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Wednesday, 17 October 2012

हिजबुल मुजाहिद्दीन का नया अड्डा बन रहा है नेपाल



हिमालय की वादियों और एवरेस्ट की तलहटी में बसा नेपाल देश, पूरे विश्व में अपनी संप्रभुता और धर्म की रक्षा के लिए जाना जाता है।  इस खूबसूरत देश की संप्रभुता और धर्म की रक्षा की वजह से इसे विश्व के सभी देश अलग नज़रिए से देखते हैं लेकिन बीते कुछ वर्षो में नेपाल की छवि काफी खराब हो चुकी है । 

तीन करोड़ की आबादी वाला ये हिन्दू राष्ट्र आज हिन्दुस्तान की उदासीनता की वजह से पकिस्तान ,चीन जैसे भारत विरोधी देशों का सहयोगी बनता जा रहा है जो हिन्दुस्तान के लिए खतरे की बात है। करीब 1800 किलोमीटर की सीमा भारतीय सीमा से सटी होने के कारण नेपाल सदियों से भारत के लिए महत्वपूर्ण रहा है। उत्तर में चीन और भारत के लिए दीवार का काम करने वाला नेपाल आज भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा बनता जा रहा है। 

आतंकी संगठनो का सबसे सुरक्षित और भारत विरोध के लिए महत्वपूर्ण देश बना 'नेपाल' आज भारत के लिए वैसे ही खतरा बन चुका है जैसे पाक अधिकृत कश्मीर के इलाकों में स्थित आतंकी संगठनो के मुख्यालय। नेपाल से आ रही खबरों के मुताबिक, नेपाल अब पाक अधिकृत कश्मीर के आतंकी संगठन 'हिजबुल मुजाहिद्दीन' का सुरक्षित और पसंदीदा स्थान बनता जा रहा है। सूत्रों की खबरों पर यदि भरोसा किया जाये तो ये खबरे भारत के लिए खतरनाक है।  

भारत के लिए कैसे महत्वपूर्ण है नेपाल

नेपाल सिर्फ हमारा पड़ोसी ही नहीं बल्कि वह हमारी धार्मिक, सांस्कृतिक अस्मिता को साझा करता है लेकिन हमारे देश की राजनीति और विदेश नीति की विफलता की वजह से आज विश्व के कई आतंकी संगठन भारतविरोधी जाल सजा रहे हैं। विदेशी आतंकियों के लिए आसान निशाना बना नेपाल और वहां की राजनीतिक अस्थिरता ने आतंकी संगठनो की काफी मदद की है। 

आज से दस वर्ष पूर्व विश्व के सबसे शांत देशों में शुमार नेपाल अपने देश के ही राजनेताओं के जाल में फंसता दिखाई पड़ रहा है। आध्यात्मिक और धार्मिक भावनाओं से ओत-प्रोत रहा ये देश पूरी दुनिया के लिए कौतूहल का विषय रहा है। ना जाने किसकी आँख लग गई इस देश को, जिसने दुनिया के सबसे शांत देश को विश्व के सबसे अशांत क्षेत्र में बदल कर रख दिया । 

नेपाल से सभी उत्तर भारतियों का भावनात्मक लगाव है, वजह भी साफ़ है कि एक संस्कृति और एक धर्म के होने की वजह से नेपाल का भारत प्रेम और भारत का नेपाल प्रेम, किसी से छुपा नहीं है। यही वजह है कि नेपाल में बीते दस वर्षों से घट रही घटनाएं आम भारतीयों को चिंतित करती हैं। नेपाल को करीब से जानने वालों का मत है कि नेपाल में भारत के खिलाफ पूरी तैयारी के साथ विदेशी ताकतें भ्रामक प्रचार कर रही हैं जबकि वहां का आम नागरिक और बुद्धिजीवी वर्ग भारत से ही ये उम्मीद लगाकर बैठा है कि सिर्फ भारत ही नेपाल और वहां के आम आदमियों की मदद कर सकता है। साथ ही हिन्दू पहचान के साथ राजतन्त्र और लोकतंत्र को एक साथ लाने की कोशिश कर सकता है। 

साम्यवादी प्रचारतंत्र ने आज हर नेपाली को भारत के प्रति शक के घेरे में धकेल दिया है। आज हालात ये है कि नेपाल में घट रही हर छोटी और बड़ी घटनाओं को भारत से जोड़ना, माओवादी हिंसा के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराना,  साथ ही स्थानीय माओवादियों द्वारा खुलेआम भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम देना, नेपाल में रोज़मर्रा की घटना हो गई है। आज नेपाल में किसी से भी बात की जाए तो यही कहता है कि नेपाल को इस स्थिति से भारत ही निकाल सकता है।

बीते 6 वर्षो में नेपाल तेज़ी से बदला है। राजनीतिक अस्थिरता, गरीबी, अशिक्षा, पलायन तो अभिशाप थे ही लेकिन वर्तमान अराजकता का सबसे बड़ा कारण  बना चीन समर्थित माओवाद । अब नेपाल में हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा भी धूमिल पड़ रही है, जिसका सबसे बड़ा कारण  माओवादियों की मदद से अंतर्राष्ट्रीय संगठनो द्वारा चर्च के माध्यम से धर्मान्तरण कराना , वही दूसरी तरफ पाकिस्तानी दूतावास ने जेहादी आतंकवाद के नए अड्डे के तौर पर नेपाल को स्थापित करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी। कुछ समय पूर्व ही पाकिस्तानी दूतावास के कर्मचारी का भारतीय करेंसी के साथ पकड़ा जाना इस बात की ओर इशारा करता है कि पाकिस्तान की मदद से आतंकी नेपाल में भारत विरोध की नींव रख चुके हैं|

पिछले 6 महीनो के दौरान भारत सीमा पर स्थित सोनौली बार्डर पर पकड़े गए हिजबुल मुजाहिद्दीन के 72 आतंकियों ने भारत की चिंता बढ़ा दी है, साथ ही ये भी साबित कर दिया है कि अब हिजबुल पीओके स्थित अपने कैम्प को नेपाल में स्थानांतरित कर रहा है। सिर्फ यही नहीं तराई क्षेत्र के सभी जिलों में खुलेआम संचालित हो रहे "चाइना स्टडी सेंटर" के माध्यम से तिब्बत की तर्ज पर नेपाल को हड़पने का उतावलापन आदि तमाम ऐसी घटनाएं है, जिसने भारत के साथ-साथ आम नेपाली नागरिकों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। 

सत्ता के संरक्षण में काठमांडू स्थित पाकिस्तानी दूतावास, पकिस्तान से आने वाले आतंकवादियों को ना केवल प्रश्रय देता है बल्कि उन्हें भारतीय सीमा पर स्थापित मदरसों तक पहुंचाने का इंतजाम भी करता है। भारत-नेपाल बार्डर पर तेजी से फैलते मदरसों को स्थापित करवाने में पाकिस्तानी दूतावास की अहम भूमिका रही है। साथ ही इन मदरसों की रोजमर्र्रा की जरूरतों को पूरा करने में आईएसआई भरपूर मदद करती है। पैसा, हथियार और आतंकी घटनाओं को कब, किस समय अंजाम देना है ये आईएसआई तय करती है| आईएसआई जैसा निर्देश देती हैं, मदरसों में बैठे हिजबुल के आतंकी उसी के अनुसार आतंकी घटनाओं को अंजाम देते हैं। 

चीन की दिलचस्पी अचानक नेपाल में ऐसे ही नहीं बढ़ी। वह अपनी विस्तारवादी महत्वकांक्षा के तहत काम कर रहा है| बीते 6 वर्षो में चीन ने नेपाल में अपने पूंजी निवेश को अचानक बढ़ा दिया है| चीन की लगातार तेज़ी और घुसपैठ ने भारत के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। सदियों से नेपाल अपनी सामान्य आवश्यकताओ के लिए भारत पर निर्भर रहा है। भारत और नेपाल 14 महत्वपूर्ण रास्तों से जुड़ते हैं, इन रास्तो की दुर्दशा भारत नेपाल संबंधो पर छाई कालिख हालत बयां करने के लिए काफी है। वहीँ,  चीन 5 बड़े अंतर्राष्ट्रीय मार्गो का तेज़ी से निर्माण कर रहा है। ल्हासा से काठमांडू और काठमांडू से लुम्बिनी तक रेल लाइन बिछाकर अपनी इस महत्वपूर्ण योजना को जल्दी से जल्दी पूरा करना चाह रहा है।

दुर्भाग्य से कही चीन अगर अपनी इन योजनाओं में सफल हो गया तो नेपाल की निर्भरता भारत पर ख़त्म हो जाएगी, उसके बाद भारत और नेपाल के रिश्ते  किस ओर जायेंगे ये चीन तय करेगा। चीन और पकिस्तान भारत को सभी सीमाओं से घेरने की कोशिश में है। इन कोशिशों को विफल करने का काम भारत सरकार और विदेश मंत्रालय का होना चाहिए था, पर नेपाल के प्रति भारत का उदासीन रवैया, आज इस देश को भारत से दूर और चीन के करीब ले गया। राजनीतिक अस्थिरता नेपाल में अराजकता का कारण बनता जा रहा है, आम उपभोक्ता वस्तुओं के मूल्यों में भारी वृद्धि और उनका आम जनता की पहुँच से बाहर होना नेपाली समाज को पुनर्विचार के लिए मजबूर कर रहा है। 

आज नेपाल में आमजन की चर्चा का विषय है नेपाल की हिन्दू देश की पहचान और उसके खोने की पीड़ा| यही वजह है कि अब नेपाल का आम जनमानस लोकतंत्र के साथ राजतंत्र का हिमायती बनता जा रहा है। नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रामबाबू परसाई का कहना है कि बीते 6 वर्षो में नेपाल में सभी प्रयोग विफल हो चुके हैं। उनका ये भी कहना है कि जब संविधान सभा नए संविधान का निर्माण नहीं कर पाई तो 1990 में बना संविधान तत्काल प्रभाव से लागू होना चाहिए।

नेपाल में 1990 में बना संविधान का जो मूल है वह 4 बातों पर टिका हुआ है और जो नेपाल की आत्मा भी है| पहला हिन्दू राष्ट्र, हिन्दू राजा, धर्मान्तरण को रोकना और गोवंश की रक्षा करना लेकिन आज नेपाल इन सभी बातों और संविधान के मूल से हट चुका है| नेपाल में वह सब कुछ हो रहा है जो नहीं होना चाहिए था। आज इन सभी के पीछे भारत सरकार की निष्क्रियता ही काम कर रही है। नेपाल के मुद्दे पर केंद्र की सत्ता पर काबिज यूपीए सरकार उदासीन है, नेपाल के लिए भारत की विदेश नीति बदल चुकी है, अब ये सब सोचने का समय नहीं रह गया है। भारत को इन सभी बातों और भविष्य में आने वाली दिक्कतों को ध्यान में रख कर नेपाल के लिए ठोस नीति बनानी पड़ेगी नहीं तो नेपाल को 'आतंकी संगठनो का आरामगाह' बनने में अब ज्यादा समय नहीं लगेगा।

Report By - Shitanshu Pati Tripathi