भारतीय राजनीति के सबसे लचीले राजनीतिज्ञ अजीत सिंह इन आम चुनावों में फूंक फूंक कर कदम रख रहे है, जाटलैंड के नाम से मशहूर पश्चिम उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर दंगों के बाद राजनीतिक परिस्थितिया काफी बदल गई है। 2009 का लोकसभा चुनाव भारतीय जनता पार्टी के साथ लड़ने वाले वाले अजित सिंह इस बार के चुनाव में कांग्रेस से हाथ मिलाया है। भाजपा ने जहा अजित सिंह को गठबंधन के तहत 7 सीटें दी थी, वही कांग्रेस ने उन्हें 9 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए हरी झंडी दे दी है। 2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के मजबूत गठबंधन से अजित सिंह 7 में से 5 सीट जीतने में कामयाब हुए थे, उसके बाद उन्होंने भाजपा से किनारा कर लिया था।
2014 के चुनाव में अजित सिंह ने कांग्रेस से गठबंधन के साथ ही दो ऐसे चर्चित चेहरों को अपने अगल बगल खड़ा कर लिया जिनको किसी भी प्रचार प्रसार की जरुरत नहीं है, ये है सपा के पूर्व दिग्गज अमर सिंह और उनकी साथी जयाप्रदा। अजित सिंह ने इन दोनों को पार्टी में शामिल करते ही इनके चुनाव लड़ने की घोषणा भी कर दी। अजित ने अमर सिंह को फतेहपुर सीकरी से चुनाव लड़ने का टिकट थमाया तो वही जयाप्रदा को अपनी चुनावी जीत की सम्भावना तलाशने के लिए बिजनौर से टिकट देकर रवाना कर दिया। राजनीतिक हलकों में अमर और जया का आरएलडी का दामन थामना चर्चा का विषय बना हुआ है।
अमर सिंह और जयाप्रदा का राष्ट्रीय लोकदल में शामिल होना उत्तर प्रदेश में क्या सियासी गुल खिलाएगा ये तो चुनाव नतीजों के बाद ही पता चलेगा, लेकिन अमर सिंह और अजित दोनों ही सियासत के ऐसे मंझे हुए खिलाड़ी हैं, जो अपने नफा और नुकसान का दूर-दूर तक आंकलन करने के बाद ही कदम उठाने के लिए पहचाने जाते हैं। अजित शुरुआत से ही अवसरवाद की राजनीति के कारण सुर्खियों में रहे हैं। कभी वह बीजेपी से दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं तो कभी मुलायम सिंह यादव की ओर मुंह ताकते हैं और जब उन्हें लगता है कि उनका सियासी भविष्य कांग्रेस के साथ महफूज रहेगा तो वह उसके साथ खड़े होने से भी परहेज नहीं करते। दूसरी ओर, अमर सिंह के लिए भी अपना सियासी वजूद बचाने के लिए लोकसभा चुनाव से पहले नया दल तलाशना जरूरी हो गया था।
वही जयाप्रदा के लिए रामपुर में प्रदेश के कद्दावर मंत्री आज़म खान ने कांटे बो दिए थे, इस बार अगर जयाप्रदा रामपुर से चुनावी मैदान में उतरती तो इतना तय था कि आज़म खान उन्हें हरवाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते। अजित सिंह ने पश्चिम उत्तर प्रदेश की राजनीति में खास असर रखने वाले और किसानो के हमदर्द रहे स्वर्गीय चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के पुत्र राकेश टिकैत को भी पार्टी में शामिल कर अमरोहा से टिकट थमा दिया। अजित सिंह इस बार अपनी सीटों को बढ़ाना चाहते है, वजह साफ है देश में अवसरवाद की राजनीति की नीव डालने वाले अजित सिंह इस बार अधिक से अधिक सीट जीतकर केंद्र में बनने वाली अगली सरकार में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर लेना चाहते है। अमर सिंह को पार्टी में शामिल कर अजित सिंह ने एक तीर से कई निशाने साध लिए। अमर सिंह के रिश्ते अन्य दलों के बड़े नेताओं से है इस्तेमाल वो चुनाव के बाद बातचीत में कर सकते है।
राकेश टिकैत के अजित सिंह का दामन पकड़ने से पश्चिम उत्तर प्रदेश में किसानो के बीच अच्छी पैठ रखने वाली भारतीय किसान यूनियन भी राष्ट्रीय लोकदल के पक्ष में खडी हो जायेगी जो चुनाव की दिशा और दशा को तय कर देगी। अजित सिंह इस बार के चुनाव में कोई भी रिस्क नहीं उठाना चाहते है यही वजह है वो कांग्रेस की खराब हालत के बावजूद भी अपना पूरा दम लगाए हुए है, वजह साफ़ है अगर केंद्र से कांग्रेस साफ़ हुई तो अजित सिंह भी ख़त्म हो जायेंगे इसकी ख़ास वजह भी है जिस तरह चुनाव जीतने के बाद अजित ने भाजपा का दामन छोड़ा वो भाजपा भूल नहीं पाई है।
2014 के चुनाव में अजित सिंह ने कांग्रेस से गठबंधन के साथ ही दो ऐसे चर्चित चेहरों को अपने अगल बगल खड़ा कर लिया जिनको किसी भी प्रचार प्रसार की जरुरत नहीं है, ये है सपा के पूर्व दिग्गज अमर सिंह और उनकी साथी जयाप्रदा। अजित सिंह ने इन दोनों को पार्टी में शामिल करते ही इनके चुनाव लड़ने की घोषणा भी कर दी। अजित ने अमर सिंह को फतेहपुर सीकरी से चुनाव लड़ने का टिकट थमाया तो वही जयाप्रदा को अपनी चुनावी जीत की सम्भावना तलाशने के लिए बिजनौर से टिकट देकर रवाना कर दिया। राजनीतिक हलकों में अमर और जया का आरएलडी का दामन थामना चर्चा का विषय बना हुआ है।
अमर सिंह और जयाप्रदा का राष्ट्रीय लोकदल में शामिल होना उत्तर प्रदेश में क्या सियासी गुल खिलाएगा ये तो चुनाव नतीजों के बाद ही पता चलेगा, लेकिन अमर सिंह और अजित दोनों ही सियासत के ऐसे मंझे हुए खिलाड़ी हैं, जो अपने नफा और नुकसान का दूर-दूर तक आंकलन करने के बाद ही कदम उठाने के लिए पहचाने जाते हैं। अजित शुरुआत से ही अवसरवाद की राजनीति के कारण सुर्खियों में रहे हैं। कभी वह बीजेपी से दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं तो कभी मुलायम सिंह यादव की ओर मुंह ताकते हैं और जब उन्हें लगता है कि उनका सियासी भविष्य कांग्रेस के साथ महफूज रहेगा तो वह उसके साथ खड़े होने से भी परहेज नहीं करते। दूसरी ओर, अमर सिंह के लिए भी अपना सियासी वजूद बचाने के लिए लोकसभा चुनाव से पहले नया दल तलाशना जरूरी हो गया था।
वही जयाप्रदा के लिए रामपुर में प्रदेश के कद्दावर मंत्री आज़म खान ने कांटे बो दिए थे, इस बार अगर जयाप्रदा रामपुर से चुनावी मैदान में उतरती तो इतना तय था कि आज़म खान उन्हें हरवाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते। अजित सिंह ने पश्चिम उत्तर प्रदेश की राजनीति में खास असर रखने वाले और किसानो के हमदर्द रहे स्वर्गीय चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के पुत्र राकेश टिकैत को भी पार्टी में शामिल कर अमरोहा से टिकट थमा दिया। अजित सिंह इस बार अपनी सीटों को बढ़ाना चाहते है, वजह साफ है देश में अवसरवाद की राजनीति की नीव डालने वाले अजित सिंह इस बार अधिक से अधिक सीट जीतकर केंद्र में बनने वाली अगली सरकार में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर लेना चाहते है। अमर सिंह को पार्टी में शामिल कर अजित सिंह ने एक तीर से कई निशाने साध लिए। अमर सिंह के रिश्ते अन्य दलों के बड़े नेताओं से है इस्तेमाल वो चुनाव के बाद बातचीत में कर सकते है।
राकेश टिकैत के अजित सिंह का दामन पकड़ने से पश्चिम उत्तर प्रदेश में किसानो के बीच अच्छी पैठ रखने वाली भारतीय किसान यूनियन भी राष्ट्रीय लोकदल के पक्ष में खडी हो जायेगी जो चुनाव की दिशा और दशा को तय कर देगी। अजित सिंह इस बार के चुनाव में कोई भी रिस्क नहीं उठाना चाहते है यही वजह है वो कांग्रेस की खराब हालत के बावजूद भी अपना पूरा दम लगाए हुए है, वजह साफ़ है अगर केंद्र से कांग्रेस साफ़ हुई तो अजित सिंह भी ख़त्म हो जायेंगे इसकी ख़ास वजह भी है जिस तरह चुनाव जीतने के बाद अजित ने भाजपा का दामन छोड़ा वो भाजपा भूल नहीं पाई है।
No comments:
Post a Comment