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Tuesday, 25 March 2014

राजनाथ कही भितरघात के शिकार तो नहीं होंगे!

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में होली के फाग और चौक की भांग की तरह ही अब फ़िज़ाओं में चुनावी सरगर्मिया तेज़ हो गई है। भारतीय जनता पार्टी और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई की परम्परागत सीट के पार्टी ने नया योद्धा भी चुन लिया है। भाजपा ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह को लखनऊ फतह के लिए चुना है। भाजपा ने अटल का खड़ाऊं लेकर 2009 का चुनाव मुश्किल से जीते लालजी टंडन को किनारे कर दिया है। पार्टी के इस फैसले से कही ख़ुशी है तो गम ज्यादा। गम टंडन खेमे में ज्यादा है और यही वजह है कि भाजपा के अंदरखाने ये चर्चा है कि टंडन क्या पूरे मन से कभी उत्तर प्रदेश की सरकार में उनके कनिष्ठ रहे और वर्त्तमान में उनके अगुवा राजनाथ सिंह का सहयोग करेंगे। जो भाजपाई टंडन को करीब से जानता है वो कुछ बोलने को तैयार नहीं| यही बात राजनाथ सिंह के खिलाफ जा सकती है। 

लखनऊ की चुनावी फ़िज़ाओं में ये चर्चा ऐसे ही नहीं उड़ रही है, राजनाथ सिंह के टिकट मिलने और न मिलने के बीच जिन चर्चाओं ने ख़बरों में जगहें बनाई थी उसमें लालजी टंडन का वो बयान भी काफी महत्वपूर्ण था जिसमें उन्होंने कहा था कि लखनऊ की सीट वो सिर्फ और सिर्फ भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के लिए ही छोड़ेंगे| टंडन ने ये भी कहा चाहे कोई आ जाए ये सीट मेरी है किसी और के लिए इसे खाली नहीं करूँगा। टंडन के इन बयानो का निहितार्थ समझने में उनके करीबियों को ज्यादा समय नहीं लगा वही उनके विरोधियों को ये समझने में देर न लगी कि टंडन नाराज हुए तो कही भाजपा को लखनऊ सीट पर फजीहत न झेलनी पड़े। भाजपा और टंडन को करीब से जानने वालों का मानना है कि भाजपा इसका परिणाम अमित पुरी प्रकरण में देख चुकी है जब विधानसभा के उपचुनाव में टंडन ने अमित पुरी का विरोध किया और वो कांग्रेस के राम किशोर शुक्ला से उपचुनाव हार गए। टंडन के नारजगी की वजह उनके बेटे गोपाल टंडन का भाजपा से टिकट काटा जाना बताया गया। 

लोकसभा चुनाव का बिगुल बजते ही टंडन ने भी अपन चुनावी तैयारिया शुरू कर दी थी, लेकिन 2 मार्च को लखनऊ में हुई विजय शंखनाद रैली में आशा के अनुरूप भीड़ न जमा होने की वजह से मोदी सहित भाजपा के बड़े नेताओं कि नाराजगी की ख़बरें भी आई, वजह साफ़ थी रैली के प्रभारी लालजी टंडन थे। अब राजनाथ सिंह के लखनऊ सीट से चुनाव लड़ने पर मोहर लगते ही ये बात भी सामने आ रही है टंडन खासे नाराज है। टंडन लखनऊ के खांटी रहने वाले है उनका परिवार कई पीढ़ियों से लखनऊ में रहता आ रहा है, पुराने लखनऊ में लालजी टंडन की पकड़ काफी अच्छी मानी जाती रही है। टंडन के बारे में ये भी कहा जाता रहा है कि अगर टंडन नाराज हो जाएँ तो वोट शिफ्टिंग में ज्यादा समय नहीं लगता। टंडन का लखनऊ संसदीय सीट पर प्रभाव अटल बिहारी वाजपेई के जमाने से रहा है, लालजी टंडन अटल जी के संसदीय प्रभारी भी रहे है और अटल जी जब जब चुनाव लड़े उनके चुनाव संचालन का काम भी टंडन ने ही देखा| यही वजह है टंडन यहाँ के कार्यकर्ताओं की नस नस से वाकिफ है साथ ही उन्हें लखनऊ की गलिया भी पहचानती है। 

लखनऊ में आजकल एक बात की और चर्चा है टंडन अपने उस विरोधी से काफी घुल मिल रहे है जिनको उन्होंने बीते चुनाव में करीब 42 हज़ार वोटो से शिकस्त दी थी| उन्ही रीता बहुगुणा जोशी के साथ एक होली मिलन समारोह में हंसते बोलते देखे गए। 2009 के चुनाव में रीता बहुगुणा जोशी चुनाव से मात्र 15 दिन पहले कांग्रेस की उम्मीदवार घोषित की गई थी| रीता ने अपने पिता हेमवती नंदन बहुगुणा के नाम पर वोट माँगा था, लोगो ने उन्हें भरपूर आशीर्वाद भी दिया और रीता, टंडन से करीब 42 हज़ार वोट से पीछे रह गई, 2009 के चुनाव में लखनऊ के लोगो ने कहा कि टंडन ने भले अटल जी के नाम पर लोकसभा का चुनाव जीता लेकिन लखनऊ का दिल अपनी बातों और सादगी से रीता लूट ले गई। टंडन और रीता बहुगुणा जोशी आजकल चुनावी घोषणा और टिकट बटवारें के बाद काफी करीब माने जा रहे है। इनकी नजदीकी मीडिया और अखबारों की सुर्खिया भी बन चुकी है। रीता बहुगुणा जोशी कांग्रेस की उम्मीदवार है और टंडन अपनी भाजपा से उम्मीदवारी को यहाँ देखने और समझने वाली बात ये होगी की जिस टंडन के पास अटल बिहारी वाजपेई की विरासत रुपी खड़ाऊं मौजूद है वो खड़ाऊं टंडन अपने साथी को पहनाते है या उसे सहेज कर रख देते है। 

लखनऊ लोकसभा सीट उत्तर प्रदेश की वीवीआईपी सीटों में शुमार है जहाँ 1991 से लगातार भाजपा का कब्जा रहा उसके पहले 1989 के चुनाव में जनता दल के मान्धाता सिंह ने अपना परचम लहराया था। 1991 में भाजपा से अटल बिहारी वाजपेई ने जीत का जो सिलसिला शुरू किया वो भाजपा के लिए आज भी जारी है| अटल के हनुमान कहे जाने वाले लालजी टंडन उनसे कहा करते थे उन्हें सिर्फ नामांकन करने लखनऊ आना है बाकी परिणाम के बाद प्रमाणपत्र लेने| आज वही टंडन नाराज है। 1991 में अटल बिहारी वाजपेई ने जनता दल के मान्धाता सिंह को करीब 5 लाख 45 हज़ार मतों से हराकर रिकार्ड बनाया था| मान्धाता सिंह जो पूर्व सांसद थे उन्हें मात्र 40 हज़ार वोट मिले थे। 1996 में अटल बिहारी वाजपेई के खिलाफ समाजवादी पार्टी ने सिने स्टार राज बब्बर को उतारा अटल बिहारी वाजपेई की राजनीति और लोगो के दिलों में उनकी जगह को राज बब्बर अपने ग्लैमर से बदल नहीं पाये। अटल बिहारी वाजपेई राज बब्बर को 1 लाख 24 हज़ार वोट से हराया। 1998 का चुनाव एक 13 दिन का प्रधानमंत्री रह चुका व्यक्ति लड़ रहा था| लखनऊ के लोगो ने अटल जी में भविष्य का बेहतर प्रधानमंत्री देखा लिया था उन्होंने पूरे मन से अटल जी का साथ दिया और अटल जी ने सपा के मुज्जफ्फर अली को 2 लाख 16 हज़ार वोटों से मात दी। 

1999 का चुनाव ख़ास था अटल बिहारी वाजपेई 13 महीनो की सरकार का नेतृत्व कर चुनावों में कूदे थे। कांग्रेस ने भी सभी पार्टियों से बात कर डॉ कर्ण सिंह को अटल जी के खिलाफ उतारा| अटल ने डॉ कर्ण सिंह को 1 लाख 24 हाज़र वोटो से हराया| वही 2004 अटल बिहारी वाजपेई का अंतिम चुनाव साबित हुआ जब भाजपा इंडिया शाइनिंग का नारा बुलंद कर चुनाव में उतरी| सपा ने अटल बिहार वाजपेई के खिलाफ मधु गुप्ता को मैदान में उतारा अटल जी अपना वोट प्रतिशत बढ़ाते हुए मधु गुप्ता को 2 लाख 17 हज़ार वोट से मात दी लेकिन भाजपा आम चुनाव के बाद केंद्र की सत्ता से बाहर हो गई। 2009 में कांग्रेस की देरी ने एक तरह से लालजी टंडन को वाकओवर दे दिया था, लेकिन रीता बहुगुणा जोशी की प्रत्याशिता घोषित होते ही चुनावी माहौल में गर्मी आ गई टंडन के ऊपर अटल जी का किला बचाने की भारी जिम्मेदारी आ गई| टंडन ने भी अटल जी के गढ़ को बचाने के लिए उन्ही के नाम का सहारा ले लिया और आम जनता के पास उनके खड़ाऊं की दुहाई देकर वोट देने की अपील की| लोगो ने अटल जी के नाम पर उन्हें वोट दिया परिणाम आने पर लालजी टंडन बमुश्किल 42 हज़ार वोट से जीते, टंडन की जीत पर सवाल भी खड़े हुए, जहां अटल बिहारी वाजपेई लगातार पांच चुनावो में 1 लाख से लेकर 5 लाख वोटो के अंतर से जीत दर्ज करते रहे वही टंडन की जीत कुछ हज़ारों में सिमट गई। 

भाजपा समझ गई अटल के गढ़ में सेंध पड़ चुकी है, कांग्रेस ने इस बार समय से बहुत पहले ही रीता बहुगुणा जोशी को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है वही रीता ने भी लखनऊ के कैंट क्षेत्र से विधायक बनने के बाद लोकसभा चुनाव के लिए अपनी सक्रियता बढ़ा दी थी, टंडन लखनऊ की राजनीति के पुराने खिलाड़ी है वही राजनाथ सिंह अपनी लोकसभा सीट गजियाबाद को छोड़कर लखनऊ आये है देखना ये है कि इस बार जनता राजनाथ सिंह को वोट देकर चुनती है या राजनाथ भी अटल बिहारी वाजपेई के नाम का सहारा लेते है वही टंडन अपनी प्रत्याशिता खारीज होने के बाद क्या गुल खिलाते है ये देखना रोचक होगा, वैसे विरोधी उम्मीदवारों के साथ गुझियों का स्वाद ले रहे टंडन चुनाव के दौरान क्या करते है, कही टंडन की नाराजगी किसी का मुंह कसैला न कर दे और उनकी कोई खतरनाक चाल किसी का आँचल खुशियों से न भर दे ।

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