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Monday, 17 August 2015

उम्मीदों से मौन तक मोदी.......... 


वो गरजते थे विरोधियों पर बरसते थे क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से देश की उम्मीदें टूटने लगी है? आज के परिपेक्ष्य में बड़ा सवाल यही है। सोशल मीडिया और मीडिया रिपोर्ट्स पर नज़र डालें तो आज प्रधानमन्त्री मोदी के खिलाफ देश में विरोध की चिंगारी फूटने लगी है जो है तो हल्की सी है लेकिन उसे आग बनने में शायद ज्यादा समय न लगे । सोशल मीडिया पर जिस तरह आम जन अपनी स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति को प्रदर्शित कर रहा है उसने एक गरिमामयी पद के प्रोटोकॉल की धज्जियाँ उड़ा दी है ।  

प्रधानमंत्री को आज देश में उनके विरोधी और 2014 के चुनावों में उनके वादों और इरादों पर विश्वास करके वोट देने वाले जुमले बाज़ प्रधानमंत्री के तौर पर उद्धघृत कर रहे है। प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ शब्दों की बाढ़ और खिलाफत की आंधी ऐसे ही नहीं चली इसकी ख़ास वजह भी,बीते एक सालों में ही पैदा हुई जब जनता की उम्मीदें धीरे धीरे उस कपडे की तरह उधड़ने लगी जिसके रेशे उतरते ही कपड़ा अपनी मजबूती खोने लगता है, और उसके आर पार सब कुछ दिखाई देने लगता है ऐसा ही कुछ हाल मोदी के उन वादों का भी हुआ जो जनता के अधिकारों से जुड़े थे और जिन्हे मोदी ने अपनी चुनावी रैलियों में सार्वजनिक मंचो से किया करते थे। 

बीते दिनों लोकसभा में मानसून सत्र के दौरान जो कुछ हुआ उसे कांग्रेस की सफलता न मानते हुए केंद्र में बैठी भाजपा और मोदी सरकार की विफलता माना जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी । कांग्रेस अपनी रणनीति में सफल रही या परदे के पीछे सरकार ने कोई बड़ा खेल खेला ये साफ़ नहीं हो सका। आरोप प्रत्यारोप का दौर लंबा चला सब बोल रहे थे बस चुप थे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आखिर क्या वजह रही की, बिहार के गया में परिवर्तन रैली के दौरान विरोधियों की खामिंया गिनाने वाले मोदी देश की सबसे बड़ी पंचायत में अपनी सीट पर भी नज़र नहीं आएं। क्या जनता को प्रधानमंत्री मोदी से निराशा हाथ लगी या जनता मोदी के मौन को अपना भाग्य समझ बैठी है । 


क्या भारत की जनता इतनी कमजोर हो गई जो मोदी जी की रैलियों में सिर्फ सवालों के जवाब दें या उनसे सवाल पूछने की हिम्मत भी कर सके। वैसे लोकतंत्र में बड़ी ताकत होती है मोदी का मौन नहीं टूटा तो उसे भी जनता अपनी चुप्पी के साथ उसी तरह तोड़ेगी जैसे कांग्रेस के दम्भ को उन्होंने बीते लोकसभा चुनाव में चकनाचूर कर दिया और उसे उस स्थिति में पहुंचा दिया जो बीते 6 दशकों में नहीं हुआ कांग्रेस 440 सीटों से 44 पर पहुँच गई। जनता मौन होती है तो भूचाल आता है कही आने वाले चुनावों में  जनता भाजपा को दिल्ली की उस चुनावी तस्वीर को दिखा दे और ये हाल मोदी की चुप्पी की वजह से होगा जिसे झेलना भाजपा को पड़ेगा। प्रधानमंत्री मोदी आज अपने को विश्व के नेता के तौर पर स्थापित करने में लगे है लेकिन विश्व नेता वो तभी बन सकते है खुद के देश भारत के अंतिम आदमी को वो संतुष्ट कर पाएं । 

प्रधानमंत्री मोदी को उनके तर्कों और बोलने की शक्ति के लिए जाना जाता है लेकिन मोदी का मौन और उनके खिलाफ मीडिया और सोशल मीडिया में बन रहे माहौल उनके लिए एलार्म की तरह है जिसे उन्हें सुन लेना चाहिए और उस जनता की दिक्कतों को धरातल पर लाना चाहिए जिसने उन्हें दोनों हाथ खोल कर समर्थन दिया था ।  

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