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Tuesday, 25 March 2014

अमर - जया के बाद राकेश आरएलडी में आने के मायने

भारतीय राजनीति के सबसे लचीले राजनीतिज्ञ अजीत सिंह इन आम चुनावों में फूंक फूंक कर कदम रख रहे है, जाटलैंड के नाम से मशहूर पश्चिम उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर दंगों के बाद राजनीतिक परिस्थितिया काफी बदल गई है। 2009 का लोकसभा चुनाव भारतीय जनता पार्टी के साथ लड़ने वाले वाले अजित सिंह इस बार के चुनाव में कांग्रेस से हाथ मिलाया है। भाजपा ने जहा अजित सिंह को गठबंधन के तहत 7 सीटें दी थी, वही कांग्रेस ने उन्हें 9 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए हरी झंडी दे दी है। 2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के मजबूत गठबंधन से अजित सिंह 7 में से 5 सीट जीतने में कामयाब हुए थे, उसके बाद उन्होंने भाजपा से किनारा कर लिया था। 

2014 के चुनाव में अजित सिंह ने कांग्रेस से गठबंधन के साथ ही दो ऐसे चर्चित चेहरों को अपने अगल बगल खड़ा कर लिया जिनको किसी भी प्रचार प्रसार की जरुरत नहीं है, ये है सपा के पूर्व दिग्गज अमर सिंह और उनकी साथी जयाप्रदा। अजित सिंह ने इन दोनों को पार्टी में शामिल करते ही इनके चुनाव लड़ने की घोषणा भी कर दी। अजित ने अमर सिंह को फतेहपुर सीकरी से चुनाव लड़ने का टिकट थमाया तो वही जयाप्रदा को अपनी चुनावी जीत की सम्भावना तलाशने के लिए बिजनौर से टिकट देकर रवाना कर दिया। राजनीतिक हलकों में अमर और जया का आरएलडी का दामन थामना चर्चा का विषय बना हुआ है। 

अमर सिंह और जयाप्रदा का राष्ट्रीय लोकदल में शामिल होना उत्तर प्रदेश में क्या सियासी गुल खिलाएगा ये तो चुनाव नतीजों के बाद ही पता चलेगा, लेकिन अमर सिंह और अजित दोनों ही सियासत के ऐसे मंझे हुए खिलाड़ी हैं, जो अपने नफा और नुकसान का दूर-दूर तक आंकलन करने के बाद ही कदम उठाने के लिए पहचाने जाते हैं। अजित शुरुआत से ही अवसरवाद की राजनीति के कारण सुर्खियों में रहे हैं। कभी वह बीजेपी से दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं तो कभी मुलायम सिंह यादव की ओर मुंह ताकते हैं और जब उन्हें लगता है कि उनका सियासी भविष्य कांग्रेस के साथ महफूज रहेगा तो वह उसके साथ खड़े होने से भी परहेज नहीं करते। दूसरी ओर, अमर सिंह के लिए भी अपना सियासी वजूद बचाने के लिए लोकसभा चुनाव से पहले नया दल तलाशना जरूरी हो गया था। 

वही जयाप्रदा के लिए रामपुर में प्रदेश के कद्दावर मंत्री आज़म खान ने कांटे बो दिए थे, इस बार अगर जयाप्रदा रामपुर से चुनावी मैदान में उतरती तो इतना तय था कि आज़म खान उन्हें हरवाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते। अजित सिंह ने पश्चिम उत्तर प्रदेश की राजनीति में खास असर रखने वाले और किसानो के हमदर्द रहे स्वर्गीय चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के पुत्र राकेश टिकैत को भी पार्टी में शामिल कर अमरोहा से टिकट थमा दिया। अजित सिंह इस बार अपनी सीटों को बढ़ाना चाहते है, वजह साफ है देश में अवसरवाद की राजनीति की नीव डालने वाले अजित सिंह इस बार अधिक से अधिक सीट जीतकर केंद्र में बनने वाली अगली सरकार में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर लेना चाहते है। अमर सिंह को पार्टी में शामिल कर अजित सिंह ने एक तीर से कई निशाने साध लिए। अमर सिंह के रिश्ते अन्य दलों के बड़े नेताओं से है इस्तेमाल वो चुनाव के बाद बातचीत में कर सकते है। 

राकेश टिकैत के अजित सिंह का दामन पकड़ने से पश्चिम उत्तर प्रदेश में किसानो के बीच अच्छी पैठ रखने वाली भारतीय किसान यूनियन भी राष्ट्रीय लोकदल के पक्ष में खडी हो जायेगी जो चुनाव की दिशा और दशा को तय कर देगी। अजित सिंह इस बार के चुनाव में कोई भी रिस्क नहीं उठाना चाहते है यही वजह है वो कांग्रेस की खराब हालत के बावजूद भी अपना पूरा दम लगाए हुए है, वजह साफ़ है अगर केंद्र से कांग्रेस साफ़ हुई तो अजित सिंह भी ख़त्म हो जायेंगे इसकी ख़ास वजह भी है जिस तरह चुनाव जीतने के बाद अजित ने भाजपा का दामन छोड़ा वो भाजपा भूल नहीं पाई है।

राजनाथ कही भितरघात के शिकार तो नहीं होंगे!

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में होली के फाग और चौक की भांग की तरह ही अब फ़िज़ाओं में चुनावी सरगर्मिया तेज़ हो गई है। भारतीय जनता पार्टी और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई की परम्परागत सीट के पार्टी ने नया योद्धा भी चुन लिया है। भाजपा ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह को लखनऊ फतह के लिए चुना है। भाजपा ने अटल का खड़ाऊं लेकर 2009 का चुनाव मुश्किल से जीते लालजी टंडन को किनारे कर दिया है। पार्टी के इस फैसले से कही ख़ुशी है तो गम ज्यादा। गम टंडन खेमे में ज्यादा है और यही वजह है कि भाजपा के अंदरखाने ये चर्चा है कि टंडन क्या पूरे मन से कभी उत्तर प्रदेश की सरकार में उनके कनिष्ठ रहे और वर्त्तमान में उनके अगुवा राजनाथ सिंह का सहयोग करेंगे। जो भाजपाई टंडन को करीब से जानता है वो कुछ बोलने को तैयार नहीं| यही बात राजनाथ सिंह के खिलाफ जा सकती है। 

लखनऊ की चुनावी फ़िज़ाओं में ये चर्चा ऐसे ही नहीं उड़ रही है, राजनाथ सिंह के टिकट मिलने और न मिलने के बीच जिन चर्चाओं ने ख़बरों में जगहें बनाई थी उसमें लालजी टंडन का वो बयान भी काफी महत्वपूर्ण था जिसमें उन्होंने कहा था कि लखनऊ की सीट वो सिर्फ और सिर्फ भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के लिए ही छोड़ेंगे| टंडन ने ये भी कहा चाहे कोई आ जाए ये सीट मेरी है किसी और के लिए इसे खाली नहीं करूँगा। टंडन के इन बयानो का निहितार्थ समझने में उनके करीबियों को ज्यादा समय नहीं लगा वही उनके विरोधियों को ये समझने में देर न लगी कि टंडन नाराज हुए तो कही भाजपा को लखनऊ सीट पर फजीहत न झेलनी पड़े। भाजपा और टंडन को करीब से जानने वालों का मानना है कि भाजपा इसका परिणाम अमित पुरी प्रकरण में देख चुकी है जब विधानसभा के उपचुनाव में टंडन ने अमित पुरी का विरोध किया और वो कांग्रेस के राम किशोर शुक्ला से उपचुनाव हार गए। टंडन के नारजगी की वजह उनके बेटे गोपाल टंडन का भाजपा से टिकट काटा जाना बताया गया। 

लोकसभा चुनाव का बिगुल बजते ही टंडन ने भी अपन चुनावी तैयारिया शुरू कर दी थी, लेकिन 2 मार्च को लखनऊ में हुई विजय शंखनाद रैली में आशा के अनुरूप भीड़ न जमा होने की वजह से मोदी सहित भाजपा के बड़े नेताओं कि नाराजगी की ख़बरें भी आई, वजह साफ़ थी रैली के प्रभारी लालजी टंडन थे। अब राजनाथ सिंह के लखनऊ सीट से चुनाव लड़ने पर मोहर लगते ही ये बात भी सामने आ रही है टंडन खासे नाराज है। टंडन लखनऊ के खांटी रहने वाले है उनका परिवार कई पीढ़ियों से लखनऊ में रहता आ रहा है, पुराने लखनऊ में लालजी टंडन की पकड़ काफी अच्छी मानी जाती रही है। टंडन के बारे में ये भी कहा जाता रहा है कि अगर टंडन नाराज हो जाएँ तो वोट शिफ्टिंग में ज्यादा समय नहीं लगता। टंडन का लखनऊ संसदीय सीट पर प्रभाव अटल बिहारी वाजपेई के जमाने से रहा है, लालजी टंडन अटल जी के संसदीय प्रभारी भी रहे है और अटल जी जब जब चुनाव लड़े उनके चुनाव संचालन का काम भी टंडन ने ही देखा| यही वजह है टंडन यहाँ के कार्यकर्ताओं की नस नस से वाकिफ है साथ ही उन्हें लखनऊ की गलिया भी पहचानती है। 

लखनऊ में आजकल एक बात की और चर्चा है टंडन अपने उस विरोधी से काफी घुल मिल रहे है जिनको उन्होंने बीते चुनाव में करीब 42 हज़ार वोटो से शिकस्त दी थी| उन्ही रीता बहुगुणा जोशी के साथ एक होली मिलन समारोह में हंसते बोलते देखे गए। 2009 के चुनाव में रीता बहुगुणा जोशी चुनाव से मात्र 15 दिन पहले कांग्रेस की उम्मीदवार घोषित की गई थी| रीता ने अपने पिता हेमवती नंदन बहुगुणा के नाम पर वोट माँगा था, लोगो ने उन्हें भरपूर आशीर्वाद भी दिया और रीता, टंडन से करीब 42 हज़ार वोट से पीछे रह गई, 2009 के चुनाव में लखनऊ के लोगो ने कहा कि टंडन ने भले अटल जी के नाम पर लोकसभा का चुनाव जीता लेकिन लखनऊ का दिल अपनी बातों और सादगी से रीता लूट ले गई। टंडन और रीता बहुगुणा जोशी आजकल चुनावी घोषणा और टिकट बटवारें के बाद काफी करीब माने जा रहे है। इनकी नजदीकी मीडिया और अखबारों की सुर्खिया भी बन चुकी है। रीता बहुगुणा जोशी कांग्रेस की उम्मीदवार है और टंडन अपनी भाजपा से उम्मीदवारी को यहाँ देखने और समझने वाली बात ये होगी की जिस टंडन के पास अटल बिहारी वाजपेई की विरासत रुपी खड़ाऊं मौजूद है वो खड़ाऊं टंडन अपने साथी को पहनाते है या उसे सहेज कर रख देते है। 

लखनऊ लोकसभा सीट उत्तर प्रदेश की वीवीआईपी सीटों में शुमार है जहाँ 1991 से लगातार भाजपा का कब्जा रहा उसके पहले 1989 के चुनाव में जनता दल के मान्धाता सिंह ने अपना परचम लहराया था। 1991 में भाजपा से अटल बिहारी वाजपेई ने जीत का जो सिलसिला शुरू किया वो भाजपा के लिए आज भी जारी है| अटल के हनुमान कहे जाने वाले लालजी टंडन उनसे कहा करते थे उन्हें सिर्फ नामांकन करने लखनऊ आना है बाकी परिणाम के बाद प्रमाणपत्र लेने| आज वही टंडन नाराज है। 1991 में अटल बिहारी वाजपेई ने जनता दल के मान्धाता सिंह को करीब 5 लाख 45 हज़ार मतों से हराकर रिकार्ड बनाया था| मान्धाता सिंह जो पूर्व सांसद थे उन्हें मात्र 40 हज़ार वोट मिले थे। 1996 में अटल बिहारी वाजपेई के खिलाफ समाजवादी पार्टी ने सिने स्टार राज बब्बर को उतारा अटल बिहारी वाजपेई की राजनीति और लोगो के दिलों में उनकी जगह को राज बब्बर अपने ग्लैमर से बदल नहीं पाये। अटल बिहारी वाजपेई राज बब्बर को 1 लाख 24 हज़ार वोट से हराया। 1998 का चुनाव एक 13 दिन का प्रधानमंत्री रह चुका व्यक्ति लड़ रहा था| लखनऊ के लोगो ने अटल जी में भविष्य का बेहतर प्रधानमंत्री देखा लिया था उन्होंने पूरे मन से अटल जी का साथ दिया और अटल जी ने सपा के मुज्जफ्फर अली को 2 लाख 16 हज़ार वोटों से मात दी। 

1999 का चुनाव ख़ास था अटल बिहारी वाजपेई 13 महीनो की सरकार का नेतृत्व कर चुनावों में कूदे थे। कांग्रेस ने भी सभी पार्टियों से बात कर डॉ कर्ण सिंह को अटल जी के खिलाफ उतारा| अटल ने डॉ कर्ण सिंह को 1 लाख 24 हाज़र वोटो से हराया| वही 2004 अटल बिहारी वाजपेई का अंतिम चुनाव साबित हुआ जब भाजपा इंडिया शाइनिंग का नारा बुलंद कर चुनाव में उतरी| सपा ने अटल बिहार वाजपेई के खिलाफ मधु गुप्ता को मैदान में उतारा अटल जी अपना वोट प्रतिशत बढ़ाते हुए मधु गुप्ता को 2 लाख 17 हज़ार वोट से मात दी लेकिन भाजपा आम चुनाव के बाद केंद्र की सत्ता से बाहर हो गई। 2009 में कांग्रेस की देरी ने एक तरह से लालजी टंडन को वाकओवर दे दिया था, लेकिन रीता बहुगुणा जोशी की प्रत्याशिता घोषित होते ही चुनावी माहौल में गर्मी आ गई टंडन के ऊपर अटल जी का किला बचाने की भारी जिम्मेदारी आ गई| टंडन ने भी अटल जी के गढ़ को बचाने के लिए उन्ही के नाम का सहारा ले लिया और आम जनता के पास उनके खड़ाऊं की दुहाई देकर वोट देने की अपील की| लोगो ने अटल जी के नाम पर उन्हें वोट दिया परिणाम आने पर लालजी टंडन बमुश्किल 42 हज़ार वोट से जीते, टंडन की जीत पर सवाल भी खड़े हुए, जहां अटल बिहारी वाजपेई लगातार पांच चुनावो में 1 लाख से लेकर 5 लाख वोटो के अंतर से जीत दर्ज करते रहे वही टंडन की जीत कुछ हज़ारों में सिमट गई। 

भाजपा समझ गई अटल के गढ़ में सेंध पड़ चुकी है, कांग्रेस ने इस बार समय से बहुत पहले ही रीता बहुगुणा जोशी को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है वही रीता ने भी लखनऊ के कैंट क्षेत्र से विधायक बनने के बाद लोकसभा चुनाव के लिए अपनी सक्रियता बढ़ा दी थी, टंडन लखनऊ की राजनीति के पुराने खिलाड़ी है वही राजनाथ सिंह अपनी लोकसभा सीट गजियाबाद को छोड़कर लखनऊ आये है देखना ये है कि इस बार जनता राजनाथ सिंह को वोट देकर चुनती है या राजनाथ भी अटल बिहारी वाजपेई के नाम का सहारा लेते है वही टंडन अपनी प्रत्याशिता खारीज होने के बाद क्या गुल खिलाते है ये देखना रोचक होगा, वैसे विरोधी उम्मीदवारों के साथ गुझियों का स्वाद ले रहे टंडन चुनाव के दौरान क्या करते है, कही टंडन की नाराजगी किसी का मुंह कसैला न कर दे और उनकी कोई खतरनाक चाल किसी का आँचल खुशियों से न भर दे ।

Namo से हर हर मोदी तक

 काशी एक धर्मनगरी होने और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर जानी जाने वाली सांस्कृतिक नगरी है। काशी को मोक्षदायनी नगरी भी कहा जाता है। काशी को घाटों का शहर भी कहा जाता है| अस्सी घाट से लेकर वरूणा के मध्य स्थिति काशी क्षेत्र का अपना एक अलग महत्व है। काशी में एक बात और सामान है जो यहाँ के सभी हिन्दू साम्प्रदाय में विश्वास रखने वाले घरों में बोला जाता है वो धार्मिक वाक्य है "हर हर महादेव" आजकल इस धार्मिक भावनाओ से ओतप्रोत होकर बोले जाने वाले इस धार्मिक नारे को मोदी के अंध भक्त उनके नाम के आगे लगाकर "हर हर मोदी" बोल रहे है। 

हर हर महादेव को हर हर मोदी बोले जाने को लेकर वाराणसी के साधू संतो में ख़ासा रोष है। जहां पहले काशी के स्थानीय संत ने हर हर मोदी नारे का विरोध किया अब शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने भी हर हर मोदी नारे पर ऐतराज जता दिया है। शंकराचार्य के इस नारे के विपक्ष में बयान देने से ये मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है आजकल वाराणसी संसदीय क्षेत्र दो वजहों से सभी की नज़रों में आ गई है पहली वजह भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी के चुनाव लड़ने और दूसरी वजह हर हर महादेव की जगह हर हर मोदी ने इसकी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा शुरू करा दी है। शंकराचार्य और काशी के विद्द्वानों ने इस बात को आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के समक्ष रखा है। 

वैसे भाजपा और मोदी खेमा किसी भी तरह से बनारस के चुनाव को हलके में नहीं ले रहा है तभी आजकल भाजपा खेमे में इस बात की चर्चा भी जोरो पर है कि मोदी बनारस में बड़े अंतर से चुनाव तभी जीतेंगे जब यहाँ से कोई बड़ा मुस्लिम चेहरा उतरेगा| भाजपा में इस बात की चर्चा भी है कि 2009 लोकसभा चुनाव में दूसरे नंबर पर रहे मुख्तार अंसारी को स्थानीय निवासी और भाजपाई मोदी के सामने खड़े देखना चाहते है। भाजपाइयों का ये भी मानना है अगर मोदी के सामने मुख्तार आते है तो मोदी यहां से चुनाव जीतेंगे ही, लेकिन मुख्तार अंसारी लड़े तो साम्प्रदायिक आधार पर मतों के ध्रुवीकरण के चलते मोदी की भारी मतों से जीत होगी यही वजह है कि धार्मिक भावनाओ को भी इन चुनावों से जोड़कर हर हर महादेव की जगह हर हर मोदी का नारा दिया गया है। 

वाराणसी संसदीय क्षेत्र में रोहनिया, वाराणसी दक्षिणी, वाराणसी उत्तरी, कैन्ट, सेवापुरी विधान सभायें आती है जिनमें से 3 पर भाजपा व एक-एक पर अपना दल व सपा का कब्जा है। वाराणसी उत्तरी से भाजपा के रविन्द्र जायसवाल, दक्षिणी से श्याम देव राय चौधरी उर्फ दादा, कैन्ट से श्रीमती ज्योत्सना श्रीवास्तव, सेवापुरी के सपा के सुरेन्द्र पटेल व रोहनिया से अपना दल की अनुप्रिया पटेल विधायक हैं। भाजपा ने मतों के ध्रुवीकरण के लिए नरेन्द्र मोदी को वाराणसी से अपना उम्मीदवार बनाया है जिसका उत्तर प्रदेश के पूर्वी क्षेत्रों के साथ-साथ बिहार, झारखण्ड, मध्यप्रदेश की कई लोक सभा क्षेत्र प्रभावित होंगे। 

सपा ने इस बार अपना प्रत्याशी बदलते हुए अजय राय की जगह कैलाश चौरसिया को अपना उम्मीदवार बनाया है| बसपा ने पिछले चुनाव में अपना दल से लड़े विजय प्रकाश जायसवाल को अपना उम्मीदवार बनाया। कौमी एकता मंच ने मुख्तार अंसारी की पत्नी को उम्मीदवार घोषित किया है लेकिन कयास यह लगाया जा रहा है कि घोषी के साथ-साथ मुख्तार अंसारी वाराणसी से भी लड़ेंगे। कांग्रेस ने अभी अपने उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है। स्थानीय दावेदारों ने पूर्व सांसद डाॅ0 राजेश मिश्रा, पिन्डरा से चार बार चुनाव जीत रहें अजय राज का नाम प्रमुख है। परन्तु इधर कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव व मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का भी नाम चर्चा में है। 

वाराणसी संसदीय क्षेत्र से 1996, 98 व 99 में भाजपा के शंकर प्रसाद जायसवाल को विजय हासिल हुई थी। 2004 में कांग्रेस के डाॅ0 राकेश मिश्रा को जीत मिली थी। 2009 के चुनाव में भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डाॅ0 मुरली मनोहर जोशी के सिर जीत का सेहरा बंधा था। डाॅ0 जोशी को 203122 निकटस्थ प्रतिद्वन्ती बसपा के मुख्तार अंसारी को 185911, सपा के अजय राय को 123874, कांग्रेस के डाॅ0 राजेश मिश्रा को 66386 और अपना दल के विजय प्रकाश जायसवाल को 65912 मत मिला था। वाराणसी संसदीय क्षेत्र में विभिन्न जाति धर्म व सम्प्रदाय के मतदाता रहते हैं। 

जातिगत आधार पर यदि मतदाताओं की संख्या पर नजर दौड़ाई जाय तो ब्राह्मण-191027, राजपूत-86217, यादव-95273, निषाद (बिन्द, मल्लाह, केवट)-172928, दलित-132442, भूमिहार -42416, राजभर-27401, चैहान-22931, कुशवाहा/मौर्य-74283, कुर्मी-152217, वैश्य-159102, मुस्लिम-252462, पाल-32241, कायस्थ-29945, प्रजापति-31466, बंगाली-44307, विश्वकर्मा-32634, चौरसिया -21016, सोनार-12613, नाई-9042 आदि सम्मिलित है। 

डाॅ0 मुरली मनोहर जोशी को वाराणसी से कानपुर भेजे जाने के कारण ब्राह्मण समाज में नाराजगी है परन्तु समय के हिसाब से सब शान्त हो जायेगा। यही वजह है भाजपा वाराणसी सीट को हाट बनाये रखने के लिए लगातार वहां की अच्छी औरे बुरी बातों को मीडिया में हवा दे रही है। आजकल हर हर मोदी घर घर मोदी नारे ने सुर्खिया बटोर रखी है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने भी इस नारे की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े कर दिए है वही विपक्ष भी इस नारे को लेकर लगातार भाजपा पर हमलावर है लेकिन बनारस के मस्त लोग अपनी मस्ती में अभी भी हर हर मोदी के नारे लगा रहे है देखना है आगे ये नारा भाजपा को क्या रास्ता दिखाता है।