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Wednesday, 19 August 2015

जहा से हम पढ़े वही से बच्चे भी पढ़ेंगे.......


सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों के दिन बहुरेंगे जब उनके प्रवेश द्वारों पर लाल और नीली बत्तियों का कभी कभी रेला लगेगा । इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसलें ने शिक्षा के क्षेत्र में अंदर तक घुस चुकी असमानता को खत्म करने की छोटी पहल की जिससे थोड़ी समानता मिलेगी। हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए उत्तर प्रदेश के एमपी, एमएलए, और अधिकारियों को कहा की वो भी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजें। हाईकोर्ट के इस फैसले का आमजन ने जहाँ स्वागत किया वही जनता के कर से मिले पैसों से तनख्वाह पाने वाले अधिकारी वर्ग में थोड़ा रोष भी दिखा लेकिन दबी जबान में । 

वही जनप्रतिनिधियों ने अपने वोट बैंक को संभालने के लिए समर्थन तो दे दिया, लेकिन यहां भी मन में कसक वही है जो सरकारी उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों में देखी गई । उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा मंत्री राम गोविन्द चौधरी ने कहा हम खुद सरकारी स्कूलों में पढ़े है तो बच्चों को पढ़ाने में क्या दिक्कत है । नेताजी हाईकोर्ट के फैसले पर कुछ कह नहीं सकते वजह साफ़ है ये ऐसा मुद्दा है जिस पर कोई भी बड़ा अधिकारी नेता और एमपी ने मुंह खोला तो उसे उसी जनता को जवाब देना होगा जिन्होंने उन्हें माननीय बनाया । हाईकोर्ट ने साफ़ कहा अगर जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ेंगे तो स्कूल की व्यवस्था और स्तर दोनों सुधर जाएगी साथ शिक्षा व्यवस्था भी पटरी पर आ जाएगी । 


भारत सरकार ने 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चो को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने के उद्द्येश्य से अप्रैल 2010 में केंद्र में बैठी यूपीए सरकार ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम बनाया । यूपीए सरकार की सबको शिक्षा देने के अधिकार अधिनियम को बनाना मनमोहन सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि माना गया । तभी से राइट टू एजुकेशन को लेकर पूरे देश में चर्चाओं का दौर चला लेकिन ये तय नहीं हुआ की बड़े बड़े प्राइवेट स्कूलों में पढने वाले और सरकारी स्कूलों में पढने वालों के बीच जो पढ़ने पढ़ाने को लेकर असमानता है उस खाई को कैसे पाटा जाए । बहसों का दौर लंबा चला लेकिन हल कोई नहीं निकला हाँ इतना जरूर हुआ कुछ जरुरत मंद गरीब लोगो के बच्चों का दाखिला जरूर अच्छे स्कूलों में मिल गया । 

कोर्ट ने साफ़ किया की उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए ऐसे ही सख्त कदम की जरुरत थी । कोर्ट ने प्रदेश के 1 लाख 80 हज़ार प्राइमरी स्कूलों में खाली अध्यापकों के 2 लाख 70 हज़ार पदों को लेकर भी तीखी टिप्पणी की साथ ही ये भी कहा प्राइमरी स्कूलों में मूलभूत सुविधाएं जैसे पीने का पानी और शौचालय आदि भी उपलब्ध नहीं है । कोर्ट की इस कड़ी टिप्पणी पर किसी भी राजनीतिक दल ने मुंह खोलने की जुर्रत दिखाई। बहरहाल इलाहबाद हाईकोर्ट के इस फैसले से उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में सुधार हो सकता है। प्रदेश के कुछ इलाके ऐसे है जो दुर्गम में है और अधिकारियों की पहुँच से बाहर वहा प्राइमरी स्कूल के शिक्षक यदा कदा ही आते जाते । 

कोर्ट के इस फैसले से भविष्य में सुधार के संकेत मिल सकते है साथ ही 70 और 80 के  दशक का वो स्वर्णिम युग भी वापस आ सकता है जब प्राइमरी और राजकीय इंटर कालेज के साथ सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में पढ़े बच्चों ने आगे चलकर ऊंचाइयों को छुवा और समाज में एक अलग मुकाम हासिल किया । 





Monday, 17 August 2015

उम्मीदों से मौन तक मोदी.......... 


वो गरजते थे विरोधियों पर बरसते थे क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से देश की उम्मीदें टूटने लगी है? आज के परिपेक्ष्य में बड़ा सवाल यही है। सोशल मीडिया और मीडिया रिपोर्ट्स पर नज़र डालें तो आज प्रधानमन्त्री मोदी के खिलाफ देश में विरोध की चिंगारी फूटने लगी है जो है तो हल्की सी है लेकिन उसे आग बनने में शायद ज्यादा समय न लगे । सोशल मीडिया पर जिस तरह आम जन अपनी स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति को प्रदर्शित कर रहा है उसने एक गरिमामयी पद के प्रोटोकॉल की धज्जियाँ उड़ा दी है ।  

प्रधानमंत्री को आज देश में उनके विरोधी और 2014 के चुनावों में उनके वादों और इरादों पर विश्वास करके वोट देने वाले जुमले बाज़ प्रधानमंत्री के तौर पर उद्धघृत कर रहे है। प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ शब्दों की बाढ़ और खिलाफत की आंधी ऐसे ही नहीं चली इसकी ख़ास वजह भी,बीते एक सालों में ही पैदा हुई जब जनता की उम्मीदें धीरे धीरे उस कपडे की तरह उधड़ने लगी जिसके रेशे उतरते ही कपड़ा अपनी मजबूती खोने लगता है, और उसके आर पार सब कुछ दिखाई देने लगता है ऐसा ही कुछ हाल मोदी के उन वादों का भी हुआ जो जनता के अधिकारों से जुड़े थे और जिन्हे मोदी ने अपनी चुनावी रैलियों में सार्वजनिक मंचो से किया करते थे। 

बीते दिनों लोकसभा में मानसून सत्र के दौरान जो कुछ हुआ उसे कांग्रेस की सफलता न मानते हुए केंद्र में बैठी भाजपा और मोदी सरकार की विफलता माना जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी । कांग्रेस अपनी रणनीति में सफल रही या परदे के पीछे सरकार ने कोई बड़ा खेल खेला ये साफ़ नहीं हो सका। आरोप प्रत्यारोप का दौर लंबा चला सब बोल रहे थे बस चुप थे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आखिर क्या वजह रही की, बिहार के गया में परिवर्तन रैली के दौरान विरोधियों की खामिंया गिनाने वाले मोदी देश की सबसे बड़ी पंचायत में अपनी सीट पर भी नज़र नहीं आएं। क्या जनता को प्रधानमंत्री मोदी से निराशा हाथ लगी या जनता मोदी के मौन को अपना भाग्य समझ बैठी है । 


क्या भारत की जनता इतनी कमजोर हो गई जो मोदी जी की रैलियों में सिर्फ सवालों के जवाब दें या उनसे सवाल पूछने की हिम्मत भी कर सके। वैसे लोकतंत्र में बड़ी ताकत होती है मोदी का मौन नहीं टूटा तो उसे भी जनता अपनी चुप्पी के साथ उसी तरह तोड़ेगी जैसे कांग्रेस के दम्भ को उन्होंने बीते लोकसभा चुनाव में चकनाचूर कर दिया और उसे उस स्थिति में पहुंचा दिया जो बीते 6 दशकों में नहीं हुआ कांग्रेस 440 सीटों से 44 पर पहुँच गई। जनता मौन होती है तो भूचाल आता है कही आने वाले चुनावों में  जनता भाजपा को दिल्ली की उस चुनावी तस्वीर को दिखा दे और ये हाल मोदी की चुप्पी की वजह से होगा जिसे झेलना भाजपा को पड़ेगा। प्रधानमंत्री मोदी आज अपने को विश्व के नेता के तौर पर स्थापित करने में लगे है लेकिन विश्व नेता वो तभी बन सकते है खुद के देश भारत के अंतिम आदमी को वो संतुष्ट कर पाएं । 

प्रधानमंत्री मोदी को उनके तर्कों और बोलने की शक्ति के लिए जाना जाता है लेकिन मोदी का मौन और उनके खिलाफ मीडिया और सोशल मीडिया में बन रहे माहौल उनके लिए एलार्म की तरह है जिसे उन्हें सुन लेना चाहिए और उस जनता की दिक्कतों को धरातल पर लाना चाहिए जिसने उन्हें दोनों हाथ खोल कर समर्थन दिया था ।