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Friday, 25 October 2013

ISI के संपर्क अब देश को बतायेंगे कांग्रेस उपाध्यक्ष

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी आजकल कांग्रेस को पांच राज्यों में सत्ता पर काबिज कराने के लिए इन सभी राज्यों के चुनावी समीकरण को दुरुस्त करने का जिम्मा अपने कन्धों पर उठा लिया है। राहुल और कांग्रेस की महत्वकांक्षा कहे या विरोधियों की बढती लोकप्रियता राहुल आजकल ऐसे ऐसे बयान दे रहे हैं जो भारत सरकार के किसी जिम्मेदार मंत्री या अधिकारी के पास ही हो सकता है। राहुल चुनावी गणित को ठीक करने के लिये बयानों पर होने वाले बवालों की परवाह किये बिना कांग्रेस और खुद के ऊपर मुसीबत मोल ले रहे है। 

राहुल गांधी ने राजस्थान के चुरू में 23 अक्टूबर को एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए ये कह कर सभी को हैरत में डाल दिया कि मेरी दादी और पापा को मारा, शायद मुझे भी एक दिन मार डालेंगे, अब राहुल गांधी को कौन मार डालेगा ये इस बात की चर्चा अगले दिन के अखबारों और सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर खूब डाली और पढ़ी गई| कहीं उनके सुरक्षा की बात हुई तो कही उनके बयान को हंसी में उड़ा दिया गया। 

राजस्थान में विधानसभा चुनाव की तिथियाँ घोषित हैं| राहुल चुनावी रैली में बोल रहे थे| राहुल ने भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधते हुए कहा बीजेपी दंगा करवाती है| नेताओं ने मुजफ्फरनगर, गुजरात और यूपी में आग लगाई| मैं बीजेपी की राजनीति के खिलाफ हूं| कांग्रेस उपाध्यक्ष ने कहा कि लोगों के अंदर गुस्सा भरते हैं नेता| गुस्सा खत्म करने में सालों का वक्त लगता है| उन्होंने कहा कि मेरा काम सिर्फ चुनाव जीतने तक सीमित नहीं, मुझे भविष्य के बारे में भी बताना होगा| 

राहुल अपने इस बयान के बाद विरोधियों के निशाने पर आ गए। चुरू से राहुल का विरोध जो शुरू हुआ वो अभी थमने का नाम ही नहीं ले रहा था की राहुल गांधी ने 23 तारीख को मध्य प्रदेश के इंदौर में मुजफ्फरनगर दंगो पर फिर मुंह खोला जिसमें उन्होंने कहा दंगो के बाद दंगो की आग में अपना घर बार छोड़ चुके 15 -20 लोगो के संपर्क में पाकितान की खुफिया इकाई ISI है। राहुल के मुंह से बयान के तौर पर ये शब्द क्या छूटे भाजपा ने उन शब्दों को पकड लिया।

भाजपा राहुल गांधी पर समाज में साम्प्रदायिक तनाव फैलाने का आरोप लगाते हुये उनकी शिकायत चुनाव आयोग में करने जा रही है। वही मुजफ्फरनगर पर बयान देने के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति गर्मा गई है। मुजफ्फरनगर दंगो में नाम आने के बाद आज़म खान की छीछालेदर हुई थी। आज़म खान ने राहुल गांधी के भाषण पर कहा वो दूसरों का लिखा हुआ भाषण पढ़ते है उन्हें भाषण देने से पहले उसे खुद पढ़ लेना चाहिये। आज़म खान के इस बयान से कांग्रेस हत्थे से उखड़ गई| कांग्रेस प्रवक्ता मीम अफज़ल ने कहा राहुल लिखा हुआ भाषण नहीं पढ़ते है बल्कि जो मन में आता है वो बोल देते है। 

आज़म खान ने कहा कि राहुल किस हैसियत ISI से जुड़े तथ्यों पर बयान दे रहे है। आज़म खान ने राहुल गांधी के बयान को बचकाना कहते हुये कहा कि राहुल गांधी को सोच-समझकर बोलना चाहिये। राहुल गांधी के बयानों से कांग्रेस की मुश्किल घटने की बजाय बढ़ती जा रही है| राहुल आजकल चुनावों को लेकर कुछ ज्यादा परेशान है। कांग्रेस का राहुल से उम्मीदों का बोझ इतना बढ़ चुका है जिसे पूरा करने के लिए राहुल गांधी बिना सोचे-समझे बयान दे रहे है।

द्रौपदी के तो पांच ही थे, हमारे 105 पति

लोकसभा चुनावों के करीब आते ही सभी पार्टियों के नेताओं के जो जो बोल फूट रहे है वो जहां कुछ को नागवार गुजर रहा है| वहीँ,कुछ बयानों पर चटकारे ले रहे है। भाजपा इन दिनों कांग्रेस पर नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में कांग्रेस पर हमले करने का कोई मौका नहीं छोड़ रही है, लेकिन पार्टी अंतर कलह से भी गुजर रही है ये भी किसी से छुपा नहीं। 

पार्टी के पूर्व अध्यक्ष ने पार्टी की अलग-अलग विचारधाराओं और नेतृत्व को लेकर तल्ख़ टिप्पणी की है। पूर्व भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कहा कि पार्टी के 105 पति है| शुक्र है द्रौपदी के 5 ही पति थे। अंग्रेजी अखबार के हवाले से नितिन गडकरी का छपा बयान में कहा गया शुक्र है द्रौपदी के पांच पति थे। 

नितिन गडकरी ने साफ़ कहा कि देश में राजनीति करने वाली कुछ पार्टिया एक परिवार तक सीमित रह गई हैं लेकिन भाजपा में ऐसा नहीं है, उन्होंने ये भी कहा जब वो अध्यक्ष थे तो उनके उनके समय 8-8 मुख्यमंत्री प्रदेशो में राज कर रहे थे, सबको संभालना मुश्किल काम था । 

गडकरी ने कहा कि कुछ पार्टिया माँ बेटे के आसपास ही घूम रही हैं लेकिन भाजपा में ऐसा नहीं है | उन्होंने कहा कि वह कभी प्रोफेशनल नेता नहीं थे| उनके शब्दों में, 'मेरे कट-आउट कहीं नहीं लगे, न ही मैंने दूसरे नेताओं के कट-आउट लगवाए| नितिन गडकरी एक सम्मेलन में बोल रहे थे जिसका विषय था 'मौजूदा राष्ट्रीय परिदृश्य और विकल्प'|

I AM MALALA

नोबल शांति पुरस्कार की दौड़ में शामिल हुई पाकिस्तान में लड़कियों की शिक्षा के लिए संघर्ष करने वाली मलाला युसुफजई आजकल पूरे विश्व में चर्चा का विषय बनी हुई है। कभी संयुक्त राष्ट्र संघ में भाषण देकर तो कभी अमेरिकन राष्ट्रपति बराक ओबामा से मुलाकात को लेकर, पर इन दिनों मलाला की सुर्ख़ियों में रहने की वजह बनी हैं उनकी अपनी किताब I AM MALALA | मलाल इस किताब को लेकर सुर्खियाँ बटोर रही है। 

अमेरिका की वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी ने मलाला की किताब I AM MALALA को विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल करने का ऐलान किया है। पाकिस्तान की यह किशोरी दुनिया भर के लोगों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन गई है, जिसे देखते हुए यूनिवर्सिटी उसके संस्मरण को लेने का फैसला किया है।

एक साल पहले स्कूल जाते हुए तालिबान के हमले का शिकार हुई मलाला युसुफजई ने सिर में गोली लगने के बावजूद मौत को पीछे छोड़ दिया मलाला ने हिम्मत नहीं हारी और इसके बाद भी अपने देश और आतंक प्रभावित इलाकों की लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के प्रयासों में लगी रही। इस किताब से मलाला के इन्हीं प्रयासों के बारे में जाना जा सकता है।

यूनिवर्सिटी के ग्लोबल वीमेन इंस्टिट्यूट (GWI) की निदेशक इल्सबर्ग ने कहा कि सिलेबस में यह लेशन ना सिर्फ छात्रों को शिक्षित करेगी, बल्कि मलाला जिन मुद्दों के लिए आवाज उठा रही है, उसे भी बढ़ावा देगी।हाल में ही मलाला ने कहा था कि मैं पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनना चाहती हूं और तब हर लड़की को स्कूल भेजूंगी। मेरी दुनिया भले ही बदल गई है, लेकिन मेरे इरादे अब भी नहीं बदले हैं। उन्होंने ये भी कहा मुझे कई बार भूतों से डर लगता है, लेकिन तालिबान से नहीं। मलाला ने कहा कि कट्टरपंथी नहीं चाहते कि लड़कियां स्कूल जाएं, क्योंकि वे डरते हैं।

एंग्री यंग युवराज अपना आक्रोश कांग्रेस को दुरुस्त करने में लगाये

 आक्रोश से भरा युवराज, देश को अपनी बातों से बदलने वाले युवराज, अपनी माँ के दुःख को जनता के सामने रखने वाले देश के भावी प्रधानमंत्री आजकल फिर गुस्से में है, विरोधियों पर आंकड़ो के हिसाब से हमला करने वाले कांग्रेस उपाध्यक्ष और भारत के युवा शक्ति को अपने नेतृत्व से राह दिखाने की मंशा रखने वाले कांग्रेसी नेता राहुल गांधी एक जगह आकर फेल साबित हो रहे है वो है उनका खुद का संसदीय क्षेत्र जहा विकास की बयार पहुंची ही नहीं| राहुल आजकल फिर चुनावी अभियान पर कांग्रेस का झंडा उठाये यूपीए को केंद्र में तीसरी बार सत्ता पर बैठाने के लिये उड़नखटोले से देशभ्रमण पर निकल चुके है लेकिन अमेठी की समस्याओं से अनजान।

2009 लोकसभा चुनावों में अपनी खास शैली और केंद्र की योजना नरेगा का बखान करके सत्ता में वापस लाने वाले राहुल गांधी आज देश को बदलने की बात कहते है। देश उनकी कांग्रेसनीत सरकार में बदल भी रहा है लेकिन उस तरह नहीं जिस तरह उसे बदलना चाहिये| अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ती जा रही है जिस तरह से अमीर और अमीर और गरीब और रसातल में जा रहा है वो सोच कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की सोच से मेल नहीं खाती है। कांग्रेस ने कुछ चुनाव पहले एक नारा दिया था "गरीबी हटाओ खुशहाली लाओ" "कांग्रेस का हाथ गरीब के साथ" आज कांग्रेस अपने उस नारे के इतर गरीब हटाओ अभियान में ही लगी हुई है। कांग्रेस नेतृत्व और यूपीए- 2 ने आज घोटालों के साथ मंहगाई को इतना बढ़ा दिया है कि आम आदमी को दो जून रोटी के लिये भी सोचना पड़ रहा है। 

कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने एक विवादास्पद बयान दिया "आदमी के दिमाग में गरीबी होती है, व्यक्ति गरीब नहीं होता।" कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की सोच और उनके बयान की विपक्ष ने धज्जियां उड़ा दी। राहुल गांधी को गरीब और गरीबी की सही परिभाषा को परिभाषित करना शायद सीखना होगा। राहुल देश को शीर्ष पर देखना चाहते है, देश को भी उनसे काफी अपेक्षाये है। लेकिन राहुल की सोच भारत जैसे राष्ट्र के लिये मेल नहीं खाती है। राहुल गांधी आक्रोश में आते है तो किसी दल का मैनिफेस्टो फाड़ देते है, वही दागी राजनेताओं वाले कानून को बदलने के लिये उन्होंने अध्यादेश को बकवास करार दे दिया, राहुल का ये आक्रोश जनता को अच्छा लगा लेकिन सरकार और खुद प्रधानमंत्री को नागावार गुजरा। 

राहुल कभी विपक्ष को निशाने पर लेते है तो कभी खुद सरकार को राहुल देश बदलने की बात करते है उनके संसदीय क्षेत्र अमेठी का हाल कैसा है शायद वो नहीं जानते| सुल्तानपुर का अमेठी लोकसभा क्षेत्र देश के VVIP संसदीय क्षेत्रों में शुमार होता है। 1980 से 2009 तक इस सीट पर कांग्रेस का कब्जा रहा है। सर्फ पुराने कांग्रेसी और कुछ दिनों लिए भाजपा में शामिल अमेठी के राजा संजय सिंह 98-99 में कांग्रेस से ये सीट 1साल के लिये छीन पाए थे नहीं तो सातवीं लोकसभा से संजय गांधी के 1980 में चुनाव जीतने के बाद जो सिलसिला कांग्रेस ने किया वो भाई राजीव गांधी, भाभी सोनिया गांधी से होता हुआ राहुल गांधी तक पहुंचा। 1980 में सातवीं लोकसभा के लिए चुने गए संजय गांधी की हवाई दुर्घटना में हुई मौत के बाद हुये उपचुनाव में उनके बड़े भाई और देश के पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत राजीव गांधी ने जीत का परचम लहराया और अपने भाई की सीट को अपने परिवार में बरक़रार रखा। 

राजीव गांधी ने अमेठी लोकसभा सीट से तीन बार प्रतिनिधित्व किया था लेकिन 21 मई 1991 को तमिलनाडु में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान श्रीपेरम्बदुर में लिट्टे ने एक आत्मघाती हमलें में उन्हें मार दिया था, राजीव गांधी के निधन से शोक में डूबे परिवार ने राहुल की खड़ाऊ कांग्रेस उनके परिवार के करीबी और राजीव गांधी के दोस्त कैप्टन सतीश शर्मा को सौंप दिया था। सतीश शर्मा ने दसवीं लोकसभा में 91 से 96 तक, ग्यारवीं लोकसभा में 96 से 98 तक इस सीट का प्रतिनिधित्व किया। संजय, राजीव की परम्परागत सीट को 1998 में पूर्व कांग्रेसी और अमेठी के राजा संजय सिंह ने भाजपा के टिकट पर लड़कर कांग्रेस से छीन लिया। कांग्रेस को अमेठी सीट हार जाने का मलाल था। 

1999 में हुये लोकसभा के उपचुनाव में राजीव की विरासत को बचाने के लिए खुद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी चुनावी मैदान में उतरी और उन्होंने भाजपा के संजय सिंह को उनकी कांग्रेस से गद्दारी का सबक सिखाते हुए करीब 3 लाख से ज्यादा वोटो से हराया। सोनिया गांधी ने अपने पति की सीट को जीतकर अपनी विरासत अपने बेटे राहुल गांधी को सौंपी जो 2004 में तेरहवीं लोकसभा के लिये अमेठी से चुने गये, राहुल गांधी ने चौदहवी लोकसभा का चुनाव भी 2009 में इसी सीट से जीता| राहुल अमेठी के सांसद है लेकिन आंकड़ो और अमेठी के विकास पर नज़र डाली जाए तो राहुल गांधी की बाते और विरोधियों पर किये जा रहे हमले उन्हें भोथरा साबित करते है। राहुल गांधी पूरे देश को बदलने की बात करते है लेकिन उनका संसदीय क्षेत्र आज किस हाल में है वो आंकड़े खुद बयान कर रहे है। 

राहुल गांधी कांग्रेस के नीतिनिर्धारकों में शामिल है और केंद्र में कांग्रेसनीत यूपीए की सरकार चल रही है, केंद्र की सरकार पूरे देश में विकास , साक्षरता , स्वास्थ्य, यातायात, खाद्य सुरक्षा जैसे कार्यक्रमों को तय करती है देश के अन्य हिस्से जहा सरकार के आंकड़ो में आफी आगे है| वहीँ, राहुल गांधी की अमेठी का हाल यहाँ दिये जा रहे आंकड़े खुद बयान कर रहे है। जहाँ राष्ट्रीय साक्षरता दर देश में 65% है| राहुल के अमेठी में ये दर मात्र 39.5% है। अमेठी में 50% जनता गरीबी से नीचे रहती है। अमेठी में मात्र 15 % जनता को बिजली की सुविधा मिलती है। अमेठी में 15% बच्चे अकाल मौत मर जाते है। सरकार जहाँ टीकाकरण कार्यक्रम के लिये अरबों रुपये खर्च करती है वहीँ,अमेठी में टकाकरण की स्थिति काफी दयनीय है यहाँ टीकाकरण 16% से कम हुआ है। 

राहुल देश के विकास के लिये अपनी जनसभाओ के हर मंच से खूब चिल्लाते है। लेकिन उनके यहाँ MPLAD FUND में आया 3.06 करोड़ रुपये में से केवल 18 लाख रुपये ही खर्च हो पाये| अमेठी में विकास की बयार आज तक नहीं चली बीते दस वर्षो में कोई नया उद्योग यहाँ नहीं लगा। राहुल गांधी के अमेठी और राजीव गांधी के कर्मक्षेत्र के तौर पर प्रसिद्द अमेठी आज अपने प्रतिनिधि से काफी उम्मीद बांधे हुये हैं लेकिन राहुल देश की विकास की बात कहते हुये अपने क्षेत्र को बैठे है। राहुल देश की राजनीति का भविष्य है, राहुल की सोच युवाओं वाली है लेकिन जिस सोच से उन्हें आगे बढ़ना चाहिए वो दिखाई नहीं देती| 

राहुल आक्रोशित हो जाते है और जब वो आक्रोश में रहते है तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का रास्ता काटने में भी उन्हें कोई गुरेज नहीं होती। लेकिन राजनीति को करीब से जानने वालों का मानना है राहुल का यही आक्रोश और सिस्टम पर गुस्सा उन्हें विपक्षियों के निशाने पर लाता है। आज राहुल को पहले अपना घर दुरुस्त करना चाहिये उसके बाद देश के बारे में सोचना चाहिये| आक्रोश अच्छी बात है लेकिन जब सरकार आपके इशारों पर चलती है तो राहुल किसको आक्रोश दिखाते है उन्हें मशीनरी को खुद दुरुस्त करना चाहिए|

अब दो प्याजा नहीं Rare शतक प्याजा खाइये

दाल रोटी के साथ गरीब की थाली में स्वाद बढाने वाला प्याज अब विशिष्ट हो चला है। गरीब के लिये प्याज का मतलब अब मटन चिकन और पनीर के बराबर हो गया है। प्याज अब शादी ब्याह में दिख जाये तो लोग अपनी कस्मत पर रक्श कर सकते है। पहले प्याज काटने पर आंसू निकलते थे अब प्याज का दाम और उसकी बढ़त सुनकर आंसू तो नहीं निकलते दिल की धड़कने जरुर बढ़ जाती है। लोगो की सब्जी की टोकरियों से प्याज गायब होता जा रहा हैं| वहीँ, अब प्याज शब्द सुनते ही केंद्र में बैठी मनमोहन सरकार को दो चार अतिविशिष्ट शब्दों से भी नवाजने में लोग गुरेज नहीं कर रहे है। 

मई 1998 के बाद भारत की जनता के लिए प्याज VVIP हुई थी,तब लोगो के बीच एक गाना काफी लोकप्रिय हुआ था, अटल बिहारी वाजपेई की दुसरे टर्म की सरकार चल रही थी, गाना अटल जी को तंज करते हुये बना था गाने के बोल थे "का हो अटल चाचा पियजिया अनार हो गईल" इस गाने में अटल जी के ऊपर फिकरा कसते हुए गायक ने प्याज क तुलना उस अनार से की थी जो सिर्फ अमीरों के डाइनिंग टेबल की शोभा बढाता था और उन्ही की पहुँच में था ऐसा ही हाल प्याज के साथ हुआ था। उस साल प्याज 80 रुपये किलों बिका जिसकी वजह थी अटल बिहारी वाजपेई सरकार द्वारा पोखरण के रेगिस्तान में 5 परमाणु परिक्षण करना जिसमें टन के हिसाब से प्याज का इस्तेमाल होना बताया गया। 

आज प्याज की कीमत 100 रुपये के पार जाने की तैयारी में है जो इन त्योहारों के मौसम में पार भी कर जायेगी। अटल बिहारी वाजपेई की सरकार में प्याज के दाम बढ़ने की जो वजह सामने आई वो देश हित में थी लेकिन मनमोहन सिंह सरकार के समय बीते 6 महीनो से आम आदमी को तरसाने वाली प्याज के दाम क्यों बढ़ रहे है इसका कोई ठोस जवाब सरकार का कोई नुमाईंदा नहीं दे रहा है। अब सरकार की तरफ से जो बयान आया वो बेहद चौकाने वाला है, केंद्र सरकार ने माना है कि जमाखोरों की वजह से प्याज के दाम बढ़ रहे हैं। वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने कहा कि देश में प्याज का काफी भंडार है। जमाखोरी के कारण प्याज की कृत्रिम रूप से कमी हो गई है। राज्य सरकारें ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करें।

पटना में प्याज की कीमतें सौ रुपए प्रति किलोग्राम के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बीच केंद्र सरकार ने इसकी जमाखोरी करने वालों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करने का राज्य सरकारों से आग्रह करते हुए कहा कि कीमतों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से जरूरत पड़ने पर इसका आयात किया जा सकता है। राजधानी दिल्ली सहित देश के अधिकांश हिस्से में प्याज की कीमत औसतन 90 रुपए प्रति किलोग्राम पर पहुंच चुकी है। पिछले चार महीने में प्याज की कीमतें चार गुना बढ़ चुकी है। उन्होंने कहा कि मुद्रास्फीति बहुत चिंता का विषय है। लेकिन इसमें खाद्य पदार्थों और सब्जियों की वजह से बढ़ोतरी होती है। हालांकि उन्होंने इस बढ़ोतरी को अस्थाई बताते हुए कहा कि यह सीजनल मामला है और यह नीचे आ जाएगा।

प्याज आज आम आदमी की पहुँच से दूर हो गया है, आज प्याज से सस्ता सेब बिक रहा है, लेकिन सभी खाद्य पदार्थो का स्वाद बढाने वाला प्याज आज लोगो की थालियों से रूठ चुका है सरकार का मानना है कि प्याज के दाम अभी दो महीने और नीचे नहीं आयेंगे| अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर देश में त्योहारों के मौसम के तौर पर जाना जाता है। बड़े से लेकर छोटा व्यवसायी इस मौके का बखूबी लाभ उठाना चाहता है| जो वो उठा भी रहा है। सरकार बेबस जनता लाचार और प्याज के काला बाजारी अपनी प्याज से होने वाले मुनाफे को लेकर मस्त। आज हालात ऐसे हैं कि लोग एक दूसरे से मज़ाक में कहने लगे है, भैया प्याज खाये कितने दिन हो गये है। 

ये तो हो गई मजाक की बात लेकिन आज जनता थाली से गायब हो चुके खाद्य पदार्थों की सबसे जरुरी चीज से धीरे धीरे उनक पहुँच से दूर होती जा रही है। सरकार आज प्याज को लेकर बेबस हो चुकी सरकार के पास सारी मशीनरी होते हुये भी प्याज की कीमतों पर अंकुश नहीं लगा पा रही है।

Tuesday, 22 October 2013

कांग्रेस-बसपा क्या अलग लड़कर भाजपा को वाकओवर देंगे

देश को 8 प्रधानमंत्री देने वाला उत्तर प्रदेश देश की सत्ता को रास्ता दिखता है। राजनीति में ये कहा जाता है कि केंद्र में सत्ता यूपी के रास्ते होकर जाता है जिसने उत्तर प्रदेश साध लिया उसने देश साध लिया। जटिल परिस्थितियों वाले उत्तर प्रदेश में जहा एक तरफ जातिवाद का बोलबाला है वही धर्म की राजनीति करने वालों के साथ हिंदुत्व और मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने वालों की कमी नहीं। यही वजह है देश में राजनीति करने वाली सभी पार्टियां अपने अपने तरीके से उत्तर प्रदेश की राजनीति और यहाँ के वोट बैंक को नियंत्रित करती है। 

प्रदेश की राजनीति को अगर प्रयोगशाला की संज्ञा दी जाये तो कही से गलत नहीं होगा। कांग्रेस, सपा, बसपा और भाजपा के लिए प्रयोगशाला बन चुकी उत्तर प्रदेश की धरती आज एक बार फिर राजनीतिक पार्टियों के लिये प्रयोग करने का स्थान बनने जा रही है। लोकसभा चुनावों से पहले जितनी पार्टिया है, उतने सपने प्रदेश की जनता को दिखाये जा रहे है। सभी राजनीतिक पार्टिया अपने अपने काम और जाति के सहारे जनता के बीच कार्यक्रमों को रखना चाह रही है। प्रदेश की राजनीति में दखल रखने वाली पार्टिया ये अच्छी तरह से जानती है अकेले दम पर जातिवाद और धर्म में अंधे लोगो के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए किसी अभिमन्यु की जरुरत पड़ेगी| वजह भी साफ़ है, अभिमन्यु की तरह इस चुनावी रुपी चक्रव्यूह में घुसना आसान है लेकिन उसे भेद पाने की विद्या इस प्रदेश पर राज कर रही पार्टियों के पास ही है।

लोकसभा चुनाव की आहट के साथ ही सभी पार्टिया अपना गुणा गणित और समीकरण बैठाने में लग गई है| भाजपा जहा नमो मंत्र के सहारे 2014 का चक्रव्यूह पार करना चाहती है, वही समाजवादी पार्टी को अपनी सरकार के काम और अपने वोट बैंक पर भरोसा है। बची है कांग्रेस जिसने 2009 में प्रदेश में आशा के विपरीत 22 सीटे जीतकर मजबूती के साथ केंद्र की सत्ता में वापस आई। लेकिन इन चार सालों और कुछ महीने की यूपीए- 2 की सरकार का ग्राफ जनता की नज़रों में लगातार गिरता जा रहा है वही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी अपने काम से जनता को खुश नहीं कर पाए। कांग्रेस की मुश्किल ये है कि यूपीए-2 की छवि जनता की नज़रों में पहले से ही गिरी हुई है वही तेज़ी से बढ़ती मंहगाई और घोटालों ने सरकार की छवि को और गिरा दिया है। 

काग्रेस उत्तर प्रदेश में मजबूत सहारे की खोज में है| वजह भी साफ़ है कांग्रेस के रणनीतिकारों को ये अच्छी तरह से पता है इस बार यूपी क जनता का मन मोहना उतना आसान नहीं होगा जितना 2009 में था| यही कारण है, सरकार के निर्देशन में जिस तरह सीबीआई ने सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह यादव को और बसपा सुप्रीमों मायावती को क्लीन चिट दिलवाई गई उससे साफ़ हो गया कांग्रेस अपने दोनों हाथो में लड्डू रखना चाहती है। कांग्रेस रणनीतिकारों का मानना है कि समाजवादी पार्टी के मुखिया जिस तरह तीसरे मोर्चे को बनाने की कवायद में लगे है उसे उनकी राजनीतिक महत्वकांक्षा का पता चलता है| साथ ही उनकी चाहत भी राजनीति की सबसे बड़ी कुर्सी तक पहुँचने क मंशा भी साफ़ हो जाती है। 

काग्रेस और समाजवादी पार्टी की तल्खी भी लगातार बढती जा रही है जहा सपा नेतृत्व के इशारे पर पार्टी के राज्यसभा सांसद नरेश अग्रवाल ने ये बयान देकर अनसन फैला दी कि सपा कब तक इस नकारा केंद्र सरकार को समर्थन देती रहेगी| उस पर कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी ने पलटवार करते हुये कहा जब केद्र सरकार से सपा को इतनी परेशानी है तो उन्हें समर्थन वापस ले लेना चाहिये। सपा और कांग्रेस की तल्खी के बीच कांग्रेस नेतृत्व को उत्तर प्रदेश में एकमात्र सहारा अब बहुजन समाज पार्टी दिखाई दे रही है। कांग्रेस उत्तर प्रदेश ही क्या पूरे देश में बहुजन समाज पार्टी के साथ चुनाव लड़ना चाहती है। 

कांग्रेस अगर बहुजन समाज पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन करती भी है तो सवाल ये खडा होता है न दोनों पार्टियों का समझौता किस आधार पर होगा पूरे देश की बात अगर छोड़ भी दी जाये तो बसपा कांग्रेस से उत्तर प्रदेश में 30 सीटों से ज्यादा पर समझौता करने के लिये तैयार होगी बहुजन समाज पार्टी भविष्य की राजनीति को देखते हुये और कांग्रेस का इतिहास देखते हुए नहीं तैयार होगी ऊपर डाले गए लिंक में ये बात साफ़ तौर पर संभावनाओ के आधार पर नहीं बल्कि तथ्यों के आधार पर लिखी गई है। बहुजन समाज पार्टी किसी भी हाल में अपना वोट बैंक कांग्रेस के साथ नहीं जोड़ना चाहेगी। 

वही कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती पर की गई| टिप्पणी ने भी बसपा कैडर को भड़का दिया। राहुल गांधी ने हाल में ही अपने पंजाब के संगरूर दौरे के दौरान मंच से भाषण देते हुये कहा था , मायावती ने अपने आगे किसी भी दलित नेता को पनपने नहीं दिया। आज कांग्रेस अपने लिये नए हाथी की तलाश में है| कांग्रेस नेतृत्व को अच्छी तरह से पता है कि मुजफ्फरनगर दंगो के बाद मुस्लिम वोट बैंक समाजवादी पार्टी से खफा हो गया| देश में सो-काल्ड धर्म निरपेक्षता की राजनीति करने वाली पार्टियों क नज़र मुस्लिम वोट बैंक की तरफ है। प्रदेश का मुस्लिम समुदाय सपा से नाराज़ है| सभी पार्टियों की नज़र अब इसी वोट बैंक की तरफ गड़ी हुई है। उधर बसपा सुप्रीमों मायावती को पता है अगर समय मुस्लिम वोट बैंक को साध लिया तो लोकसभा चुनाव में पार्टी क तस्वीर बदल जायेगी। वही मुजफ्फरनगर दंगो की वजह से भाजपा को बड़ा फायदा होता दिखाई दे रहा है। 

कांग्रेस, सपा, बसपा और भाजपा अभी पार्टिया लोकसभा चुनावों को लेकर अपन अपनी रणनीति बनाने में लगी हुई है| प्रदेश क जनता का झुकाव किस तरफ होगा ये देखने वाली बात होगी लेकन एक बात तो तय है आने वाले समय में राजनीतिक दलों के बीच होने वाली नूराकुश्ती देखने लायक होगी।

नमो ब्रांड है तो बिकेगा ही

नमो बिंदी, नमो साड़ी, नमो चिप्स से लेकर पता नहीं क्या-क्या नमो यानि नरेन्द्र मोदी के नाम पर बिक रहा है। मोदी इस समय 500 करोड़ के ब्रांड बन चुके है, नरेन्द्र मोदी के नाम को भुनाने के लिए गुजरात की कपड़ा बनाने वाली कंपनियों से लेकर कुटीर उद्योग में बिंदी और छोटे छोटे रोज़मर्रा के सामान बने वाली कंपनियों ने भी मोदी नाम के तेज़ी से बढ़ते ब्रांड का फायदा उठाने के लिये सोच लिया है। 

गुजरात से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक नमो ब्रांड की धूम है। आज हर नाम मोदी के नाम को भुना लेना चाहता है तभी तो दूरदराज के इलाके रांची में जहाँ नमो टी स्टाल खुल गया वहीँ, हाल में ही बीते नवरात्रों में युवाओं के बीच मोदी को पहुँचाने के लिये डांडिया के समय पहने जाने वाले विशेष परिधान पर भी भाजपा के PM इन वेटिंग नरेन्द्र मोदी की छाप दिखाई दी। 

मोदी नाम को भुनाने के लिये भाजपा ने भ बड़े पैमाने पर सोशल साइट्स का सहारा लिया जिसमें फेसबुक से लेकर ट्वीटर और गूगल ऐसी साइट्स है जहां मोदी की धूम है। मोदी के नाम को इस समय सभी भुनाने में लगे हुये है| वहीँ, सर्वे साइट्स पर भी मोदी की बढ़त देश के अन्य किसी भी राजनीतिज्ञ से कहीं ज्यादा है। 

गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार आज टेलीविजन रेटिंग में सबसे ज्यादा रेटिंग बटोरने वाले राजनेता बने हुये हैं| सभी निजी चैनल मोदी को दिखाकर उन्हें भुनाना चाहते है। नरेन्द्र मोदी आज अखबारों की सुर्खिया बने हुये है मोदी की कैम्पेनिंग और सोशल मीडिया पर उनकी बढ़त मोदी को भारतीय राजनीति में एक अलग स्थान दिलाती है। 

नमो-नमो कर रही देश की जनता के बीच मोदी का जादू है या केंद्र सरकार की नाकामियों के बीच जनता को सिर्फ मोदी से उम्मीद ही आज उन्हें एक अलग मुकाम दिला रही है ये तो चुनावों के बाद सामने आयेगा| लेकिन इतना तो तय है कि मोदी धीरे धीरे भारतीय जनमानस के साथ बाज़ार की उथल पुथल पर नज़र रखने की नज़र में चढ़े हुये है। 

मोदी का लोगो की नज़रों में आना एक अलग बात है लेकिन उनका बाज़ार में एक ब्रांड बन जाना दूसरी और अहम बात है। भारतीय राजनीति में संभवत मोदी ऐसे पहले राजनेता हैं जो ब्रांड के तौर पर स्थापित हुये है। इस मोदी नामक ब्रांड की कीमत बाज़ार ने करीब 500 करोड़ पहुँच गई है, भाजपा अब इसी ब्रांड मोदी को कैश कराने में लग गई है। 

5 सौ करोड़ के मोदी नामक इस ब्रांड की मुश्किलें भी कम नहीं है। कुछ राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनावों पर चुनाव आयोग की खास नज़र है अगर चुनाव आयोग ने मोदी ब्रांड और उनके नाम से बिक रहे उत्पादों को चुनाव प्रचार सामग्री मानकर चुनावी खर्चे में जोड़ दिया तो भाजपा बड़ी मुश्किल में फंस सकती है और इस नमो ब्रांड के चक्कर में भाजपा के चुनावी खर्चे का आंकलन भी चुनाव आयोग इस ब्रांड के साथ करेगा। 

मोदी आज देश की उम्मीद बने हुए है यही वजह है कि आज सभी राजनीतिक दल मोदी की आलोचना करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते है, मोदी की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है मोदी कही भी जनसभा के लिये जाते है, विरोधियों के बयान उनकी जनसभा से पहले ही आना शुरू हो जाते है। खैर आज देश में मोदी नमक ब्रांड खूब चल रहा है मौक़ा भी है और दस्तूर भी| जो दिखता है वही बिकता है तो बाज़ार मोदी को क्यों न भुना ले।