देश को 8 प्रधानमंत्री देने वाला उत्तर प्रदेश देश की सत्ता को रास्ता दिखता है। राजनीति में ये कहा जाता है कि केंद्र में सत्ता यूपी के रास्ते होकर जाता है जिसने उत्तर प्रदेश साध लिया उसने देश साध लिया। जटिल परिस्थितियों वाले उत्तर प्रदेश में जहा एक तरफ जातिवाद का बोलबाला है वही धर्म की राजनीति करने वालों के साथ हिंदुत्व और मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने वालों की कमी नहीं। यही वजह है देश में राजनीति करने वाली सभी पार्टियां अपने अपने तरीके से उत्तर प्रदेश की राजनीति और यहाँ के वोट बैंक को नियंत्रित करती है।
प्रदेश की राजनीति को अगर प्रयोगशाला की संज्ञा दी जाये तो कही से गलत नहीं होगा। कांग्रेस, सपा, बसपा और भाजपा के लिए प्रयोगशाला बन चुकी उत्तर प्रदेश की धरती आज एक बार फिर राजनीतिक पार्टियों के लिये प्रयोग करने का स्थान बनने जा रही है। लोकसभा चुनावों से पहले जितनी पार्टिया है, उतने सपने प्रदेश की जनता को दिखाये जा रहे है। सभी राजनीतिक पार्टिया अपने अपने काम और जाति के सहारे जनता के बीच कार्यक्रमों को रखना चाह रही है। प्रदेश की राजनीति में दखल रखने वाली पार्टिया ये अच्छी तरह से जानती है अकेले दम पर जातिवाद और धर्म में अंधे लोगो के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए किसी अभिमन्यु की जरुरत पड़ेगी| वजह भी साफ़ है, अभिमन्यु की तरह इस चुनावी रुपी चक्रव्यूह में घुसना आसान है लेकिन उसे भेद पाने की विद्या इस प्रदेश पर राज कर रही पार्टियों के पास ही है।
लोकसभा चुनाव की आहट के साथ ही सभी पार्टिया अपना गुणा गणित और समीकरण बैठाने में लग गई है| भाजपा जहा नमो मंत्र के सहारे 2014 का चक्रव्यूह पार करना चाहती है, वही समाजवादी पार्टी को अपनी सरकार के काम और अपने वोट बैंक पर भरोसा है। बची है कांग्रेस जिसने 2009 में प्रदेश में आशा के विपरीत 22 सीटे जीतकर मजबूती के साथ केंद्र की सत्ता में वापस आई। लेकिन इन चार सालों और कुछ महीने की यूपीए- 2 की सरकार का ग्राफ जनता की नज़रों में लगातार गिरता जा रहा है वही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी अपने काम से जनता को खुश नहीं कर पाए। कांग्रेस की मुश्किल ये है कि यूपीए-2 की छवि जनता की नज़रों में पहले से ही गिरी हुई है वही तेज़ी से बढ़ती मंहगाई और घोटालों ने सरकार की छवि को और गिरा दिया है।
काग्रेस उत्तर प्रदेश में मजबूत सहारे की खोज में है| वजह भी साफ़ है कांग्रेस के रणनीतिकारों को ये अच्छी तरह से पता है इस बार यूपी क जनता का मन मोहना उतना आसान नहीं होगा जितना 2009 में था| यही कारण है, सरकार के निर्देशन में जिस तरह सीबीआई ने सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह यादव को और बसपा सुप्रीमों मायावती को क्लीन चिट दिलवाई गई उससे साफ़ हो गया कांग्रेस अपने दोनों हाथो में लड्डू रखना चाहती है। कांग्रेस रणनीतिकारों का मानना है कि समाजवादी पार्टी के मुखिया जिस तरह तीसरे मोर्चे को बनाने की कवायद में लगे है उसे उनकी राजनीतिक महत्वकांक्षा का पता चलता है| साथ ही उनकी चाहत भी राजनीति की सबसे बड़ी कुर्सी तक पहुँचने क मंशा भी साफ़ हो जाती है।
काग्रेस और समाजवादी पार्टी की तल्खी भी लगातार बढती जा रही है जहा सपा नेतृत्व के इशारे पर पार्टी के राज्यसभा सांसद नरेश अग्रवाल ने ये बयान देकर अनसन फैला दी कि सपा कब तक इस नकारा केंद्र सरकार को समर्थन देती रहेगी| उस पर कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी ने पलटवार करते हुये कहा जब केद्र सरकार से सपा को इतनी परेशानी है तो उन्हें समर्थन वापस ले लेना चाहिये। सपा और कांग्रेस की तल्खी के बीच कांग्रेस नेतृत्व को उत्तर प्रदेश में एकमात्र सहारा अब बहुजन समाज पार्टी दिखाई दे रही है। कांग्रेस उत्तर प्रदेश ही क्या पूरे देश में बहुजन समाज पार्टी के साथ चुनाव लड़ना चाहती है।
कांग्रेस अगर बहुजन समाज पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन करती भी है तो सवाल ये खडा होता है न दोनों पार्टियों का समझौता किस आधार पर होगा पूरे देश की बात अगर छोड़ भी दी जाये तो बसपा कांग्रेस से उत्तर प्रदेश में 30 सीटों से ज्यादा पर समझौता करने के लिये तैयार होगी बहुजन समाज पार्टी भविष्य की राजनीति को देखते हुये और कांग्रेस का इतिहास देखते हुए नहीं तैयार होगी ऊपर डाले गए लिंक में ये बात साफ़ तौर पर संभावनाओ के आधार पर नहीं बल्कि तथ्यों के आधार पर लिखी गई है। बहुजन समाज पार्टी किसी भी हाल में अपना वोट बैंक कांग्रेस के साथ नहीं जोड़ना चाहेगी।
वही कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती पर की गई| टिप्पणी ने भी बसपा कैडर को भड़का दिया। राहुल गांधी ने हाल में ही अपने पंजाब के संगरूर दौरे के दौरान मंच से भाषण देते हुये कहा था , मायावती ने अपने आगे किसी भी दलित नेता को पनपने नहीं दिया। आज कांग्रेस अपने लिये नए हाथी की तलाश में है| कांग्रेस नेतृत्व को अच्छी तरह से पता है कि मुजफ्फरनगर दंगो के बाद मुस्लिम वोट बैंक समाजवादी पार्टी से खफा हो गया| देश में सो-काल्ड धर्म निरपेक्षता की राजनीति करने वाली पार्टियों क नज़र मुस्लिम वोट बैंक की तरफ है। प्रदेश का मुस्लिम समुदाय सपा से नाराज़ है| सभी पार्टियों की नज़र अब इसी वोट बैंक की तरफ गड़ी हुई है। उधर बसपा सुप्रीमों मायावती को पता है अगर समय मुस्लिम वोट बैंक को साध लिया तो लोकसभा चुनाव में पार्टी क तस्वीर बदल जायेगी। वही मुजफ्फरनगर दंगो की वजह से भाजपा को बड़ा फायदा होता दिखाई दे रहा है।
कांग्रेस, सपा, बसपा और भाजपा अभी पार्टिया लोकसभा चुनावों को लेकर अपन अपनी रणनीति बनाने में लगी हुई है| प्रदेश क जनता का झुकाव किस तरफ होगा ये देखने वाली बात होगी लेकन एक बात तो तय है आने वाले समय में राजनीतिक दलों के बीच होने वाली नूराकुश्ती देखने लायक होगी।
प्रदेश की राजनीति को अगर प्रयोगशाला की संज्ञा दी जाये तो कही से गलत नहीं होगा। कांग्रेस, सपा, बसपा और भाजपा के लिए प्रयोगशाला बन चुकी उत्तर प्रदेश की धरती आज एक बार फिर राजनीतिक पार्टियों के लिये प्रयोग करने का स्थान बनने जा रही है। लोकसभा चुनावों से पहले जितनी पार्टिया है, उतने सपने प्रदेश की जनता को दिखाये जा रहे है। सभी राजनीतिक पार्टिया अपने अपने काम और जाति के सहारे जनता के बीच कार्यक्रमों को रखना चाह रही है। प्रदेश की राजनीति में दखल रखने वाली पार्टिया ये अच्छी तरह से जानती है अकेले दम पर जातिवाद और धर्म में अंधे लोगो के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए किसी अभिमन्यु की जरुरत पड़ेगी| वजह भी साफ़ है, अभिमन्यु की तरह इस चुनावी रुपी चक्रव्यूह में घुसना आसान है लेकिन उसे भेद पाने की विद्या इस प्रदेश पर राज कर रही पार्टियों के पास ही है।
लोकसभा चुनाव की आहट के साथ ही सभी पार्टिया अपना गुणा गणित और समीकरण बैठाने में लग गई है| भाजपा जहा नमो मंत्र के सहारे 2014 का चक्रव्यूह पार करना चाहती है, वही समाजवादी पार्टी को अपनी सरकार के काम और अपने वोट बैंक पर भरोसा है। बची है कांग्रेस जिसने 2009 में प्रदेश में आशा के विपरीत 22 सीटे जीतकर मजबूती के साथ केंद्र की सत्ता में वापस आई। लेकिन इन चार सालों और कुछ महीने की यूपीए- 2 की सरकार का ग्राफ जनता की नज़रों में लगातार गिरता जा रहा है वही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी अपने काम से जनता को खुश नहीं कर पाए। कांग्रेस की मुश्किल ये है कि यूपीए-2 की छवि जनता की नज़रों में पहले से ही गिरी हुई है वही तेज़ी से बढ़ती मंहगाई और घोटालों ने सरकार की छवि को और गिरा दिया है।
काग्रेस उत्तर प्रदेश में मजबूत सहारे की खोज में है| वजह भी साफ़ है कांग्रेस के रणनीतिकारों को ये अच्छी तरह से पता है इस बार यूपी क जनता का मन मोहना उतना आसान नहीं होगा जितना 2009 में था| यही कारण है, सरकार के निर्देशन में जिस तरह सीबीआई ने सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह यादव को और बसपा सुप्रीमों मायावती को क्लीन चिट दिलवाई गई उससे साफ़ हो गया कांग्रेस अपने दोनों हाथो में लड्डू रखना चाहती है। कांग्रेस रणनीतिकारों का मानना है कि समाजवादी पार्टी के मुखिया जिस तरह तीसरे मोर्चे को बनाने की कवायद में लगे है उसे उनकी राजनीतिक महत्वकांक्षा का पता चलता है| साथ ही उनकी चाहत भी राजनीति की सबसे बड़ी कुर्सी तक पहुँचने क मंशा भी साफ़ हो जाती है।
काग्रेस और समाजवादी पार्टी की तल्खी भी लगातार बढती जा रही है जहा सपा नेतृत्व के इशारे पर पार्टी के राज्यसभा सांसद नरेश अग्रवाल ने ये बयान देकर अनसन फैला दी कि सपा कब तक इस नकारा केंद्र सरकार को समर्थन देती रहेगी| उस पर कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी ने पलटवार करते हुये कहा जब केद्र सरकार से सपा को इतनी परेशानी है तो उन्हें समर्थन वापस ले लेना चाहिये। सपा और कांग्रेस की तल्खी के बीच कांग्रेस नेतृत्व को उत्तर प्रदेश में एकमात्र सहारा अब बहुजन समाज पार्टी दिखाई दे रही है। कांग्रेस उत्तर प्रदेश ही क्या पूरे देश में बहुजन समाज पार्टी के साथ चुनाव लड़ना चाहती है।
कांग्रेस अगर बहुजन समाज पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन करती भी है तो सवाल ये खडा होता है न दोनों पार्टियों का समझौता किस आधार पर होगा पूरे देश की बात अगर छोड़ भी दी जाये तो बसपा कांग्रेस से उत्तर प्रदेश में 30 सीटों से ज्यादा पर समझौता करने के लिये तैयार होगी बहुजन समाज पार्टी भविष्य की राजनीति को देखते हुये और कांग्रेस का इतिहास देखते हुए नहीं तैयार होगी ऊपर डाले गए लिंक में ये बात साफ़ तौर पर संभावनाओ के आधार पर नहीं बल्कि तथ्यों के आधार पर लिखी गई है। बहुजन समाज पार्टी किसी भी हाल में अपना वोट बैंक कांग्रेस के साथ नहीं जोड़ना चाहेगी।
वही कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती पर की गई| टिप्पणी ने भी बसपा कैडर को भड़का दिया। राहुल गांधी ने हाल में ही अपने पंजाब के संगरूर दौरे के दौरान मंच से भाषण देते हुये कहा था , मायावती ने अपने आगे किसी भी दलित नेता को पनपने नहीं दिया। आज कांग्रेस अपने लिये नए हाथी की तलाश में है| कांग्रेस नेतृत्व को अच्छी तरह से पता है कि मुजफ्फरनगर दंगो के बाद मुस्लिम वोट बैंक समाजवादी पार्टी से खफा हो गया| देश में सो-काल्ड धर्म निरपेक्षता की राजनीति करने वाली पार्टियों क नज़र मुस्लिम वोट बैंक की तरफ है। प्रदेश का मुस्लिम समुदाय सपा से नाराज़ है| सभी पार्टियों की नज़र अब इसी वोट बैंक की तरफ गड़ी हुई है। उधर बसपा सुप्रीमों मायावती को पता है अगर समय मुस्लिम वोट बैंक को साध लिया तो लोकसभा चुनाव में पार्टी क तस्वीर बदल जायेगी। वही मुजफ्फरनगर दंगो की वजह से भाजपा को बड़ा फायदा होता दिखाई दे रहा है।
कांग्रेस, सपा, बसपा और भाजपा अभी पार्टिया लोकसभा चुनावों को लेकर अपन अपनी रणनीति बनाने में लगी हुई है| प्रदेश क जनता का झुकाव किस तरफ होगा ये देखने वाली बात होगी लेकन एक बात तो तय है आने वाले समय में राजनीतिक दलों के बीच होने वाली नूराकुश्ती देखने लायक होगी।
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