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Wednesday, 3 July 2013

अमीरात में तस्करी के शिकार पुरुषों के लिए केंद्र

संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जल्द ही मानव तस्करी और यौन शोषण के शिकार पुरुषों के लिए एक केंद्र की स्थापना करेगा। ख़बरों के मुताबिक, इस नए केंद्र की देखभाल अबु धाबी स्थित ईवा शेल्टर फॉर वुमन एंड चिल्ड्रन संस्था करेगी। यूएई रेड क्रिसेंट अथॉरिटी के अध्यक्ष शेख हमदान बिन जाएद अल नाहयान ने इस केंद्र की स्थापना के सम्बंध में एक प्रस्ताव जारी किया।

शेख हमदान ने कहा कि यूएई ने मानव तस्करी के खिलाफ कई कदम उठाए हैं। उन्होंने कहा कि यह सीमा पार से होने वाले अमानवीय अपराधों के अंत और तस्करी के पीड़ितों को सुरक्षित शरण देने के प्रति देश की प्रतिबद्धता का हिस्सा है।

भ्रष्टाचारियों पर मेहरबान सपा सरकार

हम भ्रष्टाचारियों और घोटालेबाजों को उनकी सही जगह पहुंचा देंगे। प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का ये बयान चुनावों के समय और सरकार बनने के बाद अक्सर सुनाई पड़ता रहता था, लेकिन आज इस सरकार में ईमानदारों को बेइज्जत किया जा रहा है और बेईमानो को गले लगाया जा रहा है। 

प्रदेश के प्रशासनिक महकमें में हलचल पैदा करने वाले प्रांतीय सेवा के वरिष्ठ अधिकारी हरिशंकर पांडे के साथ जिस तरह सरकार और उनके साहबों ने बर्ताव किया उसने राजनीतिक के साथ पारिवारिक पहलुओ को उजागर कर दिया। हरिशंकर पांडे की गिनती ईमानदार अधिकारियों में होती है लेकिन उनके पारिवारिक रिश्ते आज उन्ही पर भारी पड़ रहे है। 

अखिलेश सरकार का गठन जब हुआ था तब प्रदेश के सभी वर्गो में ये उम्मीद थी कि प्रदेश का ये युवा मुख्यमंत्री फिलहाल किसी भ्रष्टाचारी को गले नहीं लगायेगा और ना ही सरकार के आस पास फटकने देंगे। लेकिन सरकार के करीब सवा साल बीतते ही सरकार और उससे जुड़े लोगो का चेहरा और सच सामने आने लगा। 

अखिलेश सरकार, बसपा सरकार के समय लाइमलाईट में रहे, उन भ्रष्ट लोगो को गले लगा रही है जिनका वजूद आज इस सरकार में खत्म हो जाना चाहिये था लेकिन अखिलेश सरकार ऐसे लोगो को अपने साथ जोड़ने में लगी है जो ऊँचे पदों पर बैठकर पैसा बनाने में माहिर माने जाते है। ऐसा ही एक नाम है संजय मोहन का, जो प्रदेश क्या प्रदेश के बाहर भी भ्रष्टाचार करने में बड़ा नाम माना जाता है।

संजय मोहन को 2011 में हुये TET घोटाले का सूत्रधार माना जाता है। संजय मोहन को फ़रवरी 2012 में उत्तर प्रदेश पुलिस ने रमाबाई नगर से गिरफ्तार किया था। संजय मोहन के ऊपर TET में पैसा लेकर परीक्षा को आगे बढ़ाने का आरोप है। संजय मोहन के ऊपर ये भी आरोप है कि उसने TET की एक एक सीट का सौदा कर लिया था। 

उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के निदेशक के पद पर करीब 8 सालों तक अपना खूंटा गाड़ने वाले संजय मोहन ने पूर्वी उत्तर प्रदेश को शिक्षा माफियाओं का गढ़ बना दिया था। संजय मोहन ने जिसकी जेब में पैसा देखा उसी का सगा बन गया या उसे सगा बना लिया। संजय मोहन ने सिर्फ राजधानी लखनऊ में ही कई इंटर कालेज में अपने पैसे लगाये। 

संजय मोहन को करीब से जानने वालों का कहना है कि संजय मोहन की अवैध कमाई का करीब सौ करोड़ रुपया लखनऊ में ही विभिन्न कालेज में लगा हुआ है। संजय मोहन के इस अवैध कमाई के कृत्य में उसके कई साझीदार है जिनमे लखनऊ के कुछ नामी शिक्षण संस्थान भी शामिल है। सूत्रों के हवाले से आ रही ख़बरों के मुताबिक पूरे प्रदेश में संजय मोहन की करीब 200 करोड़ की सम्पति होने का अनुमान है। 

आज संजय मोहन जमानत करा कर जेल से बाहर आ चुका है। ख़बरों के मुताबिक़, संजय मोहन ने अपने पुराने संबंधो को भुनाकर एक बार फिर सरकार और सपा की गोद में बैठने की तैयारी कर ली है। जेल से रिहा होने के बाद संजय मोहन ने अपनी सपा से नजदीकियों का फायदा उठाने की पूरी तैयारी कर ली है। शिक्षा विभाग से जुड़े सूत्रों के हवाले से खबर है कि संजय मोहन माध्यमिक शिक्षा परिषद के पाठ्यक्रम तय करने वाली समिति के चेयरमैन पद पर आसीन होने वाला है। 

संजय मोहन को इस पद पर लाने के लिए शिक्षा माफियाओ से लेकर राजधानी में विचरने वाले कुछ तथाकथित वो बड़े नाम है जो यदा कदा सुर्ख़ियों में रहते है साथ ही उससे लाभ लेने वाले कुछ ऐसे लोग लगे है जिन्होंने कभी संजय मोहन को लाभ पहुंचाया होगा और लाभ लिया होगा। ख़बरों के मुताबिक, संजय मोहन को इस पद पर बैठाने के लिए सभी कवायदे पूरी कर ली गई है वहीँ, शासन स्तर से उनके पद पर आसीन होने वाली फ़ाइल फाईनल स्टेज पर पहुँच चुकी है। 

ED की जांच का सामना कर रहे संजय मोहन अब माध्यमक शिक्षा विभाग का पाठ्यक्रम तय करेंगे| साथ ही उन किताब की कंपनियों से करोड़ों रुपये सिर्फ इस बात के लेंगे कि उनकी किताब उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद् के स्कूलों में छात्र-छात्राओं को पढ़ने के लिए लगाई जा सके। 

संजय मोहन की तरह ही तपेन्द्र प्रसाद भी एक चर्चित नाम है जो बसपा सरकार के समय खनन विभाग का निदेशक होने के नाते आये दिन चर्चा में रहता था। पूर्व मंत्री और NRHM घोटाले में जेल में बंद बाबू सिंह कुशवाहा के करीबी तपेन्द्र प्रसाद भी आजकल अखिलेश सरकार के आँखों के तारे बने हुए हैं|

तपेन्द्र प्रसाद को सरकार ने हाल ही में प्रशासनिक सुधार विभाग में सलाहकार नियुक्त कर लाल बत्ती से नवाज दिया है । तपेन्द्र प्रसाद पर UPSIDC में हुये करोड़ों के घोटाले की जांच चल रही है| तपेन्द्र प्रसाद की जांच SIT कर रही है। अब अखिलेश सरकार दागी तपेन्द्र प्रसाद पर इतनी मेहरबान क्यों है इसकी वजह तो पता नहीं लेकिन इन सभी बातों को देखकर साफ़ पता लगता है की प्रदेश की अखिलेश सरकार भी उसी राह पर है जिस पर पूर्व की बसपा सरकार चल रही थी। 

भ्रष्ट और घोटालों को अंजाम देने के लिये भी अनुभव की जरुरत होती है जो सभी के अन्दर नहीं होता है इस विलक्षण प्रतिभा के धनी कुछ ही लोग होते है जिनमें संजय मोहन, तपेन्द्र प्रसाद और एक नया नाम हाल में ही शामिल हुआ है ललित श्रीवास्तव का। 

ललित श्रीवास्तव शिक्षा विभाग में मामूली बाबू के पद पर तैनात होने वाला शख्स है जो अपनी जोड़तोड़ और चाटुकारिता की वजह से शिक्षा विभाग के चर्चित नामों में शुमार है या ये कहे विख्यात है। ललित श्रीवास्तव की नजदीकियाँ पूर्व निदेशक संजय मोहन से भी है। संजय मोहन ललित श्रीवास्तव के आका के तौर पर जाना जाता है लेकिन परिस्थितिया आज ऐसी है कि संजय मोहन को उसी ललित श्रीवास्तव का सहारा लेना पड़ रहा है जो ललित श्रीवास्तव संजय मोहन की हुक्मउदूली किया करता था। 

सूत्रों के हवाले से आ रही ख़बरों के मुताबिक संजय मोहन की नई तैनाती में ललित श्रीवास्तव का अहम् किरदार है। ललित श्रीवास्तव ने आज अपना कद इतना बड़ा कर लिया है की संजय मोहन उसी के सहारे दोबारा अपनी पहचान पाने की कोशिश में लगे है। शिक्षा विभाग में मामूली बाबू से अपने नौकरी की शुरुवात करने वाले ललित श्रीवास्तव ने अपनी तेज़ी और जोड़तोड़ से शिक्षा विभाग के बड़े अधिकारियों के बीच अपनी पहचान बनाई। 

जिला विद्यालय निरीक्षक के कार्यालय में बाबू की नौकरी करते हुए ललित श्रीवास्तव को पत्रावलियों में हेरफेर का दोषी पाते हुए विभाग ने निलंबत कर दिया था, लेकिन संजय मोहन से अपनी नजदीकियों की वजह से ना सिर्फ ये बहाल हुआ बल्कि इसने अपनी सरकारी नौकरी को लात मार एक प्राइवेट कालेज में शिक्षक की नौकरी कर ली|इसके पीछे की मंशा उस समय लोगो को समझ में नहीं आई। 

लेकिन आज ललित श्रीवास्तव के माध्यमिक शिक्षा चयन बोर्ड में सदस्य बन जाने के बाद उसको जानने वाले इसकी जोड़तोड़ और दिमाग के कायल हो गए। संजय मोहन ने अपने एक रिश्तेदार को भी कला के शिक्षक के तौर पर के सेंटेनियल कालेज में पद दिलवा दिया जो संजय मोहन के आदेश से हुआ था। बाद में जांच के बाद नित्यानंद नामक इस शिक्षक को उसके पद से बर्खास्त कर दिया गया। 

शिक्षा विभाग में बाबू रहते और संजय मोहन की सरपरस्ती में ललित श्रीवास्तव ने अकूत धन कमाया जिसका इस्तेमाल उसने अपने कुछ संपर्को को साथ लेकर माध्यमिक शिक्षा चयन बोर्ड के सदस्य तक पहुँचने के लिए किया। ललित श्रीवास्तव आज उस कुर्सी पर बैठा हुआ है जहाँ उसे उसके तथाकथित आकाओं को शिक्षक चयन के माध्यम से अरबो रुपयों का वारा न्यारा करने का मौक़ा मिल सकता है। 

आज हालात ये है कि शिक्षा विभाग में कुख्यात ललित श्रीवास्तव की चयन बोर्ड में नियुक्ति को लेकर शिक्षा क्षेत्र से चुनकर आने वाले विधायक और शिक्षा संघों से जुड़े शिक्षक नेता ललित श्रीवास्तव की पात्रता ना होने के बावजूद चयन बोर्ड का सदस्य बनाये जाने को लेकर धरना प्रदर्शन कर रहे है साथ ही अपनी मांग और बात को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कानो तक पहुंचाने के लिए ज्ञापन का सहारा ले रहे है। 

प्रदेश के शिक्षा विभाग ने हाल में ही करीब 6 हज़ार शिक्षकों की भर्ती करने का एलान किया है ये सभी भर्ती माध्यमिक शिक्षा चयन बोर्ड के माध्यम से होंगी। सूत्रों के हवाले से ये भी खबर है कि ललित श्रीवास्तव की देखरेख में इस चयन प्रक्रिया को पूरा किया जाएगा। वहीँ, अब सरकार ने माध्यमिक शिक्षा के लिए पढाई जाने वाली किताबो के चयन का अधिकार सुप्रीम कोर्ट से जमानत पर छूटे शिक्षा विभाग से अरबो की कमाई करने वाले संजय मोहन के हाथ में देने की तैयारी हो गई है। 

सरकार और खुद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आये दिन सरकार से काम करवाने के लिए करोड़ों रुपये डकारने वाले तथाकथित लोगो की पैरवी से भ्रष्ट लोगो को ऐसे पदों पर बैठा रहे है, जहाँ इनके कदम पड़ते ही घोटालों और भ्रष्टाचार की नई नीवं पड़ जायेगी। प्रदेश की अखिलेश सरकार, बसपा सरकार के दौरान आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे उन अधिकारियों कर्मचारयों को चुन चुन कर ऐसी जगहों पर क्यों बैठा रही है ये सरकार ही जाने| लेकिन एक वजह तो साफ़ है सरकार की मंशा ऐसे लोगो को जिम्मेदार ओहदों पर बैठाने से साफ़ नहीं लग रही। 

घोटाले और भ्रष्टाचार में मास्टर की डिग्री हासिल कर चुके तपेन्द्र प्रसाद, संजय मोहन, ललित श्रीवास्तव की जरुरत सरकार को इतनी है कि आज उसे प्रदेश में इन जैसे भ्रष्टो के अलावा कोई अधिकारी नज़र नहीं आता। अखिलेश सरकार की इन घोटालेबाजों की नियुक्ति से ये बात साफ़ है घोटाला करके पैसा कैसे कमाया जाता है इस विधा में महारत रखने वाले इन लोगो की जरुरत सरकार को ज्यादा है। 

प्रदेश के लाखों छात्र छात्राओं को अपने चुनावी वादों के मुताबिक आगे की पढ़ाई को हाईटेक तरीके से करवाने के लिए प्रदेश की अखिलेश सरकार लैपटाप और टेबलेट बाँट रही है लेकिन अब सरकार द्वारा ऐसे भ्रष्टो को बड़े ओहदों पर बैठाने से इस योजना में भी धांधली होने की आशंका बढ़ गई है। अखिलेश सरकार को अपनी योजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए हरिशंकर पांडे जैसे ईमानदार अधिकारियों की जरुरत है ना की तपेन्द्र, संजय मोहन और ललित श्रीवास्तव जैसे घोटालो में लिप्त अधिकारियों और कर्मचारियों की।

Tuesday, 2 July 2013

मुलायम की औकात पीएम के घर झाड़ू लगाने लायक नहीं

केन्द्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव पर व्यक्तिगत प्रहार किया है| बेनी प्रसाद वर्मा ने मुलायम सिंह की औकात प्रधानमंत्री के घर झाड़ू लगाने वाले से नापी है| बेनी प्रसाद वर्मा ने नई दिल्ली में दिए गए बयान में कहा, "सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव प्रधानमंत्री के घर झाड़ू लगाने लायक भी नहीं है, प्रधानमंत्री पद का सपना वो मत देखे|"

मुलायम सिंह यादव के पुराने साथी बेनी प्रसाद वर्मा ने मुलायम सिंह यादव पर अपने द्वारा दिए जा रहे बयानों पर कोई अफ़सोस नहीं है| केन्द्रीय इस्पात मंत्री के इस बयान से एक बार फिर राजनीतिक गतिविधियाँ तेज़ हो गई है, बेनी के बयान को लेकर प्रदेश की सियासत से दिल्ली तक में हलचल देखी गई , पूर्व में बेनी प्रासाद के संसद सत्र के दौरान मुलायम सिंह यादव के आतंकवादियों से सम्बन्ध वाले बयान ने दिल्ली की केंद्र सरकार को भी मुश्किलों में डाल दिया था| कांग्रेस सपा में रार इतनी बढ़ी की खुद यूपीए की चेयर पर्सन और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को हस्तक्षेप करना पड़ा था| 

अब बेनी प्रसाद वर्मा के झाड़ू वाले बायन ने एक बार फिर कांग्रेस और सपा को आमने सामने लाकर खड़ा कर दिया है| बेनी प्रसाद वर्मा मुलायम सिंह यादव के संघर्ष के दिनों के साथी है, बेनी ने समाजवाद पार्टी के गठन में अहम् भूमिका अदा की थी, साथ ही मुलायम सिंह की मजबूती और कमजोरियों से अच्छी तरह वाकिफ है| बेनी बीते दो सालों से मुलायम सिंह यादव के ऊपर बयान देकर उस कहावत को चरितार्थ कर रहे है की सबसे अच्छा दोस्त सबसे बड़ा दुश्मन होता है यही हाल आजकल बेनी प्रसाद वर्मा और मुलायम सिंह यादव की सियासत का है| 

2007 में बेनी प्रसाद वर्मा ने सपा अमर सिंह की वजह से छोड़ दी थी, 2009 के चुनावों में कांग्रेस का दामन पकड़ने वाले बेनी प्रसाद वर्मा ने अपने कुर्मी वोट बैंक के बदौलत संसद की राह पकड़ी| कांग्रेस ने भी बेनी प्रसाद की जीत को इनाम में बदल कर उन्हें मंत्री पद पर बिठा दिया| मंत्री बनते ही बेनी प्रसाद वर्मा ने मुलायम सिंह यादव पर अपने बयानों से हमला बोला जो समय-समय पर सुनाई देता है|

बिना टेंडर के हुआ बड़ा खेल


उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त जस्टिस एन के मेहरोत्रा ने राजकीय निर्माण विभाग के पूर्व प्रबंध निदेशक सीपी सिंह को बिना निविदा (टेंडर) निकाले कार्य कराये जाने को लेकर दोषी ठहराया है। लोकायुक्त द्वारा जांच के बाद ये तथ्य सामने आये कि तत्कालीन एम डी सीपी सिंह ने निर्माण निगम के ज्यादातर कामो के टेंडर ही नहीं खुलवाये थे। 

लोकायुक्त द्वारा की गई इस जांच के बाद माया सरकार के दौरान और भी विभागों में बिना टेंडर के काम हुये। लोकनिर्माण विभाग, सिंचाई विभाग ऐसे विभाग थे जहाँ टेंडर का पता नहीं रहता था, ठेकेदार और अभियंता अपने में ही काम को बाँट कर कार्य को करते थे।

लोकायुक्त की जांच में जिस सीपी सिंह को बिना टेंडर के काम का दोषी ठहराया गया है| उस विभाग के पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी के ऊपर लोकायुक्त की जांच के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई है। वही लोक निर्माण विभाग के पूर्व मुख्य अभियंता टी राम आज विधायक बनकर सत्ता के गलियारों में बेख़ौफ़ घूम रहा है। 

बिना टेंडर के काम की जांच में जितना दोषी सीपी सिंह को ठहराया जा रहा है उतना ही दोषी तत्कालीन विभागीय मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी भी थे। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के करीबी और बसपा के मुस्लिम चेहरे नसीमुद्दीन सिद्दीकी की सरपस्ती में ही सीपी सिंह ने बिना निविदा खोले राजकीय निर्माण निगम के कामों का आवंटन किया था। 

बसपा से जुड़े सूत्रों के मुताबिक नसीमुद्दीन सिद्दीकी के इशारे पर ही बिना टेंडर खुले काम बांटने का खेल बसपा सरकार के समय लगातार पांच सालों तक चलता रहा। लोकायुक्त जस्टिस एन के मेहरोत्रा ने प्रदेश सरकार के पास 22 मई को मायावती सरकार के दौरान बनाये गये स्मारकों, पार्को में हुये घोटाले की जांच रिपोर्ट सरकार को भेज दी है। 

इस रिपोर्ट में लोकायुक्त ने नसीमुद्दीन सिद्दीकी और बाबु सिंह कुशवाहा सहित 19 लोगो के खिलाफ तत्काल मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई करने की संतुति की थी लेकिन कार्रवाई के नाम पर सरकार ने कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया। आज भी नसीमुद्दीन सिद्दीकी और उनकी सरपरस्ती में बड़े बड़े घोटालों को अंजाम देने वाले आराम से बाहर घूम रहे है। 

लोकायुक्त ने अपनी ताज़ा भेजी गई रिपोर्ट में सीपी सिंह के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं में अभियोज़न चलाने व उनकी पांच साल के दौरान पैदा की गई सम्पतियों की जांच की भी सिफारिश की है। लोकायुक्त ने अपनी संतुति में उनके कार्यकाल के दौरान निर्माण हुई 16 योजनाओं के निर्माण लागत का 12.5 प्रतिशत धन राजकीय निर्माण निगम से वसूलने की भी संतुति की है। 

लोकायुक्त के यहाँ 2012 में लखनऊ निवासी अधिवक्ता अरुणेन्द्र मोहन शुक्ला ने शिकायत दर्ज कराई थी जिसमें ये आरोप लगाया गया था कि सरकारी मेडिकल कालेजो , पी जी आई , किंग जार्ज मेडिकल कालेज के दन्त संकाय, नवी मुम्बई के गेस्ट हाउस समेत 16 ऐसे निर्माण कार्य हुये जिनका टेंडर नहीं खोला गया। 

ये सभी कार्य निर्माण निगम ने निजी कंपनियों को सौंप दिए, इनकी भू भाग के क्षेत्रफल के हिसाब से तय कर दी गई थी, जिसकी वजह से ठेकेदारों को ख़ासा मुनाफ़ा हुआ ये ,मुनाफा किन किन के बीच वितरित हुआ ये भी जांच का विषय है। 

इन सभी कार्यों में भवनो के नक़्शे और निर्माण कार्य की देख रेख के लिए निजी अभियंताओं की मदद ली गई इन सभी अभियंताओं और वास्तुविदों का चयन तत्कालीन चिकित्सा शिक्षा मंत्री के राय से किया गया। ऐसे 16 कार्यों पर 858 करोड़ 95 लाख 19 हज़ार रुपये खर्च किये गए। इन सभी कामो की टेंडर प्रक्रिया ठीक नहीं थी। 

लोकायुक्त ने इस मामले में जांच रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई करने को लिखा है लेकिन यहाँ सबसे बड़ा सवाल ये है कि लोकायुक्त जस्टिस एन के मेहरोत्रा द्वारा 22 मई को भेजी गई रिपोर्ट का सरकार ने फिलहाल कोई पुर्साहाल नहीं लिया है। 

स्मारकों के निर्माण में 14.10 अरब के घोटाले के लिए पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन और बाबू सिंह कुशवाहा सहित कुल 199 लोगों को दोषी ठहराते हुए उनसे रकम वसूलने की सिफारिश की है। इसके साथ ही उन्होंने 19 लोगों के खिलाफ तुरंत एफआईआर दर्ज कराकर मुकदमा चलाने की सिफारिश की है। लेकिन अखिलेश सरकार ने कुछ भी नहीं किया| लोकायुक्त नाराजगी जताते हुए कहते हैं कि पूर्व मंत्रियों से जुडी सिफारिशों पर सरकार की ओर से समयबद्ध कार्रवाई न होना खेदजनक है। अब तो दोषी पाए लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराकर मुकदमा चलाया जाना चाहिए। सरकार की कार्रवाई से मैं संतुष्ट नहीं हूं।

लोकायुक्त की एक और जांच रिपोर्ट की सिफारिश फिलहाल सरकार के पास भेजी गई है सवाल ये उठाता है की इस मामले में अकेले सीपी सिंह को ही दोषी क्यों ठहराया गया जबकि सीपी सिंह के ऊपर सरकार के सबसे कद्दावर मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी का हाथ था, क्या इस मामले में जांच की सुई नसीमुद्दीन की तरफ नहीं घुमनी चाहिए ?

3700 लोगो ने उसे अपना मसीहा बनाया

वो मसीहा है  जेलों में बंद कैदियों का वो मसीहा है उनका जिनको विदेश में पुर्साहाल लेने वाला कोई नहीं उसे मसीहा एक दो लोगो ने नहीं बनाया है बल्कि पुरे 3700 लोगो ने उसे अपना मसीहा भाई , दोस्त और ना जाने किस किस नाम से पुकारा है। 

हम इस रिपोर्ट में आज एक ऐसी शख्सियत के बारे में दुनिया को बताने जा रहे है जिसने इस मतलब परस्त दुनिया में ऐसे  3700 लोगो को एक बार फिर उनकी दुनिया में लौटने का मौक़ा दिलाया है जिसे वो भूल चुके थे। ये मसीहा है दुबई के आभूषण कंपनी के मालिक फिरोज जी मर्चेंट जिनकी पहल से आज ना सिर्फ हिन्दुस्तान के बल्कि कई देशों के सजायाफ्ता कैदी अपने देश, अपने घरों और अपने परिवारों के पास लौट चुके है। 

संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में भारतीय मूल के आभूषण कारोबारी फिरोज जी मर्चेंट ने ऐसे कैदियों की मदद की जो अरब की अलग अलग जेलों में बंद थे और जिन्हें वहा पूछने वाला कोई नहीं था। इन कैदियों में ज्यादातर ऐसे थे जिन्होंने अपनी सज़ा अरब के अलग अलग जेलों में काट भी ली थी लेकिन जुर्माने की रकम न चुका पाने की वजह से सज़ा कटाने के बाद भी जेलों में बंद थे। 

फिरोज जी मर्चेंट ने इन कैदियों की दुर्दशा और उनकी दिक्कतों के बारे में सुना फिरोज का दिल अपने देश के इन निरीह लोगो के लिए पसीज गया और उन्होंने इनकी मदद का बीड़ा उठाया फिरोज ने न सिर्फ उनकी लिस्ट तैयार की बल्कि उन्हें जेल से बाहर निकालने के लिए उन सभी कानूनी पहलुओ पर भी अपने वकीलों से राय ली ताकि उन्हें अरब कानून के मुताबिक़ बाहर निकाला जा सके। 

फिरोज जी मर्चेंट ने ये काम 2011 से शुरू किया और अभी तक 3700 लोगो को कैद से आज़ाद करा चुके है। इस साल करीब 500 कैदी जेल से रिहा किये गए इस पूरी प्रक्रिया में फिरोज जी मर्चेंट का करीब 6 करोड़ रुपया खर्च हो चुका है। फिरोज इस साल करीब 1000 कैदियों का ऋण चुकाने के लिए प्रयासरत है ताकि इन बिछड़े कैदियों की मुलाकात अपनों से हो सके। 

फीरोज का कहना है कि मैंने इन कैदियों के बारे में सुना था, बाद में मैंने जेलों में इनकी दशा को जाकर देखा मुझे ऐसे सैकड़ो कैदी मिले जिन्होंने अपनी सज़ा पूरी कर ली थी, लेकिन वो अपने देश इस लिए वापस नहीं जा पा रहे थे की उन्होंने यहाँ रहते हुए जो कर्ज लिया था उसे चुकता करने के लिए इनके पास पैसे नहीं थे। 

फिरोज जी मर्चेंट का कहना है कि अरब की जेलों में सुविधाये बहुत है लेकिन जेल तो जेल होती है। उनका ये भी मानना है कि कोई अपने परिवार और देश से एक दुसरे देश की जेल में बंद रहे ये उन्हें और उनके परिवार को मंजूर नहीं था इसीलिये उन्होंने इन्हें रिहा करा कर वापस इनके देश भेजने का बीड़ा उठाया। 

फीरोज का ये भी कहना है कि ये सिर्फ उन कैदियों की मदद करते है जो मकान का किराया, कार ऋण, क्रेडिट कार्ड का भुगतान जैसे मामलों में पैसे न चुका पाने की स्थिति में जेल में बंद होते है। उनका मानना है कि उनके स्मगलर, ह्त्या, दुष्कर्म, और नशीले पदार्थो के सेवन करने वाले कैदियों के लिए कोई जगह नहीं है। 

फिरोज जी मर्चेंट का कहना है की उनका दिल तब बहुत दुखता था जब वो अखबारों और टीवी पर ऐसे लोगो की ख़बरों को पढ़ते थे ये वो लोग थे जो अपना सब कुछ दाँव पर लगा कर अरब पैसे कमाने आये थे लेकिन आर्थिक मंदी के दौर में इनकी नौकरियां चली गई थी। 

फिरोज ने इस काम की शुरुवात भारतीय कैदियों को जेलों से रिहा कराने के साथ की थी लेकिन बाद में इन्होने पाकिस्तान, श्रीलंका, मालद्वीप, जैसे देशों के कैदियों को भी उनका ऋण चुका कर बाहर कराया और उन्हें टिकट करा कर उनके देश भेजा। 

फिरोज की ये अनोखी सेवा आज उन्हें भारत सहित कई देशों में एक अच्छे और नेकदिल इंसान के तौर पर पहचान दिला रही है। फिरोज आज भी इस मिशन में लगे हुए है। अरब में निताकत कानून के आने के बाद लाखों लोगो की नौकरियों पर संकट मंडरा रहा है। फिरोज आने वाले समय में ऐसे लोगो की मदद करते देखे जा सकते है जिनका इस परदेश में कोई नहीं जो उन्हें उनके बिछड़ो से मिला सके लेकिन फिरोज जी मर्चेंट के रूप में एक मसीहा वहा मौजूद है जो उन्हें उनके घरों का रास्ता दिखा सकता है।    

सीबीआई दाढ़ी के रंग के आधार पर नहीं लायेगी चार्जशीट

इशरत जहां एन्काउन्टर मामले में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके करीबी मंत्री अमित शाह की मुश्किलें 4 जुलाई तक बढ़ी हुई है| उधर सीबीआई सूत्रों के हवाले से आ रही ख़बरों के मुताबिक सीबीआई हाई कोर्ट में विभाग को किरकिरी से बचाने के लिए मोदी , अमित शाह और पूर्व संयुक्त निदेशक आई बी राजिन्द्र कुमार का नाम चार्जशीट से निकालने पर विचार कर रही है| 

सीबीआई इस मामले में बैकफुट पर आ चुकी है| उधर आईबी के पूर्व निदेशक और गुजरात पुलिस द्वारा दिए गए बयानों ने सीबीआई को और उलझा दिया है| 15 जून 2004 को आईबी के पूर्व संयुक्त निदेशक राजिन्द्र कुमार ने अपनी अहमदाबाद तैनाती के दौरान गुजरात पुलिस को पाक समर्थित लश्करे- तैय्यबा के एक महिला सहित पांच आतंकवादियों को गुजरात में प्रवेश की जानकारी दी थी, जिन्हें बाद में एक मुठभेड़ के दौरान मार गिराया गया था| वहीँ, गुजरात पुलिस राजिन्द्र कुमार के बयान से अलग बयान दे रही है, गुजरात पुलिस का दावा है कि इन आतंकियों को गुजरात पुलिस ने पकड़ा था, आईबी सिर्फ पूछताछ करने आई थी उसके बाद इन्हें ले जाकर अहमदाबाद के बाहरी इलाके में एन्काउन्टर कर दिया गया| 

सीबीआई गुजरात पुलिस के उस बयान को पहले आधार बनाना चाहती थी जिसमें पूर्व DIG डी जी बंजारा और आईबी संयुक्त निदेशक पर बातचीत हुई थी जिसमें सफ़ेद और काली दाढ़ी वालों से बातचीत होने की बात सामने आई थी| बंजारा और कुमार के बीच हुई इस बातचीत में काली और सफ़ेद दाढ़ी वालों से इजाजत मिलने की बात कही गई थी| 

इसी एन्काउन्टर के दौरान वायरलेस पर कुछ पुलिस वालों ने काली और सफ़ेद दाढ़ी वालों से बात हो गई है जैसे शब्द सुने थे| सीबीआई इस एक बयान के आधार पर मोदी और शाह का नाम चार्जशीट में डालने जा रही है लेकिन सीबीआई को अच्छी तरह से पता है कि सुनी हुई बातों पर कोर्ट यकीन नहीं करती| सीबीआई कि इस मुश्किल को आसान किया राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन और पूर्व गृह सचिव आर के सिंह ने| इन दोनों कि सलाह पर अब सीबीआई इस चार्जशीट से मोदी और शाह का नाम चार्जशीट से बाहर करने पर विचार कर रही है|

तेलंगाना के गठन पर फैसला

रायलसीमा और तेलंगाना क्षेत्रों को मिलाकर रायल-तेलंगाना के गठन या हैदराबाद को केंद्र शासित प्रदेश की हैसियत दी जाएगी, मगर अब ऐसी कोई संभावना नहीं रही।पृथक तेलंगाना मुद्दे पर फैसला अपने अंतिम चरण में है और यथाशीघ्र इसकी घोषणा कर दी जाएगी। कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि सरकार के पास केवल दो ही विकल्प हैं। एकजुट आंध्र प्रदेश या पृथक तेलंगाना राज्य का गठन। 

दिग्विजय सिंह ने कहा कि यथाशीघ्र फैसला लिया जाएगा, लेकिन उन्होंने इसकी कोई समय सीमा बताने से यह कहते हुए मना कर दिया कि इस तरह की समय सीमा पहले कई बार तय की जा चुकी हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री एन. किरण कुमार रेड्डी, उप मुख्यमंत्री दामोदर राजानरसिम्हा और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बोस्ता सत्यनारायण को इस बात की तैयारी करने के लिए कहा कि यदि कोई फैसला लिया जाता है तो रणनीति क्या होनी चाहिए।

उन्होंने कहा, इस मामले में भावी कदम का वास्तविक अर्थ यह है कि यदि कोई फैसला लिया जाता है तो राजनीतिक रणनीति और प्रशासनिक कार्रवाई क्या होनी चाहिए। दोनों सरकारों और पार्टी को इसके लिए तैयार रहना होगा। केंद्र सरकार द्वारा 9 दिसंबर 2009 के बयान के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। हम कह चुके हैं कि यह आंध्र प्रदेश विधानसभा को अग्रसारित किया जाएगा।

दिग्विजय सिंह ने कहा कि जहां विधानसभा में प्रस्ताव पारित करना एक पृथक राज्य के गठन की सामान्य प्रक्रिया है, वहीं ऐसा प्रस्ताव केंद्र सरकार के लिए बंधनकारी नहीं होगा।