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Friday, 31 May 2013

हनुमान जी को चाहिए था पैन कार्ड, आयकर विभाग ने दिया

नई दिल्ली। क्या भगवान को किसी कार्ड या किसी सरकारी विभाग के मेहरबानी की जरुरत है। लेकिन आजकल आयकर विभाग भगवान के ऊपर मेहरबान हो चला है। आयकर विभाग ने हनुमान जी का भी पैन कार्ड बना कर नया इतिहास रच दिया है। 

जब से भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंक में खाता खोलने के लिए पर्मानेंट एकाउंट नंबर (PAN) को अनिवार्य कर दिया है तब से इन्कम टैक्स विभाग में रोजाना हज़ारों की संख्या में आवेदन पत्र आते है । इन सभी आवेदन पत्रों पर भले ही आयकर विभाग के अधिकारीयों कर्मचारियों की नज़र ना पड़े लेकिन भगवन हनुमान की तरफ से आये आवेदन को उन्होंने न सिर्फ स्वीकार किया है, बल्कि उनका पर्मानेंट एकाउंट नंबर भी जारी कर दिया है। 

आयकर विभाग की तरफ से जारी किये गए इस पैन कार्ड में बाकायदा भगवन की फोटो लगी है, नाम के आगे श्री हनुमान लिखा है, पिता के नाम के आगे बानर राज केशरी लिखा हुआ है। वही पता में त्रेता युग और पैन नंबर की जगह pnapv30L87 दर्ज है। वही हस्ताक्षर वाली जगह पर श्री हनुमान जी के बाकायदा अंग्रेजी भाषा में हस्ताक्षर भी है। 

आयकर विभाग द्वारा किये गए इस कारनामे में या तो अधिकारियों कर्मचारियों की घोर लापरवाही है या किसी हनुमान भक्त ने अपनी भक्ति दिखाने के लिए इस कार्ड को बिना आवेदन फार्म चेक किये जारी करा दिया।

अखिलेश- शिवराज खामोश : यूपी, एमपी में कुकुरमुत्तो की तरह उग रही है चिटफंड कंपनिया

लखनऊ। 80 के दशक में देश के सभी चौराहों पर सपने बेचने की दुकाने खुली थी, बस इन दुकानों की शर्त इतनी थी कि इनके पास आपको अपनी गाढ़ी कमाई का कुछ हिस्सा थोडा-थोडा करके जमा करना होता था। इन सपने बेचने की दुकानों ने अपने व्यापार का धार ही लोगो की भावनाओं को बनाया था। कम पूंजी में बड़े सपने देखने की चाहत सभी हिन्दुस्तानियों में जन्मजात होती है। आत्मविश्वास से लबरेज इस देश की और यहाँ के नागरिकों की सबसे बड़ी विडम्बना ही यही होती है कि वह किसी के बहकावे में आकर अपना सब कुछ दाँव पर लगाने में भी पीछे नहीं रहते, जिसका परिणाम सामने आता है धोखे और उस फरेब के तौर पर जो ये कम्पनियां उन भोले-भाले लोगों को सपने के तौर पर दिखाकर करती हैं। 

रमेश चाय वाले का सपना है कि उसका बेटा पढ़-लिखकर डाक्टर या इंजीनियर बने जिसके लिए उसे अच्छी शिक्षा के साथ काफी पूंजी लगाने की भी आवश्यकता पड़ने वाली है। रमेश को कोई राय देता है कि फला चौराहे पर फला कंपनी एक रूपये के तीन या चार साल बाद चार रूपये वापस कर रही है। रमेश इस बात को सुनकर अपने जीवन भर की पूंजी को दाँव पर लगाकर अपने बेटे को बेहतर ज़िन्दगी देने का सपना देखने लगता है लेकिन रमेश को झटका उस समय लगता है जब कंपनी रमेश और उसके जैसे हज़ारों लोगो के सपने बेचकर उन्ही का पैसा लेकर फरार हो चुकी होती है। ये कहानी सिर्फ एक बानगी भर है| हमारे समाज में अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए अपना सबकुछ गंवाने वाले लाखो रमेश मिल जायेंगे, साथ ही उनके वो सपने भी उसी चाय की भट्टी में जलते मिल जायेंगे जिसमें पसीना बहाकर उन्होंने पाई-पाई जोड़कर उस कंपनी में इस उम्मीद में जमा किया कि यह पैसा बेटे की पढ़ाई और बुरे वक़्त में सहारा बनेगा। 

सहारा इंडिया, लालिमा फाइनेंस, कुबेर, जेवीजी, राप्ती, सोप्ती, अनिल, चंदू, गुडिया, हरियाली जैसे ऐसे कुछ नाम है जिन्होंने लोगो के शरीर से पैसे के रूप में उनका खून निकाला है। आज देश में गिनी-चुनी फाइनेंस कंपनिया बची हुई है| इन कंपनियों ने बड़ा बनने के लिए लाखों निवेशकों को इस बात के लिए तैयार किया कि वह उन पर विश्वास करें और उनके यहाँ उस विश्वास के साथ अपने जीवन की जमा पूंजी रख दे जो उन्होंने खाता खोलने के लिए कंपनी पर दिखाया था| लेकिन शायद उन लाखों निवेशकों को ये पता नहीं था कि वह अपने पैसे ऐसे लोगो के हाथ में दे रहे है जो कभी वापस नहीं आयेंगे। उनके पैसे को यही कम्पनियां अलग-अलग स्कीमों में लगाकर पैसे की तरह उन्हें भी जीवन भर घुमाती रहेंगी। 

देश इस समय सरधा चिटफंड घोटाले की आग में तप रहा है| इस चिटफंड घोटाले की आग देश के वित्तमंत्री पी चिदंबरम के घर तक उनकी पत्नी नलिनी चिदंबरम के जरिये पहुँच चुकी है| इस कंपनी ने सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही अपना कारोबार करते हुए करीब 20 हज़ार करोड़ के घोटाले को अंजाम दे दिया| इस घोटाले में सरधा ग्रुप ने उन सभी हथकंडो का इस्तेमाल किया जिसके जरिये आम आदमी के जेब का पैसा उनकी तिजोरियों में पहुंच सके|सरधा ग्रुप के चेयरमैन सुदीप्ता सेन ने जब इस स्कैम्प के बाबत अपना मुंह खोला तो कई सफेदपोशो के चेहरे भी इस स्कैम्प की रोशनी में सामने आ गए। बंगाल में लोगो का गुस्सा फूट पड़ा| लोगो को अपना मकान जमीन दिलाने का सपना दिखाने वाली सरधा ग्रुप ने डेली वेजेज पर हजारों निवेशको से करीब पांच सालों तक सौ दो सौ रूपये रोज़ाना के हिसाब से पैसे जमा करवाए| वो भी उस जमीन के नाम पर जो जमीन सिर्फ कंपनी की स्कीम्स में थी लेकिन हकीक़त में जमीन का कोई पता नहीं था। 

आज सरधा ग्रुप हजारों करोड़ का चूना लगाकर फरार हो चुकी है| उसका मालिक पुलिस की गिरफ्त में है और निवेशक पागल होकर अपने पैसे और उस जमीन को तलाश रहे है जो कहीं है ही नहीं। सरधा ग्रुप की तरह अभी भी देश के कई राज्यों में वैसी ही चिटफंड कंपनिया काम कर रही है जिन पर केंद्र क्या राज्य सरकारों की भी नज़र नहीं है। ताज़ा मामला सामने आया है मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर बेंच में जहाँ 2010 में दाखिल हुई एक पीआईएल ने मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में काम कर रही कंपनियों के बारे में तीखी टिप्पणी की है। 

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के ग्वालियर बेंच के जज न्यायाधीश एस के गंगेले और न्यायधीश ब्रिज किशोर दुबे की खंडपीठ ने याची धर्मवीर सिंह और अन्य बनाम भारत सरकार और राज्य की याचिका 3332, 2010 पर सुनवाई करते हुए कहा कि राज्य और सरकार याचिकाकर्ताओं के हितों को सुनिश्चित करें। धर्मवीर सिंह और अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट की ग्वालियर बेंच ने कहा कि जनता के हितों की रक्षा करना राज्य सरकारों का काम है। सरकारे इस मुद्दे पर कोई ध्यान नहीं दे रही जिसकी वजह से निवेशको का हित प्रभावी हो रहा है। 

हाईकोर्ट ने मध्य प्रदेश निष्पक्षो के हितों का संरक्षण अधिनियम 2000 सेक्शन 58B (5&5A) & 58C आफ आरबीआई एक्ट, 1934 और सेक्शन 4,5, और 6 ईनामी चिट और पैसे स्कीम धारा 1978 के तहत कंपनी के संचालकों के खिलाफ सेक्शन 3 (1 ) , 3 (2 ) 3 (4 ) और 6 के तहत करवाई की जाएँ। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि सरकार ऐसी कंपनियों पर कोई भी कार्रवाई नहीं कर रही है बल्कि प्रदेश और देश में मकड़े के जाल की तरह फैली इन बोगस और फ्राड कंपनियों की संरक्षक बनी हुई है। हाईकोर्ट ने इस प्रकरण की जांच के लिए सीबीआई जांच के आदेश दिए है। साथ ही राज्य सरकार को भी इस मामले में कठघरे में खडा करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ भी तीखी टिप्पणी की। 

भारत में चिटफंड कंपनियों की बयार दक्षिण से बही थी लेकिन उत्तर आते-आते ये लोगो की भावनाओं से खेलने वाली और उनके जीवन भर की कमाई को गायब करने वाली बन गई। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश दो ऐसे राज्य है जहाँ की जनसँख्या ऐसे कामों के लिए मुफीद मानी जाती रही है। शातिर दिमाग वालों ने ऐसे लोगों को अपनी स्कीमों में निशाने पर रखा जिनका समाज में वजूद नहीं के बराबर हो और वो अपनी आपबीती भी किसी को ना सुना पाए। 

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में मकड़ी के जाल की तरह फैले इन चिट फंड कंपनियों पर फिलहाल दोनों राज्यों की सरकारों का कोई ध्यान नहीं है। शिवराज के राज में बड़ा स्कैम्प हुआ, हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया| आज सीबीआई जाँच तक बात पहुंची लेकिन उत्तर प्रदेश में अभी भी बड़े से लेकर छोटे कई ऐसे धन्धेबाज़ है जो आम जनता का रोजाना थोड़ा-थोड़ा खून चूस रहे हैं पर सरकार इस पर कुछ नहीं कर रही। सवाल यह उठता है कि सरधा ग्रुप की तरह जब कोई बड़ी कंपनी लोगो का 'सहारा' बने जमापूंजी को बेसहारा कर देगी तब यहाँ की सरकारे जागेगी या आम जनता का हंगामा सरकारों की कुम्भकर्णी नींद को तोड़ने में सफल हो पायेगा। 


Report By - Shitanshu Pati Tripathi 

बीसीसीआई पर जिसका कब्ज़ा वही टीम बनेगी चैम्पियन, मयप्पन न होता अन्दर तो फिर चैम्पियन होती चेन्नई?

कोलकाता। IPL सीजन 6 खत्म हो गया है लेकिन आईपीएल की शुरुआत 2008 में एक व्यवसाई के दिमाग से निकली चमक दमक भरी दुनिया की ऐसी कल्पना थी, जिसे साकार भी वही व्यक्ति कर सकता था जिसके दिमाग की ये उपज थी। इस व्यक्ति का नाम था ललित मोदी जिसने क्रिकेट को ऐसा व्यवसाई रूप दे दिया जिसके पीछे आज दुनिया के वो सभी देश पागल है जो क्रिकेट खेलते है और वो भी जो क्रिकेट नहीं खेलते। 

आईपीएल कमिश्नर के तौर पर अपने सपने को 2008 में क्रिकेट के चकाचौंध मैदान पर उतारने वाले ललित मोदी ने क्रिकेट के 20 ट्वेंटी फार्मेट को वो चमकीली दुनिया बना दिया जिसने क्रिकेट में प्रतिस्पर्धा के साथ पैसा, ग्लैमर और परदे के पीछे सट्टेबाजी की दुनिया को ऐसे आबाद किया जैसे आईपीएल के भारत और विश्व के सभी क्रिकेट देखने वाले देशों की दुनिया ही यही हो। 

ललित मोदी की सोच के पीछे पैसा ही था लेकिन उन्होंने इस पैसे को और बड़ा बनाने के लिए ग्लैमर की दुनिया को भी इस दुनिया में शामिल कर लिया। बालीवुड और क्रिकेट का मेल हो जाए तो लोग अपने आप जुड़ जाते है और वैसे भी बालीवुड और क्रिकेट का साथ काफी पुराना रहा है। ललित मोदी ने भारत के विश्व प्रसिद्द खिलाड़ियों की बोली लगवाई और उन्हें फिल्मी दुनिया और भारत के कार्पोरेट घरानों के हाथों बिकवा दिया। 

देश विदेश के खिलाड़ी इस नीलामी में शामिल हुए| सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़ , रिकी पोंटिंग जैसे प्लेयर बिक कर खुश थे| उन्हें करोड़ों में खरीदा गया था, साथ ही करोड़ों का करार भी मिला। आईपीएल में एक बात सही थी जिन खिलाड़ियों को राष्ट्रीय और अपने प्रदेशों की टीम में खेलने का मौका नहीं मिला था, वो खिलाड़ी भी आईपीएल की बोली में लाखों में बिक गए। 

बहरहाल, कहते है जहाँ पैसा होता है वहा करप्शन, धोखा, धांधली ना हो, ये हो नहीं सकता। आईपीएल के साथ भी कुछ ऐसा ही था। ललित मोदी की इस चमकीली दुनिया को एक सीजन बाद ही ग्रहण लगना शुरू हो गया। खुद ललित मोदी भी अपनी कुर्सी बचाने के लिए संघर्ष करते रहे लेकिन पूंजीपतियों और क्रिकेट प्रशासकों के आगे हार गए| 2008-10 के बीच आईपीएल के कमिश्नर रहने वाले ललित कुमार मोदी के ऊपर करप्शन के ही चार्ज लगे, साथ ही उन्हें प्रसारण अधिकार बेचने और खिलाड़ियों की नीलामी में कमीशन का आरोप भी लगाया गया। 

आईपीएल में मोदी युग का अंत हो गया| 2010 में भारत और विश्व भर के खिलाड़ियों के लिए स्वर्णिम सौगात छोड़कर मोदी बेइज्जत होकर आईपीएल से बाहर कर दिए गए। आईपीएल पर कांग्रेस का वर्चस्व हो गया, आईपीएल कमिश्नर राजीव शुक्ल बनाये गए। आईपीएल होते रहे, करप्शन व फिक्सिंग की ख़बरें आती रही। ललित मोदी के जाने के बाद दो आईपीएल सीजन निकले, जिसमें क्रिकेट बोर्ड अध्यक्ष बोर्ड की टीम चेन्नई सुपर किंग्स ने लगातार चार सालों तक बेहतर प्रदर्शन करते हुए दो बार खिताब जीता और दो बार रनर अप रही। 

इन सबके बीच आईपीएल 6 में स्पॉट फिक्सिंग का भी भूत सामने आया, जिसने आईपीएल की पोल खोल कर रख दी| साथ ही उन पहलुओ पर भी ध्यान देने की ओर इशारा कर दिया जिस पर किसी का ध्यान नहीं था। वो था लगातार चेन्नई सुपर किंग्स का फाइनल खेलना और दो बार विजेता बन जाना। चेन्नई सुपर किंग्स बीसीसीआई अध्यक्ष नारायणस्वामी श्रीनिवासन की खुद की टीम है जिसके मालिक श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मयप्पन है। 

गुरुनाथ मयप्पन को आईपीएल के फाइनल मैच से पहले पुलिस ने सट्टेबाजों से सम्बन्ध रखने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। मयप्पन की गिरफ्तारी ने एक बात और साफ़ कर दी कि आईपीएल में सब कुछ ठीक नहीं है। गुरुनाथ की टीम चेन्नई सुपर किंग्स लगातार 2010 से फाइनल खेल रही थी जबकि उससे पहले चेन्नई की टीम ललित मोदी के जमाने में एक बार फाइनल में पहुंची और उसी ललित मोदी की टीम से मैच हार गई जिसने आईपीएल की संरचना की थी यानी कि आईपीएल के मैनेजमेंट पर जिसका राज उसी की टीम आईपीएल चैम्पियन। 

26 मई को कोलकाता के ऐतिहासिक ईडन गार्डन मैदान में चेन्नई एक बार फिर फाइनल में थी लेकिन उस टीम का मालिक पुलिस की गिरफ्त में आईपीएल देखने वाले दर्शकों की भावनाओं का हिसाब दे रहा था। मैच शुरू हुआ, मुम्बई इंडियन ने खेल शुरू किया| उससे पहले बीसीसीआई के अध्यक्ष अपना खेल शुरू कर चुके थे। बीसीसीआई अध्यक्ष श्रीनिवासन ने कहा कि मयप्पन चेन्नई सुपर किंग्स के मालिक नहीं है लेकिन उनके खेल को राजीव शुक्ला के एक मेल ने फेल कर दिया। भारी दबाव और सट्टेबाजी के जाल में फंसी चेन्नई सुपर किंग्स आईपीएल का फाइनल हार गई। 

श्रीनिवासन साहब की टीम और उनके दामाद का खेल दुनिया के सामने आ चुका था। चेन्नई की हार ने एक बात साबित कर दी कि उससे बेहतर टीम मुम्बई इंडियन ने अपने दम पर ट्राफी जीत ली, चेन्नई की पूर्व के आईपीएल में दर्ज की गई जीत सवालों के घेरे में है। यहाँ सवाल ये उठता है कि जिस आईपीएल टीम का मालिक खुद सट्टेबाजी के आरोप में पुलिस के सवालों के जवाब दे रहा है। क्या उसकी टीम ने 2010 के बाद हुए सभी आईपीएल मुकाबले अपने दम पर जीते? 2010-11 में चेन्नई ने जो आईपीएल का खिताब जीता, कहीं वो भी फिक्स तो नहीं था? चेन्नई चार बार फाइनल में पहुंची, कहीं वो भी फिक्स तो नहीं था? 

इन सब सवालों के बीच एक सवाल और खडा हुआ कि आईपीएल ख़त्म होने के बाद टीमों को उनके खेल के आधार पर फेयर प्ले ट्राफी दी जाती है। जब से आईपीएल शुरू हुआ सिर्फ 2012 को छोड़ दिया जाए तो फेयर प्ले की प्रतिष्ठित ट्राफी चेन्नई सुपर किंग्स को मिली यानी छह सीजन में पांच बार।अब सवाल ये है कि जिस टीम का मालिक खुद फेयर ना हो उस टीम को ये ट्राफी किसी करार के तहत तो नहीं मिली या बीसीसीआई के आका नारायणस्वामी श्रीनिवासन को खुश करने के लिए ये ट्राफी प्रदान की गई हो। भले ही उनका ही दामाद अपनी टीम के खिलाड़ियों पर सट्टा लगा रहा हो। 

बहरहाल, आईपीएल खत्म हो गया है और आईपीएल को नया चैम्पियन भी मिल गया है। सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविड़ जैसे प्लेयर अपनी इज्जत बचा के इस चकाचौंध भरी दुनिया को अलविदा कह चुके हैं लेकिन अभी भी दिल्ली, मुम्बई पुलिस के हाथ में कुछ ऐसे पत्ते है जिनकी फेंटाई चल रही है। देखने वाली बात यह होगी कि पुलिस की इस फेंटाई में से कौन-कौन सी बात खुलकर सामने आती है और किस-किस की कुर्सी ललित मोदी की तरह जाती है। 

वैसे ये आईपीएल की दुनिया है बड़ी मजेदार, इसका मज़ा सब लेना चाहते है लेकिन उस मज़ा के सज़ा का अंदाजा किसी को नहीं होता| वैसे इस समय जो मज़ा श्रीसंत, अजित चंदीला, अंकित चव्हाण, विन्दु और बीसीसीआई अध्यक्ष श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मयप्पन ले रहे है, वो उनका मन ही जानता है। पुलिस की पूछताछ, उनकी लहराती लाठियां, पुलिसिया भाषा उन्हें उन आईपीएल चीयर लीडर्स की याद जरुर दिलाती होंगी जो चौकों, छक्को और विकेट गिरने पर डांस करने लगती थी। 

Report By - Shitanshu Pati Tripathi

कुछ जश्न मना रहे थे,वो मर रहा था,

रायपुर। नक्सलियो ने 'सलवा जुडूम' के संस्थापक महेंद्र कर्मा को गोलियों से भूनने के बाद जमकर नाच गाना किया। नक्सली अपना आक्रोश व्यक्त करने के लिए महेंद्र कर्मा के मरने के बाद भी उन्हें बन्दूक की बटो से मार रहे थे, साथ ही मृत शरीर में लगातार गोलियां उतार रहे थे। 

महेंद्र कर्मा 'सलवा जुडूम' के माध्यम से छत्तीसगढ़ के आदवासी इलाकों में ग्रामीणों के बीच जनजागरण आभियान चला रहे थे। यही बात नक्सली संगठनो को नागवार गुजर रही थी| 2005 में जब महेंद्र कर्मा ने सलवा जुडूम की शुरुआत की तब किसी को ये खबर नहीं थी कि एक नेता और अगुवाकी सोच देश में मजबूती से अपनी जड़े जमा चुकी माओ समस्या के नेताओं को इतनी नागवार गुजरेगी कि वो उस नेता को ख़त्म करने के लिए हमला दर हमला करेंगे और अंत में उसे मारने के बाद जश्न भी मनायेंगे ।

दहशत का आलम ये था कि संगीनों के साए में रहने वाले बड़े बड़े नेता उन्ही संगीनों से डरे हुए थे। चारों तरफ सिर्फ गोलियां चल रही थी और देश प्रदेश की जनता की अगुवाई करने वाले नेता गाड़ियों में अपनी जान बचाने के लिए सीटों के नीचे छुपे हुए थे लेकिन 'बस्तर का शेर' कहे जाने वाले महेंद्र कर्मा ने अपना नाम लेने पर ना सिर्फ उन्हें ललकारा बल्कि खुद ही मोर्चा लेने की कोशिश करने लगे| महेंद्र कर्मा के सामने आते ही नक्सलियों ने न सिर्फ उन्हें गोलियों से छलनी कर दिया बल्कि नाच गाकर अपना महेंद्र कर्मा के प्रति मन में बैठा आक्रोश भी निकाल दिया। 

छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में बीते शनिवार की शाम हुए नक्सलियों के भीषण हमले में मारे गए महेंद्र कर्मा प्रदेश को नक्सल समस्या से मुक्त कराना चाहते थे। छत्तीसगढ़ के जनजातीय इलाकों में नक्सलियों का सामना करने के लिए 'सलवा जुडूम' की शुरुआत की गई। 'सलवा जुडूम' का अर्थ है ‘शांति मार्च’| छोटे स्तर से शुरु हुए आदिवासियों के इस मूवमेंट को बाद में छत्तीसगढ़ राज्य सरकार ने भी अपना समर्थन देना शुरु कर दिया। 'सलवा जुडूम' के कार्यकर्ताओं को नक्सलियों से सामना करने के लिए हथियार दिए गए। असल में 'सलवा जुडूम' की शुरुआत साल 2005 में छत्तीसगढ़ के बीजापुर इलाके से हुई। धीरे-धीरे बड़ी तादाद में आदिवासी इस मूवमेंट से जुड़ते गए। 

नक्सली हमले में मारे गए महेंद्र कर्मा छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी नेता थे। वो 2003 से 2008 तक छत्तीसगढ़ विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे। वर्ष 2005 में उन्होंने नक्सलवादियों से निपटने के लिए 'सलवा जुडूम' की स्थापना की। तब उनके इस कदम की मुख्यमंत्री रमन सिंह ने काफी सराहना की थी। सरकार ने 'सलवा जुडूम' को अपना समर्थन दिया था। 

महेंद्र कर्मा ने नक्सलियों के खिलाफ चलाए गए जनजागरण एवं 'सलवा जुडूम' अभियान में खुलकर हिस्सा लिया था। तभी से नक्सली उनके जान के दुश्मन बन गए थे। इससे पहले भी नक्सली तीन बार महेंद्र कर्मा पर हमला कर चुके हैं, जिसमें वह बाल-बाल बचे थे। महेंद्र कर्मा पर नक्सलियों ने यह चौथी बार हमला किया।

कर्मा को मारने से पहले उनकी अंतिम इच्छा पूछी नक्सलियों ने

बस्तर। महेंद्र कर्मा को बस्तर का शेर कहा जाता था, कर्मा की मौत भी शेर की तरह हुई, महेंद्र कर्मा को मारने से पहले नक्सलियों ने उनसे उनकी अंतिम इच्छा भी पूछी और उनकी इच्छा को पूरा किया उसके बाद उन्हें गोली मारी लेकिन बस्तर का वो शेर गोली लगने के बाद भी गिरा नहीं तब उसकी टांगो को तोड़ा गया उसके बाद उसे चाकुओ से गोदकर मार दिया गया। 

पहली नज़र में ये लाइने किसी फिल्म के स्क्रिप्ट का हिस्सा सरीखी लग रही है लेकिन ये सच है। महेंद्र कर्मा को मारने के लिए नक्सलियों ने एक पूरी पटकथा तैयार की थी। नक्सलियों ने महेंद्र कर्मा को घेरने के लिए पहले उनकी रेकी कि उसके बाद दरभा घाटी में कांग्रेस परिवर्तन यात्रा में उन्हें घेर लिया। 

महेंद्र कर्मा की शिनाख्त करने के बाद नक्सली उन्हें एक किनारे ले गए और उनका हाथ पीछे की तरफ बाँध दिया। नक्सली जिन्होंने परिवर्तन रैली पर हमला किया उनमे दस से बाढ़ की संख्या में हार्ड कोर्ड महिला नक्सली भी थी जो अलग अलग जगहों से इस आपरेशन को अंजाम देने के लिए बुलाई गई थी। उन महिला नक्सलियों ने ही कर्मा को अपने कब्जे में लिया और उन्हें मारने से पहले उनकी अंतिम पूछी। 

नक्सलियों ने पूछा कि वो नए कपडे पहनना पसंद करेंगे या खाना खाना इतना पूछते ही एक महिला नक्सली ने महेंद्र कर्मा को पीछे से गोली मार दी कर्मा गोली लगने के बाद भी गिरे नहीं तब अपने इंतकाम की आग ठंडी करने के लिए महिला नक्सलियों ने कर्मा का पैर लकड़ी से मार कर तोड़ दिया। कर्मा गिर पड़े तब महिला नक्सलियों ने उन्हें चाकुओ से करीब 78 बार गोदा इसी में महेंद्र कर्मा की मौत हो गई। 

महेंद्र कर्मा पर जो बीती उसका आँखों देखा हाल बताया दो आदवासियों ने जो सीआरपीएफ के कोबरा पोस्ट कमांडोज के पास आये थे। आदिवासियों ने आँखोदेखी हाल बताते हुए कहा नक्सलियों ने हैवानियत की साडी हदे पार कर दी थी। सलवा जुडूम अभियान का बदला नक्सलियों ने महेन्द्र कर्मा से ऐसे लिया जैसे उन्होंने किसी फिल्म की पटकथा को लिखा था।

सौरभ की पत्नी रजनी भगौड़ा

 जैसा कि आपको पता है दवा कारोबारी सौरभ जैन की पत्नी रजनी जैन को भी सीबीआई ने एनआरएचएम घोटाले के एक मामले में आरोपी बना रखा है उसे सीबीआई विशेष न्यायाधीश एस. लाल ने भगौड़ा घोषित कर दिया है। रजनी के खिलाफ 15 मई को कोर्ट ने गैर जमानती वारंट जारी किए थे। सीबीआई रजनी के खिलाफ आरोपपत्र भी दाखिल कर चुकी है। इस मामले की अगली सुनवाई 12 जून को होगी।

15 मई को सौरभ जैन ने सीबीआई कर्मी को दी गालियाँ कहा करा दूंगा ट्रांसफर

फिलहाल सौरभ उसकी पत्नी रजनी और भाई विवेक जैन पर क़ानूनी शिकंजा कस चुका है लेकिन इनकी अकड़ है की जाती ही नहीं| हाल ही में सौरभ ने एक सीबीआई कर्मी के साथ गाली गलौज की है| 

सीबीआई हेडकांस्टेबल वीर सिंह ने कोर्ट को बताया कि वो जब रजनी के विरुद्ध जमानती वारंट लेकर मुरादाबाद गया था उसे घर पर सौरभ जैन मिला| सौरभ ने रजनी के ना होने की बात कही और इसके बाद अपने वकील अरविंद मोहन को बुला लिया| उसके बाद सौरभ और अरविंद ने उसके साथ गाली गलौज की और कोर्ट के लिए भी अपशब्द प्रयोग किये| हेडकांस्टेबल ने कोर्ट को बताया कि सौरभ ने धमकी दी है कि कोर्ट के पीठासीन अधिकारी का तीन से चार हफ़्तों में ट्रांसफर करा देगा। 

वीर सिंह की शिकायत को न्यायमूर्ति ने गंभीरता से लेकर जहाँ सौरभ और उसके वकील को लताड़ा, वहीँ दूसरी ओर रजनी के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी कर दिया है। कोर्ट ने आदेश दिया कि 29 मई तक रजनी को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया जाए।

आपको बता दें रजनी के खिलाफ सीबीआई ने अप्रैल में चार्जशीट दाखिल की थी। चार्जशीट दाखिल होने के बाद से रजनी एक बार भी कोर्ट में तारीख पर नहीं पहुंची। 2 मई को कोर्ट ने रजनी के जमानती वारंट जारी किए थे। एनआरएचएम घोटाले में सौरभ उसकी पत्नी रजनी और भाई विवेक जैन आरोपी हैं। इनमें से विवेक जेल में है और सौरभ को जमानत मिल चुकी है। 

सौरभ के काले कारोबार में बराबर की हिस्सेदार है रजनी जैन 

सौरभ जैन की पत्नी रजनी की फर्म सिद्धि ट्रेडर्स, मुरादाबाद को यूपी स्माल स्केल इंडस्ट्रीज कारपोरेशन (यूपीएसआईसी) ने 14 सितंबर 2010 को ठेका दिया था। इस फर्म पर यूपीएसआईसी की इतनी ज्यादा मेहरबान थी कि इसे 13.69 करोड़ का ठेका देने के साथ ही तीन करोड़ रुपए एडवांस दे दिए गये। यह सारा पैसा फर्म के पास रखे सामानों के लिए बगैर किसी बैंक गारंटी लिए ही दे दिया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, यह सारा काम यूपीएसआईसी और परिवार कल्याण महानिदेशालय के बीच हुए करार में तय दाम से बहुत ज्यादा रेट पर किया गया।

यह भी जानकारी मिली है कि काम आधा-अधूरा हुआ लेकिन पैसा पूरा वसूल लिया गया। उदहारण के तौर पर उसे स्वास्थ्य उपकेन्द्रों पर 105 रुपए की दर से 20621 स्थानों पर वाल पेंटिंग करनी थी, लेकिन उसने केवल 10825 वाल पेंटिंग की और 200 रुपए की दर से पैसा लिया। यही नहीं उसकी फर्म को जिला अस्पतालों पर 804 स्थानों पर वाल पेंटिंग 700 रुपए की दर से करनी थी। उसने काम तो 450 स्थानों पर किया और 700 की जगह 1250 रुपए की दर से पैसा वसूला। इस फर्म ने होर्डिंग, वाल पेटिंग, बैनर, फ्लैक्स, ग्लोसाइन बोर्ड लगाने का सारा ठेका लिया पर किसी भी जिले में पूरा काम नहीं किया। आधा-अधूरा काम और दोगुना दाम वसूलने से 4.32 करोड़ रुपए ज्यादा खर्च कर दिए गये।

आपको बता दें की इतना तो कुछ भी नहीं था, सौरभ जैन की फर्म गुरु कृपा इंटरप्राइजेज का मूल काम रजिस्टर बनाना, स्टेशनरी की आपूर्ति और फर्नीचर की आपूर्ति थी। इसका वाणिज्य कर विभाग में वैट पंजीकरण इसी धंधे के रूप में है, लेकिन उसे 4.75 करोड़ का ठेका एमवीए सीरिंज, आईयूडी किट और सर्जिकल बाथरूम स्केल सप्लाई करने के लिए दे दिया गया। जैन की ही दूसरी फर्म कपिल मेडिकल एजेंसी को नसबंदी किट, आवोडोफर साल्यूशन, सर्जिकल ग्लब्स, हैण्ड वाश साल्यूशन, साल्ट टेस्टिंग किट, ग्लूटेटिहाइड साल्यूशन सप्लाई का ठेका दिया गया। यह सारा ठेका 5.93 करोड़ का था। यूपीएसआईसी ने बगैर किसी बैंक गारंटी के 4.42 करोड़ सौरभ जैन की फर्म को दे दिया गया|