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Friday, 31 May 2013

अखिलेश- शिवराज खामोश : यूपी, एमपी में कुकुरमुत्तो की तरह उग रही है चिटफंड कंपनिया

लखनऊ। 80 के दशक में देश के सभी चौराहों पर सपने बेचने की दुकाने खुली थी, बस इन दुकानों की शर्त इतनी थी कि इनके पास आपको अपनी गाढ़ी कमाई का कुछ हिस्सा थोडा-थोडा करके जमा करना होता था। इन सपने बेचने की दुकानों ने अपने व्यापार का धार ही लोगो की भावनाओं को बनाया था। कम पूंजी में बड़े सपने देखने की चाहत सभी हिन्दुस्तानियों में जन्मजात होती है। आत्मविश्वास से लबरेज इस देश की और यहाँ के नागरिकों की सबसे बड़ी विडम्बना ही यही होती है कि वह किसी के बहकावे में आकर अपना सब कुछ दाँव पर लगाने में भी पीछे नहीं रहते, जिसका परिणाम सामने आता है धोखे और उस फरेब के तौर पर जो ये कम्पनियां उन भोले-भाले लोगों को सपने के तौर पर दिखाकर करती हैं। 

रमेश चाय वाले का सपना है कि उसका बेटा पढ़-लिखकर डाक्टर या इंजीनियर बने जिसके लिए उसे अच्छी शिक्षा के साथ काफी पूंजी लगाने की भी आवश्यकता पड़ने वाली है। रमेश को कोई राय देता है कि फला चौराहे पर फला कंपनी एक रूपये के तीन या चार साल बाद चार रूपये वापस कर रही है। रमेश इस बात को सुनकर अपने जीवन भर की पूंजी को दाँव पर लगाकर अपने बेटे को बेहतर ज़िन्दगी देने का सपना देखने लगता है लेकिन रमेश को झटका उस समय लगता है जब कंपनी रमेश और उसके जैसे हज़ारों लोगो के सपने बेचकर उन्ही का पैसा लेकर फरार हो चुकी होती है। ये कहानी सिर्फ एक बानगी भर है| हमारे समाज में अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए अपना सबकुछ गंवाने वाले लाखो रमेश मिल जायेंगे, साथ ही उनके वो सपने भी उसी चाय की भट्टी में जलते मिल जायेंगे जिसमें पसीना बहाकर उन्होंने पाई-पाई जोड़कर उस कंपनी में इस उम्मीद में जमा किया कि यह पैसा बेटे की पढ़ाई और बुरे वक़्त में सहारा बनेगा। 

सहारा इंडिया, लालिमा फाइनेंस, कुबेर, जेवीजी, राप्ती, सोप्ती, अनिल, चंदू, गुडिया, हरियाली जैसे ऐसे कुछ नाम है जिन्होंने लोगो के शरीर से पैसे के रूप में उनका खून निकाला है। आज देश में गिनी-चुनी फाइनेंस कंपनिया बची हुई है| इन कंपनियों ने बड़ा बनने के लिए लाखों निवेशकों को इस बात के लिए तैयार किया कि वह उन पर विश्वास करें और उनके यहाँ उस विश्वास के साथ अपने जीवन की जमा पूंजी रख दे जो उन्होंने खाता खोलने के लिए कंपनी पर दिखाया था| लेकिन शायद उन लाखों निवेशकों को ये पता नहीं था कि वह अपने पैसे ऐसे लोगो के हाथ में दे रहे है जो कभी वापस नहीं आयेंगे। उनके पैसे को यही कम्पनियां अलग-अलग स्कीमों में लगाकर पैसे की तरह उन्हें भी जीवन भर घुमाती रहेंगी। 

देश इस समय सरधा चिटफंड घोटाले की आग में तप रहा है| इस चिटफंड घोटाले की आग देश के वित्तमंत्री पी चिदंबरम के घर तक उनकी पत्नी नलिनी चिदंबरम के जरिये पहुँच चुकी है| इस कंपनी ने सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही अपना कारोबार करते हुए करीब 20 हज़ार करोड़ के घोटाले को अंजाम दे दिया| इस घोटाले में सरधा ग्रुप ने उन सभी हथकंडो का इस्तेमाल किया जिसके जरिये आम आदमी के जेब का पैसा उनकी तिजोरियों में पहुंच सके|सरधा ग्रुप के चेयरमैन सुदीप्ता सेन ने जब इस स्कैम्प के बाबत अपना मुंह खोला तो कई सफेदपोशो के चेहरे भी इस स्कैम्प की रोशनी में सामने आ गए। बंगाल में लोगो का गुस्सा फूट पड़ा| लोगो को अपना मकान जमीन दिलाने का सपना दिखाने वाली सरधा ग्रुप ने डेली वेजेज पर हजारों निवेशको से करीब पांच सालों तक सौ दो सौ रूपये रोज़ाना के हिसाब से पैसे जमा करवाए| वो भी उस जमीन के नाम पर जो जमीन सिर्फ कंपनी की स्कीम्स में थी लेकिन हकीक़त में जमीन का कोई पता नहीं था। 

आज सरधा ग्रुप हजारों करोड़ का चूना लगाकर फरार हो चुकी है| उसका मालिक पुलिस की गिरफ्त में है और निवेशक पागल होकर अपने पैसे और उस जमीन को तलाश रहे है जो कहीं है ही नहीं। सरधा ग्रुप की तरह अभी भी देश के कई राज्यों में वैसी ही चिटफंड कंपनिया काम कर रही है जिन पर केंद्र क्या राज्य सरकारों की भी नज़र नहीं है। ताज़ा मामला सामने आया है मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर बेंच में जहाँ 2010 में दाखिल हुई एक पीआईएल ने मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में काम कर रही कंपनियों के बारे में तीखी टिप्पणी की है। 

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के ग्वालियर बेंच के जज न्यायाधीश एस के गंगेले और न्यायधीश ब्रिज किशोर दुबे की खंडपीठ ने याची धर्मवीर सिंह और अन्य बनाम भारत सरकार और राज्य की याचिका 3332, 2010 पर सुनवाई करते हुए कहा कि राज्य और सरकार याचिकाकर्ताओं के हितों को सुनिश्चित करें। धर्मवीर सिंह और अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट की ग्वालियर बेंच ने कहा कि जनता के हितों की रक्षा करना राज्य सरकारों का काम है। सरकारे इस मुद्दे पर कोई ध्यान नहीं दे रही जिसकी वजह से निवेशको का हित प्रभावी हो रहा है। 

हाईकोर्ट ने मध्य प्रदेश निष्पक्षो के हितों का संरक्षण अधिनियम 2000 सेक्शन 58B (5&5A) & 58C आफ आरबीआई एक्ट, 1934 और सेक्शन 4,5, और 6 ईनामी चिट और पैसे स्कीम धारा 1978 के तहत कंपनी के संचालकों के खिलाफ सेक्शन 3 (1 ) , 3 (2 ) 3 (4 ) और 6 के तहत करवाई की जाएँ। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि सरकार ऐसी कंपनियों पर कोई भी कार्रवाई नहीं कर रही है बल्कि प्रदेश और देश में मकड़े के जाल की तरह फैली इन बोगस और फ्राड कंपनियों की संरक्षक बनी हुई है। हाईकोर्ट ने इस प्रकरण की जांच के लिए सीबीआई जांच के आदेश दिए है। साथ ही राज्य सरकार को भी इस मामले में कठघरे में खडा करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ भी तीखी टिप्पणी की। 

भारत में चिटफंड कंपनियों की बयार दक्षिण से बही थी लेकिन उत्तर आते-आते ये लोगो की भावनाओं से खेलने वाली और उनके जीवन भर की कमाई को गायब करने वाली बन गई। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश दो ऐसे राज्य है जहाँ की जनसँख्या ऐसे कामों के लिए मुफीद मानी जाती रही है। शातिर दिमाग वालों ने ऐसे लोगों को अपनी स्कीमों में निशाने पर रखा जिनका समाज में वजूद नहीं के बराबर हो और वो अपनी आपबीती भी किसी को ना सुना पाए। 

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में मकड़ी के जाल की तरह फैले इन चिट फंड कंपनियों पर फिलहाल दोनों राज्यों की सरकारों का कोई ध्यान नहीं है। शिवराज के राज में बड़ा स्कैम्प हुआ, हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया| आज सीबीआई जाँच तक बात पहुंची लेकिन उत्तर प्रदेश में अभी भी बड़े से लेकर छोटे कई ऐसे धन्धेबाज़ है जो आम जनता का रोजाना थोड़ा-थोड़ा खून चूस रहे हैं पर सरकार इस पर कुछ नहीं कर रही। सवाल यह उठता है कि सरधा ग्रुप की तरह जब कोई बड़ी कंपनी लोगो का 'सहारा' बने जमापूंजी को बेसहारा कर देगी तब यहाँ की सरकारे जागेगी या आम जनता का हंगामा सरकारों की कुम्भकर्णी नींद को तोड़ने में सफल हो पायेगा। 


Report By - Shitanshu Pati Tripathi 

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