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Monday, 23 September 2013

महाभारत में शहीद होंगे बहुगुणा

उत्तराखंड में जून में आई आपदा ने इस पर्वतीय प्रदेश की सियासत को गर्म कर दिया था, आपदा इतनी भीषण थी की केंद्र सरकार और कांग्रेस नेतृत्व ने उत्तराखंड सरकार और वहां के मुख्यमंत्री को आपदा से निपटने के लिए पूरी छूट दे दी थी, पूरे देश ने इस आपदा से निपटने में वहां की सरकार का पूरा साथ दिया। लाखो लोग उत्तराखंड आपदा से प्रभावित हुये, चार धाम यात्रा भी पूरी तरह से रोक दी गई। उत्तराखंड में आई उस विनाशलीला में बाबा केदारनाथ का धाम और पूरी केदारघाटी तबाह हो गई। 

कांग्रेस नेतृत्व ने मुख्यमंत्री वजय बहुगुणा को आर्थिक, सैन्य बल और सिस्टम सपोर्ट देकर आपदा प्रभावित लोगो को राहत पहुंचाने के लिए हर सम्भव मदद की थी इस बीच विजय बहुगुणा की सुस्ती और उनके काम करने के तरीके को लेकर भी सवालिया निशान लगने शुरू हो गए। वही बहुगुणा सरकार में शामिल उन्ही के सहयोगी उनके लिए गड्ढा खोदने का काम करने लगे। आपदा के समय मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की निष्क्रियता को लेकर स्थानीय कांग्रेसियों ने कांग्रेस नेतृत्व और आलाकमान सोनिया गांधी के सामने उनकी बखिया उधेड़ कर रख दी। 

विजय बहुगुणा के विरोधियों का नेतृत्व खुद केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत ने किया वजह साफ़ थी जिस तरह विधानसभा चुनावों के बाद विजय बहुगुणा ने अपने ब्राह्मण होने का फायदा मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचने के लिए उठाया था वो हरीश रावत को नागवार गुजरा था, विधानसभा चुनावों के बाद अगर विजय बहुगुणा कांग्रेस आलाकमान से अपनी नजदीकियों का फायदा उठाकर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुये थे उसने अन्दर ही अन्दर हरीश रावत गुट को आंदोलित कर दिया था। 

हरीश रावत इस आपदा के बहाने विजय बहुगुणा से मुख्यमंत्री की कुर्सी छिनने की पूरी तैयारी कर चुके थे लेकिन सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने आपदा को प्राकृतिक आपदा मान कर उन्हें जीवनदान दे दिया था। विजय बहुगुणा भी अपनी कुर्सी बचाने के लिए आपदा के राहत कार्य के साथ साथ पार्ट के अन्दर उठ रहे विरोध के स्वर को थामने पर भी लगे थे, इसी बीच उन्ही के मंत्रिमंडल के हरक सिंह रावत ने उत्तराखंड की राजनीति को अस्थिर करने के लिए नई राजनीतिक चाल चली जिसमें उन्होंने कांग्रेसी विधायको का मन टटोलने के लिए अपने आवास पर एक डिनर पार्टी आयोजित की थी जिसमें ऐसी घटना घटी जिसने हरक सिंह रावत की मुख्यमंत्री की कुर्सी हलाने की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। 

हरक सिंह रावत की इस डिनर पार्टी के दौरान हुई फायरिंग में दो लोगो के जख्मी हो गए| कांग्रेस के खानपुर विधायक और वन विकास निगम के अध्यक्ष कुंवर प्रणव सिंह के चैंपियन पर गैरकानूनी फायरिग करने का आरोप हैं| कृषि मंत्री ने के यहाँ आयोजित इस भोज में प्रदेश के कई बड़े-बड़े मंत्री और विधायक शिरकत करनें पहुंचे थे। करीब 9 बजे खानपुर विधायक और वन विकास निगम के अध्यक्ष कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन भी समारोह में सम्मलित होनें पहुंचे प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक हरक सिंह रावत से मुलाकत करनें के बाद उन्होंने हवाई फायर किये| इसके बाद कुंवर सिंह चैंपियन नें डाइनिंग हॉल में जाकर भी हवाई फायरिंग का प्रदर्शन किया। इसी दौरान एक गोली छिटकर कांग्रेस नेता विवेकानंद खंडूरी के पाँव में जा लगी और दूसरी गोली हरिद्वार के नेता रवींद्र सैनी को लगी। 

हरक सिंह रावत की इस डिनर पार्टी में खुद मुख्यमंत्री भी शामिल होने वाले थे लेकन उसके पहले ही हुई इस फायरिंग ने बहुगुणा के कार्यक्रम को रद्द करा दिया साथ ही हरक सिंह की मुख्यमंत्री बनने के सपने को भी तोड़ दिया था। हरक सिंह रावत स पार्टी के बहाने अपनी ताकत दिखाना चाहते थे। दिल्ली दरबार से आ रही ख़बरों के मुताबिक लोकसभा चुनावों से पहले कांग्रेस नेतृत्व उतराखंड में परिवर्तन के संकेत दे चुका है, विजय बहुगुणा इस मुद्दे पर कुछ भी बोलने से कतरा रहे है वही उनके मंत्रिमंडल के सहयोगी और राजनीतिक विरोधी उनकी कुर्सी के पाये उखाड़ने पर लगे हुये है। 

विजय बहुगुणा के साथ ही कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्या से भी उनकी प्रदेश की अध्यक्षी वापस ली जा रह है कांग्रेस ने उनको हटाने के लिए एक व्यक्ति एक पद का फार्मूला दिया है। लोकसभा चुनाव से पहले उतराखंड में भारी बदलाव देखने को मिलेगा कुछ नेता जोड़तोड़ भी करते मिलेंगे तो कुछ के सपने उनके द्वारा किये जा रहे गलत कामों की वजह से टूटेंगे। कांग्रेस नेतृत्व किस पर भरोसा दिखाती है साथ ही किसका भाग्य बाकी नेताओं पर भर पड़ता है ये उतराखंड की राजनीति में मची उथल पुथल के शांत होने के बाद ही सामने आयेगा। लेकन ये तो तय है कि विजय बहुगुणा के सर से ताज उतरने वाला है।

विधायकों की गिरफ्तारी सपा-भाजपा की राजनीति तो नहीं

18 सितम्बर को उत्तर प्रदेश विधानसभा के विशेष सत्र के दौरान जहाँ मुजफ्फरनगर दंगा पूरी तरह से सदन के अन्दर छाया रहा, शुक्रवार को भाजपा विधायक सुरेश राणा की लखनऊ के गोमतीनगर इलाके से हुई गिरफ्तारी के बाद पूरी प्रदेश की सियासत गर्म हो गई, वहीँ समाजवादी पार्टी और भाजपा इस गिरफ्तारी को लेकर आमने सामने आ गए। विधानसभा सत्र के आखिरी दिन सदन के अन्दर दोनों दलों के विधायकों ने अपने कुर्ते की बांह चढ़ाकर संसदीय गरिमा को तार-तार किया तो सरकार ने सदन के अन्दर हुए अपमान का बदला ले लिया। 

सरकार ने मुजफ्फरनगर दंगो के आरोप में जारी किये गए वारंट के तामिल के लिए पुलिस अफसरों के चूले कसे तो अफसर भी विधानसभा सत्र के दौरान जिन आरोपी विधायकों को ढूंढ नहीं पा रहे थे वो उन्हें सड़क चलते मिल गए पुलिस ने भारतीय जनता पार्टी के विधायक सुरेश राणा को राजधानी लखनऊ से गिरफ्तार कर लिया और जज के सामने प्रस्तुत कर जेल भेजने की तैयारी कर ली उधर बाकी आरोपी विधायक राजधानी में सत्र समाप्त होते है सरकार और पुलिस की जानकारी में और उनकी आँखों के सामने अपने अपने विधानसभा क्षेत्रों में पहुँच गए।

सरकार और पुलिस का समन्वय यहाँ समझ नहीं आया जो मुजफ्फरनगर एक छोटी सी घटना के बाद दो सप्ताह तक साम्प्रदायिक दंगो की आग में झुलसता रहा। प्रदेश की अखिलेश सरकार भाजपा के विधायको हुकुम सिंह, संगीत सोम, भारतेंदु सिंह, सतीश राणा और बसपा विधायक नूर सलीम राणा को इस दंगे का जिम्मेदार मानकर मुकादमा दर्ज कराती रही| पुलिस इन्हें खोजने के लिए वारंट लेकर इधर उधर दौडती रही| वो सभी माननीय लगातार चार दिनों तक प्रदेश की राजधानी के अति महत्वपूर्ण और अति सुरक्षित इलाकों में घुमते रहे| तब पुलिस ने सपा सरकार के इशारे पर गिरफ्तार नहीं किया लेकिन जैसे ही वो अपने क्षेत्र जो इस समय प्रदेश का सांप्रदायिक दंगो को लेकर संवेदनशील हो चुका है वहां पहुंचे पुलिस ने उन्हें उनके घरो से गिरफ्तार कर लिया। 

सरकार और पुलिस का ये नाटक समझ से परे है जो विधायक राजधानी लखनऊ में आसानी से गिरफ्तार किये जा सकते थे उन्हें उनके ही प्रभाव वाले क्षेत्र में उनके समर्थको के सामने गिरफ्तार करने के पीछे सरकार की मंशा क्या है? ये राजनीति की थोड़ी समझ रखने वाला व्यक्ति समझ जाएगा। मुजफ्फरनगर दंगो के पीछे किसका हाथ है ये जांच के बाद पता चलेगा लें पूर्व में आ रही खबरों और प्रदेश सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री के तथाकथित फ़ोन करने की बात सामने आने के बाद इन दंगो की छुपी सच्चाई सामने आने लगी है। भाजपा विधायकों हुकुम सिंह, संगीत सोम और बसपा के नूर सलीम राणा की गिरफ्तारी कुछ और ही कहानी कह रही है। 

मुजफ्फरनगर में हुई इन गिरफ्तारियों के पीछे सपा-भाजपा की सोची समझी राजनीतिक चाल तो नहीं है? संगीत सोम ने अपनी गिरफ्तारी के समय कहा उनकी गिरफ्तारी पश्चिम उत्तर प्रदेश के प्रभारी मंत्री और कद्दावर सपा नेता आज़म खान के इशारे पर हुई है, संगीत सोम का ये बयान अपने में बहुत कुछ कह रहा है। वहीँ सरकार और पुलिस ने इन गिरफ्तारियों को मुजफ्फरनगर में करके एक बार फिर उन जख्मो को कुरेद दिया है जो अभी दंगो के बाद हरे है। विधायको को गिरफ्तार करवा कर प्रदेश की अखिलेश सरकार कौन सा सन्देश मुजफ्फरनगर वासियों को देना चाहती है इसे समझना अभी बाकी है। 

भाजपा विधायकों की गिरफ्तारी के समय उनके समर्थको के आक्रोश था और वहा हुई नारेबाजी के बाद एक बात साफ़ हो गई कि सरकार ने दंगो की आग को सेना और अर्धसैनिक बल लगाकर दबा भले दिया हो लेकिन अन्दर ही अंदर चिंगारी सुलग रही है। सरकार और भाजपा की मंशा साफ़ नहीं है इन गिरफ्तारियों को जो लखनऊ में हो जानी चाहिए थी उसे मुजफ्फरनगर में कर के सरकार ने दबी चिंगारी को हवा देने का ही काम किया वो इन दोनों पार्टियों की मिली जुली राजनीति की तरफ ही इशारा कर रही है। 

जांच एजेंसियों की जांच में कितनी सामने आयेगी ये तो रिपोर्ट आने के बाद ही तय होगा लेकिन पश्चिम उत्तर प्रदेश की राजनीति को इन दोनों दलों ने 27 अगस्त को ही तय कर दिया जो भविष्य में अपना रंग दिखाएगी साथ ही लोकसभा चुनाव के दौरान मतदाताओं के फर्क को भी तय कर देगी की दोनों वर्ग किस तरफ जायेंगे।

माफ़ी से पिघले मुख्यमंत्री अखिलेश

मुजफ्फरनगर दंगो से पहले देश की मीडिया में छाई रहने वाली और सुर्खियाँ बटोरने वाली भारतीय प्रशासनिक सेवा की अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल अब जल्द बहाल हो जायेंगी। मुख्यमंत्री सचिवालय से आ रही ख़बरों के मुताबिक, दुर्गा शक्ति नागपाल ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मुलाकात कर उनसे माफ़ी मांगी ली है। दुर्गा शक्ति नागपाल अपने निलंबन से पहले नोएडा में उपजिलाधिकारी सदर के पद पर तैनात थी। 

दुर्गा शक्ति नागपाल को 27 जुलाई को उत्तर प्रदेश सरकार ने एक निर्माणधीन धार्मिक स्थल की दीवार गिरवाने के आरोप में निलंबित कर दिया था। दुर्गा शक्ति पर साम्प्रदायिक तनाव फैलाने का भी आरोप था। दुर्गा शक्ति के निलंबन को लेकर ये भी ख़बरें आई कि खनन माफियाओं पर कार्रवाई को लेकर स्थानीय सपा नेताओं ने सरकार पर दबाव बनाया था। 

करीब एक महीने तक मीडिया की सुर्ख़ियों में रही दुर्गा शक्ति से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी नाराज थे, दुर्गा शक्ति को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया गया था जिसका जवाब उन्होंने सरकार को दे दिया था। दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन को लेकर अखिलेश यादव सरकार की काफी किरकिरी भी हुई थी। 

प्रदेश में ही नहीं पूरे देश में दुर्गा शक्ति के निलंबन को लेकर विरोध हुआ। अखिलेश सरकार पर उगलियां उठाई जा रहीं थी। आरोप ये लगा कि उन्होंने ग्रेटर नोएडा के कादलपुर गांव में बन रही एक मस्जिद के निर्माण को अवैध करार देकर उसकी दीवार को गिरा दिया। जिससे इलाके में धार्मिक सदभाव बिगड़ने का खतरा पैदा हो गया है।

दंगा हो रहा था मुख्यमंत्री सो रहे थे : जयराम रमेश

केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने दंगो पर सीधे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर हमला बोला है। शनिवार को लखनऊ आये जयराम रमेश ने कहा मुजफ्फरनगर दंगे पूरी तरह से सपा- भाजपा द्वारा प्रायोजित थे, दोनों पार्टियों की मिलीभगत से एक छोटी सी घटना ने साम्प्रदायिक दंगो का रूप ले लिया। जयराम रमेश ने साफ़ कहा कि प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को जिस तरह से अपने पद का इस्तेमाल करना चाहिए था उस समय वो मुख्यमंत्री आवास के अपने आलिशान शयनकक्ष में सो रहे थे। 

जयराम रमेश ने मुजफ्फरनगर दंगो पर बोलते हुये कहा कि ये दंगे भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी की मिलीभगत के नतीजे के तौर पर सामने आये। उन्होंने ये भी कहा कि जिस तरह से 27 अगस्त के बाद धीरे धीरे एक छोटी सी चिंगारी ने बड़ा रूप ले लिया हैं उसमे सरकार के अगुवा की निष्क्रियता साफ़ झलकती है, वही भाजपा आगामी लोकसभा चुनावों को लेकर ऐसे दंगो में अपने हाथ सेंक कर सियासी फायदा उठाना चाहती है। 

जयराम रमेश के प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर किये गए इस खुलेआम हमले ने प्रदेश सरकार की मुश्किल बढ़ा दी है। जयराम रमेश से पहले भी खुद प्रदेश के राज्यपाल बनवारी लाल जोशी ने भी अखिलेश सरकार पर तीखी टिप्पणी की थी, इस टिप्पणी में राज्यपाल ने केंद्र को भेजी अपनी रिपोर्ट में साफ़ लिखा था कि प्रदेश की अखिलेश सरकार ने समय रहते कार्रवाई नहीं की। 

जयराम रमेश की प्रदेश सरकार पर की गई इस तल्ख़ टिप्पणी का जवाब समाजवादी पार्टी किस रूप में देती है ये भविष्य में की जाने वाली राजनीति के बाद ही सामने आयेगा वैसे मुजफ्फरनगर दंगो को लेकर मोर्चा और रिपोर्ट सरकार को राज्यपाल बीएल जोशी ने भेजी थी, उसी रिपोर्ट को एक तरह से और तीखे अंदाज में जयराम रमेश ने आगे बढ़ा दिया है। 

इस बीच पुलिस ने मुजफ्फरनगर दंगो के लिए दोषी ठहराये जा रहे भाजपा के दो विधायकों सुरेश राणा और संगीत सिंह सोम को गिरफ्तार किया है| वहीं, बसपा के विधायक नूर सलीम को भी पुलिस ने गिरफ्त में लिया है। मुजफ्फरनगर दंगो के बाद कठघरे में खड़ी प्रदेश सरकार ने इन तीनो विधायकों की गिरफ्तारी कर अपने दामन पर लगे दागो को धोने की कोशिश की है। 

केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश ने मनरेगा घोटालों पर भी उत्तर प्रदेश की सपा सरकार की कार्यशैली पर सवालिया निशान खड़े किये है। रमेश ने साफ़ कहा कि मनरेगा घोटाले पर प्रदेश की अखिलेश सरकार गंभीर नहीं है, उन्होंने साफ़ कहा की इस घोटाले की जांच सीबीआई से कराये जाने की आवश्यकता है। 

मुजफ्फरनगर दंगे और मनरेगा के बहाने ही केंद्र की सत्ता की अगुवाई कर रही कांग्रेस प्रदेश सरकार पर निशाना साध कर अपने उस वोट बैंक को बचाने की कवायद में लग गई है जो प्रदेश में सियासत कर रही सभी पार्टियां कांग्रेस के पाले से खिसका रही है। कांग्रेस अपनी 2009 की स्थिति को बचाने में लगी हुई है, देखना है उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस फिलहाल इन दो मुद्दों को उठाकर अखिलेश सरकार और अन्य पार्टियों को कितना दबा सकती है।

सियासत और मोदी

भारतीय जनता पार्टी ने आगामी आम चुनावों को लेकर पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को घोषित कर कांग्रेस से मामले में बढ़त ले ली। नरेन्द्र मोदी की प्रधानमंत्री पद पर उम्मीदवारी घोषित होते ही ये तय हो गया कि भाजपा और सहयोगी पार्टियां आम चुनाव में बहुमत के लिए जरुरी 272 का जादुई आंकड़ा छूती है तो देश के अगले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही होंगे।

नरेन्द्र मोदी ने भी अपनी उम्मीदवारी की घोषणा के बाद भाजपा की केन्द्रीय चुनाव संचालन समिति के पद से इस्तीफा दे दिया। भाजपा की केन्द्रीय प्रचार टीम अब प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर नरेन्द्र मोदी के देश के अलग अलग हिस्सों में आयोजित होने वाली चुनावी जनसभाओ के कार्यक्रम को तैयार करने में जुट गई है। भाजपा ने नरेन्द्र मोदी के कार्यक्रम को तय करने में जातिगत वोट बैंक, लोकसभा सीटों के हिसाब से प्रदेशो में होने वाले जनसभाओ की संख्या भी तय करना शुरू कर दिया है। 

भाजपा 2014 आम चुनावों में 1996 को दोहराना चाहती है। वजह भी साफ़ है 1996 में राममंदिर आन्दोलन और तात्कालिक प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की असफल कांग्रेस सरकार के बाद पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में उतरी भाजपा ने 1991 से एक कदम आगे निकलते हुये 51 सीटों से एक सीट ज्यादा जीतकर 96 में प्रदेश में भाजपा का परचम 52 सीटों पर जीत दर्ज कर लहरा दिया था। यही वो साल था जब भाजपा ने पहली बार 13 दिन की सरकार बनाई और लोकसभा में बहुमत साबित न होने की वजह से अटल बिहारी वाजपेई की सरकार एक वोट से गिर गई थी।

जिस उत्तर प्रदेश ने भारतीय जनता पार्टी को केंद्र की सत्ता के करीब पहुंचाया आज वही उत्तर प्रदेश एक बार फिर भाजपा की प्रयोगशाला बनने जा रहा है, और इस प्रयोगशाला पर प्रयोग करने की कमान भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के कंधो पर डाली गई है भाजपा की केन्द्रीय चुनाव समिति ने नरेन्द्र मोदी के उत्तर प्रदेश की आम जनता को लुभाने के लिए उनके कार्यक्रमों की एक लम्बी लिस्ट तैयार की है जो 15 अक्टूबर से जनसभाओ में तब्दील होने लगेगी| देखने वाली बात ये होगी गुजरात के नरेन्द्र मोदी उत्तर प्रदेश की आम जनता की आँखों में कैसे कैसे लुभावने सपने डालते है। 

मोदी शब्दों के बाज़ीगर कहे जाते है उनकी भाषण शैली जहां पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई की याद दिलाती है वहीँ, वो भाजपा के जनप्रिय नेता अटल जी से एक कदम आगे आक्रामक शैली का भी प्रयोग करते है। नरेन्द्र मोदी को जमीनी राजनीति की हकीक़त पता है। जातियों में बनती उत्तर प्रदेश की राजनीति की नब्ज पकड़ना मोदी और भाजपा के लिए आसान नहीं है इस बात से वाकिफ भाजपा का थिंक टैंक और खुद मोदी भी इस प्रदेश की महत्वता समझते हुये फूंक फूंक कर कदम रख रहे है। 

नरेन्द्र मोदी की पहली जनसभा कानपुर में होने वाली है जहां से केन्द्रीय कोयला मंत्री और तीन बार से सांसद श्री प्रकाश जायसवाल संसंदीय क्षेत्र का नेतृत्व करते है| मोदी कांग्रेस पर पहली चोट कानपुर से ही करेंगे वही दूसरी जनसभा झाँसी में होगी जहां के सांसद आदित्य जैन है जो केंद्र सरकार में मंत्री है जबकि तीसरी जनसभा जनसंघ की प्रयोगशाला के तौर पर मशहूर बहराइच में होगी इस सीट से भी सोनिया गांधी के करीबी और राजीव गाँधी की सुरक्षा में तैनात रहे कमांडो कमल किशोर सांसद है। 

नरेंद्र मोदी और भाजपा उत्तर प्रदेश में अपनी पहली तीन जनसभाओ का एलान कर चुके है इसके अलावा भी मोदी की आगामी जनसभाओ का एलान जल्द होगा| मोदी और उनकी टीम उन सीटों को ही पहले निशाने पर ले चुकी है जहां से कांग्रेस ने 2009 के चुनावों में जीत हासिल की थी, मोदी और उनके सबसे करीबी अमित शाह की मंशा इन लोकसभा सीटो का चयन कर ये साफ़ कर चुकी है की मोदी की जनसभाओ में भीड़ जुटाकर केंद्र में बैठी यूपीए सरकार को ये सन्देश दे दिया जाये की कांग्रेस से जनता उब चुकी है। 

मोदी और भाजपा अच्छी तरह से जानते है अगर उत्तर प्रदेश जीत लिया तो केंद्र जीत लिया, इस बात को ध्यान में रखते हुए भाजपा की केन्द्रीय समिति ने अपनी कमर कस ली है। भाजपा नेतृत्व को अच्छी तरह पता है कि अगर भाजपा ने 1991, 1996 दोहरा दिया तो प्रदेश में भाजपा की स्वर्णिम उड़ान एक बार फिर शुरू हो जायेगी। जनसंघ की प्रयोगशाला के तौर पर जानी जाने वाली यूपी को लेकर भाजपा सतर्क हो गई है। भाजपा ने जातिगत आधार को भी ध्यान में रखकर नरेन्द्र मोदी के कार्यक्रम को तय किया है। नरेन्द्र मोदी खुद पिछड़ी जाति से आते है। 

80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में चुनावी घमासान की आहट सुनाई पड़ने लगी है। मुलायम सिंह यादव खुद अपने कार्यकर्ताओं से 60 सीटे जीतकर देने की मांग कर चुके है। वहीँ, कांग्रेस भी अपनी उन 21 सीटों को बचाने की जुगत में लगी हुई है जो उसने अप्रत्याशित रूप से 2009 में जीती थी। भाजपा भी 2014 के आम चुनावों में व्यक्तिवादी सोच से आगे निकलकर पार्टी के सन्देश और मोदी के व्यक्तित्व को प्रदेश की जनता तक पहुंचाने में लगी हुई है। 

भाजपा ने 2004 और 2009 के चुनाव में 10-10 सीट जीती थी, जो स्थानीय भाजपा नेताओं के खुद के प्रभाव वाली सीटे थी। मोदी इन्ही 10 सीटो से आगे बढ़कर लोकसभा चुनाव में 50 सीट को जीत में तब्दील करना चाहते है। भाजपा ने प्रदेश में मोदी के प्रथम आगमन की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। मोदी को भाजपा ने जून महीने में ही केन्द्रीय चुनाव संचालन समिति का अध्यक्ष मनोनित किया था, तभी से कयास लगाये जा रहे थे की मोदी उत्तर प्रदेश का रूख कब करते है, पार्टी के अंदरुनी सूत्रों की माने तो मोदी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित होने के बाद ही पार्टी चाहती थी कि मोदी उत्तर प्रदेश आये, अब भाजपा वही करने जा रही है। 

84 कोसी परिक्रमा, राममंदिर का राग और अब मुजफ्फरनगर दंगो ने प्रदेश की जनता में एक माहौल और डर पैदा करने का काम किया है। मुजफ्फरनगर दंगो के बाद प्रदेश की सियासत गर्म है प्रदेश सरकार और उनके कद्दावर मंत्री पर आलोचनाओं की झड़ी लग गई है। भाजपा, बसपा, कांग्रेस जैसी पार्टिया इन दंगो को भुनाने में लगी है वही समाजवादी पार्टी भी इन दंगो को कैश कराने के लिए तत्पर दिख रही है। मोदी मुजफ्फरनगर दंगो पर बोलेंगे कि नहीं ये 15 अक्तूबर को पता चलेगा लेकिन ये तय है की अब मोदी का कार्यक्रम आ जाने के बाद प्रदेश की राजनीति का पारा चढ़ने वाला है।

मुजफ्फरनगर दंगा रोकने के लिये "KSBL" योजना की मदद क्यों नहीं

1 अक्टूबर 2010 का दिन प्रदेश क्या देश की जनता नहीं भूल सकती जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अयोध्या में विवादित जमीन मामले और रामजन्म भूमि पर अपना फैसला दिया था। फैसला लखनऊ में आना था लेकिन इस फैसले को सुनने के लिए प्रदेश के साथ पूरा देश बेचैन था। वही प्रदेश की पुलिस इस बात को लेकर बेचैन थी कि फैसले के बाद जनता की प्रतिक्रिया क्या होगी। 

फैसले का समय करीब आ रहा था| फिल्ड में तैनात पुलिस हलचल में थी, सड़कों पर सन्नाटा फैला हुआ था, लेकिन दो ऐसे पुलिस अफसर भी थे जो डीजीपी आफिस में चाय की चुस्कियों के बीच उस फैसले का इंतज़ार कर रहे थे जिसने बीते 18 सालों से आम जनता को दो भागो में बांटा था और कई दंगो की वजह बन गया था। 

राजधानी लखनऊ के डीजीपी आफिस में मौजूद तात्कालिक डीजीपी कर्मवीर सिंह और उनके सहयोगी बृजलाल ने इस फैसले के बाद होने वाले तनाव से निपटने के लए तीन महीने पहले ही तैयारिया कर ली थी। पुलिस की तैनाती से ज्यादा आम जनता में इस बात का भरोसा पैदा करना इनका मकसद था की ये प्रदेश ये जमीन और समाज आपका है इसे आप खुद नुक्सान नहीं पहुंचा सकते। 

कर्मवीर सिंह और बृजलाल ने मिलकर एक योजना तैयार की थी| कर्मवीर सिंह बृजलाल योजना (KSBL) वैसे इस योजना को "कानून व्यवस्था जनसहयोग" नाम दिया गया, जिसमे आम जनता के सहयोग से संभावित टकराव को टालना मूल मंत्र था। योजना के तहत हर गाँव में पांच लोगो की समिति बनाना, ग्राम प्रधानो , ब्लाक प्रमुखों के मोबाइल नंबरो की डायरी बनाना, दंगा न करने और दंगा रोकने के लिए लोगो को सामूहिक रूप से पाबन्द किया गया। 

थानेदारो को आदेश था कि वो खुद ही लोगो का कुशलक्षेम जानेंगे, इस योजना में दंगा होने पर पूरे गाँव पर जुर्माना लगाने का प्रावधान किया गया, साथ ही पुलिस और थानेदारों के साथ एसपी को भी सख्त चेतावनी दी गई थी की क्षेत्र में दंगा हुआ तो उसके भुग्तभोगी वो खुद होंगे, साथ ही अफवाहों का खंडन वो खुद करेंगे। इस KSBL योजना को लागू कर बसपा सरकार और उसके अफसरों ने अयोध्या जैसे विवादित मुद्दे और फैसले के बाद होने वाले टकराव को टाल दिया था साथ ही आम जनता के मन में पुलिस और कानून का भय बैठकर उन्हें घरो में रहने पर मजबूर कर दिया।

आज प्रदेश के हालात बद से बद्दतर होते जा रहे है। प्रदेश में सपा सरकार के सत्ता में आते ही इस KSBL ढाँचे को तोड़ दिया गया। काबिल थानेदारो को हटा सपा नेताओं के पसंदीदा थानेदारो की तैनाती की गई। साथ ही बड़े अफसरों का सारोकार जनता से टूट गया वो अपनी कुर्सी बचाने में ही लगे रहे। जबकि कर्मवीर सिंह जैसे अफसर सीधे जनता का हाल पूछ लेते थे। KSBL योजना ने देहात क्षेत्रों में दोनों सम्प्रदायों में एक विश्वास पैदा कर दिया था|

आज इस KSBL योजना की फ़ाइल उन अफसरों के डीजीपी मुख्यालय से दूर होते ही आलमारी में कही धुल फांक रही है। जबकि इस योजना ने अक्टूबर 2010 में बारूद के ढेर पर बैठे इस प्रदेश को एक विश्वास दिया था की फैसला चाहे कुछ भी हो ये समाज हमारा है इसके फैसले हम करेंगे किसी बाहर वाले को दखल नहीं देने देंगे। 

आज मुजफ्फरनगर के जो हालात है वैसे हालात बसपा सरकार के दौरान कभी नहीं रहे| प्रदेश सरकार ने और पुलिस ने KSBL योजना पर संजीदगी से काम किया होता तो शायद पश्चिम उत्तर प्रदेश जहाँ दोनों सम्प्रदाय एक दूसरे के साथ रहकर सियासी ही नहीं ज़िन्दगी के हर मोर्चे पर लड़ते रहे है आपस में यूं लड़ने पर आमदा नहीं होते।

Monday, 9 September 2013

मुजफ्फरनगर दंगा : मुलायम ने संभाली कमान

मुजफ्फरनगर के जानसठ क्षेत्र के कवाल गाँव से उठी एक चिंगारी ने आज पूर्व प्रदेश को अपने आगोश में ले लिया है। प्रदेश के सभी जिलों में मुजफ्फरनगर में फैले सांप्रदायिक तनाव की चर्चा है वही ये भी चर्चा है कि प्रदेश सरकार ने समय से कार्रवाई न कर दंगाइयों को पूरी छूट दे दी। जिसकी वजह से कवाल काण्ड से उठी चिंगारी से आग में बदल गई पूरे जिले को दंगो की आग में झोंक दिया।

मुजफ्फरनगर में फैले सांप्रदायिक तनाव को लेकर सरकार और प्रशासनिक अमले में बैचैनी का माहौल है। उत्तर प्रदेश सरकार की निष्क्रियता का आलम ये था कि मुजफ्फरनगर में सम्प्रादयिक तनाव दिनों दिन बढ़ता जा रहा था और सरकार अधिकारियों के हाथ बांधे उन्हें पत्थर खाने पर मजबूर कर रही थी| वजह भी साफ़ थी एक सम्प्रदाय के मामा भांजे की ह्त्या के बाद भड़की सांप्रदायिक हिंसा ने ऐसा रूप लिया की मुजफ्फरनगर शहर से फैली आग गाँव-देहातों तक पहुँच गई। 

6 सितम्बर के महापंचायत के बाद हुई दोनों समुदायों की झडप ने शाम होते होते इतना विकराल रूप ले लिया की पूरे जिले में दोनों समुदाय के लोग आमने सामने आने लगे। 7 सितम्बर को इस साम्प्रदायिक हिंसा में दोनों तरफ से गोलियां चली और लाशे गिरी| इस हिंसा का शिकार मीडिया भी हुआ एक न्यूज़ चैनल और पुलिस द्वारा अनुबंधित एक फोटो पत्रकार की हत्या कर दी गई। 

मुजफ्फरनगर हिंसा प्रशासन और उत्तर प्रदेश सरकार के हाथ से निकल गई। पुलिस और प्रशासन के ऊपर भी हमले होने लगे| हालात बद से बदतर होते देख इस मामले में केंद्र ने दखल दिया| वहीँ, प्रदेश सरकार और प्रशासनिक अमले की कमान खुद सपा अध्यक्ष ने संभाल ली और मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव को तलब किया। सपा सरकार बनने के बाद ये पहला मौका था की मुलायम सिंह यादव ने सरकार और प्रशासनिक अमले के सबसे बड़े अधिकारी के साथ मुख्यमंत्री को भी काण्ड पर काबू करने के लिए चर्चा के लिए बुलाया । 

उधर केंद्र सरकार ने जिला प्रशासन और उत्तर प्रदेश सरकार के अनुरोध पर मुजफ्फरनगर में सेना उतार दी जिसने आते ही कमान संभाल ली वही जिलाधिकारी ने दंगाईयो को देखते ही गोली मारने के आदेश दे दिए थे, लेकिन इन उपायों के बाद भी दंगाई जगह जगह एक दूसरे पर हमले करते रहे। शहर से निकल कर हिंसा देहात के इलाकों में फ़ैल गई| इस बीच जिले से आ रही ख़बरों में 30 लोगो के मरने की पुष्टि हुई| वहीँ, सैकड़ो घायल हो गए जिसमें 40 गंभीर तौर पर घायल है। 

केंद्र सरकार ने मुजफ्फरनगर दंगो को लेकर सख्ती दिखाते हुए राज्यपाल बीएल जोशी को रिपोर्ट और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा निभाई गई भूमिका पर जवाब माँगा गया| राज्यपालों बीएल जोशी ने अपनी रिपोर्ट में साफ़ कहा प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार ने अपने सरकारी दायित्वों और कानून का ठीक से पालन नहीं किया| सरकार दंगो को सँभालने में बुरी तरह असफल रही। राज्यपाल की इस रिपोर्ट ने अखिलेश सरकार की निष्क्रियता की पोल खोल कर रख दी। 

वहीँ, बड़े पैमाने पर जान माल की हानि और सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के कड़े तेवर के बाद जागी सरकार ने मुजफ्फरनगर और मेरठ जोन के बड़े अधिकारियों पर अपनी खीज और गुस्से की गाज गिराते हुए उन्हें वहां से हटा दिया। सहारनपुर के कमिश्नर और मेरठ जोन के आईजी भावेश कुमार हटा दिए गए| वही हिंसा के मद्देनजर जिले में 30 पुलिस अधीक्षकों, 18 वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों, 23 पुलिस उपाधिक्षकों की तैनाती की गई है।

उन्होंने बताया कि इसके अलावा 119 निरीक्षकों एवं उपनिरीक्षकों तथा 300 पुलिसकर्मियों की तैनाती अलग-अलग जगहों पर की गई है। वहीँ रैपिड एक्शन फोर्स की आठ कंपनियां, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की 17, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस बल की चार कंपनियों को अलग-अलग जगाहों पर तैनात किया गया है। जिले के तीन थानाक्षेत्रों- सिविल लाइन, कोतवाली और नई मंडी में कर्फ्यू लगाया गया है।

इस बीच सरकार ने भाजपा को इस दंगे का दोषी ठहराते हुए महापंचायत बुलाने के लिए भाजपा नेता हुकुम देव नारायण सिंह पर मुकदमा कायम किया है| वहीँ, दंगे भड़काने के लिए भाजपा विधायक संगीत सोम, सुरेश रैना, भारतेंदु और कांग्रेस नेता हरिंदर मलिक के साथ भारतीय किसान यूनियन के नरेश टिकैत के साथ राकेश टिकैत को भी आरोपी बनाया गया है। 

प्रदेश सरकार और प्रशासनिक अमला अब इस आग को प्रदेश के अन्य जिलों में फैलने से रोकने की कवायद में लगा हुआ है। वही सरकार इस कोशिश में भी है की इस आग में घी का काम करने वालों से सख्ती से निपटा जाए जिसके लिए खुद मुलायम सिंह यादव ने कमान संभाली है और मुजफ्फरनगर के वरिष्ठ सपा नेताओं से स्थिति को सामान्य करने के लिए कहा है। मुलायम द्वारा कमान सँभालने के बाद अब देखना है कि ये आग कब तक ठंडी होती है।

मुजफ्फरनगर से उठी इस चिंगारी ने वैसे प्रदेश के उन जिलों में हलचल पैदा कर दी जो पूर्व में दंगाग्रस्त रहे है| साम्प्रदायिक आग ने मुजफ्फरनगर को ऐसे समय अपने आगोश में लिया है जब प्रदेश में लोकसभा चुनाव की हलचल धीरे धीरे सुनाई देने लगी है, कुछ राजनीतिक पार्टिया इस आग को ठंडा नहीं होने देना चाहती वही कुछ इस मौके की फिराक में है की आग भले दब जाए लेकिन अन्दर ही अन्दर सुलगती रहे ताकि आने वाले जाड़ो के बाद होने वाले आम चुनाव उनकी सियासी नैया पार लगा दें|