मुजफ्फरनगर के जानसठ क्षेत्र के कवाल गाँव से उठी एक चिंगारी ने आज पूर्व प्रदेश को अपने आगोश में ले लिया है। प्रदेश के सभी जिलों में मुजफ्फरनगर में फैले सांप्रदायिक तनाव की चर्चा है वही ये भी चर्चा है कि प्रदेश सरकार ने समय से कार्रवाई न कर दंगाइयों को पूरी छूट दे दी। जिसकी वजह से कवाल काण्ड से उठी चिंगारी से आग में बदल गई पूरे जिले को दंगो की आग में झोंक दिया।
मुजफ्फरनगर में फैले सांप्रदायिक तनाव को लेकर सरकार और प्रशासनिक अमले में बैचैनी का माहौल है। उत्तर प्रदेश सरकार की निष्क्रियता का आलम ये था कि मुजफ्फरनगर में सम्प्रादयिक तनाव दिनों दिन बढ़ता जा रहा था और सरकार अधिकारियों के हाथ बांधे उन्हें पत्थर खाने पर मजबूर कर रही थी| वजह भी साफ़ थी एक सम्प्रदाय के मामा भांजे की ह्त्या के बाद भड़की सांप्रदायिक हिंसा ने ऐसा रूप लिया की मुजफ्फरनगर शहर से फैली आग गाँव-देहातों तक पहुँच गई।
6 सितम्बर के महापंचायत के बाद हुई दोनों समुदायों की झडप ने शाम होते होते इतना विकराल रूप ले लिया की पूरे जिले में दोनों समुदाय के लोग आमने सामने आने लगे। 7 सितम्बर को इस साम्प्रदायिक हिंसा में दोनों तरफ से गोलियां चली और लाशे गिरी| इस हिंसा का शिकार मीडिया भी हुआ एक न्यूज़ चैनल और पुलिस द्वारा अनुबंधित एक फोटो पत्रकार की हत्या कर दी गई।
मुजफ्फरनगर हिंसा प्रशासन और उत्तर प्रदेश सरकार के हाथ से निकल गई। पुलिस और प्रशासन के ऊपर भी हमले होने लगे| हालात बद से बदतर होते देख इस मामले में केंद्र ने दखल दिया| वहीँ, प्रदेश सरकार और प्रशासनिक अमले की कमान खुद सपा अध्यक्ष ने संभाल ली और मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव को तलब किया। सपा सरकार बनने के बाद ये पहला मौका था की मुलायम सिंह यादव ने सरकार और प्रशासनिक अमले के सबसे बड़े अधिकारी के साथ मुख्यमंत्री को भी काण्ड पर काबू करने के लिए चर्चा के लिए बुलाया ।
उधर केंद्र सरकार ने जिला प्रशासन और उत्तर प्रदेश सरकार के अनुरोध पर मुजफ्फरनगर में सेना उतार दी जिसने आते ही कमान संभाल ली वही जिलाधिकारी ने दंगाईयो को देखते ही गोली मारने के आदेश दे दिए थे, लेकिन इन उपायों के बाद भी दंगाई जगह जगह एक दूसरे पर हमले करते रहे। शहर से निकल कर हिंसा देहात के इलाकों में फ़ैल गई| इस बीच जिले से आ रही ख़बरों में 30 लोगो के मरने की पुष्टि हुई| वहीँ, सैकड़ो घायल हो गए जिसमें 40 गंभीर तौर पर घायल है।
केंद्र सरकार ने मुजफ्फरनगर दंगो को लेकर सख्ती दिखाते हुए राज्यपाल बीएल जोशी को रिपोर्ट और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा निभाई गई भूमिका पर जवाब माँगा गया| राज्यपालों बीएल जोशी ने अपनी रिपोर्ट में साफ़ कहा प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार ने अपने सरकारी दायित्वों और कानून का ठीक से पालन नहीं किया| सरकार दंगो को सँभालने में बुरी तरह असफल रही। राज्यपाल की इस रिपोर्ट ने अखिलेश सरकार की निष्क्रियता की पोल खोल कर रख दी।
वहीँ, बड़े पैमाने पर जान माल की हानि और सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के कड़े तेवर के बाद जागी सरकार ने मुजफ्फरनगर और मेरठ जोन के बड़े अधिकारियों पर अपनी खीज और गुस्से की गाज गिराते हुए उन्हें वहां से हटा दिया। सहारनपुर के कमिश्नर और मेरठ जोन के आईजी भावेश कुमार हटा दिए गए| वही हिंसा के मद्देनजर जिले में 30 पुलिस अधीक्षकों, 18 वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों, 23 पुलिस उपाधिक्षकों की तैनाती की गई है।
उन्होंने बताया कि इसके अलावा 119 निरीक्षकों एवं उपनिरीक्षकों तथा 300 पुलिसकर्मियों की तैनाती अलग-अलग जगहों पर की गई है। वहीँ रैपिड एक्शन फोर्स की आठ कंपनियां, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की 17, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस बल की चार कंपनियों को अलग-अलग जगाहों पर तैनात किया गया है। जिले के तीन थानाक्षेत्रों- सिविल लाइन, कोतवाली और नई मंडी में कर्फ्यू लगाया गया है।
इस बीच सरकार ने भाजपा को इस दंगे का दोषी ठहराते हुए महापंचायत बुलाने के लिए भाजपा नेता हुकुम देव नारायण सिंह पर मुकदमा कायम किया है| वहीँ, दंगे भड़काने के लिए भाजपा विधायक संगीत सोम, सुरेश रैना, भारतेंदु और कांग्रेस नेता हरिंदर मलिक के साथ भारतीय किसान यूनियन के नरेश टिकैत के साथ राकेश टिकैत को भी आरोपी बनाया गया है।
प्रदेश सरकार और प्रशासनिक अमला अब इस आग को प्रदेश के अन्य जिलों में फैलने से रोकने की कवायद में लगा हुआ है। वही सरकार इस कोशिश में भी है की इस आग में घी का काम करने वालों से सख्ती से निपटा जाए जिसके लिए खुद मुलायम सिंह यादव ने कमान संभाली है और मुजफ्फरनगर के वरिष्ठ सपा नेताओं से स्थिति को सामान्य करने के लिए कहा है। मुलायम द्वारा कमान सँभालने के बाद अब देखना है कि ये आग कब तक ठंडी होती है।
मुजफ्फरनगर से उठी इस चिंगारी ने वैसे प्रदेश के उन जिलों में हलचल पैदा कर दी जो पूर्व में दंगाग्रस्त रहे है| साम्प्रदायिक आग ने मुजफ्फरनगर को ऐसे समय अपने आगोश में लिया है जब प्रदेश में लोकसभा चुनाव की हलचल धीरे धीरे सुनाई देने लगी है, कुछ राजनीतिक पार्टिया इस आग को ठंडा नहीं होने देना चाहती वही कुछ इस मौके की फिराक में है की आग भले दब जाए लेकिन अन्दर ही अन्दर सुलगती रहे ताकि आने वाले जाड़ो के बाद होने वाले आम चुनाव उनकी सियासी नैया पार लगा दें|
मुजफ्फरनगर में फैले सांप्रदायिक तनाव को लेकर सरकार और प्रशासनिक अमले में बैचैनी का माहौल है। उत्तर प्रदेश सरकार की निष्क्रियता का आलम ये था कि मुजफ्फरनगर में सम्प्रादयिक तनाव दिनों दिन बढ़ता जा रहा था और सरकार अधिकारियों के हाथ बांधे उन्हें पत्थर खाने पर मजबूर कर रही थी| वजह भी साफ़ थी एक सम्प्रदाय के मामा भांजे की ह्त्या के बाद भड़की सांप्रदायिक हिंसा ने ऐसा रूप लिया की मुजफ्फरनगर शहर से फैली आग गाँव-देहातों तक पहुँच गई।
6 सितम्बर के महापंचायत के बाद हुई दोनों समुदायों की झडप ने शाम होते होते इतना विकराल रूप ले लिया की पूरे जिले में दोनों समुदाय के लोग आमने सामने आने लगे। 7 सितम्बर को इस साम्प्रदायिक हिंसा में दोनों तरफ से गोलियां चली और लाशे गिरी| इस हिंसा का शिकार मीडिया भी हुआ एक न्यूज़ चैनल और पुलिस द्वारा अनुबंधित एक फोटो पत्रकार की हत्या कर दी गई।
मुजफ्फरनगर हिंसा प्रशासन और उत्तर प्रदेश सरकार के हाथ से निकल गई। पुलिस और प्रशासन के ऊपर भी हमले होने लगे| हालात बद से बदतर होते देख इस मामले में केंद्र ने दखल दिया| वहीँ, प्रदेश सरकार और प्रशासनिक अमले की कमान खुद सपा अध्यक्ष ने संभाल ली और मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव को तलब किया। सपा सरकार बनने के बाद ये पहला मौका था की मुलायम सिंह यादव ने सरकार और प्रशासनिक अमले के सबसे बड़े अधिकारी के साथ मुख्यमंत्री को भी काण्ड पर काबू करने के लिए चर्चा के लिए बुलाया ।
उधर केंद्र सरकार ने जिला प्रशासन और उत्तर प्रदेश सरकार के अनुरोध पर मुजफ्फरनगर में सेना उतार दी जिसने आते ही कमान संभाल ली वही जिलाधिकारी ने दंगाईयो को देखते ही गोली मारने के आदेश दे दिए थे, लेकिन इन उपायों के बाद भी दंगाई जगह जगह एक दूसरे पर हमले करते रहे। शहर से निकल कर हिंसा देहात के इलाकों में फ़ैल गई| इस बीच जिले से आ रही ख़बरों में 30 लोगो के मरने की पुष्टि हुई| वहीँ, सैकड़ो घायल हो गए जिसमें 40 गंभीर तौर पर घायल है।
केंद्र सरकार ने मुजफ्फरनगर दंगो को लेकर सख्ती दिखाते हुए राज्यपाल बीएल जोशी को रिपोर्ट और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा निभाई गई भूमिका पर जवाब माँगा गया| राज्यपालों बीएल जोशी ने अपनी रिपोर्ट में साफ़ कहा प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार ने अपने सरकारी दायित्वों और कानून का ठीक से पालन नहीं किया| सरकार दंगो को सँभालने में बुरी तरह असफल रही। राज्यपाल की इस रिपोर्ट ने अखिलेश सरकार की निष्क्रियता की पोल खोल कर रख दी।
वहीँ, बड़े पैमाने पर जान माल की हानि और सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के कड़े तेवर के बाद जागी सरकार ने मुजफ्फरनगर और मेरठ जोन के बड़े अधिकारियों पर अपनी खीज और गुस्से की गाज गिराते हुए उन्हें वहां से हटा दिया। सहारनपुर के कमिश्नर और मेरठ जोन के आईजी भावेश कुमार हटा दिए गए| वही हिंसा के मद्देनजर जिले में 30 पुलिस अधीक्षकों, 18 वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों, 23 पुलिस उपाधिक्षकों की तैनाती की गई है।
उन्होंने बताया कि इसके अलावा 119 निरीक्षकों एवं उपनिरीक्षकों तथा 300 पुलिसकर्मियों की तैनाती अलग-अलग जगहों पर की गई है। वहीँ रैपिड एक्शन फोर्स की आठ कंपनियां, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की 17, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस बल की चार कंपनियों को अलग-अलग जगाहों पर तैनात किया गया है। जिले के तीन थानाक्षेत्रों- सिविल लाइन, कोतवाली और नई मंडी में कर्फ्यू लगाया गया है।
इस बीच सरकार ने भाजपा को इस दंगे का दोषी ठहराते हुए महापंचायत बुलाने के लिए भाजपा नेता हुकुम देव नारायण सिंह पर मुकदमा कायम किया है| वहीँ, दंगे भड़काने के लिए भाजपा विधायक संगीत सोम, सुरेश रैना, भारतेंदु और कांग्रेस नेता हरिंदर मलिक के साथ भारतीय किसान यूनियन के नरेश टिकैत के साथ राकेश टिकैत को भी आरोपी बनाया गया है।
प्रदेश सरकार और प्रशासनिक अमला अब इस आग को प्रदेश के अन्य जिलों में फैलने से रोकने की कवायद में लगा हुआ है। वही सरकार इस कोशिश में भी है की इस आग में घी का काम करने वालों से सख्ती से निपटा जाए जिसके लिए खुद मुलायम सिंह यादव ने कमान संभाली है और मुजफ्फरनगर के वरिष्ठ सपा नेताओं से स्थिति को सामान्य करने के लिए कहा है। मुलायम द्वारा कमान सँभालने के बाद अब देखना है कि ये आग कब तक ठंडी होती है।
मुजफ्फरनगर से उठी इस चिंगारी ने वैसे प्रदेश के उन जिलों में हलचल पैदा कर दी जो पूर्व में दंगाग्रस्त रहे है| साम्प्रदायिक आग ने मुजफ्फरनगर को ऐसे समय अपने आगोश में लिया है जब प्रदेश में लोकसभा चुनाव की हलचल धीरे धीरे सुनाई देने लगी है, कुछ राजनीतिक पार्टिया इस आग को ठंडा नहीं होने देना चाहती वही कुछ इस मौके की फिराक में है की आग भले दब जाए लेकिन अन्दर ही अन्दर सुलगती रहे ताकि आने वाले जाड़ो के बाद होने वाले आम चुनाव उनकी सियासी नैया पार लगा दें|
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