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Monday, 23 September 2013

मुजफ्फरनगर दंगा रोकने के लिये "KSBL" योजना की मदद क्यों नहीं

1 अक्टूबर 2010 का दिन प्रदेश क्या देश की जनता नहीं भूल सकती जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अयोध्या में विवादित जमीन मामले और रामजन्म भूमि पर अपना फैसला दिया था। फैसला लखनऊ में आना था लेकिन इस फैसले को सुनने के लिए प्रदेश के साथ पूरा देश बेचैन था। वही प्रदेश की पुलिस इस बात को लेकर बेचैन थी कि फैसले के बाद जनता की प्रतिक्रिया क्या होगी। 

फैसले का समय करीब आ रहा था| फिल्ड में तैनात पुलिस हलचल में थी, सड़कों पर सन्नाटा फैला हुआ था, लेकिन दो ऐसे पुलिस अफसर भी थे जो डीजीपी आफिस में चाय की चुस्कियों के बीच उस फैसले का इंतज़ार कर रहे थे जिसने बीते 18 सालों से आम जनता को दो भागो में बांटा था और कई दंगो की वजह बन गया था। 

राजधानी लखनऊ के डीजीपी आफिस में मौजूद तात्कालिक डीजीपी कर्मवीर सिंह और उनके सहयोगी बृजलाल ने इस फैसले के बाद होने वाले तनाव से निपटने के लए तीन महीने पहले ही तैयारिया कर ली थी। पुलिस की तैनाती से ज्यादा आम जनता में इस बात का भरोसा पैदा करना इनका मकसद था की ये प्रदेश ये जमीन और समाज आपका है इसे आप खुद नुक्सान नहीं पहुंचा सकते। 

कर्मवीर सिंह और बृजलाल ने मिलकर एक योजना तैयार की थी| कर्मवीर सिंह बृजलाल योजना (KSBL) वैसे इस योजना को "कानून व्यवस्था जनसहयोग" नाम दिया गया, जिसमे आम जनता के सहयोग से संभावित टकराव को टालना मूल मंत्र था। योजना के तहत हर गाँव में पांच लोगो की समिति बनाना, ग्राम प्रधानो , ब्लाक प्रमुखों के मोबाइल नंबरो की डायरी बनाना, दंगा न करने और दंगा रोकने के लिए लोगो को सामूहिक रूप से पाबन्द किया गया। 

थानेदारो को आदेश था कि वो खुद ही लोगो का कुशलक्षेम जानेंगे, इस योजना में दंगा होने पर पूरे गाँव पर जुर्माना लगाने का प्रावधान किया गया, साथ ही पुलिस और थानेदारों के साथ एसपी को भी सख्त चेतावनी दी गई थी की क्षेत्र में दंगा हुआ तो उसके भुग्तभोगी वो खुद होंगे, साथ ही अफवाहों का खंडन वो खुद करेंगे। इस KSBL योजना को लागू कर बसपा सरकार और उसके अफसरों ने अयोध्या जैसे विवादित मुद्दे और फैसले के बाद होने वाले टकराव को टाल दिया था साथ ही आम जनता के मन में पुलिस और कानून का भय बैठकर उन्हें घरो में रहने पर मजबूर कर दिया।

आज प्रदेश के हालात बद से बद्दतर होते जा रहे है। प्रदेश में सपा सरकार के सत्ता में आते ही इस KSBL ढाँचे को तोड़ दिया गया। काबिल थानेदारो को हटा सपा नेताओं के पसंदीदा थानेदारो की तैनाती की गई। साथ ही बड़े अफसरों का सारोकार जनता से टूट गया वो अपनी कुर्सी बचाने में ही लगे रहे। जबकि कर्मवीर सिंह जैसे अफसर सीधे जनता का हाल पूछ लेते थे। KSBL योजना ने देहात क्षेत्रों में दोनों सम्प्रदायों में एक विश्वास पैदा कर दिया था|

आज इस KSBL योजना की फ़ाइल उन अफसरों के डीजीपी मुख्यालय से दूर होते ही आलमारी में कही धुल फांक रही है। जबकि इस योजना ने अक्टूबर 2010 में बारूद के ढेर पर बैठे इस प्रदेश को एक विश्वास दिया था की फैसला चाहे कुछ भी हो ये समाज हमारा है इसके फैसले हम करेंगे किसी बाहर वाले को दखल नहीं देने देंगे। 

आज मुजफ्फरनगर के जो हालात है वैसे हालात बसपा सरकार के दौरान कभी नहीं रहे| प्रदेश सरकार ने और पुलिस ने KSBL योजना पर संजीदगी से काम किया होता तो शायद पश्चिम उत्तर प्रदेश जहाँ दोनों सम्प्रदाय एक दूसरे के साथ रहकर सियासी ही नहीं ज़िन्दगी के हर मोर्चे पर लड़ते रहे है आपस में यूं लड़ने पर आमदा नहीं होते।

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