Translate

Sunday, 16 June 2013

धोखा की मिसाल बनी सपा विधायक

वो विधायक है तो क्या हुआ उनका भी दिल धड़कता है, वो सत्ताधारी पार्टी की विधायक है तो क्या हुआ उन्हें भी प्यार करने का अधिकार है। भले वो विधायक बनने से पहले किसी की पत्नी के तौर पर रही और उस व्यक्ति से दो बच्चो की माँ बनी तो क्या हुआ ये तो आजकल आम बात है। 

हमारे समाज और कानून ने भले ही लिव इन रिलेशन को मंजूरी ना दी हो लेकिन सत्ताधारी पार्टी की एक विधायिका के बयानों के मुताबिक, विधायिका को अपनी पत्नी बताने वाले शख्स के साथ पांच साल बिना शादी किये लिव इन रिलेशनशिप में रही। 

हम बात कर रहे है संभल जिले के चंदौसी से सपा विधायक लक्ष्मी गौतम की जिन्हें आजकल अपने तथाकथित पति का सामना करना मुश्किल हो रहा है। यह भी जानिए कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। दरअसल, पेशे से शिक्षक विधायिका के तथाकथित पति दिलीप वार्ष्णेय ने जब से विधायिका के आवास से उसके प्रेमी मुकुल अग्रवाल को भागते देखा है तब से वो पागलों की तरह इन्साफ पाने को इधर उधर भटक रहा है। 

मामला विधायिका के प्रेम प्रसंग और उसकी तथाकथित शादी से जुड़ा होने की वजह से उत्तर प्रदेश में चर्चा का विषय बना हुआ है जिसकी गूंज प्रदेश की राजधानी स्थित सत्ता के गलियारों से होती हुई प्रदेश सरकार के मुखिया अखिलेश यादव के कानो तक भी पहुँच गई है। 

सरकार विधायिका के कृत से हिली हुई है वही पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव भी विधायिका के प्रेम प्रसंग प्रकरण की वजह पार्टी की छवि को खराब होता देख रहे है तो विपक्षी खेमे में विधायिका के प्यार , सेक्स और धोखे की इस खबर को चटकारे ले ले कर बयान किया जा रहा है। 

विधायिका अपनी बात पार्टी नेतृत्व और सपा मुखिया के सामने रखने के लिए राजधानी लखनऊ रवाना हो चुकी है तो उसका तथाकथित पति अपनी पत्नी और दोनों बच्चियों से मिलने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और नेताओं के यहाँ गुहार लगा रहा है। 

विधायिका ने खुद को दिलीप वार्ष्णेय के साथ पांच सालों तक लिव इन रिलेशनशिप में रहने की बात कबूली है अगर ये बात सही है तो खुद विधायिका और सरकार के लिए मुश्किलें बढ़ने वाली है, वजह साफ़ है चुनाव लड़ते समय सपा प्रत्याशी के तौर पर लक्ष्मी गौतम ने जो हलफनामा दिया था उसमे उन्होंने खुद को शादीशुदा और दिलीप वार्ष्णेय को अपना पति बताया था जो पेशे से शिक्षक है। 

लक्ष्मी गौतम द्वारा दिया गया यही हलफनामा विपक्षियों के लिए हथियार बन गया है। मुख्य विपक्षी पार्टी बहुजन समाज पार्टी इस हलफनामे को झूठा मानकर विधायिका के खिलाफ कोर्ट जाने की तैयारी में है। वही विधायिका लक्ष्मी गौतम अपनी सफाई देने के लिए पार्टी के जिम्मेदार नेताओं और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिलने का प्रयास कर रही है। 

वहीं, खुद मुख्यमंत्री इस मामले को देखने की बात कह रहे है, पार्टी नेतृत्व भी इस आफत से निपटने की तैयारी में है। वैसे सपा सरकार बनने के बाद ये कोई पहला मामला नहीं है। पार्टी ने इस मामले की गंभीरता को देखते संभल के जिलाध्यक्ष से इस बाबत रिपोर्ट मांगी है, सपा जिलाध्यक्ष ने विधायिका के खिलाफ इस रिपोर्ट में बहुत कुछ लिखकर उन्हें कठघरे में खडा किया है। 

वैसे ये मामला लव सेक्स और धोखा का परफेक्ट मामला है लेकिन इस मामले में विधायिका के शामिल होने की वजह से ये हाईप्रोफाइल और सरकार को हिलाने वाला मामला हो गया है अब देखना है सपा मुखिया सरकार के मुखिया विधायिका की इस लिव इन रिलेशन शिप की बात पर कितना यकीन करते है।






Thursday, 6 June 2013

20 राज्यों के 213 जिलों में लाल सलाम का आतंक

दक्षिण के राज्य आंध्र प्रदेश में स्थित विश्व प्रसिद्द तिरुपति बालाजी का मंदिर देश दुनिया के भक्तों के के लिए आस्था का वो केंद्र है जिनकी झोलिया भगवान् विष्णु के अवतार तिरुपति के बाला जी हमेशा भरते रहते है। वैसे ही उत्तर में स्थित नेपाल देश में स्थित पशुपति नाथ का मंदिर भी देवों के देव कहे जाने वाले भोले शंकर का विश्व प्रसिद्द मंदिर है। इन दोनों मंदिरों से भक्तो की आस्था ऐसे जुडी है जैसे जीवन का सांस की डोर से। 

तिरुपति से पशुपति मंदिर तक जहा भक्तों की आस्था जुड़ी है वही एक बात और दोनों क्षेत्रो के मदिरों में समान है वो है इन दोनों मदिरो के बीच बीते पांच दशको से जड़ जमाता लाल गलियारा, या ये कहे लाल आतंक। लाल आतंक का आतंक इन दोनों विश्व प्रसिद्द मंदिरों के बीच इतना फ़ैल चुका है जहा नेपाल सरकार इस नक्सल आतंक के आगे हथियार डाल चुकी है वही भारत सरकार नक्सल समस्या से बुरी तरह जूझ रही है। 

नेपाल में माओवादियो ने अपनी सरकार भी बनाई माओ नेता पुष्प कमल दहल उर्फ़ प्रचंड के नेतृत्व में नेपाल की सत्ता पर एक बार लाल झंडा फहराया जा चुका है लेकिन अपनी नीतियों और गलत निर्णयों कि वजह से वहा जनाक्रोश भी फैला और विद्रोह भी हुआ प्रचंड को सत्ता छोड़नी पड़ी लेकिन लाल आतंक का अंत नहीं हुआ।

उत्तर में स्थित नेपाल से होता हुआ ये लाल आतंक आज दक्षिण के राज्य आन्ध्र प्रदेश तक पहुँच चुका है। इनके बीच आने वाले करीब नौ राज्य आज नक्सल समस्या से ग्रस्त है। उत्तर प्रदेश,बिहार , झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र इन सभी राज्यों के क्षेत्रों को मिला दिया जाए तो एक लाल गलियारा तैयार हो जाता है। 

इसी लाल गलियारे यानि रेड कारपेट इलाके को नक्सल क्षेत्र या देश में सबसे अशांत क्षेत्र कहा जा सकता है। नेपाल से शुरू हुए लाल आतंक ने आज दक्षिण के राज्य आंध्र प्रदेश को सबसे ज्यादा प्रभाव में ले रखा है। आन्ध्र सीमा से सटे महाराष्ट्र, और छत्तीसगढ़ में इस लाल आतंक का जोर इतना है की आज नक्सली जो चाहते है वो कर रहे है सरकार असह्याय बनी नेताओं, सुरक्षा कर्मियों, और पुलिस वालों को मरते देख रही है। 

पश्चिम बंगाल के नक्‍सलबाड़ी से 60 के दशक में शुरू हुआ नक्‍सल आंदोलन आज छत्तीसगढ़, मध्‍य प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश, झारखंड, महाराष्ट्र, ओडिशा समेत कुल नौ राज्‍यों में फैला हुआ है। लाल आतंक ने देश के 160 जिलों को अपनी चपेट ले लिया है। इन चार-पांच दशकों में नक्‍सलियों ने अपने नेटवर्क का खासा विस्‍तार कर लिया और इनके संबंध आईएसआई से होने के भी संदेह हैं। उन्‍हें चीन से भी मदद मिलने की बातें यदा कदा सामने आती रहती हैं। इन हालातों में यदि हम नक्‍सलियों को लेकर थोड़ी भी लापरवाही और बरते तो आंतरिक मोर्चे पर कई समस्‍याओं का सामना करना पड़ेगा। बीते कुछ सालों में प. बंगाल, आंध्र प्रदेश व ओड़िसा में तो नक्सली हमलों पर कुछ काबू पाया जा सका है, लेकिन छत्तीसगढ़ में यह अभी भी गंभीर चुनौती बना हुआ है। 

देश के 160 जिलों में चलाये जा रहे नक्सल आन्दोलन में नक्सलियों ने भोले भाले आदिवासियों को अपनी ढाल बना कर सरकार के सामने लगातार चुनौती पेश कर रहे है। अपनी बेजा मांगो को सामने रखकर उन्होंने सरकार को झुकाने की लगातार कोशिश कि है। केंद्र सरकार ने इस लाल आतंक को थामने के लिए 'आपरेशन ग्रीन हंट' शुरू किया इसी बात पर चिढ़े नक्सलियों ने महाराष्ट्र के गढ़चिरौली, छत्तीसगढ़ के बस्तर , सुकमा, और आन्ध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम जैसे जिलों में हमले तेज़ कर दिए। 

हाल में ही देश का सबसे बड़ा नक्सली हमला हुआ जिसमें नक्सलियों ने पहली बार किसी राष्ट्रीय पार्टी के नेताओ को अपना निशाना बनाया। इस हमले में कांग्रेस के राज्य अध्यक्ष नन्द कुमार पटेल , विधायक उदय मुदलियार, और सलवा जुडूम के जनक और कांग्रेस सरकार में पूर्व मंत्री महेंद्र कर्मा समेत 30 लोगो का नरसंहार कर दिया। राज्य सरकार हिली, केंद्र सरकार के माथे पर चिंता की लकीरे आई प्रधानमंत्री ने खुद दौरा किया जो इस भयावह स्थिति कि कहानी खुद बयान करता है| 

राजनेताओं पर नक्सलियों के सबसे बड़े इस हमले में कई नेताओं को मौत कि नींद सुला गया, इस हमले ने जहा देश को झकझोर दिया वही देश और राज्यों की सरकारों को सोचने पर भी मजबूर कर दिया कि अब वक्त आ गया है इस समस्या को जड़ से ख़त्म करने का। वैसे सरकार ने इस हमले से पहले केन्द्रीय सुरक्षा बलों के हाथ बाँध रखे थे केन्द्रीय और पुलिस बलों की कार्रवाई पर नेता, सरकार , और मानवाधिकार संगठन उनकी कार्रवाई और उस कार्रवाई में मारे जाने वाले नक्सलियों के मानवाधिकार की बात उठा केन्द्रीय सुरक्षा बलों के हाथ बाँध दिया करते थे। 

बीते तीन सालों में अलग अलग प्रदेशों के 26 जिलों में वह की जनता और सुरक्षा बलों ने इस लाल आतंक को करीब से देखा था। सरकार ने बीते तीन सालों में देश के इन 26 जिलों में हुए बड़े हमलों कि वजह से इन्हें सबसे ज्यादा प्रभावित जिले माना। इन्ही जिलो में करीब 80% हमले हुए। आंकड़ो पर नज़र डाले तो छत्तीसगढ़ में बस्तर, बीजापुर, दंतेवाड़ा कांकेर कान्डोगाँव, नारायणपुर, राजनंदगाँव और सुकमा वो जिले जो इन नक्सली हमलों में सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। वही इस रेड कारीडोर में आने वाले सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य झारखण्ड भी है जहाँ गडवा, गिरिडीह, गुमला,खूंटी, लातेहार, पलामू, सिमडेगा, और पश्चिम सिंहभूम जिले थे जहा इस लाल आतंक ने सबसे ज्यादा आतंक फैलाया। 

इसी प्रकार बिहार में भी लाल आतंक यदा कदा दस्तक देता रहा है यहाँ पर भी औरंगाबाद, गया और जमुई वो जिले है जो झारखण्ड सीमा के पास है और रेड कारीडोर का हिस्सा है। ओडिशा में तीन जिलों को सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित जिलों कि श्रेणी में रखा जा सकता है। ओडिशा से वैसे कभी कभार ही नक्सल हमले की सूचना आती रही है लेकिन कोरापुट मल्कानगिरी और बोलानगिर जी जो आन्ध्र सीमा के करीब है यहाँ नक्सल समस्या सबसे ज्यादा देखी गई। महाराष्ट्र में गढ़चिरौली एक ऐसा स्थान है जहा पर नक्सलियों ने सबसे बड़े हमले को अंजाम दिया था इस हमले में 16 पुलिस वालों की काम्बिंग के दौरान मौत हो गई थी। 

लाल आतंक का झंडा इन दिनों जिन कामरेड्स के हाथ में है उनमे से ज्यादातर आंध्र प्रदेश से आते है। कभी आन्ध्र के आधा दर्जन जिलों में नक्सली अपनी सामानांतर सरकार चलाते थे लेकिन आज ये खम्मम और विशाखापट्टनम में ही सिमट गया है, नक्सल समस्या पर नज़र रखने वालो का मानना है आन्ध्र के बड़े नक्सली नेता छत्तीसगढ़ और ओडिशा चले गए है। आन्ध्र के नक्सली नेता अपनी सटीक योजना और अचूक वार के लिए साथ ही हमले की रणनीति बनाने में माहिर माने जाते है। 


Shitanshu Pati Tripathi

5.60 करोड़ जीतिये सिर्फ एक सवाल का जवाब दीजिये

भारत जैसे गरीब देश में करोडपति बनने का सपना हर कोई देखता है उनके सपने को हकीक़त में बदलने के लिए सभी मनोरंजक टीवी चैनल सीजन दर सीजन अपने प्रसिद्द क्वीज कार्यक्रमों को लेकर आते है। टीवी पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों में कोई 15 सवालों के सही जवाब देने पर करोडपति बना देता है तो कोई चैंनल एंकर के सवालों के जवाब सही देने पर 'छप्पर फाड़ के पैसा' देता है। सोनी टीवी पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम जिसमें जाने की चाहत करीब हर भारतीय को होती है, कार्यक्रम भारत में काफी प्रसिद्द है इस कार्यक्रम ने भारत में कईयों को करोडपति तो कईयो को लखपति बना के उनके सपने पुरे किये है तो कुछ व्यक्ति सालों से करोडपति कि 'हाट सीट' तक पहुँचने के लिए प्रयासरत है। 

'कौन बनेगा करोडपति' कार्यक्रम में आवाज के जादूगर महानायक अमिताभ बच्चन द्वारा पूछे गए 15 सवालों के जवाब देने होते है, इन सवालों के जवाब देंते समय कई पडाव भी आते है, तो कुछ सवालों पर उलझ जाने के बाद लाइफ लाइन का सहारा भी दिया जाता है। प्रतिभागी लाइफलाइन का इस्तेमाल कर आगे तो बढ़ जाता है लेकिन उसके करोडपति बनने के सपनो पर यही ग्रहण लगना शुरू हो जाता है। केबीसी के फार्मेट के हिसाब से हर विषय, सामान्य ज्ञान, सम सामायिक, राजनीति, विज्ञान , सभी क्षेत्रों के सवाल पूछे जाते है। प्रतिभागी का दिमाग और मेमोरी अगर उसके साथ है तो वो करोडपति के एंकर द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब बता कर आगे बढ़ जाता है, और सवाल के जवाब नहीं पता हो तो उसकी केबीसी की यात्रा जल्द ख़त्म हो जाती है। 

इन सब झंझटों से मुक्त होना है और हर क्षेत्र के सवालों के जवाब देने से बचना हो तो अमेरिका के डलास शहर के अरबपति बैंकर डी एंड्रू 'एंडी' बील के एक गणित के सवाल का जवाब दीजिये और 5 करोड़ 60 लाख रुपये जीत जाइये। एंडी इस गणितीय थ्योरी को हल करने के लिए 1997 से एक क्वीज प्रोग्राम चला रहे है। लेकिन एंडी के इस एक सवाल का जवाब बीते पंद्रह सालों में कोई नहीं दे पाया। एंडी ने इस सवाल और खुद के द्वारा दी जाने वाली धनराशि कि विश्वसनीयता बनाये रखने के लिए 'अमेरिकन मैथमेटिकल सोसाईटी' की देखरेख में के इस सवाल को हल करने की बात करते है। एंडी ने इस सवाल को हल करने के लिए सीधी थ्योरी के साथ खुद की थ्योरी लगाकर प्रूव करने की छुट दे रखी है। 

1997 से चल रहे इस क्वीज कार्यक्रम में अब तक सैकड़ो गणित के जानकारों ने एंडी के सवाल को हल करने कि कोशिश की लेकिन सवाल हल ना हो सका। एंडी के सवाल का जवाब तो नह्जी मिल सका, साल बढ़ते गए एंडी की बेचैनी भी पर एंडी ने इस सवाल के जवाब में दी जाने वाली धनराशि को भी $1,00,000 से बढ़ा कर $10 ,00,000 कर दिया है। 

Report By - Shitanshu Pati Tripathi

Tuesday, 4 June 2013

वियाग्रा अब 85 पैसे में खाइये

वियाग्रा जिसने पूरी दुनिया के मर्दों को अपना दिवाना बना दिया लेकिन वो सिर्फ पैसे वालों के ही हाथ तक पहुंचती थी अब वो दवा पूरी दुनिया के आम से लेकर ख़ास लोगो के इस्तेमाल में आ सकती है| मर्दों के बीच मशहूर यौन स्फूर्ति बढाने वाली विश्वविख्यात जेनेरिक दवा वियाग्रा अब 800 रुपये की बजाय मात्र 85 पैसे में मिल सकती है। इस खबर से वो आम मर्द खुश हो सकते है जो इस दवा का नाम तो जानते थे लेकिन मंहगी होने कि वजह से खरीद नहीं सकते थे अब ये उनकी जेब कि पहुँच में आ गई है| 

पूरी दुमिया के मर्दों के बीच चर्चा में रही विश्वविख्यात वियाग्रा दवा का फाइजर कंपनी ने ब्रिटेन में पेटेंट करा रखा था, कुछ ही समय में वो पेटेंट ख़त्म होने जा रहा है। पेटेंट ख़त्म होने के बाद कोई भी दवा बनाने वाली कंपनी इस दवा में इस्तेमाल किये जाने वाले केमिकल साल्ट का इस्तेमाल कर ये दवा बना सकती है। भारत में दवा बनाने वाली कंपनिया वैसे भी सस्ती दवा बनाने के लिए विश्व में प्रसिद्द है। वियाग्रा का पेटेंट ख़त्म होने से विश्व की नामी गिरामी और छोटी दवा कंपनिया भी वियाग्रा जैसी दवा मार्केट में 'शौकिनो' के लिए उतारने के लिए स्वतंत्र हो जाएँगी। 

वियाग्रा बनाने वाली कंपनी फाइजर ने 1999 में ब्रिटेन में इस यौन स्फूर्ति को बढाने वाली दवा को लोगो के इस्तेमाल के लिए बाज़ार में उतारा था लेकिन मंहगी होने की वजह से ये दवा आम लोगो कि पहुँच से बाहर थी वजह साफ़ थी इस दवा का पेटेंट फाइजर कंपनी के पास था, इसलिए विश्व की कोई भी कंपनी इसके रासयनिक नाम का इस्तेमाल कर यह दवा नहीं बना सकती थी।

ज़िन्दगी को अलविदा कहने की उम्र नहीं थी

सुबह आँख खुली तो एक खबर ने चौका दिया या यूँ कहिये कि 1993 की उस सुबह की याद दिला दी जब उस समय की जवां दिलों की धड़कन हिरोईन दिव्या भारती की मौत का मंजर याद आया, ये खबर थी जिया खान के खुदकुशी की खबर, जिया जिसने अपने फ़िल्मी जीवन की शुरुवात सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की हिरोईन बनकर की थी। 

निशब्द फिल्म से पहले जिया खान ने बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट 1998 में आई शाहरुख खान, मनीषा कोइराला स्टारर 'दिल से' फिल्म से की थी। दिल से में जिया खान ने मनीषा कोइराला के बचपन का किरदार निभाया था। 

जिया खान ने 19 साल कि उम्र में करीब साठ साल के अमिताभ बच्चन कि हिरोइन बनकर फ़िल्मी दुनिया को चौंका दिया। जिया खान जिंदादिल और ज़िन्दगी जीने वाली लड़की थी भले ही जिया उर्फ़ नफीसा खान की पैदाइश अमेरिका के न्यूयार्क और परवरिश ब्रिटेन में हुई हो लेकिन जिया ज़िन्दगी हिन्दुस्तान में ही जीना चाहती थी। 

जिया खान ने अपनी फ़िल्मी कैरियर में कुल चार फिल्मों में काम किया जिनमे तीन फ़िल्में उन सुपर स्टार्स के साथ थी जिन्हें देखने सुनने दर्शक पिक्चर हाल में जाते है। जिया ने अमिताभ के साथ 'निशब्द', आमिर खान के साथ 'गज़नी' और अक्षय कुमार के साथ 'हाउसफुल'। 

हाउसफुल पिक्चर में एक गाना काफी हिट हुआ जिसे जिया खान और अक्षय कुमार के ऊपर फिल्माया गया था। इस गाने के बोल में एक लाईन थी 'आजा तुझे हेवेन दिखाउंगी;' जिया खान ने अपने फ़िल्मी किरदारों और खुद के काम से दर्शको को हेवेन तो दिखाया ही पर खुद हेवेन देखने कि इतनी जल्दी में थी की उन्होंने खुद को ही मार लिया। 

जिया खान एक ज़िंदादिल लड़की का नाम था जिसे जिंदगी ज़ीने में मज़ा आता था, ये बात हम ऐसे ही नहीं कह रहे बल्कि उन तीन फिल्मो में निभाये गए उनके किरदारों को देखकर कह रहे है जिनको जिया जैसी जिंदादिल लड़की और हिरोईन निभा सकती थी। 

लोग कह रहे है जिया अवसाद की शिकार थी, अवसाद यानि डीप्रेशन हमारा सवाल है जिया खान के इस अवसाद के पीछे वजह क्या थी। जिया खान के बॉयफ्रेंड सूरज पंचोली से भी पुलिस ने जिया के अवसाद में जाने कि वजह पूछी लेकिन वो भी कुछ नहीं बता पाया। 

दिव्या भारती और जिया खान की मौत की वजह में कुछ समानताये थी, दिव्या भी काफी कम उम्र में मरी जिया भी, दिव्या भारती ने भी ख़ुदकुशी कि जिया ने भी, दिव्या भी डीप्रेशन में थी जिया की भी मौत कि वजह डीप्रेशन बताई जा रही है। 

हमारा ये कहना है कि आखिरे ये 'डीप्रेशन' चीज क्या है, जिसने जिया और दिव्या जैसी प्रतिभाशाली हीरोईनो को हमसे छीन लिया। अवसाद में अगर ऐसे लोग मौत को गले लगाने लगे जो अपने जीवन में शुरुआती सफलता पाने के बाद भी अवसाद में चले जा रहे है और मौत को गले लगा लेते है तो ये उन युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत भी बन जायेंगे जो जीवन में क्षणिक असफलता हाथ लगते ही मौत को गले लगाने चल देंगे। 

जिया खान की ख़ुदकुशी ने देश को भी निशब्द कर दिया लेकिन अरसद वारसी ने जिया के बारे में लिखते हुए कहा 'ज़िन्दगी को अलविदा कहने की उम्र नहीं थी', यही बात देश भी कह रहा है 'जिया अभी ज़िन्दगी को अलविदा कहने की उम्र नहीं थी, शायद तुम ज़िन्दगी को भूलकर 'गज़नी' बन गई या तुम्हे 'हाउसफुल' के उस गाने 'आजा तुझे हेवेन दिखाउंगी' कि तरह हेवेन (स्वर्ग) देखने की जल्दी थी, या तुमने अवसाद (डीप्रेशन) में आकर कोई बात 'दिल से' लगा और देश को 'निशब्द' करके चली गई।


Shitanshu Pati Tripathi

Monday, 3 June 2013

चैम्पियंस ट्रॉफी डालमिया के दिमाग की थी उपज


आईपीएल का विवाद और चैम्पियंस ट्राफी की शुरुवात के साथ एक व्यक्ति इन दिनों चर्चा में है वो है जगमोहन डालमिया । भारत और विश्व क्रिकेट बिरादरी में जगमोहन डालमिया को ख़त्म मान लिया गया था, लेकिन कहते है व्यक्ति कभी ख़त्म नहीं होता बस उसे सही समय पर दाँव लगाना चाहिए। जगमोहन डालमिया वही व्यक्ति है जिन्होंने आईपीएल विवाद के बाद ऐसा दाँव खेला कि ना सिर्फ बीसीसीआई अध्यक्ष की कुर्सी उनके पास आ गई बल्कि आज वो देश के सबसे शक्तिशाली क्रिकेट प्रशासक के तौर पर एक बार फिर उभरे। 

जगमोहन डालमिया एक सख्त क्रिकेट प्रशासक और दूर तक देखने वाले व्यक्ति माने जाते है। देश और विश्व क्रिकेट में अपनी अलग धमक रखने वाले डालमिया ने भारतीय क्रिकेट का व्यवसायिक करण करके ना सिर्फ भारत को विश्व में क्रिकेट शक्ति के तौर पर स्थापित करा दिया बल्कि विश्व की क्रिकेट बिरादरी को भी भारत के सामने झुकने पर मजबूर कर दिया। आज जगमोहन डालमिया एक बार फिर बीसीसीआई और आईपीएल विवाद के बाद एक ताकत के तौर पर देखे जा रहे है। 

जगमोहन डालमिया ने विश्व क्रिकेट को कई सौगात दी है उसी में से एक चैम्पियंस ट्राफी जैसा प्रतिष्ठित टूर्नामेंट भी है वर्ष 1998 में शुरू हुए चैम्पियंस ट्राफी टूर्नामेंट जगमोहन डालमिया के दिमाग की ही उपज थी। डालमिया ने इस टूर्नामेंट को दो वजहों से शुरू कराया था। पहला ये कि क्रिकेट को उन देशो से परिचित और प्रचारित प्रसारित कराया जाए जहा इसकी जड़े कम गहरी है। दूसरा ये टूर्नामेंट विश्वकप और इस टूर्नामेंट के बीच में बचे समय में आईसीसी के कमाई का जरिया बने। 

चैम्पियंस ट्राफी को मिनी विश्व के तौर पर प्रचारित किया गया इस टूर्नामेंट की शुरुवात 1998 में बांग्लादेश की राजधानी ढाका में हुई। पहले ही चैम्पियंस ट्राफी में डालमिया के जादू और बेहतर मार्केटिंग स्ट्रेटजी की वजह से आईसीसी को करीब एक करोड़ डालर का लाभ हुआ वही साउथ अफ्रीका पहली चैम्पियंस ट्राफी का विजेता बना। 2000 में दूसरा चैम्पियन्स ट्राफी टूर्नामेंट केन्या की राजधानी नैरोबी में हुआ जिसमें दर्शक तो कम मिले लेकिन बेहतर प्रसारण और टेलीविजन राइट्स की वजह से आईसीसी ने खूब कमाई की इस साल ट्राफी न्यूजीलैंड ने जीती उसने भारत को फाइनल में हराया। 

2002 में ये टूर्नामेंट श्रीलंका में हुआ इस टूर्नामेंट के ठीक बाद क्रिकेट विश्व कप खेला जाना था, श्रीलंका में आयोजित इस टूर्नामेंट की वजह से टीमों को अभ्यास और विश्व कप की तैयारियों का मौक़ा नहीं मिला था। क्रिकेट पंडित और सभी देशो के बोर्ड्स ने इस आयोजन की खूब आलोचना की। इस बार 12 टीमों ने भाग लिया था जिसमें केन्या और नीदरलैंड के तौर पर दो नई टीमे शामिल कि गई थी। भारत और श्रीलंका फाइनल में पहुंचे थे लेकिन बारिश की वजह से फाइनल मैच पूरा नहीं हो सका जिसकी वजह से भारत और श्रीलंका को संयुक्त विजेता घोषित कर दिया गया।  

2004 के सितम्बर महीने में इंग्लैण्ड में आयोजित चैम्पियंस ट्राफी तीन शहरों में खेली गई एजबस्टन, द रोज बाउल, और द ओवल में खेले गए मैचों में वेस्टइंडीज ने चैम्पियंस ट्राफी जीती। वही 2006 में ये टूर्नामेंट भारत पहुंचा जहा इसके फार्मेट में थोड़ा चेंज हुआ राउंड राबिन के आधार पर खेले गए मैचेज में आस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीज फाइनल में पहुंचे, वेस्टइंडीज अपना खिताब बचाने  के लिए उतरा था लेकिन आस्ट्रेलिया की विश्वविजेता टीम के आगे वेस्टइंडीज की टीम बौनी साबित हुई आस्ट्रेलिया ने पहली बार इस टूर्नामेंट को जीता। 

2008 में प्रस्तावित चैम्पियंस ट्राफी पाकिस्तान में होनी थी लेकिन सुरक्षा कारणों से कई टीमों ने पाकिस्तान में खेलने से मना कर दिया था। देश के साथ तारिख भी बदल दी गई। 24 सितम्बर से 5 अक्टूबर के बीच साउथ अफ्रीका के वांडर्र्स और सेञ्चुरियन के मैदान पर खेली गई इस प्रतियोगिता के फाइनल में आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड आमने सामने थे जिसमें आस्ट्रेलिया ने न्यूजीलैंड को हराकर लगातार दूसरी बार चैम्पियंस ट्राफी पर कब्जा किया। 

2009 चैम्पियंस ट्राफी टूर्नामेंट के बाद इस ट्राफी पर ग्रहण लग गया लगातार चार साल तक इस ट्राफी को नहीं खेला गया 2013 में एक बार फिर चैम्पियन टीमों का रोमांच इंग्लैण्ड में देखने को मिलेगा इधर क्रिकेट के डाईनामाईट कहे जाने वाले भारत में आईपीएल में स्पाट फिक्सिंग के बाद आये तूफ़ान ने विश्व क्रिकेट की हिला दिया। आईसीसी चैम्पियंस ट्राफी कि शुरुवात करने वाले जगमोहन डालमिया एक बार फिर अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर ही सही विश्व के सबसे ताकतवर क्रिकेट बोर्ड बीसीसीआई के बॉस बन चुके है। 

डालिमया की ताजपोशी का असर और आईपीएल विवाद से दूर टीम इंडिया इस बार अकेले चैम्पियंस ट्राफी का खिताब जीत पाती है या नहीं वैसे आईपीएल विवाद के बाद उठे तूफ़ान के बाद और धोनी के बॉस नारायण श्रीनिवासन की विदाई का असर कॉम और कूल महेंद्र सिंह धोनी पर पड़ता है या धोनी विवादों से परे इस ट्रॉफी के जनक जगमोहन डालमिया को चैम्पियंस ट्राफी जीत कर देश और उन्हें सलामी देंगे।   

Report By - Shitanshu Pati Tripathi   

Sunday, 2 June 2013

पशुओ और घी पर रकम लगवा कर दुगुना करने वाली कंपनियों का फर्जीवाड़ा

नई दिल्ली। गाय-भैंस- बकरी, जमीन, सोना, चांदी पर तो आपने निवेश कराते या करते सुना होगा लेकिन 'घी' पर निवेश कराकर रकम दुगुना करने वाली एक कंपनी प्रकाश में आई है। आज एक ऐसी कम्पनी का खुलासा करने जा रहे है जो 'घी' से रकम दुगुना करने का दावा करती है। 

HBN डेयरी एंड एलायड लिमिटेड नामक कंपनी पशुओ और 'घी' पर पैसा लगवा कर अपनी पूँजी स्कीम के माध्यम से 31 मार्च 2011 तक 745 करोड़ रुपये जुटा चुकी है। कंपनी निवेशको को उनके द्वारा जमा किये गए पैसे का रिटर्न पशुओ की बिक्री और उन पशुओ से उत्पादित घी को बेचकर करेगी। 

कंपनी की वेबसाईट पर दावा किया गया है कि दिल्ली में स्थापित ये कंपनी 90 के दशक से दूध व्यवसाय में लगी हुई है। इसका काम अन्य राज्य हरियाणा में भी फैला हुआ है। हरियाणा के समालखा और गन्नौर में कई  कई एकड़ में फैले डेयरी फार्म है। 

कंपनी ने ये दावा किया है कि निवेशक जिस समय अपनी रकम निकलना चाहेगा उसी समय उन्हें पशुओ और घी की अनुमानित कीमत के हिसाब से रिटर्न दे दिया जायेगा। स्कीम के तहत एक महीने से नौ साल तक कि अवधि के लिए निवेश के विकल्प दिए जा रहे है। 

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) से बिना मंजूरी लिए चलाई जा रही इस योजना और सामूहिक निवेश योजना की जांच शुरू हो गई है। निवेशको ने सेबी से इस तरह के निवेश की शिकायत कि थी। नियामक ने जब इसकी जांच शुरू कि तो निवेशको कि शिकायत सही पाई गई। 

सेबी की जांच शुरू होते ही कंपनी ने पहले तो अपने को रजिस्टर्ड कराने की कोशिश कि लेकिन सेबी द्वारा विस्तृत जानकारी माँगने पर कंपनी ने अपना कार्यालय ही बदल दिया। नियामक की तरफ से कंपनी को कई बार नोटिस दी गई जिसे कंपनी ने रिसीव नहीं किया।

सेबी ने बीते महीने ही इस मामले को लेकर कंपनी को एक और समन भेजा वही HBN में निवेश कराने वाले निदेशकों को मई महीने के आखिर में सेबी के सामने पेश होने को कहा लेकिन ये समन भी कंपनी ने रिसीव नहीं किया। 

सेबी अब कंपनी पर अपना शिकंजा कसने जा रही है, लेकिन एक बात जो इस मुद्दे में सामने आई सरकार और सेबी आम आदमी कि गाढ़ी कमाई बचाने के लिए जितने भी प्रयास कर ले रोजाना कोई ना कोई कंपनी का खुलासा हो रहा है जो आम आदमियों से इस तरह का निवेश करा उनके पैसे को डकार रही है। 

बीते वर्ष भी सेबी ने एक कंपनी बीटल लाइव स्टाक एंड फ़ार्म लिमिटेड को नोटिस जारी किया था, इस कंपनी ने बकरी पालन का हवाल देकर निवेशको से रकम जमा कराई थी इस कंपनी की स्कीम में निवेशक कुछ हज़ार रुपये जमा करके बकरी का मालिक बन सकता था। 

इन बकरियों के पालन और उनके देखरेख की जिम्मेदारी खुद कंपनी उठा रही थी। हर निवेशक से ये कहा जाता था कि कंपनी द्वारा पाली जा रही बकरी हर साल चार बच्चे देती है जिसके मालिक वो खुद होंते है इन्ही बकरी के बच्चो को  निवेशक के पैसे दुगुना तिगुना करके वापस किये जायेंगे। 

इन स्कीमो को चलाने में राजधानी दिल्ली से लेकर मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में हज़ारो कंपनिया कुकुरमुत्ते की तरह उग गई। जो पशुओ पर पैसे लगाकर रकम दुगुना करती थी।

समृद्धा जीवन फूड्स लिमिटेड, सक्षम डेयरी इंडिया लिमिटेड नामक कंपनिया छोटे छोटे व्यवसाय करके अपना काम किया करती थी लेकिन फर्जी चिट फंड कंपनी खोलकर जब इन्होने छोटे व्यवासाइयों को अपने पशुओ और व्यवसाय को बढ़ावा देने का लालच दिया तो करीब आधा दर्जन राज्यों के पशु व्यवसाई और कम लागत लगाकर ज्यादा पाने की चाहत रखने वाले आम आदमियों ने अपनी जमा पूंजी भी गंवा दी। 

समृद्धा जीवन फूड्स लिमिटेड नामक कंपनी चिट फंड में आने से पहले खुद डेयरी व्यवसाय का काम करती थी| गुरुकृपा डेयरी के नाम से काम करने वाली इस कंपनी ने 29 अप्रैल 2002 को सक्षम डेयरी इंडिया लिमिटेड के नाम से पुणे के कंपनी रजिस्ट्रार के आफिस से रजिस्ट्रेशन कराकर चिट फंड की दुनिया में कदम रखा और बीते 10 सालों में इसने करीब अरबों का व्यवसाय कर डाला| आज इस कंपनी के पास करीब 35 हज़ार कस्टमर है जिनके पैसे डूबने के कगार पर है। 

समृद्धा जीवन फूड्स लिमिटेड प्राइवेट लिमिटेड के व्यवसाय का तरीका और कंपनियों से काफी अलग है। इस कंपनी के पास अपने करीब 30 हज़ार भैसे हैं, साथ ही 1 हज़ार बकरियां जिन पर कंपनी ने बाकायदा स्कीम निकाल कर लोगो से पैसे जमा कराये। कंपनी आम लोगो के बीच अपने फार्म हाउसेज में पाली गई भैंसों और बकरियों को किलो के हिसाब से लोगो के नाम कर देती थी| 

स्कीम के तहत एक कांट्रेक्ट पेपर साइन किया जाता था जिसमें इन्वेस्टर हर महीने थोड़ी-थोड़ी रकम जमा कराता था, समय पूरा होने पर या तो इन्वेस्टर अपनी भैंस या बकरी को कंपनी से ले ले या फिर अपने द्वारा जमा किये गए पैसे को वापस मय ब्याज ले ले। इस कांट्रेक्ट का एक निश्चित समय निर्धारित था लेकिन इस अवधि के बीच दुधारू भैंस का दूध कंपनी खुद बेचकर मुनाफ़ा कमाती रहती थी। कंपनी ने अपनी इस स्कीम के तहत एक एक दुधारू भैंस और बकरियों को कई-कई इन्वेस्टर को कांट्रेक्ट के मुताबिक एलाट किया। 


इसी प्रकार सक्षम डेयरी लिमिटेड ने भी 21 दिसंबर 2000 को हरियाणा और दिल्ली में काम करने के लिए अपना रजिस्ट्रेशन कराया लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक की बगैर अनुमति के आम जनता से धन उगाही में जुटी गैर बैंकिंग कंपनियों तथा सक्षम कार्यालय में बगैर पंजीयन के रियल स्टेट के कारोबार के नाम से आम जनता से धन बटोर रही इन कंपनियों के खिलाफ जिला प्रशासन ने पूर्व में भी सख्त कार्रवाई करते हुए पुलिस में प्रकरण दर्ज कराए थे।