दक्षिण के राज्य आंध्र प्रदेश में स्थित विश्व प्रसिद्द तिरुपति बालाजी का मंदिर देश दुनिया के भक्तों के के लिए आस्था का वो केंद्र है जिनकी झोलिया भगवान् विष्णु के अवतार तिरुपति के बाला जी हमेशा भरते रहते है। वैसे ही उत्तर में स्थित नेपाल देश में स्थित पशुपति नाथ का मंदिर भी देवों के देव कहे जाने वाले भोले शंकर का विश्व प्रसिद्द मंदिर है। इन दोनों मंदिरों से भक्तो की आस्था ऐसे जुडी है जैसे जीवन का सांस की डोर से।
तिरुपति से पशुपति मंदिर तक जहा भक्तों की आस्था जुड़ी है वही एक बात और दोनों क्षेत्रो के मदिरों में समान है वो है इन दोनों मदिरो के बीच बीते पांच दशको से जड़ जमाता लाल गलियारा, या ये कहे लाल आतंक। लाल आतंक का आतंक इन दोनों विश्व प्रसिद्द मंदिरों के बीच इतना फ़ैल चुका है जहा नेपाल सरकार इस नक्सल आतंक के आगे हथियार डाल चुकी है वही भारत सरकार नक्सल समस्या से बुरी तरह जूझ रही है।
नेपाल में माओवादियो ने अपनी सरकार भी बनाई माओ नेता पुष्प कमल दहल उर्फ़ प्रचंड के नेतृत्व में नेपाल की सत्ता पर एक बार लाल झंडा फहराया जा चुका है लेकिन अपनी नीतियों और गलत निर्णयों कि वजह से वहा जनाक्रोश भी फैला और विद्रोह भी हुआ प्रचंड को सत्ता छोड़नी पड़ी लेकिन लाल आतंक का अंत नहीं हुआ।
उत्तर में स्थित नेपाल से होता हुआ ये लाल आतंक आज दक्षिण के राज्य आन्ध्र प्रदेश तक पहुँच चुका है। इनके बीच आने वाले करीब नौ राज्य आज नक्सल समस्या से ग्रस्त है। उत्तर प्रदेश,बिहार , झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र इन सभी राज्यों के क्षेत्रों को मिला दिया जाए तो एक लाल गलियारा तैयार हो जाता है।
इसी लाल गलियारे यानि रेड कारपेट इलाके को नक्सल क्षेत्र या देश में सबसे अशांत क्षेत्र कहा जा सकता है। नेपाल से शुरू हुए लाल आतंक ने आज दक्षिण के राज्य आंध्र प्रदेश को सबसे ज्यादा प्रभाव में ले रखा है। आन्ध्र सीमा से सटे महाराष्ट्र, और छत्तीसगढ़ में इस लाल आतंक का जोर इतना है की आज नक्सली जो चाहते है वो कर रहे है सरकार असह्याय बनी नेताओं, सुरक्षा कर्मियों, और पुलिस वालों को मरते देख रही है।
पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से 60 के दशक में शुरू हुआ नक्सल आंदोलन आज छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश, झारखंड, महाराष्ट्र, ओडिशा समेत कुल नौ राज्यों में फैला हुआ है। लाल आतंक ने देश के 160 जिलों को अपनी चपेट ले लिया है। इन चार-पांच दशकों में नक्सलियों ने अपने नेटवर्क का खासा विस्तार कर लिया और इनके संबंध आईएसआई से होने के भी संदेह हैं। उन्हें चीन से भी मदद मिलने की बातें यदा कदा सामने आती रहती हैं। इन हालातों में यदि हम नक्सलियों को लेकर थोड़ी भी लापरवाही और बरते तो आंतरिक मोर्चे पर कई समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। बीते कुछ सालों में प. बंगाल, आंध्र प्रदेश व ओड़िसा में तो नक्सली हमलों पर कुछ काबू पाया जा सका है, लेकिन छत्तीसगढ़ में यह अभी भी गंभीर चुनौती बना हुआ है।
देश के 160 जिलों में चलाये जा रहे नक्सल आन्दोलन में नक्सलियों ने भोले भाले आदिवासियों को अपनी ढाल बना कर सरकार के सामने लगातार चुनौती पेश कर रहे है। अपनी बेजा मांगो को सामने रखकर उन्होंने सरकार को झुकाने की लगातार कोशिश कि है। केंद्र सरकार ने इस लाल आतंक को थामने के लिए 'आपरेशन ग्रीन हंट' शुरू किया इसी बात पर चिढ़े नक्सलियों ने महाराष्ट्र के गढ़चिरौली, छत्तीसगढ़ के बस्तर , सुकमा, और आन्ध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम जैसे जिलों में हमले तेज़ कर दिए।
हाल में ही देश का सबसे बड़ा नक्सली हमला हुआ जिसमें नक्सलियों ने पहली बार किसी राष्ट्रीय पार्टी के नेताओ को अपना निशाना बनाया। इस हमले में कांग्रेस के राज्य अध्यक्ष नन्द कुमार पटेल , विधायक उदय मुदलियार, और सलवा जुडूम के जनक और कांग्रेस सरकार में पूर्व मंत्री महेंद्र कर्मा समेत 30 लोगो का नरसंहार कर दिया। राज्य सरकार हिली, केंद्र सरकार के माथे पर चिंता की लकीरे आई प्रधानमंत्री ने खुद दौरा किया जो इस भयावह स्थिति कि कहानी खुद बयान करता है|
राजनेताओं पर नक्सलियों के सबसे बड़े इस हमले में कई नेताओं को मौत कि नींद सुला गया, इस हमले ने जहा देश को झकझोर दिया वही देश और राज्यों की सरकारों को सोचने पर भी मजबूर कर दिया कि अब वक्त आ गया है इस समस्या को जड़ से ख़त्म करने का। वैसे सरकार ने इस हमले से पहले केन्द्रीय सुरक्षा बलों के हाथ बाँध रखे थे केन्द्रीय और पुलिस बलों की कार्रवाई पर नेता, सरकार , और मानवाधिकार संगठन उनकी कार्रवाई और उस कार्रवाई में मारे जाने वाले नक्सलियों के मानवाधिकार की बात उठा केन्द्रीय सुरक्षा बलों के हाथ बाँध दिया करते थे।
बीते तीन सालों में अलग अलग प्रदेशों के 26 जिलों में वह की जनता और सुरक्षा बलों ने इस लाल आतंक को करीब से देखा था। सरकार ने बीते तीन सालों में देश के इन 26 जिलों में हुए बड़े हमलों कि वजह से इन्हें सबसे ज्यादा प्रभावित जिले माना। इन्ही जिलो में करीब 80% हमले हुए। आंकड़ो पर नज़र डाले तो छत्तीसगढ़ में बस्तर, बीजापुर, दंतेवाड़ा कांकेर कान्डोगाँव, नारायणपुर, राजनंदगाँव और सुकमा वो जिले जो इन नक्सली हमलों में सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। वही इस रेड कारीडोर में आने वाले सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य झारखण्ड भी है जहाँ गडवा, गिरिडीह, गुमला,खूंटी, लातेहार, पलामू, सिमडेगा, और पश्चिम सिंहभूम जिले थे जहा इस लाल आतंक ने सबसे ज्यादा आतंक फैलाया।
इसी प्रकार बिहार में भी लाल आतंक यदा कदा दस्तक देता रहा है यहाँ पर भी औरंगाबाद, गया और जमुई वो जिले है जो झारखण्ड सीमा के पास है और रेड कारीडोर का हिस्सा है। ओडिशा में तीन जिलों को सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित जिलों कि श्रेणी में रखा जा सकता है। ओडिशा से वैसे कभी कभार ही नक्सल हमले की सूचना आती रही है लेकिन कोरापुट मल्कानगिरी और बोलानगिर जी जो आन्ध्र सीमा के करीब है यहाँ नक्सल समस्या सबसे ज्यादा देखी गई। महाराष्ट्र में गढ़चिरौली एक ऐसा स्थान है जहा पर नक्सलियों ने सबसे बड़े हमले को अंजाम दिया था इस हमले में 16 पुलिस वालों की काम्बिंग के दौरान मौत हो गई थी।
लाल आतंक का झंडा इन दिनों जिन कामरेड्स के हाथ में है उनमे से ज्यादातर आंध्र प्रदेश से आते है। कभी आन्ध्र के आधा दर्जन जिलों में नक्सली अपनी सामानांतर सरकार चलाते थे लेकिन आज ये खम्मम और विशाखापट्टनम में ही सिमट गया है, नक्सल समस्या पर नज़र रखने वालो का मानना है आन्ध्र के बड़े नक्सली नेता छत्तीसगढ़ और ओडिशा चले गए है। आन्ध्र के नक्सली नेता अपनी सटीक योजना और अचूक वार के लिए साथ ही हमले की रणनीति बनाने में माहिर माने जाते है।
Shitanshu Pati Tripathi
तिरुपति से पशुपति मंदिर तक जहा भक्तों की आस्था जुड़ी है वही एक बात और दोनों क्षेत्रो के मदिरों में समान है वो है इन दोनों मदिरो के बीच बीते पांच दशको से जड़ जमाता लाल गलियारा, या ये कहे लाल आतंक। लाल आतंक का आतंक इन दोनों विश्व प्रसिद्द मंदिरों के बीच इतना फ़ैल चुका है जहा नेपाल सरकार इस नक्सल आतंक के आगे हथियार डाल चुकी है वही भारत सरकार नक्सल समस्या से बुरी तरह जूझ रही है।
नेपाल में माओवादियो ने अपनी सरकार भी बनाई माओ नेता पुष्प कमल दहल उर्फ़ प्रचंड के नेतृत्व में नेपाल की सत्ता पर एक बार लाल झंडा फहराया जा चुका है लेकिन अपनी नीतियों और गलत निर्णयों कि वजह से वहा जनाक्रोश भी फैला और विद्रोह भी हुआ प्रचंड को सत्ता छोड़नी पड़ी लेकिन लाल आतंक का अंत नहीं हुआ।
उत्तर में स्थित नेपाल से होता हुआ ये लाल आतंक आज दक्षिण के राज्य आन्ध्र प्रदेश तक पहुँच चुका है। इनके बीच आने वाले करीब नौ राज्य आज नक्सल समस्या से ग्रस्त है। उत्तर प्रदेश,बिहार , झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र इन सभी राज्यों के क्षेत्रों को मिला दिया जाए तो एक लाल गलियारा तैयार हो जाता है।
इसी लाल गलियारे यानि रेड कारपेट इलाके को नक्सल क्षेत्र या देश में सबसे अशांत क्षेत्र कहा जा सकता है। नेपाल से शुरू हुए लाल आतंक ने आज दक्षिण के राज्य आंध्र प्रदेश को सबसे ज्यादा प्रभाव में ले रखा है। आन्ध्र सीमा से सटे महाराष्ट्र, और छत्तीसगढ़ में इस लाल आतंक का जोर इतना है की आज नक्सली जो चाहते है वो कर रहे है सरकार असह्याय बनी नेताओं, सुरक्षा कर्मियों, और पुलिस वालों को मरते देख रही है।
पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से 60 के दशक में शुरू हुआ नक्सल आंदोलन आज छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश, झारखंड, महाराष्ट्र, ओडिशा समेत कुल नौ राज्यों में फैला हुआ है। लाल आतंक ने देश के 160 जिलों को अपनी चपेट ले लिया है। इन चार-पांच दशकों में नक्सलियों ने अपने नेटवर्क का खासा विस्तार कर लिया और इनके संबंध आईएसआई से होने के भी संदेह हैं। उन्हें चीन से भी मदद मिलने की बातें यदा कदा सामने आती रहती हैं। इन हालातों में यदि हम नक्सलियों को लेकर थोड़ी भी लापरवाही और बरते तो आंतरिक मोर्चे पर कई समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। बीते कुछ सालों में प. बंगाल, आंध्र प्रदेश व ओड़िसा में तो नक्सली हमलों पर कुछ काबू पाया जा सका है, लेकिन छत्तीसगढ़ में यह अभी भी गंभीर चुनौती बना हुआ है।
देश के 160 जिलों में चलाये जा रहे नक्सल आन्दोलन में नक्सलियों ने भोले भाले आदिवासियों को अपनी ढाल बना कर सरकार के सामने लगातार चुनौती पेश कर रहे है। अपनी बेजा मांगो को सामने रखकर उन्होंने सरकार को झुकाने की लगातार कोशिश कि है। केंद्र सरकार ने इस लाल आतंक को थामने के लिए 'आपरेशन ग्रीन हंट' शुरू किया इसी बात पर चिढ़े नक्सलियों ने महाराष्ट्र के गढ़चिरौली, छत्तीसगढ़ के बस्तर , सुकमा, और आन्ध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम जैसे जिलों में हमले तेज़ कर दिए।
हाल में ही देश का सबसे बड़ा नक्सली हमला हुआ जिसमें नक्सलियों ने पहली बार किसी राष्ट्रीय पार्टी के नेताओ को अपना निशाना बनाया। इस हमले में कांग्रेस के राज्य अध्यक्ष नन्द कुमार पटेल , विधायक उदय मुदलियार, और सलवा जुडूम के जनक और कांग्रेस सरकार में पूर्व मंत्री महेंद्र कर्मा समेत 30 लोगो का नरसंहार कर दिया। राज्य सरकार हिली, केंद्र सरकार के माथे पर चिंता की लकीरे आई प्रधानमंत्री ने खुद दौरा किया जो इस भयावह स्थिति कि कहानी खुद बयान करता है|
राजनेताओं पर नक्सलियों के सबसे बड़े इस हमले में कई नेताओं को मौत कि नींद सुला गया, इस हमले ने जहा देश को झकझोर दिया वही देश और राज्यों की सरकारों को सोचने पर भी मजबूर कर दिया कि अब वक्त आ गया है इस समस्या को जड़ से ख़त्म करने का। वैसे सरकार ने इस हमले से पहले केन्द्रीय सुरक्षा बलों के हाथ बाँध रखे थे केन्द्रीय और पुलिस बलों की कार्रवाई पर नेता, सरकार , और मानवाधिकार संगठन उनकी कार्रवाई और उस कार्रवाई में मारे जाने वाले नक्सलियों के मानवाधिकार की बात उठा केन्द्रीय सुरक्षा बलों के हाथ बाँध दिया करते थे।
बीते तीन सालों में अलग अलग प्रदेशों के 26 जिलों में वह की जनता और सुरक्षा बलों ने इस लाल आतंक को करीब से देखा था। सरकार ने बीते तीन सालों में देश के इन 26 जिलों में हुए बड़े हमलों कि वजह से इन्हें सबसे ज्यादा प्रभावित जिले माना। इन्ही जिलो में करीब 80% हमले हुए। आंकड़ो पर नज़र डाले तो छत्तीसगढ़ में बस्तर, बीजापुर, दंतेवाड़ा कांकेर कान्डोगाँव, नारायणपुर, राजनंदगाँव और सुकमा वो जिले जो इन नक्सली हमलों में सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। वही इस रेड कारीडोर में आने वाले सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य झारखण्ड भी है जहाँ गडवा, गिरिडीह, गुमला,खूंटी, लातेहार, पलामू, सिमडेगा, और पश्चिम सिंहभूम जिले थे जहा इस लाल आतंक ने सबसे ज्यादा आतंक फैलाया।
इसी प्रकार बिहार में भी लाल आतंक यदा कदा दस्तक देता रहा है यहाँ पर भी औरंगाबाद, गया और जमुई वो जिले है जो झारखण्ड सीमा के पास है और रेड कारीडोर का हिस्सा है। ओडिशा में तीन जिलों को सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित जिलों कि श्रेणी में रखा जा सकता है। ओडिशा से वैसे कभी कभार ही नक्सल हमले की सूचना आती रही है लेकिन कोरापुट मल्कानगिरी और बोलानगिर जी जो आन्ध्र सीमा के करीब है यहाँ नक्सल समस्या सबसे ज्यादा देखी गई। महाराष्ट्र में गढ़चिरौली एक ऐसा स्थान है जहा पर नक्सलियों ने सबसे बड़े हमले को अंजाम दिया था इस हमले में 16 पुलिस वालों की काम्बिंग के दौरान मौत हो गई थी।
लाल आतंक का झंडा इन दिनों जिन कामरेड्स के हाथ में है उनमे से ज्यादातर आंध्र प्रदेश से आते है। कभी आन्ध्र के आधा दर्जन जिलों में नक्सली अपनी सामानांतर सरकार चलाते थे लेकिन आज ये खम्मम और विशाखापट्टनम में ही सिमट गया है, नक्सल समस्या पर नज़र रखने वालो का मानना है आन्ध्र के बड़े नक्सली नेता छत्तीसगढ़ और ओडिशा चले गए है। आन्ध्र के नक्सली नेता अपनी सटीक योजना और अचूक वार के लिए साथ ही हमले की रणनीति बनाने में माहिर माने जाते है।
Shitanshu Pati Tripathi

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