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Wednesday, 19 August 2015

जहा से हम पढ़े वही से बच्चे भी पढ़ेंगे.......


सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों के दिन बहुरेंगे जब उनके प्रवेश द्वारों पर लाल और नीली बत्तियों का कभी कभी रेला लगेगा । इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसलें ने शिक्षा के क्षेत्र में अंदर तक घुस चुकी असमानता को खत्म करने की छोटी पहल की जिससे थोड़ी समानता मिलेगी। हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए उत्तर प्रदेश के एमपी, एमएलए, और अधिकारियों को कहा की वो भी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजें। हाईकोर्ट के इस फैसले का आमजन ने जहाँ स्वागत किया वही जनता के कर से मिले पैसों से तनख्वाह पाने वाले अधिकारी वर्ग में थोड़ा रोष भी दिखा लेकिन दबी जबान में । 

वही जनप्रतिनिधियों ने अपने वोट बैंक को संभालने के लिए समर्थन तो दे दिया, लेकिन यहां भी मन में कसक वही है जो सरकारी उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों में देखी गई । उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा मंत्री राम गोविन्द चौधरी ने कहा हम खुद सरकारी स्कूलों में पढ़े है तो बच्चों को पढ़ाने में क्या दिक्कत है । नेताजी हाईकोर्ट के फैसले पर कुछ कह नहीं सकते वजह साफ़ है ये ऐसा मुद्दा है जिस पर कोई भी बड़ा अधिकारी नेता और एमपी ने मुंह खोला तो उसे उसी जनता को जवाब देना होगा जिन्होंने उन्हें माननीय बनाया । हाईकोर्ट ने साफ़ कहा अगर जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ेंगे तो स्कूल की व्यवस्था और स्तर दोनों सुधर जाएगी साथ शिक्षा व्यवस्था भी पटरी पर आ जाएगी । 


भारत सरकार ने 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चो को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने के उद्द्येश्य से अप्रैल 2010 में केंद्र में बैठी यूपीए सरकार ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम बनाया । यूपीए सरकार की सबको शिक्षा देने के अधिकार अधिनियम को बनाना मनमोहन सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि माना गया । तभी से राइट टू एजुकेशन को लेकर पूरे देश में चर्चाओं का दौर चला लेकिन ये तय नहीं हुआ की बड़े बड़े प्राइवेट स्कूलों में पढने वाले और सरकारी स्कूलों में पढने वालों के बीच जो पढ़ने पढ़ाने को लेकर असमानता है उस खाई को कैसे पाटा जाए । बहसों का दौर लंबा चला लेकिन हल कोई नहीं निकला हाँ इतना जरूर हुआ कुछ जरुरत मंद गरीब लोगो के बच्चों का दाखिला जरूर अच्छे स्कूलों में मिल गया । 

कोर्ट ने साफ़ किया की उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए ऐसे ही सख्त कदम की जरुरत थी । कोर्ट ने प्रदेश के 1 लाख 80 हज़ार प्राइमरी स्कूलों में खाली अध्यापकों के 2 लाख 70 हज़ार पदों को लेकर भी तीखी टिप्पणी की साथ ही ये भी कहा प्राइमरी स्कूलों में मूलभूत सुविधाएं जैसे पीने का पानी और शौचालय आदि भी उपलब्ध नहीं है । कोर्ट की इस कड़ी टिप्पणी पर किसी भी राजनीतिक दल ने मुंह खोलने की जुर्रत दिखाई। बहरहाल इलाहबाद हाईकोर्ट के इस फैसले से उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में सुधार हो सकता है। प्रदेश के कुछ इलाके ऐसे है जो दुर्गम में है और अधिकारियों की पहुँच से बाहर वहा प्राइमरी स्कूल के शिक्षक यदा कदा ही आते जाते । 

कोर्ट के इस फैसले से भविष्य में सुधार के संकेत मिल सकते है साथ ही 70 और 80 के  दशक का वो स्वर्णिम युग भी वापस आ सकता है जब प्राइमरी और राजकीय इंटर कालेज के साथ सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में पढ़े बच्चों ने आगे चलकर ऊंचाइयों को छुवा और समाज में एक अलग मुकाम हासिल किया । 





Monday, 17 August 2015

उम्मीदों से मौन तक मोदी.......... 


वो गरजते थे विरोधियों पर बरसते थे क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से देश की उम्मीदें टूटने लगी है? आज के परिपेक्ष्य में बड़ा सवाल यही है। सोशल मीडिया और मीडिया रिपोर्ट्स पर नज़र डालें तो आज प्रधानमन्त्री मोदी के खिलाफ देश में विरोध की चिंगारी फूटने लगी है जो है तो हल्की सी है लेकिन उसे आग बनने में शायद ज्यादा समय न लगे । सोशल मीडिया पर जिस तरह आम जन अपनी स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति को प्रदर्शित कर रहा है उसने एक गरिमामयी पद के प्रोटोकॉल की धज्जियाँ उड़ा दी है ।  

प्रधानमंत्री को आज देश में उनके विरोधी और 2014 के चुनावों में उनके वादों और इरादों पर विश्वास करके वोट देने वाले जुमले बाज़ प्रधानमंत्री के तौर पर उद्धघृत कर रहे है। प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ शब्दों की बाढ़ और खिलाफत की आंधी ऐसे ही नहीं चली इसकी ख़ास वजह भी,बीते एक सालों में ही पैदा हुई जब जनता की उम्मीदें धीरे धीरे उस कपडे की तरह उधड़ने लगी जिसके रेशे उतरते ही कपड़ा अपनी मजबूती खोने लगता है, और उसके आर पार सब कुछ दिखाई देने लगता है ऐसा ही कुछ हाल मोदी के उन वादों का भी हुआ जो जनता के अधिकारों से जुड़े थे और जिन्हे मोदी ने अपनी चुनावी रैलियों में सार्वजनिक मंचो से किया करते थे। 

बीते दिनों लोकसभा में मानसून सत्र के दौरान जो कुछ हुआ उसे कांग्रेस की सफलता न मानते हुए केंद्र में बैठी भाजपा और मोदी सरकार की विफलता माना जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी । कांग्रेस अपनी रणनीति में सफल रही या परदे के पीछे सरकार ने कोई बड़ा खेल खेला ये साफ़ नहीं हो सका। आरोप प्रत्यारोप का दौर लंबा चला सब बोल रहे थे बस चुप थे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आखिर क्या वजह रही की, बिहार के गया में परिवर्तन रैली के दौरान विरोधियों की खामिंया गिनाने वाले मोदी देश की सबसे बड़ी पंचायत में अपनी सीट पर भी नज़र नहीं आएं। क्या जनता को प्रधानमंत्री मोदी से निराशा हाथ लगी या जनता मोदी के मौन को अपना भाग्य समझ बैठी है । 


क्या भारत की जनता इतनी कमजोर हो गई जो मोदी जी की रैलियों में सिर्फ सवालों के जवाब दें या उनसे सवाल पूछने की हिम्मत भी कर सके। वैसे लोकतंत्र में बड़ी ताकत होती है मोदी का मौन नहीं टूटा तो उसे भी जनता अपनी चुप्पी के साथ उसी तरह तोड़ेगी जैसे कांग्रेस के दम्भ को उन्होंने बीते लोकसभा चुनाव में चकनाचूर कर दिया और उसे उस स्थिति में पहुंचा दिया जो बीते 6 दशकों में नहीं हुआ कांग्रेस 440 सीटों से 44 पर पहुँच गई। जनता मौन होती है तो भूचाल आता है कही आने वाले चुनावों में  जनता भाजपा को दिल्ली की उस चुनावी तस्वीर को दिखा दे और ये हाल मोदी की चुप्पी की वजह से होगा जिसे झेलना भाजपा को पड़ेगा। प्रधानमंत्री मोदी आज अपने को विश्व के नेता के तौर पर स्थापित करने में लगे है लेकिन विश्व नेता वो तभी बन सकते है खुद के देश भारत के अंतिम आदमी को वो संतुष्ट कर पाएं । 

प्रधानमंत्री मोदी को उनके तर्कों और बोलने की शक्ति के लिए जाना जाता है लेकिन मोदी का मौन और उनके खिलाफ मीडिया और सोशल मीडिया में बन रहे माहौल उनके लिए एलार्म की तरह है जिसे उन्हें सुन लेना चाहिए और उस जनता की दिक्कतों को धरातल पर लाना चाहिए जिसने उन्हें दोनों हाथ खोल कर समर्थन दिया था ।  

Tuesday, 25 March 2014

अमर - जया के बाद राकेश आरएलडी में आने के मायने

भारतीय राजनीति के सबसे लचीले राजनीतिज्ञ अजीत सिंह इन आम चुनावों में फूंक फूंक कर कदम रख रहे है, जाटलैंड के नाम से मशहूर पश्चिम उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर दंगों के बाद राजनीतिक परिस्थितिया काफी बदल गई है। 2009 का लोकसभा चुनाव भारतीय जनता पार्टी के साथ लड़ने वाले वाले अजित सिंह इस बार के चुनाव में कांग्रेस से हाथ मिलाया है। भाजपा ने जहा अजित सिंह को गठबंधन के तहत 7 सीटें दी थी, वही कांग्रेस ने उन्हें 9 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए हरी झंडी दे दी है। 2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के मजबूत गठबंधन से अजित सिंह 7 में से 5 सीट जीतने में कामयाब हुए थे, उसके बाद उन्होंने भाजपा से किनारा कर लिया था। 

2014 के चुनाव में अजित सिंह ने कांग्रेस से गठबंधन के साथ ही दो ऐसे चर्चित चेहरों को अपने अगल बगल खड़ा कर लिया जिनको किसी भी प्रचार प्रसार की जरुरत नहीं है, ये है सपा के पूर्व दिग्गज अमर सिंह और उनकी साथी जयाप्रदा। अजित सिंह ने इन दोनों को पार्टी में शामिल करते ही इनके चुनाव लड़ने की घोषणा भी कर दी। अजित ने अमर सिंह को फतेहपुर सीकरी से चुनाव लड़ने का टिकट थमाया तो वही जयाप्रदा को अपनी चुनावी जीत की सम्भावना तलाशने के लिए बिजनौर से टिकट देकर रवाना कर दिया। राजनीतिक हलकों में अमर और जया का आरएलडी का दामन थामना चर्चा का विषय बना हुआ है। 

अमर सिंह और जयाप्रदा का राष्ट्रीय लोकदल में शामिल होना उत्तर प्रदेश में क्या सियासी गुल खिलाएगा ये तो चुनाव नतीजों के बाद ही पता चलेगा, लेकिन अमर सिंह और अजित दोनों ही सियासत के ऐसे मंझे हुए खिलाड़ी हैं, जो अपने नफा और नुकसान का दूर-दूर तक आंकलन करने के बाद ही कदम उठाने के लिए पहचाने जाते हैं। अजित शुरुआत से ही अवसरवाद की राजनीति के कारण सुर्खियों में रहे हैं। कभी वह बीजेपी से दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं तो कभी मुलायम सिंह यादव की ओर मुंह ताकते हैं और जब उन्हें लगता है कि उनका सियासी भविष्य कांग्रेस के साथ महफूज रहेगा तो वह उसके साथ खड़े होने से भी परहेज नहीं करते। दूसरी ओर, अमर सिंह के लिए भी अपना सियासी वजूद बचाने के लिए लोकसभा चुनाव से पहले नया दल तलाशना जरूरी हो गया था। 

वही जयाप्रदा के लिए रामपुर में प्रदेश के कद्दावर मंत्री आज़म खान ने कांटे बो दिए थे, इस बार अगर जयाप्रदा रामपुर से चुनावी मैदान में उतरती तो इतना तय था कि आज़म खान उन्हें हरवाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते। अजित सिंह ने पश्चिम उत्तर प्रदेश की राजनीति में खास असर रखने वाले और किसानो के हमदर्द रहे स्वर्गीय चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के पुत्र राकेश टिकैत को भी पार्टी में शामिल कर अमरोहा से टिकट थमा दिया। अजित सिंह इस बार अपनी सीटों को बढ़ाना चाहते है, वजह साफ है देश में अवसरवाद की राजनीति की नीव डालने वाले अजित सिंह इस बार अधिक से अधिक सीट जीतकर केंद्र में बनने वाली अगली सरकार में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर लेना चाहते है। अमर सिंह को पार्टी में शामिल कर अजित सिंह ने एक तीर से कई निशाने साध लिए। अमर सिंह के रिश्ते अन्य दलों के बड़े नेताओं से है इस्तेमाल वो चुनाव के बाद बातचीत में कर सकते है। 

राकेश टिकैत के अजित सिंह का दामन पकड़ने से पश्चिम उत्तर प्रदेश में किसानो के बीच अच्छी पैठ रखने वाली भारतीय किसान यूनियन भी राष्ट्रीय लोकदल के पक्ष में खडी हो जायेगी जो चुनाव की दिशा और दशा को तय कर देगी। अजित सिंह इस बार के चुनाव में कोई भी रिस्क नहीं उठाना चाहते है यही वजह है वो कांग्रेस की खराब हालत के बावजूद भी अपना पूरा दम लगाए हुए है, वजह साफ़ है अगर केंद्र से कांग्रेस साफ़ हुई तो अजित सिंह भी ख़त्म हो जायेंगे इसकी ख़ास वजह भी है जिस तरह चुनाव जीतने के बाद अजित ने भाजपा का दामन छोड़ा वो भाजपा भूल नहीं पाई है।

राजनाथ कही भितरघात के शिकार तो नहीं होंगे!

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में होली के फाग और चौक की भांग की तरह ही अब फ़िज़ाओं में चुनावी सरगर्मिया तेज़ हो गई है। भारतीय जनता पार्टी और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई की परम्परागत सीट के पार्टी ने नया योद्धा भी चुन लिया है। भाजपा ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह को लखनऊ फतह के लिए चुना है। भाजपा ने अटल का खड़ाऊं लेकर 2009 का चुनाव मुश्किल से जीते लालजी टंडन को किनारे कर दिया है। पार्टी के इस फैसले से कही ख़ुशी है तो गम ज्यादा। गम टंडन खेमे में ज्यादा है और यही वजह है कि भाजपा के अंदरखाने ये चर्चा है कि टंडन क्या पूरे मन से कभी उत्तर प्रदेश की सरकार में उनके कनिष्ठ रहे और वर्त्तमान में उनके अगुवा राजनाथ सिंह का सहयोग करेंगे। जो भाजपाई टंडन को करीब से जानता है वो कुछ बोलने को तैयार नहीं| यही बात राजनाथ सिंह के खिलाफ जा सकती है। 

लखनऊ की चुनावी फ़िज़ाओं में ये चर्चा ऐसे ही नहीं उड़ रही है, राजनाथ सिंह के टिकट मिलने और न मिलने के बीच जिन चर्चाओं ने ख़बरों में जगहें बनाई थी उसमें लालजी टंडन का वो बयान भी काफी महत्वपूर्ण था जिसमें उन्होंने कहा था कि लखनऊ की सीट वो सिर्फ और सिर्फ भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के लिए ही छोड़ेंगे| टंडन ने ये भी कहा चाहे कोई आ जाए ये सीट मेरी है किसी और के लिए इसे खाली नहीं करूँगा। टंडन के इन बयानो का निहितार्थ समझने में उनके करीबियों को ज्यादा समय नहीं लगा वही उनके विरोधियों को ये समझने में देर न लगी कि टंडन नाराज हुए तो कही भाजपा को लखनऊ सीट पर फजीहत न झेलनी पड़े। भाजपा और टंडन को करीब से जानने वालों का मानना है कि भाजपा इसका परिणाम अमित पुरी प्रकरण में देख चुकी है जब विधानसभा के उपचुनाव में टंडन ने अमित पुरी का विरोध किया और वो कांग्रेस के राम किशोर शुक्ला से उपचुनाव हार गए। टंडन के नारजगी की वजह उनके बेटे गोपाल टंडन का भाजपा से टिकट काटा जाना बताया गया। 

लोकसभा चुनाव का बिगुल बजते ही टंडन ने भी अपन चुनावी तैयारिया शुरू कर दी थी, लेकिन 2 मार्च को लखनऊ में हुई विजय शंखनाद रैली में आशा के अनुरूप भीड़ न जमा होने की वजह से मोदी सहित भाजपा के बड़े नेताओं कि नाराजगी की ख़बरें भी आई, वजह साफ़ थी रैली के प्रभारी लालजी टंडन थे। अब राजनाथ सिंह के लखनऊ सीट से चुनाव लड़ने पर मोहर लगते ही ये बात भी सामने आ रही है टंडन खासे नाराज है। टंडन लखनऊ के खांटी रहने वाले है उनका परिवार कई पीढ़ियों से लखनऊ में रहता आ रहा है, पुराने लखनऊ में लालजी टंडन की पकड़ काफी अच्छी मानी जाती रही है। टंडन के बारे में ये भी कहा जाता रहा है कि अगर टंडन नाराज हो जाएँ तो वोट शिफ्टिंग में ज्यादा समय नहीं लगता। टंडन का लखनऊ संसदीय सीट पर प्रभाव अटल बिहारी वाजपेई के जमाने से रहा है, लालजी टंडन अटल जी के संसदीय प्रभारी भी रहे है और अटल जी जब जब चुनाव लड़े उनके चुनाव संचालन का काम भी टंडन ने ही देखा| यही वजह है टंडन यहाँ के कार्यकर्ताओं की नस नस से वाकिफ है साथ ही उन्हें लखनऊ की गलिया भी पहचानती है। 

लखनऊ में आजकल एक बात की और चर्चा है टंडन अपने उस विरोधी से काफी घुल मिल रहे है जिनको उन्होंने बीते चुनाव में करीब 42 हज़ार वोटो से शिकस्त दी थी| उन्ही रीता बहुगुणा जोशी के साथ एक होली मिलन समारोह में हंसते बोलते देखे गए। 2009 के चुनाव में रीता बहुगुणा जोशी चुनाव से मात्र 15 दिन पहले कांग्रेस की उम्मीदवार घोषित की गई थी| रीता ने अपने पिता हेमवती नंदन बहुगुणा के नाम पर वोट माँगा था, लोगो ने उन्हें भरपूर आशीर्वाद भी दिया और रीता, टंडन से करीब 42 हज़ार वोट से पीछे रह गई, 2009 के चुनाव में लखनऊ के लोगो ने कहा कि टंडन ने भले अटल जी के नाम पर लोकसभा का चुनाव जीता लेकिन लखनऊ का दिल अपनी बातों और सादगी से रीता लूट ले गई। टंडन और रीता बहुगुणा जोशी आजकल चुनावी घोषणा और टिकट बटवारें के बाद काफी करीब माने जा रहे है। इनकी नजदीकी मीडिया और अखबारों की सुर्खिया भी बन चुकी है। रीता बहुगुणा जोशी कांग्रेस की उम्मीदवार है और टंडन अपनी भाजपा से उम्मीदवारी को यहाँ देखने और समझने वाली बात ये होगी की जिस टंडन के पास अटल बिहारी वाजपेई की विरासत रुपी खड़ाऊं मौजूद है वो खड़ाऊं टंडन अपने साथी को पहनाते है या उसे सहेज कर रख देते है। 

लखनऊ लोकसभा सीट उत्तर प्रदेश की वीवीआईपी सीटों में शुमार है जहाँ 1991 से लगातार भाजपा का कब्जा रहा उसके पहले 1989 के चुनाव में जनता दल के मान्धाता सिंह ने अपना परचम लहराया था। 1991 में भाजपा से अटल बिहारी वाजपेई ने जीत का जो सिलसिला शुरू किया वो भाजपा के लिए आज भी जारी है| अटल के हनुमान कहे जाने वाले लालजी टंडन उनसे कहा करते थे उन्हें सिर्फ नामांकन करने लखनऊ आना है बाकी परिणाम के बाद प्रमाणपत्र लेने| आज वही टंडन नाराज है। 1991 में अटल बिहारी वाजपेई ने जनता दल के मान्धाता सिंह को करीब 5 लाख 45 हज़ार मतों से हराकर रिकार्ड बनाया था| मान्धाता सिंह जो पूर्व सांसद थे उन्हें मात्र 40 हज़ार वोट मिले थे। 1996 में अटल बिहारी वाजपेई के खिलाफ समाजवादी पार्टी ने सिने स्टार राज बब्बर को उतारा अटल बिहारी वाजपेई की राजनीति और लोगो के दिलों में उनकी जगह को राज बब्बर अपने ग्लैमर से बदल नहीं पाये। अटल बिहारी वाजपेई राज बब्बर को 1 लाख 24 हज़ार वोट से हराया। 1998 का चुनाव एक 13 दिन का प्रधानमंत्री रह चुका व्यक्ति लड़ रहा था| लखनऊ के लोगो ने अटल जी में भविष्य का बेहतर प्रधानमंत्री देखा लिया था उन्होंने पूरे मन से अटल जी का साथ दिया और अटल जी ने सपा के मुज्जफ्फर अली को 2 लाख 16 हज़ार वोटों से मात दी। 

1999 का चुनाव ख़ास था अटल बिहारी वाजपेई 13 महीनो की सरकार का नेतृत्व कर चुनावों में कूदे थे। कांग्रेस ने भी सभी पार्टियों से बात कर डॉ कर्ण सिंह को अटल जी के खिलाफ उतारा| अटल ने डॉ कर्ण सिंह को 1 लाख 24 हाज़र वोटो से हराया| वही 2004 अटल बिहारी वाजपेई का अंतिम चुनाव साबित हुआ जब भाजपा इंडिया शाइनिंग का नारा बुलंद कर चुनाव में उतरी| सपा ने अटल बिहार वाजपेई के खिलाफ मधु गुप्ता को मैदान में उतारा अटल जी अपना वोट प्रतिशत बढ़ाते हुए मधु गुप्ता को 2 लाख 17 हज़ार वोट से मात दी लेकिन भाजपा आम चुनाव के बाद केंद्र की सत्ता से बाहर हो गई। 2009 में कांग्रेस की देरी ने एक तरह से लालजी टंडन को वाकओवर दे दिया था, लेकिन रीता बहुगुणा जोशी की प्रत्याशिता घोषित होते ही चुनावी माहौल में गर्मी आ गई टंडन के ऊपर अटल जी का किला बचाने की भारी जिम्मेदारी आ गई| टंडन ने भी अटल जी के गढ़ को बचाने के लिए उन्ही के नाम का सहारा ले लिया और आम जनता के पास उनके खड़ाऊं की दुहाई देकर वोट देने की अपील की| लोगो ने अटल जी के नाम पर उन्हें वोट दिया परिणाम आने पर लालजी टंडन बमुश्किल 42 हज़ार वोट से जीते, टंडन की जीत पर सवाल भी खड़े हुए, जहां अटल बिहारी वाजपेई लगातार पांच चुनावो में 1 लाख से लेकर 5 लाख वोटो के अंतर से जीत दर्ज करते रहे वही टंडन की जीत कुछ हज़ारों में सिमट गई। 

भाजपा समझ गई अटल के गढ़ में सेंध पड़ चुकी है, कांग्रेस ने इस बार समय से बहुत पहले ही रीता बहुगुणा जोशी को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है वही रीता ने भी लखनऊ के कैंट क्षेत्र से विधायक बनने के बाद लोकसभा चुनाव के लिए अपनी सक्रियता बढ़ा दी थी, टंडन लखनऊ की राजनीति के पुराने खिलाड़ी है वही राजनाथ सिंह अपनी लोकसभा सीट गजियाबाद को छोड़कर लखनऊ आये है देखना ये है कि इस बार जनता राजनाथ सिंह को वोट देकर चुनती है या राजनाथ भी अटल बिहारी वाजपेई के नाम का सहारा लेते है वही टंडन अपनी प्रत्याशिता खारीज होने के बाद क्या गुल खिलाते है ये देखना रोचक होगा, वैसे विरोधी उम्मीदवारों के साथ गुझियों का स्वाद ले रहे टंडन चुनाव के दौरान क्या करते है, कही टंडन की नाराजगी किसी का मुंह कसैला न कर दे और उनकी कोई खतरनाक चाल किसी का आँचल खुशियों से न भर दे ।

Namo से हर हर मोदी तक

 काशी एक धर्मनगरी होने और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर जानी जाने वाली सांस्कृतिक नगरी है। काशी को मोक्षदायनी नगरी भी कहा जाता है। काशी को घाटों का शहर भी कहा जाता है| अस्सी घाट से लेकर वरूणा के मध्य स्थिति काशी क्षेत्र का अपना एक अलग महत्व है। काशी में एक बात और सामान है जो यहाँ के सभी हिन्दू साम्प्रदाय में विश्वास रखने वाले घरों में बोला जाता है वो धार्मिक वाक्य है "हर हर महादेव" आजकल इस धार्मिक भावनाओ से ओतप्रोत होकर बोले जाने वाले इस धार्मिक नारे को मोदी के अंध भक्त उनके नाम के आगे लगाकर "हर हर मोदी" बोल रहे है। 

हर हर महादेव को हर हर मोदी बोले जाने को लेकर वाराणसी के साधू संतो में ख़ासा रोष है। जहां पहले काशी के स्थानीय संत ने हर हर मोदी नारे का विरोध किया अब शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने भी हर हर मोदी नारे पर ऐतराज जता दिया है। शंकराचार्य के इस नारे के विपक्ष में बयान देने से ये मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है आजकल वाराणसी संसदीय क्षेत्र दो वजहों से सभी की नज़रों में आ गई है पहली वजह भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी के चुनाव लड़ने और दूसरी वजह हर हर महादेव की जगह हर हर मोदी ने इसकी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा शुरू करा दी है। शंकराचार्य और काशी के विद्द्वानों ने इस बात को आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के समक्ष रखा है। 

वैसे भाजपा और मोदी खेमा किसी भी तरह से बनारस के चुनाव को हलके में नहीं ले रहा है तभी आजकल भाजपा खेमे में इस बात की चर्चा भी जोरो पर है कि मोदी बनारस में बड़े अंतर से चुनाव तभी जीतेंगे जब यहाँ से कोई बड़ा मुस्लिम चेहरा उतरेगा| भाजपा में इस बात की चर्चा भी है कि 2009 लोकसभा चुनाव में दूसरे नंबर पर रहे मुख्तार अंसारी को स्थानीय निवासी और भाजपाई मोदी के सामने खड़े देखना चाहते है। भाजपाइयों का ये भी मानना है अगर मोदी के सामने मुख्तार आते है तो मोदी यहां से चुनाव जीतेंगे ही, लेकिन मुख्तार अंसारी लड़े तो साम्प्रदायिक आधार पर मतों के ध्रुवीकरण के चलते मोदी की भारी मतों से जीत होगी यही वजह है कि धार्मिक भावनाओ को भी इन चुनावों से जोड़कर हर हर महादेव की जगह हर हर मोदी का नारा दिया गया है। 

वाराणसी संसदीय क्षेत्र में रोहनिया, वाराणसी दक्षिणी, वाराणसी उत्तरी, कैन्ट, सेवापुरी विधान सभायें आती है जिनमें से 3 पर भाजपा व एक-एक पर अपना दल व सपा का कब्जा है। वाराणसी उत्तरी से भाजपा के रविन्द्र जायसवाल, दक्षिणी से श्याम देव राय चौधरी उर्फ दादा, कैन्ट से श्रीमती ज्योत्सना श्रीवास्तव, सेवापुरी के सपा के सुरेन्द्र पटेल व रोहनिया से अपना दल की अनुप्रिया पटेल विधायक हैं। भाजपा ने मतों के ध्रुवीकरण के लिए नरेन्द्र मोदी को वाराणसी से अपना उम्मीदवार बनाया है जिसका उत्तर प्रदेश के पूर्वी क्षेत्रों के साथ-साथ बिहार, झारखण्ड, मध्यप्रदेश की कई लोक सभा क्षेत्र प्रभावित होंगे। 

सपा ने इस बार अपना प्रत्याशी बदलते हुए अजय राय की जगह कैलाश चौरसिया को अपना उम्मीदवार बनाया है| बसपा ने पिछले चुनाव में अपना दल से लड़े विजय प्रकाश जायसवाल को अपना उम्मीदवार बनाया। कौमी एकता मंच ने मुख्तार अंसारी की पत्नी को उम्मीदवार घोषित किया है लेकिन कयास यह लगाया जा रहा है कि घोषी के साथ-साथ मुख्तार अंसारी वाराणसी से भी लड़ेंगे। कांग्रेस ने अभी अपने उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है। स्थानीय दावेदारों ने पूर्व सांसद डाॅ0 राजेश मिश्रा, पिन्डरा से चार बार चुनाव जीत रहें अजय राज का नाम प्रमुख है। परन्तु इधर कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव व मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का भी नाम चर्चा में है। 

वाराणसी संसदीय क्षेत्र से 1996, 98 व 99 में भाजपा के शंकर प्रसाद जायसवाल को विजय हासिल हुई थी। 2004 में कांग्रेस के डाॅ0 राकेश मिश्रा को जीत मिली थी। 2009 के चुनाव में भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डाॅ0 मुरली मनोहर जोशी के सिर जीत का सेहरा बंधा था। डाॅ0 जोशी को 203122 निकटस्थ प्रतिद्वन्ती बसपा के मुख्तार अंसारी को 185911, सपा के अजय राय को 123874, कांग्रेस के डाॅ0 राजेश मिश्रा को 66386 और अपना दल के विजय प्रकाश जायसवाल को 65912 मत मिला था। वाराणसी संसदीय क्षेत्र में विभिन्न जाति धर्म व सम्प्रदाय के मतदाता रहते हैं। 

जातिगत आधार पर यदि मतदाताओं की संख्या पर नजर दौड़ाई जाय तो ब्राह्मण-191027, राजपूत-86217, यादव-95273, निषाद (बिन्द, मल्लाह, केवट)-172928, दलित-132442, भूमिहार -42416, राजभर-27401, चैहान-22931, कुशवाहा/मौर्य-74283, कुर्मी-152217, वैश्य-159102, मुस्लिम-252462, पाल-32241, कायस्थ-29945, प्रजापति-31466, बंगाली-44307, विश्वकर्मा-32634, चौरसिया -21016, सोनार-12613, नाई-9042 आदि सम्मिलित है। 

डाॅ0 मुरली मनोहर जोशी को वाराणसी से कानपुर भेजे जाने के कारण ब्राह्मण समाज में नाराजगी है परन्तु समय के हिसाब से सब शान्त हो जायेगा। यही वजह है भाजपा वाराणसी सीट को हाट बनाये रखने के लिए लगातार वहां की अच्छी औरे बुरी बातों को मीडिया में हवा दे रही है। आजकल हर हर मोदी घर घर मोदी नारे ने सुर्खिया बटोर रखी है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने भी इस नारे की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े कर दिए है वही विपक्ष भी इस नारे को लेकर लगातार भाजपा पर हमलावर है लेकिन बनारस के मस्त लोग अपनी मस्ती में अभी भी हर हर मोदी के नारे लगा रहे है देखना है आगे ये नारा भाजपा को क्या रास्ता दिखाता है।

Friday, 25 October 2013

ISI के संपर्क अब देश को बतायेंगे कांग्रेस उपाध्यक्ष

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी आजकल कांग्रेस को पांच राज्यों में सत्ता पर काबिज कराने के लिए इन सभी राज्यों के चुनावी समीकरण को दुरुस्त करने का जिम्मा अपने कन्धों पर उठा लिया है। राहुल और कांग्रेस की महत्वकांक्षा कहे या विरोधियों की बढती लोकप्रियता राहुल आजकल ऐसे ऐसे बयान दे रहे हैं जो भारत सरकार के किसी जिम्मेदार मंत्री या अधिकारी के पास ही हो सकता है। राहुल चुनावी गणित को ठीक करने के लिये बयानों पर होने वाले बवालों की परवाह किये बिना कांग्रेस और खुद के ऊपर मुसीबत मोल ले रहे है। 

राहुल गांधी ने राजस्थान के चुरू में 23 अक्टूबर को एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए ये कह कर सभी को हैरत में डाल दिया कि मेरी दादी और पापा को मारा, शायद मुझे भी एक दिन मार डालेंगे, अब राहुल गांधी को कौन मार डालेगा ये इस बात की चर्चा अगले दिन के अखबारों और सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर खूब डाली और पढ़ी गई| कहीं उनके सुरक्षा की बात हुई तो कही उनके बयान को हंसी में उड़ा दिया गया। 

राजस्थान में विधानसभा चुनाव की तिथियाँ घोषित हैं| राहुल चुनावी रैली में बोल रहे थे| राहुल ने भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधते हुए कहा बीजेपी दंगा करवाती है| नेताओं ने मुजफ्फरनगर, गुजरात और यूपी में आग लगाई| मैं बीजेपी की राजनीति के खिलाफ हूं| कांग्रेस उपाध्यक्ष ने कहा कि लोगों के अंदर गुस्सा भरते हैं नेता| गुस्सा खत्म करने में सालों का वक्त लगता है| उन्होंने कहा कि मेरा काम सिर्फ चुनाव जीतने तक सीमित नहीं, मुझे भविष्य के बारे में भी बताना होगा| 

राहुल अपने इस बयान के बाद विरोधियों के निशाने पर आ गए। चुरू से राहुल का विरोध जो शुरू हुआ वो अभी थमने का नाम ही नहीं ले रहा था की राहुल गांधी ने 23 तारीख को मध्य प्रदेश के इंदौर में मुजफ्फरनगर दंगो पर फिर मुंह खोला जिसमें उन्होंने कहा दंगो के बाद दंगो की आग में अपना घर बार छोड़ चुके 15 -20 लोगो के संपर्क में पाकितान की खुफिया इकाई ISI है। राहुल के मुंह से बयान के तौर पर ये शब्द क्या छूटे भाजपा ने उन शब्दों को पकड लिया।

भाजपा राहुल गांधी पर समाज में साम्प्रदायिक तनाव फैलाने का आरोप लगाते हुये उनकी शिकायत चुनाव आयोग में करने जा रही है। वही मुजफ्फरनगर पर बयान देने के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति गर्मा गई है। मुजफ्फरनगर दंगो में नाम आने के बाद आज़म खान की छीछालेदर हुई थी। आज़म खान ने राहुल गांधी के भाषण पर कहा वो दूसरों का लिखा हुआ भाषण पढ़ते है उन्हें भाषण देने से पहले उसे खुद पढ़ लेना चाहिये। आज़म खान के इस बयान से कांग्रेस हत्थे से उखड़ गई| कांग्रेस प्रवक्ता मीम अफज़ल ने कहा राहुल लिखा हुआ भाषण नहीं पढ़ते है बल्कि जो मन में आता है वो बोल देते है। 

आज़म खान ने कहा कि राहुल किस हैसियत ISI से जुड़े तथ्यों पर बयान दे रहे है। आज़म खान ने राहुल गांधी के बयान को बचकाना कहते हुये कहा कि राहुल गांधी को सोच-समझकर बोलना चाहिये। राहुल गांधी के बयानों से कांग्रेस की मुश्किल घटने की बजाय बढ़ती जा रही है| राहुल आजकल चुनावों को लेकर कुछ ज्यादा परेशान है। कांग्रेस का राहुल से उम्मीदों का बोझ इतना बढ़ चुका है जिसे पूरा करने के लिए राहुल गांधी बिना सोचे-समझे बयान दे रहे है।

द्रौपदी के तो पांच ही थे, हमारे 105 पति

लोकसभा चुनावों के करीब आते ही सभी पार्टियों के नेताओं के जो जो बोल फूट रहे है वो जहां कुछ को नागवार गुजर रहा है| वहीँ,कुछ बयानों पर चटकारे ले रहे है। भाजपा इन दिनों कांग्रेस पर नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में कांग्रेस पर हमले करने का कोई मौका नहीं छोड़ रही है, लेकिन पार्टी अंतर कलह से भी गुजर रही है ये भी किसी से छुपा नहीं। 

पार्टी के पूर्व अध्यक्ष ने पार्टी की अलग-अलग विचारधाराओं और नेतृत्व को लेकर तल्ख़ टिप्पणी की है। पूर्व भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कहा कि पार्टी के 105 पति है| शुक्र है द्रौपदी के 5 ही पति थे। अंग्रेजी अखबार के हवाले से नितिन गडकरी का छपा बयान में कहा गया शुक्र है द्रौपदी के पांच पति थे। 

नितिन गडकरी ने साफ़ कहा कि देश में राजनीति करने वाली कुछ पार्टिया एक परिवार तक सीमित रह गई हैं लेकिन भाजपा में ऐसा नहीं है, उन्होंने ये भी कहा जब वो अध्यक्ष थे तो उनके उनके समय 8-8 मुख्यमंत्री प्रदेशो में राज कर रहे थे, सबको संभालना मुश्किल काम था । 

गडकरी ने कहा कि कुछ पार्टिया माँ बेटे के आसपास ही घूम रही हैं लेकिन भाजपा में ऐसा नहीं है | उन्होंने कहा कि वह कभी प्रोफेशनल नेता नहीं थे| उनके शब्दों में, 'मेरे कट-आउट कहीं नहीं लगे, न ही मैंने दूसरे नेताओं के कट-आउट लगवाए| नितिन गडकरी एक सम्मेलन में बोल रहे थे जिसका विषय था 'मौजूदा राष्ट्रीय परिदृश्य और विकल्प'|

I AM MALALA

नोबल शांति पुरस्कार की दौड़ में शामिल हुई पाकिस्तान में लड़कियों की शिक्षा के लिए संघर्ष करने वाली मलाला युसुफजई आजकल पूरे विश्व में चर्चा का विषय बनी हुई है। कभी संयुक्त राष्ट्र संघ में भाषण देकर तो कभी अमेरिकन राष्ट्रपति बराक ओबामा से मुलाकात को लेकर, पर इन दिनों मलाला की सुर्ख़ियों में रहने की वजह बनी हैं उनकी अपनी किताब I AM MALALA | मलाल इस किताब को लेकर सुर्खियाँ बटोर रही है। 

अमेरिका की वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी ने मलाला की किताब I AM MALALA को विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल करने का ऐलान किया है। पाकिस्तान की यह किशोरी दुनिया भर के लोगों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन गई है, जिसे देखते हुए यूनिवर्सिटी उसके संस्मरण को लेने का फैसला किया है।

एक साल पहले स्कूल जाते हुए तालिबान के हमले का शिकार हुई मलाला युसुफजई ने सिर में गोली लगने के बावजूद मौत को पीछे छोड़ दिया मलाला ने हिम्मत नहीं हारी और इसके बाद भी अपने देश और आतंक प्रभावित इलाकों की लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के प्रयासों में लगी रही। इस किताब से मलाला के इन्हीं प्रयासों के बारे में जाना जा सकता है।

यूनिवर्सिटी के ग्लोबल वीमेन इंस्टिट्यूट (GWI) की निदेशक इल्सबर्ग ने कहा कि सिलेबस में यह लेशन ना सिर्फ छात्रों को शिक्षित करेगी, बल्कि मलाला जिन मुद्दों के लिए आवाज उठा रही है, उसे भी बढ़ावा देगी।हाल में ही मलाला ने कहा था कि मैं पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनना चाहती हूं और तब हर लड़की को स्कूल भेजूंगी। मेरी दुनिया भले ही बदल गई है, लेकिन मेरे इरादे अब भी नहीं बदले हैं। उन्होंने ये भी कहा मुझे कई बार भूतों से डर लगता है, लेकिन तालिबान से नहीं। मलाला ने कहा कि कट्टरपंथी नहीं चाहते कि लड़कियां स्कूल जाएं, क्योंकि वे डरते हैं।

एंग्री यंग युवराज अपना आक्रोश कांग्रेस को दुरुस्त करने में लगाये

 आक्रोश से भरा युवराज, देश को अपनी बातों से बदलने वाले युवराज, अपनी माँ के दुःख को जनता के सामने रखने वाले देश के भावी प्रधानमंत्री आजकल फिर गुस्से में है, विरोधियों पर आंकड़ो के हिसाब से हमला करने वाले कांग्रेस उपाध्यक्ष और भारत के युवा शक्ति को अपने नेतृत्व से राह दिखाने की मंशा रखने वाले कांग्रेसी नेता राहुल गांधी एक जगह आकर फेल साबित हो रहे है वो है उनका खुद का संसदीय क्षेत्र जहा विकास की बयार पहुंची ही नहीं| राहुल आजकल फिर चुनावी अभियान पर कांग्रेस का झंडा उठाये यूपीए को केंद्र में तीसरी बार सत्ता पर बैठाने के लिये उड़नखटोले से देशभ्रमण पर निकल चुके है लेकिन अमेठी की समस्याओं से अनजान।

2009 लोकसभा चुनावों में अपनी खास शैली और केंद्र की योजना नरेगा का बखान करके सत्ता में वापस लाने वाले राहुल गांधी आज देश को बदलने की बात कहते है। देश उनकी कांग्रेसनीत सरकार में बदल भी रहा है लेकिन उस तरह नहीं जिस तरह उसे बदलना चाहिये| अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ती जा रही है जिस तरह से अमीर और अमीर और गरीब और रसातल में जा रहा है वो सोच कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की सोच से मेल नहीं खाती है। कांग्रेस ने कुछ चुनाव पहले एक नारा दिया था "गरीबी हटाओ खुशहाली लाओ" "कांग्रेस का हाथ गरीब के साथ" आज कांग्रेस अपने उस नारे के इतर गरीब हटाओ अभियान में ही लगी हुई है। कांग्रेस नेतृत्व और यूपीए- 2 ने आज घोटालों के साथ मंहगाई को इतना बढ़ा दिया है कि आम आदमी को दो जून रोटी के लिये भी सोचना पड़ रहा है। 

कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने एक विवादास्पद बयान दिया "आदमी के दिमाग में गरीबी होती है, व्यक्ति गरीब नहीं होता।" कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की सोच और उनके बयान की विपक्ष ने धज्जियां उड़ा दी। राहुल गांधी को गरीब और गरीबी की सही परिभाषा को परिभाषित करना शायद सीखना होगा। राहुल देश को शीर्ष पर देखना चाहते है, देश को भी उनसे काफी अपेक्षाये है। लेकिन राहुल की सोच भारत जैसे राष्ट्र के लिये मेल नहीं खाती है। राहुल गांधी आक्रोश में आते है तो किसी दल का मैनिफेस्टो फाड़ देते है, वही दागी राजनेताओं वाले कानून को बदलने के लिये उन्होंने अध्यादेश को बकवास करार दे दिया, राहुल का ये आक्रोश जनता को अच्छा लगा लेकिन सरकार और खुद प्रधानमंत्री को नागावार गुजरा। 

राहुल कभी विपक्ष को निशाने पर लेते है तो कभी खुद सरकार को राहुल देश बदलने की बात करते है उनके संसदीय क्षेत्र अमेठी का हाल कैसा है शायद वो नहीं जानते| सुल्तानपुर का अमेठी लोकसभा क्षेत्र देश के VVIP संसदीय क्षेत्रों में शुमार होता है। 1980 से 2009 तक इस सीट पर कांग्रेस का कब्जा रहा है। सर्फ पुराने कांग्रेसी और कुछ दिनों लिए भाजपा में शामिल अमेठी के राजा संजय सिंह 98-99 में कांग्रेस से ये सीट 1साल के लिये छीन पाए थे नहीं तो सातवीं लोकसभा से संजय गांधी के 1980 में चुनाव जीतने के बाद जो सिलसिला कांग्रेस ने किया वो भाई राजीव गांधी, भाभी सोनिया गांधी से होता हुआ राहुल गांधी तक पहुंचा। 1980 में सातवीं लोकसभा के लिए चुने गए संजय गांधी की हवाई दुर्घटना में हुई मौत के बाद हुये उपचुनाव में उनके बड़े भाई और देश के पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत राजीव गांधी ने जीत का परचम लहराया और अपने भाई की सीट को अपने परिवार में बरक़रार रखा। 

राजीव गांधी ने अमेठी लोकसभा सीट से तीन बार प्रतिनिधित्व किया था लेकिन 21 मई 1991 को तमिलनाडु में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान श्रीपेरम्बदुर में लिट्टे ने एक आत्मघाती हमलें में उन्हें मार दिया था, राजीव गांधी के निधन से शोक में डूबे परिवार ने राहुल की खड़ाऊ कांग्रेस उनके परिवार के करीबी और राजीव गांधी के दोस्त कैप्टन सतीश शर्मा को सौंप दिया था। सतीश शर्मा ने दसवीं लोकसभा में 91 से 96 तक, ग्यारवीं लोकसभा में 96 से 98 तक इस सीट का प्रतिनिधित्व किया। संजय, राजीव की परम्परागत सीट को 1998 में पूर्व कांग्रेसी और अमेठी के राजा संजय सिंह ने भाजपा के टिकट पर लड़कर कांग्रेस से छीन लिया। कांग्रेस को अमेठी सीट हार जाने का मलाल था। 

1999 में हुये लोकसभा के उपचुनाव में राजीव की विरासत को बचाने के लिए खुद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी चुनावी मैदान में उतरी और उन्होंने भाजपा के संजय सिंह को उनकी कांग्रेस से गद्दारी का सबक सिखाते हुए करीब 3 लाख से ज्यादा वोटो से हराया। सोनिया गांधी ने अपने पति की सीट को जीतकर अपनी विरासत अपने बेटे राहुल गांधी को सौंपी जो 2004 में तेरहवीं लोकसभा के लिये अमेठी से चुने गये, राहुल गांधी ने चौदहवी लोकसभा का चुनाव भी 2009 में इसी सीट से जीता| राहुल अमेठी के सांसद है लेकिन आंकड़ो और अमेठी के विकास पर नज़र डाली जाए तो राहुल गांधी की बाते और विरोधियों पर किये जा रहे हमले उन्हें भोथरा साबित करते है। राहुल गांधी पूरे देश को बदलने की बात करते है लेकिन उनका संसदीय क्षेत्र आज किस हाल में है वो आंकड़े खुद बयान कर रहे है। 

राहुल गांधी कांग्रेस के नीतिनिर्धारकों में शामिल है और केंद्र में कांग्रेसनीत यूपीए की सरकार चल रही है, केंद्र की सरकार पूरे देश में विकास , साक्षरता , स्वास्थ्य, यातायात, खाद्य सुरक्षा जैसे कार्यक्रमों को तय करती है देश के अन्य हिस्से जहा सरकार के आंकड़ो में आफी आगे है| वहीँ, राहुल गांधी की अमेठी का हाल यहाँ दिये जा रहे आंकड़े खुद बयान कर रहे है। जहाँ राष्ट्रीय साक्षरता दर देश में 65% है| राहुल के अमेठी में ये दर मात्र 39.5% है। अमेठी में 50% जनता गरीबी से नीचे रहती है। अमेठी में मात्र 15 % जनता को बिजली की सुविधा मिलती है। अमेठी में 15% बच्चे अकाल मौत मर जाते है। सरकार जहाँ टीकाकरण कार्यक्रम के लिये अरबों रुपये खर्च करती है वहीँ,अमेठी में टकाकरण की स्थिति काफी दयनीय है यहाँ टीकाकरण 16% से कम हुआ है। 

राहुल देश के विकास के लिये अपनी जनसभाओ के हर मंच से खूब चिल्लाते है। लेकिन उनके यहाँ MPLAD FUND में आया 3.06 करोड़ रुपये में से केवल 18 लाख रुपये ही खर्च हो पाये| अमेठी में विकास की बयार आज तक नहीं चली बीते दस वर्षो में कोई नया उद्योग यहाँ नहीं लगा। राहुल गांधी के अमेठी और राजीव गांधी के कर्मक्षेत्र के तौर पर प्रसिद्द अमेठी आज अपने प्रतिनिधि से काफी उम्मीद बांधे हुये हैं लेकिन राहुल देश की विकास की बात कहते हुये अपने क्षेत्र को बैठे है। राहुल देश की राजनीति का भविष्य है, राहुल की सोच युवाओं वाली है लेकिन जिस सोच से उन्हें आगे बढ़ना चाहिए वो दिखाई नहीं देती| 

राहुल आक्रोशित हो जाते है और जब वो आक्रोश में रहते है तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का रास्ता काटने में भी उन्हें कोई गुरेज नहीं होती। लेकिन राजनीति को करीब से जानने वालों का मानना है राहुल का यही आक्रोश और सिस्टम पर गुस्सा उन्हें विपक्षियों के निशाने पर लाता है। आज राहुल को पहले अपना घर दुरुस्त करना चाहिये उसके बाद देश के बारे में सोचना चाहिये| आक्रोश अच्छी बात है लेकिन जब सरकार आपके इशारों पर चलती है तो राहुल किसको आक्रोश दिखाते है उन्हें मशीनरी को खुद दुरुस्त करना चाहिए|

अब दो प्याजा नहीं Rare शतक प्याजा खाइये

दाल रोटी के साथ गरीब की थाली में स्वाद बढाने वाला प्याज अब विशिष्ट हो चला है। गरीब के लिये प्याज का मतलब अब मटन चिकन और पनीर के बराबर हो गया है। प्याज अब शादी ब्याह में दिख जाये तो लोग अपनी कस्मत पर रक्श कर सकते है। पहले प्याज काटने पर आंसू निकलते थे अब प्याज का दाम और उसकी बढ़त सुनकर आंसू तो नहीं निकलते दिल की धड़कने जरुर बढ़ जाती है। लोगो की सब्जी की टोकरियों से प्याज गायब होता जा रहा हैं| वहीँ, अब प्याज शब्द सुनते ही केंद्र में बैठी मनमोहन सरकार को दो चार अतिविशिष्ट शब्दों से भी नवाजने में लोग गुरेज नहीं कर रहे है। 

मई 1998 के बाद भारत की जनता के लिए प्याज VVIP हुई थी,तब लोगो के बीच एक गाना काफी लोकप्रिय हुआ था, अटल बिहारी वाजपेई की दुसरे टर्म की सरकार चल रही थी, गाना अटल जी को तंज करते हुये बना था गाने के बोल थे "का हो अटल चाचा पियजिया अनार हो गईल" इस गाने में अटल जी के ऊपर फिकरा कसते हुए गायक ने प्याज क तुलना उस अनार से की थी जो सिर्फ अमीरों के डाइनिंग टेबल की शोभा बढाता था और उन्ही की पहुँच में था ऐसा ही हाल प्याज के साथ हुआ था। उस साल प्याज 80 रुपये किलों बिका जिसकी वजह थी अटल बिहारी वाजपेई सरकार द्वारा पोखरण के रेगिस्तान में 5 परमाणु परिक्षण करना जिसमें टन के हिसाब से प्याज का इस्तेमाल होना बताया गया। 

आज प्याज की कीमत 100 रुपये के पार जाने की तैयारी में है जो इन त्योहारों के मौसम में पार भी कर जायेगी। अटल बिहारी वाजपेई की सरकार में प्याज के दाम बढ़ने की जो वजह सामने आई वो देश हित में थी लेकिन मनमोहन सिंह सरकार के समय बीते 6 महीनो से आम आदमी को तरसाने वाली प्याज के दाम क्यों बढ़ रहे है इसका कोई ठोस जवाब सरकार का कोई नुमाईंदा नहीं दे रहा है। अब सरकार की तरफ से जो बयान आया वो बेहद चौकाने वाला है, केंद्र सरकार ने माना है कि जमाखोरों की वजह से प्याज के दाम बढ़ रहे हैं। वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने कहा कि देश में प्याज का काफी भंडार है। जमाखोरी के कारण प्याज की कृत्रिम रूप से कमी हो गई है। राज्य सरकारें ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करें।

पटना में प्याज की कीमतें सौ रुपए प्रति किलोग्राम के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बीच केंद्र सरकार ने इसकी जमाखोरी करने वालों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करने का राज्य सरकारों से आग्रह करते हुए कहा कि कीमतों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से जरूरत पड़ने पर इसका आयात किया जा सकता है। राजधानी दिल्ली सहित देश के अधिकांश हिस्से में प्याज की कीमत औसतन 90 रुपए प्रति किलोग्राम पर पहुंच चुकी है। पिछले चार महीने में प्याज की कीमतें चार गुना बढ़ चुकी है। उन्होंने कहा कि मुद्रास्फीति बहुत चिंता का विषय है। लेकिन इसमें खाद्य पदार्थों और सब्जियों की वजह से बढ़ोतरी होती है। हालांकि उन्होंने इस बढ़ोतरी को अस्थाई बताते हुए कहा कि यह सीजनल मामला है और यह नीचे आ जाएगा।

प्याज आज आम आदमी की पहुँच से दूर हो गया है, आज प्याज से सस्ता सेब बिक रहा है, लेकिन सभी खाद्य पदार्थो का स्वाद बढाने वाला प्याज आज लोगो की थालियों से रूठ चुका है सरकार का मानना है कि प्याज के दाम अभी दो महीने और नीचे नहीं आयेंगे| अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर देश में त्योहारों के मौसम के तौर पर जाना जाता है। बड़े से लेकर छोटा व्यवसायी इस मौके का बखूबी लाभ उठाना चाहता है| जो वो उठा भी रहा है। सरकार बेबस जनता लाचार और प्याज के काला बाजारी अपनी प्याज से होने वाले मुनाफे को लेकर मस्त। आज हालात ऐसे हैं कि लोग एक दूसरे से मज़ाक में कहने लगे है, भैया प्याज खाये कितने दिन हो गये है। 

ये तो हो गई मजाक की बात लेकिन आज जनता थाली से गायब हो चुके खाद्य पदार्थों की सबसे जरुरी चीज से धीरे धीरे उनक पहुँच से दूर होती जा रही है। सरकार आज प्याज को लेकर बेबस हो चुकी सरकार के पास सारी मशीनरी होते हुये भी प्याज की कीमतों पर अंकुश नहीं लगा पा रही है।

Tuesday, 22 October 2013

कांग्रेस-बसपा क्या अलग लड़कर भाजपा को वाकओवर देंगे

देश को 8 प्रधानमंत्री देने वाला उत्तर प्रदेश देश की सत्ता को रास्ता दिखता है। राजनीति में ये कहा जाता है कि केंद्र में सत्ता यूपी के रास्ते होकर जाता है जिसने उत्तर प्रदेश साध लिया उसने देश साध लिया। जटिल परिस्थितियों वाले उत्तर प्रदेश में जहा एक तरफ जातिवाद का बोलबाला है वही धर्म की राजनीति करने वालों के साथ हिंदुत्व और मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने वालों की कमी नहीं। यही वजह है देश में राजनीति करने वाली सभी पार्टियां अपने अपने तरीके से उत्तर प्रदेश की राजनीति और यहाँ के वोट बैंक को नियंत्रित करती है। 

प्रदेश की राजनीति को अगर प्रयोगशाला की संज्ञा दी जाये तो कही से गलत नहीं होगा। कांग्रेस, सपा, बसपा और भाजपा के लिए प्रयोगशाला बन चुकी उत्तर प्रदेश की धरती आज एक बार फिर राजनीतिक पार्टियों के लिये प्रयोग करने का स्थान बनने जा रही है। लोकसभा चुनावों से पहले जितनी पार्टिया है, उतने सपने प्रदेश की जनता को दिखाये जा रहे है। सभी राजनीतिक पार्टिया अपने अपने काम और जाति के सहारे जनता के बीच कार्यक्रमों को रखना चाह रही है। प्रदेश की राजनीति में दखल रखने वाली पार्टिया ये अच्छी तरह से जानती है अकेले दम पर जातिवाद और धर्म में अंधे लोगो के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए किसी अभिमन्यु की जरुरत पड़ेगी| वजह भी साफ़ है, अभिमन्यु की तरह इस चुनावी रुपी चक्रव्यूह में घुसना आसान है लेकिन उसे भेद पाने की विद्या इस प्रदेश पर राज कर रही पार्टियों के पास ही है।

लोकसभा चुनाव की आहट के साथ ही सभी पार्टिया अपना गुणा गणित और समीकरण बैठाने में लग गई है| भाजपा जहा नमो मंत्र के सहारे 2014 का चक्रव्यूह पार करना चाहती है, वही समाजवादी पार्टी को अपनी सरकार के काम और अपने वोट बैंक पर भरोसा है। बची है कांग्रेस जिसने 2009 में प्रदेश में आशा के विपरीत 22 सीटे जीतकर मजबूती के साथ केंद्र की सत्ता में वापस आई। लेकिन इन चार सालों और कुछ महीने की यूपीए- 2 की सरकार का ग्राफ जनता की नज़रों में लगातार गिरता जा रहा है वही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी अपने काम से जनता को खुश नहीं कर पाए। कांग्रेस की मुश्किल ये है कि यूपीए-2 की छवि जनता की नज़रों में पहले से ही गिरी हुई है वही तेज़ी से बढ़ती मंहगाई और घोटालों ने सरकार की छवि को और गिरा दिया है। 

काग्रेस उत्तर प्रदेश में मजबूत सहारे की खोज में है| वजह भी साफ़ है कांग्रेस के रणनीतिकारों को ये अच्छी तरह से पता है इस बार यूपी क जनता का मन मोहना उतना आसान नहीं होगा जितना 2009 में था| यही कारण है, सरकार के निर्देशन में जिस तरह सीबीआई ने सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह यादव को और बसपा सुप्रीमों मायावती को क्लीन चिट दिलवाई गई उससे साफ़ हो गया कांग्रेस अपने दोनों हाथो में लड्डू रखना चाहती है। कांग्रेस रणनीतिकारों का मानना है कि समाजवादी पार्टी के मुखिया जिस तरह तीसरे मोर्चे को बनाने की कवायद में लगे है उसे उनकी राजनीतिक महत्वकांक्षा का पता चलता है| साथ ही उनकी चाहत भी राजनीति की सबसे बड़ी कुर्सी तक पहुँचने क मंशा भी साफ़ हो जाती है। 

काग्रेस और समाजवादी पार्टी की तल्खी भी लगातार बढती जा रही है जहा सपा नेतृत्व के इशारे पर पार्टी के राज्यसभा सांसद नरेश अग्रवाल ने ये बयान देकर अनसन फैला दी कि सपा कब तक इस नकारा केंद्र सरकार को समर्थन देती रहेगी| उस पर कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी ने पलटवार करते हुये कहा जब केद्र सरकार से सपा को इतनी परेशानी है तो उन्हें समर्थन वापस ले लेना चाहिये। सपा और कांग्रेस की तल्खी के बीच कांग्रेस नेतृत्व को उत्तर प्रदेश में एकमात्र सहारा अब बहुजन समाज पार्टी दिखाई दे रही है। कांग्रेस उत्तर प्रदेश ही क्या पूरे देश में बहुजन समाज पार्टी के साथ चुनाव लड़ना चाहती है। 

कांग्रेस अगर बहुजन समाज पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन करती भी है तो सवाल ये खडा होता है न दोनों पार्टियों का समझौता किस आधार पर होगा पूरे देश की बात अगर छोड़ भी दी जाये तो बसपा कांग्रेस से उत्तर प्रदेश में 30 सीटों से ज्यादा पर समझौता करने के लिये तैयार होगी बहुजन समाज पार्टी भविष्य की राजनीति को देखते हुये और कांग्रेस का इतिहास देखते हुए नहीं तैयार होगी ऊपर डाले गए लिंक में ये बात साफ़ तौर पर संभावनाओ के आधार पर नहीं बल्कि तथ्यों के आधार पर लिखी गई है। बहुजन समाज पार्टी किसी भी हाल में अपना वोट बैंक कांग्रेस के साथ नहीं जोड़ना चाहेगी। 

वही कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती पर की गई| टिप्पणी ने भी बसपा कैडर को भड़का दिया। राहुल गांधी ने हाल में ही अपने पंजाब के संगरूर दौरे के दौरान मंच से भाषण देते हुये कहा था , मायावती ने अपने आगे किसी भी दलित नेता को पनपने नहीं दिया। आज कांग्रेस अपने लिये नए हाथी की तलाश में है| कांग्रेस नेतृत्व को अच्छी तरह से पता है कि मुजफ्फरनगर दंगो के बाद मुस्लिम वोट बैंक समाजवादी पार्टी से खफा हो गया| देश में सो-काल्ड धर्म निरपेक्षता की राजनीति करने वाली पार्टियों क नज़र मुस्लिम वोट बैंक की तरफ है। प्रदेश का मुस्लिम समुदाय सपा से नाराज़ है| सभी पार्टियों की नज़र अब इसी वोट बैंक की तरफ गड़ी हुई है। उधर बसपा सुप्रीमों मायावती को पता है अगर समय मुस्लिम वोट बैंक को साध लिया तो लोकसभा चुनाव में पार्टी क तस्वीर बदल जायेगी। वही मुजफ्फरनगर दंगो की वजह से भाजपा को बड़ा फायदा होता दिखाई दे रहा है। 

कांग्रेस, सपा, बसपा और भाजपा अभी पार्टिया लोकसभा चुनावों को लेकर अपन अपनी रणनीति बनाने में लगी हुई है| प्रदेश क जनता का झुकाव किस तरफ होगा ये देखने वाली बात होगी लेकन एक बात तो तय है आने वाले समय में राजनीतिक दलों के बीच होने वाली नूराकुश्ती देखने लायक होगी।

नमो ब्रांड है तो बिकेगा ही

नमो बिंदी, नमो साड़ी, नमो चिप्स से लेकर पता नहीं क्या-क्या नमो यानि नरेन्द्र मोदी के नाम पर बिक रहा है। मोदी इस समय 500 करोड़ के ब्रांड बन चुके है, नरेन्द्र मोदी के नाम को भुनाने के लिए गुजरात की कपड़ा बनाने वाली कंपनियों से लेकर कुटीर उद्योग में बिंदी और छोटे छोटे रोज़मर्रा के सामान बने वाली कंपनियों ने भी मोदी नाम के तेज़ी से बढ़ते ब्रांड का फायदा उठाने के लिये सोच लिया है। 

गुजरात से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक नमो ब्रांड की धूम है। आज हर नाम मोदी के नाम को भुना लेना चाहता है तभी तो दूरदराज के इलाके रांची में जहाँ नमो टी स्टाल खुल गया वहीँ, हाल में ही बीते नवरात्रों में युवाओं के बीच मोदी को पहुँचाने के लिये डांडिया के समय पहने जाने वाले विशेष परिधान पर भी भाजपा के PM इन वेटिंग नरेन्द्र मोदी की छाप दिखाई दी। 

मोदी नाम को भुनाने के लिये भाजपा ने भ बड़े पैमाने पर सोशल साइट्स का सहारा लिया जिसमें फेसबुक से लेकर ट्वीटर और गूगल ऐसी साइट्स है जहां मोदी की धूम है। मोदी के नाम को इस समय सभी भुनाने में लगे हुये है| वहीँ, सर्वे साइट्स पर भी मोदी की बढ़त देश के अन्य किसी भी राजनीतिज्ञ से कहीं ज्यादा है। 

गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार आज टेलीविजन रेटिंग में सबसे ज्यादा रेटिंग बटोरने वाले राजनेता बने हुये हैं| सभी निजी चैनल मोदी को दिखाकर उन्हें भुनाना चाहते है। नरेन्द्र मोदी आज अखबारों की सुर्खिया बने हुये है मोदी की कैम्पेनिंग और सोशल मीडिया पर उनकी बढ़त मोदी को भारतीय राजनीति में एक अलग स्थान दिलाती है। 

नमो-नमो कर रही देश की जनता के बीच मोदी का जादू है या केंद्र सरकार की नाकामियों के बीच जनता को सिर्फ मोदी से उम्मीद ही आज उन्हें एक अलग मुकाम दिला रही है ये तो चुनावों के बाद सामने आयेगा| लेकिन इतना तो तय है कि मोदी धीरे धीरे भारतीय जनमानस के साथ बाज़ार की उथल पुथल पर नज़र रखने की नज़र में चढ़े हुये है। 

मोदी का लोगो की नज़रों में आना एक अलग बात है लेकिन उनका बाज़ार में एक ब्रांड बन जाना दूसरी और अहम बात है। भारतीय राजनीति में संभवत मोदी ऐसे पहले राजनेता हैं जो ब्रांड के तौर पर स्थापित हुये है। इस मोदी नामक ब्रांड की कीमत बाज़ार ने करीब 500 करोड़ पहुँच गई है, भाजपा अब इसी ब्रांड मोदी को कैश कराने में लग गई है। 

5 सौ करोड़ के मोदी नामक इस ब्रांड की मुश्किलें भी कम नहीं है। कुछ राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनावों पर चुनाव आयोग की खास नज़र है अगर चुनाव आयोग ने मोदी ब्रांड और उनके नाम से बिक रहे उत्पादों को चुनाव प्रचार सामग्री मानकर चुनावी खर्चे में जोड़ दिया तो भाजपा बड़ी मुश्किल में फंस सकती है और इस नमो ब्रांड के चक्कर में भाजपा के चुनावी खर्चे का आंकलन भी चुनाव आयोग इस ब्रांड के साथ करेगा। 

मोदी आज देश की उम्मीद बने हुए है यही वजह है कि आज सभी राजनीतिक दल मोदी की आलोचना करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते है, मोदी की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है मोदी कही भी जनसभा के लिये जाते है, विरोधियों के बयान उनकी जनसभा से पहले ही आना शुरू हो जाते है। खैर आज देश में मोदी नमक ब्रांड खूब चल रहा है मौक़ा भी है और दस्तूर भी| जो दिखता है वही बिकता है तो बाज़ार मोदी को क्यों न भुना ले।

इंकार पर फिर से विचार करे सऊदी अरब

संयुक्त राष्ट्र में अरब समूह के देशों ने सऊदी अरब से अनुरोध किया है कि वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के निर्वाचित सदस्य के रूप में परिषद में सीट लेने से अपने । संयुक्त राष्ट्र में अरब समूह के देशों के हवाले से कहा, सऊदी अरब के नेताओं को सुरक्षा परिषद की अपनी सदस्यता बरकरार रखनी चाहिए, तथा हमारी नीतियों, खासकर सुरक्षा परिषद के मंच से जुड़े मुद्दों, के पक्ष में अपनी मजबूत भूमिका जारी रखनी चाहिए।

रियाद ने चक्रण प्रणाली के आधार पर अगले दो वर्ष के लिए गुरुवार को हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा चुनाव में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सदस्य चुने जाने के एक दिन बाद शुक्रवार को इसकी सदस्यता ग्रहण करने से इंकार कर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को चौंका दिया। इस बीच खाड़ी समन्वय परिषद (जीसीसी) ने यूएनएससी को अपने कर्तव्यों को बेहतर और व्यावहारिक तरीके से निर्वाह कर सकने के लिए सऊदी अरब द्वारा इसमें सुधार की मांग की सराहना की है।

कांशीराम मायावती को मुख्यमंत्री नहीं बनाना चाहते थे

राजनीति में कब कौन सा सुर कौन सा राजनीतिज्ञ पकड़ ले और कौन सा राग अलापने लगे ये कह नहीं सकते। देश की राजनीति और प्रदेशो में राजनीति करने वाले सभी दल अपना एक अलग वोट बैंक बनाना चाहते है । देश की राजनीति पर नज़र डाली जाये तो राष्ट्रीय स्तर से लेकर क्षेत्रीय स्तर पर अभी छोटे बड़े दलों का अपना अपना वोट बैंक है जो जातिगत और क्षेत्र के हिसाब से बने हुये है। यही वजह है अपना वोट बैंक बढाने के लिए राजनीतिज्ञ और जातिगत राजनीति करने वाले नेता समय समय पर ऐसे बयान देते है जो उनका वोट बैंक तो बढ़ाता ही है साथ ही उन्हें सुर्ख़ियों में ला देता है। 

वर्ष 84 में राजनीति की जमीन तलाश कर रहे पंजाब के रहने वाले बसपा के संस्थापक कांशीराम के भाई दलबारा सिंह ने एक बयान देकर बसपा कैडर और उसकी विरोधी पार्टियों को सकते में डाल दिया है, अब इस बयान को दलबारा सिंह का कोई राजनीतिक पैंतरा समझा जाये या लोकसभा चुनाव से पहले दरबारा सिंह के पीछे खड़ी किसी राजनीतिक पार्टी की चाल। दरबारा सिंह ने ये कह कर उत्तर प्रदेश के साथ केंद्र में राजनीति करने वाली पार्टियों और बहुजन समाज पार्टी में हलचल पैदा कर दी की कांशीराम वर्तमान बसपा अध्यक्ष मायावती को उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनाने के खिलाफ थे।

बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक और दलबारा सिंह के भाई कांशीराम ने मायावती को दूसरे दलों का सहारा लेकर सरकार न बनाने की सलाह दी थी लेकिन मायावती ने सत्ता को पास आता देखकर भाजपा के सहयोग से उत्तर प्रदेश में 3 जून 1995 को बसपा की सरकार बना ली थी जो अक्टूबर में गिर गई थी जिसका हश्र सबके सामने आया। दलबारा ने मायावती के ऊपर बहुजन समाज से धोखा करने का आरोप भी लगाया। 

खुद की राजनीतिक जमीन तलाश रहे दलबारा सिंह ने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ बैठक कर आगामी लोकसभा चुनाव में पार्टी प्रत्याशी उतारने का भी एलान किया। उन्होंने कहा पार्टी उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज को धोखा देने वाली मायावती को सबक सिखाने के लिए 50 सीटों पर चुनाव लड़ेगी साथ ही बहुजन समाज को कांशीराम के सपने और मायावती के धोखे से अवगत करायेगी। 

Sunday, 20 October 2013

Election है भाई

राजा और रजवाड़े भले ही खत्म हो गए हों, लेकिन मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का टिकट पाकर विधायक बनने की आस में बुंदेलखंड में नाम के राजा और रानी, प्रजा के साथ कतार में लगे हैं। बुंदेलखंड में रियासतें गिनती की रही हैं। आजादी के बाद रियासतें भले ही खत्म हो गई हों, मगर इस इलाके में क्षत्रिय परिवार में जन्मे बालक के नाम के साथ आज भी राजा या जू लगाने की परंपरा बरकरार है। यही कारण है कि क्षत्रिय परिवार का शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति हो जिसको राजा या जू कहकर न बुलाया जाता हो।

इस इलाके की विभिन्न रियासतों के वारिस अथवा क्षत्रिय परिवारों से नाता रखने वाले आगामी विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों की चौखट पर दस्तक देने में लगे हैं। कोई पाला बदल रहा है तो कोई अपनी निष्ठा का हवाला देकर चुनाव में टिकट मांग रहा है। इनमें से कई तो अभी विधायक हैं और कई अपने लिए नई जमीन तलाश रहे हैं। बुंदेलखंड में वैसे तो मध्य प्रदेश में छह जिले -छतरपुर, टीकमगढ़, सागर, दमोह, पन्ना और दतिया- आते हैं। इस इलाके के छतरपुर, टीकमगढ़ और पन्ना में नाम के साथ राजा, रानी या जू लिखने की परंपरा अन्य क्षेत्रों की तुलना में कहीं ज्यादा है। 

राज्य में नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस और भाजपा में टिकट वितरण की कवायद तेज हो चली है। अन्य लोगों के साथ नाम के राजा भी उम्मीदवार बनने के लिए जोड़-तोड़ में लगे हुए हैं। छतरपुर जिले की छतरपुर विधानसभा सीट से कांग्रेस का टिकट पाने वाले डीलमणी सिंह उर्फ बब्बू राजा, राजनगर क्षेत्र से वर्तमान विधायक विक्रम सिंह उर्फ नाती राजा व पूर्व विधायक शंकर प्रताप सिंह उर्फ मुन्ना राजा, महाराजपुर से भाजपा के विधायक मानवेंद्र सिंह उर्फ भंवर राजा, बिजावर से विधायक आशा रानी, भाजपा सांसद जितेंद्र सिंह बुंदेला उर्फ अन्नू राजा, टीकमगढ़ से कांग्रेस विधायक यादवेंद्र सिंह उर्फ जग्गू राजा, खरगापुर से भाजपा के पूर्व विधायक सुरेंद्र प्रताप सिंह उर्फ बेबी राजा टिकट पाने के लिए ताल ठोंक रहे हैं। इसी तरह पन्ना राजघराने की जीतेश्वरी देवी उर्फ युवरानी भाजपा से टिकट की दावेदार हैं।

एक तरफ जहां प्रजा के साथ राजा टिकटें मांग रहे हैं, वहीं एक राजा दूसरे राजा की टिकट कटवाने में भी पूरी तरह सक्रिय है। इन राजाओं की दोनों ही दलों में मजबूत पकड़ है, यही कारण है कि अधिकांश दावेदारों को मैदान में जोर आजमाइश करने का मौका मिल जाएगा। बुंदेलखंड के वरिष्ठ पत्रकार रवींद्र व्यास कहते हैं कि इस इलाके की राजनीति ब्राह्मण और क्षत्रिय के बीच घूमती है। खासकर छतरपुर, टीकमगढ़ और पन्ना जिलों में आरक्षित विधानसभा सीटों को छोड़कर शेष स्थानों से इन्हीं दो वर्गों के प्रतिनिधि जीतकर आते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि ये दोनों वर्ग धन और बाहुबल में अन्य से कहीं आगे हैं। 

राज्य में विधानसभा चुनाव को लेकर बुंदेलखंड क्षेत्र में टिकट के लिए कतार में खड़े कितने राजा और रानी टिकट पाने में सफल होते हैं, इस पर सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है।

सहकारिता मंत्री का फरमान चपरासी बनने के लिये तैयार रहो

राजनीति आपसे क्या न करवा दे, राजनीति सपने दिखाती भी है और उन्हें दूसरे दलों को तोड़ने का मौका भी देती है। राजनीति करने वाले जल्द दूसरी सरकारों द्वारा लिये गए फैसलों को बदलते नहीं है लेकिन कुछ ऐसे राजनीतिक दल भी है जो मौक़ा पड़ने पर अपने प्रतिद्वंदी या उनके आदमियों को निपटाने में तनिक भी देर नहीं करते। उत्तर प्रदेश में भी दो ऐसे दल है जो समय-समय पर एक दूसरे के सामने आते रहते है| जब जिसकी सरकार बनी वो दूसरे को नेस्तनाबूत करने में कोई कोताही नहीं बरतता। 

उत्तर प्रदेश में जानी दुश्मन बन चुके सपा-बसपा शीर्ष स्तर पर तो एक दूसरे के नेताओं को छूने से परहेज करते है लेकिन नीचे के स्तर पर अगर गड़बडिया मिल गई तो उसकी गाज उनके ऊपर गिरती है जिन्होंने किसी नेता की मदद लेकर लाभ लिया हो। प्रदेश की राजनीति में आजकल एक वरिष्ठ मंत्री का बयान एक महकमे के लोगो के लिए शाप बन गया। आजकल कई घरों के चूल्हे भकभकाने लगे है| वहीँ, सैकड़ो लोगो की आँखों से नींद गायब है। 

प्रदेश के सहकारिता मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने प्रदेश में स्थापित सहकारी बैंको के दर्जनों मैनेजरों की यह कह कर दिवाली खराब कर दी है कि बहुजन समाज पार्टी सरकार के समय सहकारी बैंको में मैनेजर के पदों पर नियुक्त लोगो की योग्यता अगर कम पाई गई तो उन्हें चपरासी बना दिया जायेगा। मंत्री के इस बयान से सहकारी बैंक के वो मैनेजर आजकल परेशान चल रहे है जिनकी नियुक्ती बसपा शासन काल में हुई थी। 

मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने ये बयान देकर हडकंप मचा दिया है, शिवपाल सिंह यादव ने कहा है कि मानक से कम योग्यता वाले मैनेजर चपरासी बनने के लिये तैयार रहे। आज हालात ये है कि नाम न छापने की शर्त पर बसपा शासन काल के समय नियुक्त हुए एक युवा मैनेजर कहते है कितनो ने अपनी जमीन जायदाद और घर के जेवरात बेचकर इस नौकरी को प्राप्त किया था, आज योग्यता का आधार किस तरह तय होगा ये किसी को मालूम नहीं है इसमें साफ़ तौर पर राजनीति ही दिख रही है।

SSP मुझे जान से मरवा देगा

"मातहत हो मातहत बनकर रहो" ये हम नहीं कह रहे है बल्कि आजकल उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग के अधिकारी अपने सब-आर्डीनेट से कह रहे है। समाजवादी पार्टी की सरकार में हालात इतने खराब हो चुके है कि कनिष्ठ अधिकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों पर उन्हें जान से मारने का आरोप लगा रहे है। पुलिस विभाग अनुशासन के लिये जाना जाता है। लेकिन आजकल उत्तर प्रदेश पुलिस के अधिकारी अपना हित साधने के लिये अपने कनिष्ठ अधिकारियों को प्रताड़ित करने से भी बाज़ नहीं आ रहे है। 

ऐसा ही एक मामला इन दिनों पुलिस महकमे में गूंज रहा है जहाँ एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी जो भारतीय पुलिस सेवा से चयनित होकर आया है उसने अपने कनिष्ठ के साथ ऐसा क्या किया कि आज उसने पुलिस महकमे के आला अधिकारी को पत्र लिखकर अपनी जान का ख़तरा बताया है। 

मामला प्रदेश के वाराणसी जिले का है जहाँ पुलिस अधीक्षक यातायात और जिलें के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के बीच अघोषित जंग चल रही है। यातायात पुलिस अधीक्षक जीएन खन्ना ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को लेकर एक शिकायती पत्र ADG को लिखा| इस पत्र में जीएन खन्ना ने अपनी जान का ख़तरा बताते हुये अपने अफसर को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। 

SP यातायात जीवन खन्ना ने ADG जीएल मीणा को लिखे पत्र में लिखा है की वाराणसी जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अजय मिश्रा पुलिस मैनुअल और नियमो को दरकिनार कर अपनी सत्ता चला रहे है। SP यातायात ने आरोप लगाया कि एसएसपी ने दबाव डालकर उनके गाडी चालक, गनर और फालोवर को जबरिया अवकाश पर भेज दिया है। वही बगैर उनके अनुमोदन के यातायात पुलिस कर्मियों का स्थानान्तरण कर दिया। 

ADG जीएल मीणा ने इस पत्र को रेंज के DIG को भेजकर इस पूरे प्रकरण की जांच करने को कहा है। DIG रेंज वाराणसी ने SP यातायात के आरोपों को निराधार बताते हुये SP यातायात को ही कटघरे में खड़ा करने का काम किया है। DIG के एसएसपी के पक्ष में खड़ा होने से भारतीय पुलिस सेवा और प्रांतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों के बीच की खाई उजागर हो गई। 

यातायात पुलिस अधीक्षक जीएन खन्ना ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अजय मिश्र पर जो आरोप लगाये है वो काफी संगीन है, मामले की शुरुवात नो एंट्री में बड़े वाहनों के प्रवेश पास जारी करने में फर्जीवाड़ा पकड़े जाने बाद दोनों अधिकारियों के बीच दूरियाँ बढ़ गई। इस आरोप और दोनों अधिकारियों में बढे तनाव की जांच भ्रष्टचार निवारण संगठन कर रहा है। SP जीएन खन्ना ये भी आरोप लगाते है कि अपने पद का दुरुपयोग करते हुये एसएसपी उनका लगातार उत्पीड़न कर रहे है। 

इस पूरे प्रकरण से एक बात सामने आ गई कि पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी अपने कनिष्ठ अधिकारियों को किस तरह से अपने अंगूठे के नीचे दबा कर रखते है, ये वाराणसी के प्रकरण से जनता और सरकार के सामने आ गया है| वैसे देखा ये गया है कि वरिष्ठ अधिकारी वो भी पुलिस महकमे के अपने मातहतों को अनुशासन का पाठ पढ़ाते तो है लेकिन खुद नियमों को कैसे तोड़ते-मरोड़ते है ये वाराणसी की घटना ने साबित किया।

एक तरफ मतदान होगा तो दूसरी तरफ होंगी सैकड़ो शादियां

छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण के होने वाले मतदान को लेकर प्रशासन के साथ-साथ आम नागरिक भी कशमकश की स्थिति में हैं। 19 नवंबर को सूबे की 73 विधानसभाओं के लिए मतदान होना है और 18 व 19 नवंबर को ही विवाह के श्रेष्ठ मुहूर्त भी हैं। ऐसे में भवनों, बसों आदि की बुकिंग को लेकर असमंजस की स्थिति है। मतदान के दिन ही प्रदेश में सैकड़ों शादियां होने वाली हैं, जिससे मतदान प्रभावित होने का अंदेशा है। इसको लेकर राजनीतिक दल भी चिंतित नजर आ रहे हैं।

प्रशासन को शासकीय कार्यालयों में प्रशिक्षण शुरू करना है और बसों को अधिगृहीत करना है, ऐसे में लोगों को विवाह भवन तथा बसों के लिए परेशान होना पड़ सकता है। विदित हो कि सूबे के जिन जिलों में चुनाव के लिए अधिसूचना 25 अक्टूबर को जारी की जाएगी, वहां नामांकन भरने की अंतिम तिथि एक नवंबर निर्धारित की गई है। दो नवंबर को नामांकन पत्रों की जांच एवं चार नवंबर तक नाम वापस लिया जाएगा तथा मतदान 19 नवंबर को कराया जाएगा। इधर, चुनाव की तारीखों तथा विवाह सीजन के एक साथ होने से सूबे के अधिकारियों को अपना पसीना बहाना पड़ सकता है। 

गौरतलब है कि दूसरे चरण के तहत प्रदेश की 73 विधानसभा क्षेत्रों में 19 तारीख को मतदान होना है, वहीं पंडितों का कहना है कि 18 तथा 19 नवंबर को इस सीजन की श्रेष्ठ विवाह मुहूर्त की तारीखें हैं। पंडित अजय शर्मा के मुताबिक, 18 तथा 19 नवंबर श्रेष्ठ तिथियों में से हैं तथा इस दिन कई घरों में विवाह की तारीखें पहले ही तय की जा चुकी हैं। प्रदेश के इन इलाकों में निर्वाचन कार्यो के लिए अधिकारियों के पास पहले से ही बसों की काफी कमी है, जिस वजह से अधिकारियों ने मतदान दलों को ट्रक से पहुंचाने की योजना बनाई है। चुनावी कार्यक्रम तथा विवाह तिथियों के साथ-साथ होने से अब लोगों को अपने घरों की विवाह तिथियों की चिंता सता रही है। जिन घरों में विवाह होने हैं वे बारात आदि के लिए बसों के न मिलने से चिंतित हैं। 

नवंबर में सूबे में सैकड़ों की संख्या में विवाह होने हैं, जिसके लिए महीनों पूर्व से ही हलवाई, बैंड, वाहन, टेंट, फोटोग्राफर, वीडियो शूटिंग आदि की बुकिंग कराई गई है। ऐन विवाह मुहूर्त के दिन मतदान तिथि को देखते हुए अधिकारियों को मतदान के प्रतिशत में कमी आने की आशंका भी सता रही है। इसके उलट जिन लोगों के घरों में विवाह हैं उनको भवन तथा बसों की चिंता सता रही है। निजी बस एसोसिएशन के अध्यक्ष ललित विश्वकर्मा ने बताया, जिस किसी व्यक्ति की बस की बुकिंग चुनाव कार्य की वजह से रद्द हो रही है उसे हम लिया गया एडवांस रकम पूरा वापस कर रहे हैं। बहुतेरे बस मालिकों ने चुनावी वर्ष होने की वजह से बुकिंग ही नहीं ली है।

वहीं, कांग्रेस के जिला पंचायत सदस्य सुनील माहेश्वरी का मानना है कि विवाह की वजह से मतदान पर असर पड़ने की संभावना है। उन्होंने मतदाताओं से अपील की है कि वे मतदान करने के बाद ही विवाह कार्य के लिए घरों से निकलें। बहरहाल, एक ही तिथि में विवाह और मतदान होने से प्रत्याशियों के साथ-साथ प्रशासन भी चिंतित नजर आ रहा है।

केंद्र सरकार के कारनामों से हिन्दुस्तान की लाईफ खो गई

भूख पर शहजादे कुछ नहीं बोलते, सोनिया गांधी कुछ नहीं बोलती, कांग्रेस का पाप छुपाने में सभी सहभागी है जो इस उत्तर प्रदेश में भी मौजूद है। उत्तर प्रदेश के कानपुर में अपनी पहली रैली को संबोधित करते हुए भाजपा के पीएम इन वेटिंग नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस के साथ अभी दलों पर हमला बोला| मोदी ने कानपुर को क्रांति का गवाह बताते हुए कहा कि कांग्रेस को सत्ता से हटाने के लिए कानपुर से आवाज उठनी चाहिये। स्वराज्य के लिये आवाज लगाइए। 

नरेन्द्र मोदी ने कहा कि कांग्रेस ने इन दस सालों में कुछ नहीं किया| अटल बिहारी वाजपेई के शासन के 6 साल को निकाल दिया जाये तो सिर्फ तबाही के सिवा आपको कुछ नहीं मिला। उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था पर प्रहार करते हुए उन्होंने कहा कि अखिलेश सरकार के राज में कानून व्यवस्था इतनी बिगड़ गई है कि एक साल में 5 हज़ार से ज्यादा लोगो की हत्या हो गई है। फिर भी उत्तर प्रदेश की सरकार वोट की राजनीति खेलती है। सरकार आतंकवादियों को जेल से छोड़ने की तैयारी कर रही है| क्या आप ऐसी सरकार का साथ देना चाहिए? आप इन्हें करारा जवाब दीजिये। 

मेरे गुजरात में यूपी का कोई जिला, कोई तहसील ऐसी नहीं होगी जहाँ का निवासी गुजरात में न रहता हो और सुख चैन की ज़िन्दगी जीता है। अपना सब कुछ छोड़कर गुजरात गया है उसे क्यों जाना पडा। जिस भूमि ने 8-8 प्रधानमंत्री दिए वहा के लोगो को रोज़ी रोटी के लिए गुजरात जाना पडता है। अपराध की स्थिति उत्तर प्रदेश में काफी दयनीय है| उत्तर प्रदेश के लोग चिंता में रहते है। संकल्प लीजिये कांग्रेस ही नहीं उसके चट्टो बत्तो को भी सबक सिखायेंगे। 

कानपुर नगर पर उन्होंने कहा कि यहाँ की सभी मीलें बंद है| ऐसा क्यों हुआ आप को सोचना है। सपा , बसपा और कांग्रेस की तिकड़ी ने इसे मिटटी में मिला दिया है। 2014 में लोकसभा का चुनाव है। दिल्ली सरकार को अपने कारनामो का हिसाब देना चाहिए| मैंने चुनाव से पहले हर एक खर्च का हिसाब दिया। कांग्रेसी जहा जाते है गुजरात का बखान और बुराई एक साथ करते है| मैंने अपना हिसाब दे दिया है। हिन्दुस्तान की जनता को गुमराह मत करिये। मै अगर मुजरिम हूँ तो प्रधानमंत्री भी मुजरिम है। कोयला की फ़ाइल नहीं दिल्ली में पूरी सरकार खो गई है। आपके कारनामों के कारण हिन्दुस्तान की लाइफ खो गई है।

बालिग महिलाओं को सहमति से संबंध बनाने का अधिकार

भारतीय पुरुष किसी महिला के साथ सहमति से सम्बन्ध तो बना लेता है , लेकिन यही सम्बन्ध उसकी खुशियों को खराब कर देती है और कुछ दिनों बाद ही, आपसी सहमति से सम्बन्ध बनाने वाली महिला जब उक्त व्यक्ति पर बलात्कार का आरोप लगाती है तो वही ख़ुशी उसके जीवन का कभी न मिटने वाला नासूर बन जाती है। लेकिन कोर्ट के एक आदेश से पुरुषों को थोड़ी राहत दे गया कोर्ट ने कहा अब 18 साल से ऊपर की महिला सहमति से सेक्स करें तो कोई अपराध नहीं, और इसके लिये अदालत से मंजूरी की जरुरत नहीं। 

कोर्ट के इस आदेश ने सहमति से सेक्स करने के बाद परिवार के दबाव आकर बलात्कार का आरोप लगाने वाली महिलाओं के इस कृत्य पर रोक लगेगी। रेणुका चौधरी ने कहा की सहमति से सेक्स और बलात्कार का आरोप लगाने वाली स्थिति में संशय है। रेणुका चौधरी ने कहा की कुछ महिलायें सहमती से सम्बन्ध बनती है उसके बाद उसे बलात्कार का रूप दे देती है ये दुखद: उन्होंने कहा की 18 से ऊपर वाली महिलायें किसी के बिना सेक्स कर सकती है और किसी व्यक्ति से सम्बन्ध बना सकती है उन्हें किसी अदालत से मंजूरी की जरुरत नहीं।