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Friday, 25 October 2013

ISI के संपर्क अब देश को बतायेंगे कांग्रेस उपाध्यक्ष

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी आजकल कांग्रेस को पांच राज्यों में सत्ता पर काबिज कराने के लिए इन सभी राज्यों के चुनावी समीकरण को दुरुस्त करने का जिम्मा अपने कन्धों पर उठा लिया है। राहुल और कांग्रेस की महत्वकांक्षा कहे या विरोधियों की बढती लोकप्रियता राहुल आजकल ऐसे ऐसे बयान दे रहे हैं जो भारत सरकार के किसी जिम्मेदार मंत्री या अधिकारी के पास ही हो सकता है। राहुल चुनावी गणित को ठीक करने के लिये बयानों पर होने वाले बवालों की परवाह किये बिना कांग्रेस और खुद के ऊपर मुसीबत मोल ले रहे है। 

राहुल गांधी ने राजस्थान के चुरू में 23 अक्टूबर को एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए ये कह कर सभी को हैरत में डाल दिया कि मेरी दादी और पापा को मारा, शायद मुझे भी एक दिन मार डालेंगे, अब राहुल गांधी को कौन मार डालेगा ये इस बात की चर्चा अगले दिन के अखबारों और सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर खूब डाली और पढ़ी गई| कहीं उनके सुरक्षा की बात हुई तो कही उनके बयान को हंसी में उड़ा दिया गया। 

राजस्थान में विधानसभा चुनाव की तिथियाँ घोषित हैं| राहुल चुनावी रैली में बोल रहे थे| राहुल ने भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधते हुए कहा बीजेपी दंगा करवाती है| नेताओं ने मुजफ्फरनगर, गुजरात और यूपी में आग लगाई| मैं बीजेपी की राजनीति के खिलाफ हूं| कांग्रेस उपाध्यक्ष ने कहा कि लोगों के अंदर गुस्सा भरते हैं नेता| गुस्सा खत्म करने में सालों का वक्त लगता है| उन्होंने कहा कि मेरा काम सिर्फ चुनाव जीतने तक सीमित नहीं, मुझे भविष्य के बारे में भी बताना होगा| 

राहुल अपने इस बयान के बाद विरोधियों के निशाने पर आ गए। चुरू से राहुल का विरोध जो शुरू हुआ वो अभी थमने का नाम ही नहीं ले रहा था की राहुल गांधी ने 23 तारीख को मध्य प्रदेश के इंदौर में मुजफ्फरनगर दंगो पर फिर मुंह खोला जिसमें उन्होंने कहा दंगो के बाद दंगो की आग में अपना घर बार छोड़ चुके 15 -20 लोगो के संपर्क में पाकितान की खुफिया इकाई ISI है। राहुल के मुंह से बयान के तौर पर ये शब्द क्या छूटे भाजपा ने उन शब्दों को पकड लिया।

भाजपा राहुल गांधी पर समाज में साम्प्रदायिक तनाव फैलाने का आरोप लगाते हुये उनकी शिकायत चुनाव आयोग में करने जा रही है। वही मुजफ्फरनगर पर बयान देने के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति गर्मा गई है। मुजफ्फरनगर दंगो में नाम आने के बाद आज़म खान की छीछालेदर हुई थी। आज़म खान ने राहुल गांधी के भाषण पर कहा वो दूसरों का लिखा हुआ भाषण पढ़ते है उन्हें भाषण देने से पहले उसे खुद पढ़ लेना चाहिये। आज़म खान के इस बयान से कांग्रेस हत्थे से उखड़ गई| कांग्रेस प्रवक्ता मीम अफज़ल ने कहा राहुल लिखा हुआ भाषण नहीं पढ़ते है बल्कि जो मन में आता है वो बोल देते है। 

आज़म खान ने कहा कि राहुल किस हैसियत ISI से जुड़े तथ्यों पर बयान दे रहे है। आज़म खान ने राहुल गांधी के बयान को बचकाना कहते हुये कहा कि राहुल गांधी को सोच-समझकर बोलना चाहिये। राहुल गांधी के बयानों से कांग्रेस की मुश्किल घटने की बजाय बढ़ती जा रही है| राहुल आजकल चुनावों को लेकर कुछ ज्यादा परेशान है। कांग्रेस का राहुल से उम्मीदों का बोझ इतना बढ़ चुका है जिसे पूरा करने के लिए राहुल गांधी बिना सोचे-समझे बयान दे रहे है।

द्रौपदी के तो पांच ही थे, हमारे 105 पति

लोकसभा चुनावों के करीब आते ही सभी पार्टियों के नेताओं के जो जो बोल फूट रहे है वो जहां कुछ को नागवार गुजर रहा है| वहीँ,कुछ बयानों पर चटकारे ले रहे है। भाजपा इन दिनों कांग्रेस पर नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में कांग्रेस पर हमले करने का कोई मौका नहीं छोड़ रही है, लेकिन पार्टी अंतर कलह से भी गुजर रही है ये भी किसी से छुपा नहीं। 

पार्टी के पूर्व अध्यक्ष ने पार्टी की अलग-अलग विचारधाराओं और नेतृत्व को लेकर तल्ख़ टिप्पणी की है। पूर्व भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कहा कि पार्टी के 105 पति है| शुक्र है द्रौपदी के 5 ही पति थे। अंग्रेजी अखबार के हवाले से नितिन गडकरी का छपा बयान में कहा गया शुक्र है द्रौपदी के पांच पति थे। 

नितिन गडकरी ने साफ़ कहा कि देश में राजनीति करने वाली कुछ पार्टिया एक परिवार तक सीमित रह गई हैं लेकिन भाजपा में ऐसा नहीं है, उन्होंने ये भी कहा जब वो अध्यक्ष थे तो उनके उनके समय 8-8 मुख्यमंत्री प्रदेशो में राज कर रहे थे, सबको संभालना मुश्किल काम था । 

गडकरी ने कहा कि कुछ पार्टिया माँ बेटे के आसपास ही घूम रही हैं लेकिन भाजपा में ऐसा नहीं है | उन्होंने कहा कि वह कभी प्रोफेशनल नेता नहीं थे| उनके शब्दों में, 'मेरे कट-आउट कहीं नहीं लगे, न ही मैंने दूसरे नेताओं के कट-आउट लगवाए| नितिन गडकरी एक सम्मेलन में बोल रहे थे जिसका विषय था 'मौजूदा राष्ट्रीय परिदृश्य और विकल्प'|

I AM MALALA

नोबल शांति पुरस्कार की दौड़ में शामिल हुई पाकिस्तान में लड़कियों की शिक्षा के लिए संघर्ष करने वाली मलाला युसुफजई आजकल पूरे विश्व में चर्चा का विषय बनी हुई है। कभी संयुक्त राष्ट्र संघ में भाषण देकर तो कभी अमेरिकन राष्ट्रपति बराक ओबामा से मुलाकात को लेकर, पर इन दिनों मलाला की सुर्ख़ियों में रहने की वजह बनी हैं उनकी अपनी किताब I AM MALALA | मलाल इस किताब को लेकर सुर्खियाँ बटोर रही है। 

अमेरिका की वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी ने मलाला की किताब I AM MALALA को विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल करने का ऐलान किया है। पाकिस्तान की यह किशोरी दुनिया भर के लोगों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन गई है, जिसे देखते हुए यूनिवर्सिटी उसके संस्मरण को लेने का फैसला किया है।

एक साल पहले स्कूल जाते हुए तालिबान के हमले का शिकार हुई मलाला युसुफजई ने सिर में गोली लगने के बावजूद मौत को पीछे छोड़ दिया मलाला ने हिम्मत नहीं हारी और इसके बाद भी अपने देश और आतंक प्रभावित इलाकों की लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के प्रयासों में लगी रही। इस किताब से मलाला के इन्हीं प्रयासों के बारे में जाना जा सकता है।

यूनिवर्सिटी के ग्लोबल वीमेन इंस्टिट्यूट (GWI) की निदेशक इल्सबर्ग ने कहा कि सिलेबस में यह लेशन ना सिर्फ छात्रों को शिक्षित करेगी, बल्कि मलाला जिन मुद्दों के लिए आवाज उठा रही है, उसे भी बढ़ावा देगी।हाल में ही मलाला ने कहा था कि मैं पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनना चाहती हूं और तब हर लड़की को स्कूल भेजूंगी। मेरी दुनिया भले ही बदल गई है, लेकिन मेरे इरादे अब भी नहीं बदले हैं। उन्होंने ये भी कहा मुझे कई बार भूतों से डर लगता है, लेकिन तालिबान से नहीं। मलाला ने कहा कि कट्टरपंथी नहीं चाहते कि लड़कियां स्कूल जाएं, क्योंकि वे डरते हैं।

एंग्री यंग युवराज अपना आक्रोश कांग्रेस को दुरुस्त करने में लगाये

 आक्रोश से भरा युवराज, देश को अपनी बातों से बदलने वाले युवराज, अपनी माँ के दुःख को जनता के सामने रखने वाले देश के भावी प्रधानमंत्री आजकल फिर गुस्से में है, विरोधियों पर आंकड़ो के हिसाब से हमला करने वाले कांग्रेस उपाध्यक्ष और भारत के युवा शक्ति को अपने नेतृत्व से राह दिखाने की मंशा रखने वाले कांग्रेसी नेता राहुल गांधी एक जगह आकर फेल साबित हो रहे है वो है उनका खुद का संसदीय क्षेत्र जहा विकास की बयार पहुंची ही नहीं| राहुल आजकल फिर चुनावी अभियान पर कांग्रेस का झंडा उठाये यूपीए को केंद्र में तीसरी बार सत्ता पर बैठाने के लिये उड़नखटोले से देशभ्रमण पर निकल चुके है लेकिन अमेठी की समस्याओं से अनजान।

2009 लोकसभा चुनावों में अपनी खास शैली और केंद्र की योजना नरेगा का बखान करके सत्ता में वापस लाने वाले राहुल गांधी आज देश को बदलने की बात कहते है। देश उनकी कांग्रेसनीत सरकार में बदल भी रहा है लेकिन उस तरह नहीं जिस तरह उसे बदलना चाहिये| अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ती जा रही है जिस तरह से अमीर और अमीर और गरीब और रसातल में जा रहा है वो सोच कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की सोच से मेल नहीं खाती है। कांग्रेस ने कुछ चुनाव पहले एक नारा दिया था "गरीबी हटाओ खुशहाली लाओ" "कांग्रेस का हाथ गरीब के साथ" आज कांग्रेस अपने उस नारे के इतर गरीब हटाओ अभियान में ही लगी हुई है। कांग्रेस नेतृत्व और यूपीए- 2 ने आज घोटालों के साथ मंहगाई को इतना बढ़ा दिया है कि आम आदमी को दो जून रोटी के लिये भी सोचना पड़ रहा है। 

कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने एक विवादास्पद बयान दिया "आदमी के दिमाग में गरीबी होती है, व्यक्ति गरीब नहीं होता।" कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की सोच और उनके बयान की विपक्ष ने धज्जियां उड़ा दी। राहुल गांधी को गरीब और गरीबी की सही परिभाषा को परिभाषित करना शायद सीखना होगा। राहुल देश को शीर्ष पर देखना चाहते है, देश को भी उनसे काफी अपेक्षाये है। लेकिन राहुल की सोच भारत जैसे राष्ट्र के लिये मेल नहीं खाती है। राहुल गांधी आक्रोश में आते है तो किसी दल का मैनिफेस्टो फाड़ देते है, वही दागी राजनेताओं वाले कानून को बदलने के लिये उन्होंने अध्यादेश को बकवास करार दे दिया, राहुल का ये आक्रोश जनता को अच्छा लगा लेकिन सरकार और खुद प्रधानमंत्री को नागावार गुजरा। 

राहुल कभी विपक्ष को निशाने पर लेते है तो कभी खुद सरकार को राहुल देश बदलने की बात करते है उनके संसदीय क्षेत्र अमेठी का हाल कैसा है शायद वो नहीं जानते| सुल्तानपुर का अमेठी लोकसभा क्षेत्र देश के VVIP संसदीय क्षेत्रों में शुमार होता है। 1980 से 2009 तक इस सीट पर कांग्रेस का कब्जा रहा है। सर्फ पुराने कांग्रेसी और कुछ दिनों लिए भाजपा में शामिल अमेठी के राजा संजय सिंह 98-99 में कांग्रेस से ये सीट 1साल के लिये छीन पाए थे नहीं तो सातवीं लोकसभा से संजय गांधी के 1980 में चुनाव जीतने के बाद जो सिलसिला कांग्रेस ने किया वो भाई राजीव गांधी, भाभी सोनिया गांधी से होता हुआ राहुल गांधी तक पहुंचा। 1980 में सातवीं लोकसभा के लिए चुने गए संजय गांधी की हवाई दुर्घटना में हुई मौत के बाद हुये उपचुनाव में उनके बड़े भाई और देश के पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत राजीव गांधी ने जीत का परचम लहराया और अपने भाई की सीट को अपने परिवार में बरक़रार रखा। 

राजीव गांधी ने अमेठी लोकसभा सीट से तीन बार प्रतिनिधित्व किया था लेकिन 21 मई 1991 को तमिलनाडु में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान श्रीपेरम्बदुर में लिट्टे ने एक आत्मघाती हमलें में उन्हें मार दिया था, राजीव गांधी के निधन से शोक में डूबे परिवार ने राहुल की खड़ाऊ कांग्रेस उनके परिवार के करीबी और राजीव गांधी के दोस्त कैप्टन सतीश शर्मा को सौंप दिया था। सतीश शर्मा ने दसवीं लोकसभा में 91 से 96 तक, ग्यारवीं लोकसभा में 96 से 98 तक इस सीट का प्रतिनिधित्व किया। संजय, राजीव की परम्परागत सीट को 1998 में पूर्व कांग्रेसी और अमेठी के राजा संजय सिंह ने भाजपा के टिकट पर लड़कर कांग्रेस से छीन लिया। कांग्रेस को अमेठी सीट हार जाने का मलाल था। 

1999 में हुये लोकसभा के उपचुनाव में राजीव की विरासत को बचाने के लिए खुद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी चुनावी मैदान में उतरी और उन्होंने भाजपा के संजय सिंह को उनकी कांग्रेस से गद्दारी का सबक सिखाते हुए करीब 3 लाख से ज्यादा वोटो से हराया। सोनिया गांधी ने अपने पति की सीट को जीतकर अपनी विरासत अपने बेटे राहुल गांधी को सौंपी जो 2004 में तेरहवीं लोकसभा के लिये अमेठी से चुने गये, राहुल गांधी ने चौदहवी लोकसभा का चुनाव भी 2009 में इसी सीट से जीता| राहुल अमेठी के सांसद है लेकिन आंकड़ो और अमेठी के विकास पर नज़र डाली जाए तो राहुल गांधी की बाते और विरोधियों पर किये जा रहे हमले उन्हें भोथरा साबित करते है। राहुल गांधी पूरे देश को बदलने की बात करते है लेकिन उनका संसदीय क्षेत्र आज किस हाल में है वो आंकड़े खुद बयान कर रहे है। 

राहुल गांधी कांग्रेस के नीतिनिर्धारकों में शामिल है और केंद्र में कांग्रेसनीत यूपीए की सरकार चल रही है, केंद्र की सरकार पूरे देश में विकास , साक्षरता , स्वास्थ्य, यातायात, खाद्य सुरक्षा जैसे कार्यक्रमों को तय करती है देश के अन्य हिस्से जहा सरकार के आंकड़ो में आफी आगे है| वहीँ, राहुल गांधी की अमेठी का हाल यहाँ दिये जा रहे आंकड़े खुद बयान कर रहे है। जहाँ राष्ट्रीय साक्षरता दर देश में 65% है| राहुल के अमेठी में ये दर मात्र 39.5% है। अमेठी में 50% जनता गरीबी से नीचे रहती है। अमेठी में मात्र 15 % जनता को बिजली की सुविधा मिलती है। अमेठी में 15% बच्चे अकाल मौत मर जाते है। सरकार जहाँ टीकाकरण कार्यक्रम के लिये अरबों रुपये खर्च करती है वहीँ,अमेठी में टकाकरण की स्थिति काफी दयनीय है यहाँ टीकाकरण 16% से कम हुआ है। 

राहुल देश के विकास के लिये अपनी जनसभाओ के हर मंच से खूब चिल्लाते है। लेकिन उनके यहाँ MPLAD FUND में आया 3.06 करोड़ रुपये में से केवल 18 लाख रुपये ही खर्च हो पाये| अमेठी में विकास की बयार आज तक नहीं चली बीते दस वर्षो में कोई नया उद्योग यहाँ नहीं लगा। राहुल गांधी के अमेठी और राजीव गांधी के कर्मक्षेत्र के तौर पर प्रसिद्द अमेठी आज अपने प्रतिनिधि से काफी उम्मीद बांधे हुये हैं लेकिन राहुल देश की विकास की बात कहते हुये अपने क्षेत्र को बैठे है। राहुल देश की राजनीति का भविष्य है, राहुल की सोच युवाओं वाली है लेकिन जिस सोच से उन्हें आगे बढ़ना चाहिए वो दिखाई नहीं देती| 

राहुल आक्रोशित हो जाते है और जब वो आक्रोश में रहते है तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का रास्ता काटने में भी उन्हें कोई गुरेज नहीं होती। लेकिन राजनीति को करीब से जानने वालों का मानना है राहुल का यही आक्रोश और सिस्टम पर गुस्सा उन्हें विपक्षियों के निशाने पर लाता है। आज राहुल को पहले अपना घर दुरुस्त करना चाहिये उसके बाद देश के बारे में सोचना चाहिये| आक्रोश अच्छी बात है लेकिन जब सरकार आपके इशारों पर चलती है तो राहुल किसको आक्रोश दिखाते है उन्हें मशीनरी को खुद दुरुस्त करना चाहिए|

अब दो प्याजा नहीं Rare शतक प्याजा खाइये

दाल रोटी के साथ गरीब की थाली में स्वाद बढाने वाला प्याज अब विशिष्ट हो चला है। गरीब के लिये प्याज का मतलब अब मटन चिकन और पनीर के बराबर हो गया है। प्याज अब शादी ब्याह में दिख जाये तो लोग अपनी कस्मत पर रक्श कर सकते है। पहले प्याज काटने पर आंसू निकलते थे अब प्याज का दाम और उसकी बढ़त सुनकर आंसू तो नहीं निकलते दिल की धड़कने जरुर बढ़ जाती है। लोगो की सब्जी की टोकरियों से प्याज गायब होता जा रहा हैं| वहीँ, अब प्याज शब्द सुनते ही केंद्र में बैठी मनमोहन सरकार को दो चार अतिविशिष्ट शब्दों से भी नवाजने में लोग गुरेज नहीं कर रहे है। 

मई 1998 के बाद भारत की जनता के लिए प्याज VVIP हुई थी,तब लोगो के बीच एक गाना काफी लोकप्रिय हुआ था, अटल बिहारी वाजपेई की दुसरे टर्म की सरकार चल रही थी, गाना अटल जी को तंज करते हुये बना था गाने के बोल थे "का हो अटल चाचा पियजिया अनार हो गईल" इस गाने में अटल जी के ऊपर फिकरा कसते हुए गायक ने प्याज क तुलना उस अनार से की थी जो सिर्फ अमीरों के डाइनिंग टेबल की शोभा बढाता था और उन्ही की पहुँच में था ऐसा ही हाल प्याज के साथ हुआ था। उस साल प्याज 80 रुपये किलों बिका जिसकी वजह थी अटल बिहारी वाजपेई सरकार द्वारा पोखरण के रेगिस्तान में 5 परमाणु परिक्षण करना जिसमें टन के हिसाब से प्याज का इस्तेमाल होना बताया गया। 

आज प्याज की कीमत 100 रुपये के पार जाने की तैयारी में है जो इन त्योहारों के मौसम में पार भी कर जायेगी। अटल बिहारी वाजपेई की सरकार में प्याज के दाम बढ़ने की जो वजह सामने आई वो देश हित में थी लेकिन मनमोहन सिंह सरकार के समय बीते 6 महीनो से आम आदमी को तरसाने वाली प्याज के दाम क्यों बढ़ रहे है इसका कोई ठोस जवाब सरकार का कोई नुमाईंदा नहीं दे रहा है। अब सरकार की तरफ से जो बयान आया वो बेहद चौकाने वाला है, केंद्र सरकार ने माना है कि जमाखोरों की वजह से प्याज के दाम बढ़ रहे हैं। वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने कहा कि देश में प्याज का काफी भंडार है। जमाखोरी के कारण प्याज की कृत्रिम रूप से कमी हो गई है। राज्य सरकारें ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करें।

पटना में प्याज की कीमतें सौ रुपए प्रति किलोग्राम के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बीच केंद्र सरकार ने इसकी जमाखोरी करने वालों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करने का राज्य सरकारों से आग्रह करते हुए कहा कि कीमतों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से जरूरत पड़ने पर इसका आयात किया जा सकता है। राजधानी दिल्ली सहित देश के अधिकांश हिस्से में प्याज की कीमत औसतन 90 रुपए प्रति किलोग्राम पर पहुंच चुकी है। पिछले चार महीने में प्याज की कीमतें चार गुना बढ़ चुकी है। उन्होंने कहा कि मुद्रास्फीति बहुत चिंता का विषय है। लेकिन इसमें खाद्य पदार्थों और सब्जियों की वजह से बढ़ोतरी होती है। हालांकि उन्होंने इस बढ़ोतरी को अस्थाई बताते हुए कहा कि यह सीजनल मामला है और यह नीचे आ जाएगा।

प्याज आज आम आदमी की पहुँच से दूर हो गया है, आज प्याज से सस्ता सेब बिक रहा है, लेकिन सभी खाद्य पदार्थो का स्वाद बढाने वाला प्याज आज लोगो की थालियों से रूठ चुका है सरकार का मानना है कि प्याज के दाम अभी दो महीने और नीचे नहीं आयेंगे| अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर देश में त्योहारों के मौसम के तौर पर जाना जाता है। बड़े से लेकर छोटा व्यवसायी इस मौके का बखूबी लाभ उठाना चाहता है| जो वो उठा भी रहा है। सरकार बेबस जनता लाचार और प्याज के काला बाजारी अपनी प्याज से होने वाले मुनाफे को लेकर मस्त। आज हालात ऐसे हैं कि लोग एक दूसरे से मज़ाक में कहने लगे है, भैया प्याज खाये कितने दिन हो गये है। 

ये तो हो गई मजाक की बात लेकिन आज जनता थाली से गायब हो चुके खाद्य पदार्थों की सबसे जरुरी चीज से धीरे धीरे उनक पहुँच से दूर होती जा रही है। सरकार आज प्याज को लेकर बेबस हो चुकी सरकार के पास सारी मशीनरी होते हुये भी प्याज की कीमतों पर अंकुश नहीं लगा पा रही है।

Tuesday, 22 October 2013

कांग्रेस-बसपा क्या अलग लड़कर भाजपा को वाकओवर देंगे

देश को 8 प्रधानमंत्री देने वाला उत्तर प्रदेश देश की सत्ता को रास्ता दिखता है। राजनीति में ये कहा जाता है कि केंद्र में सत्ता यूपी के रास्ते होकर जाता है जिसने उत्तर प्रदेश साध लिया उसने देश साध लिया। जटिल परिस्थितियों वाले उत्तर प्रदेश में जहा एक तरफ जातिवाद का बोलबाला है वही धर्म की राजनीति करने वालों के साथ हिंदुत्व और मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने वालों की कमी नहीं। यही वजह है देश में राजनीति करने वाली सभी पार्टियां अपने अपने तरीके से उत्तर प्रदेश की राजनीति और यहाँ के वोट बैंक को नियंत्रित करती है। 

प्रदेश की राजनीति को अगर प्रयोगशाला की संज्ञा दी जाये तो कही से गलत नहीं होगा। कांग्रेस, सपा, बसपा और भाजपा के लिए प्रयोगशाला बन चुकी उत्तर प्रदेश की धरती आज एक बार फिर राजनीतिक पार्टियों के लिये प्रयोग करने का स्थान बनने जा रही है। लोकसभा चुनावों से पहले जितनी पार्टिया है, उतने सपने प्रदेश की जनता को दिखाये जा रहे है। सभी राजनीतिक पार्टिया अपने अपने काम और जाति के सहारे जनता के बीच कार्यक्रमों को रखना चाह रही है। प्रदेश की राजनीति में दखल रखने वाली पार्टिया ये अच्छी तरह से जानती है अकेले दम पर जातिवाद और धर्म में अंधे लोगो के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए किसी अभिमन्यु की जरुरत पड़ेगी| वजह भी साफ़ है, अभिमन्यु की तरह इस चुनावी रुपी चक्रव्यूह में घुसना आसान है लेकिन उसे भेद पाने की विद्या इस प्रदेश पर राज कर रही पार्टियों के पास ही है।

लोकसभा चुनाव की आहट के साथ ही सभी पार्टिया अपना गुणा गणित और समीकरण बैठाने में लग गई है| भाजपा जहा नमो मंत्र के सहारे 2014 का चक्रव्यूह पार करना चाहती है, वही समाजवादी पार्टी को अपनी सरकार के काम और अपने वोट बैंक पर भरोसा है। बची है कांग्रेस जिसने 2009 में प्रदेश में आशा के विपरीत 22 सीटे जीतकर मजबूती के साथ केंद्र की सत्ता में वापस आई। लेकिन इन चार सालों और कुछ महीने की यूपीए- 2 की सरकार का ग्राफ जनता की नज़रों में लगातार गिरता जा रहा है वही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी अपने काम से जनता को खुश नहीं कर पाए। कांग्रेस की मुश्किल ये है कि यूपीए-2 की छवि जनता की नज़रों में पहले से ही गिरी हुई है वही तेज़ी से बढ़ती मंहगाई और घोटालों ने सरकार की छवि को और गिरा दिया है। 

काग्रेस उत्तर प्रदेश में मजबूत सहारे की खोज में है| वजह भी साफ़ है कांग्रेस के रणनीतिकारों को ये अच्छी तरह से पता है इस बार यूपी क जनता का मन मोहना उतना आसान नहीं होगा जितना 2009 में था| यही कारण है, सरकार के निर्देशन में जिस तरह सीबीआई ने सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह यादव को और बसपा सुप्रीमों मायावती को क्लीन चिट दिलवाई गई उससे साफ़ हो गया कांग्रेस अपने दोनों हाथो में लड्डू रखना चाहती है। कांग्रेस रणनीतिकारों का मानना है कि समाजवादी पार्टी के मुखिया जिस तरह तीसरे मोर्चे को बनाने की कवायद में लगे है उसे उनकी राजनीतिक महत्वकांक्षा का पता चलता है| साथ ही उनकी चाहत भी राजनीति की सबसे बड़ी कुर्सी तक पहुँचने क मंशा भी साफ़ हो जाती है। 

काग्रेस और समाजवादी पार्टी की तल्खी भी लगातार बढती जा रही है जहा सपा नेतृत्व के इशारे पर पार्टी के राज्यसभा सांसद नरेश अग्रवाल ने ये बयान देकर अनसन फैला दी कि सपा कब तक इस नकारा केंद्र सरकार को समर्थन देती रहेगी| उस पर कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी ने पलटवार करते हुये कहा जब केद्र सरकार से सपा को इतनी परेशानी है तो उन्हें समर्थन वापस ले लेना चाहिये। सपा और कांग्रेस की तल्खी के बीच कांग्रेस नेतृत्व को उत्तर प्रदेश में एकमात्र सहारा अब बहुजन समाज पार्टी दिखाई दे रही है। कांग्रेस उत्तर प्रदेश ही क्या पूरे देश में बहुजन समाज पार्टी के साथ चुनाव लड़ना चाहती है। 

कांग्रेस अगर बहुजन समाज पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन करती भी है तो सवाल ये खडा होता है न दोनों पार्टियों का समझौता किस आधार पर होगा पूरे देश की बात अगर छोड़ भी दी जाये तो बसपा कांग्रेस से उत्तर प्रदेश में 30 सीटों से ज्यादा पर समझौता करने के लिये तैयार होगी बहुजन समाज पार्टी भविष्य की राजनीति को देखते हुये और कांग्रेस का इतिहास देखते हुए नहीं तैयार होगी ऊपर डाले गए लिंक में ये बात साफ़ तौर पर संभावनाओ के आधार पर नहीं बल्कि तथ्यों के आधार पर लिखी गई है। बहुजन समाज पार्टी किसी भी हाल में अपना वोट बैंक कांग्रेस के साथ नहीं जोड़ना चाहेगी। 

वही कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती पर की गई| टिप्पणी ने भी बसपा कैडर को भड़का दिया। राहुल गांधी ने हाल में ही अपने पंजाब के संगरूर दौरे के दौरान मंच से भाषण देते हुये कहा था , मायावती ने अपने आगे किसी भी दलित नेता को पनपने नहीं दिया। आज कांग्रेस अपने लिये नए हाथी की तलाश में है| कांग्रेस नेतृत्व को अच्छी तरह से पता है कि मुजफ्फरनगर दंगो के बाद मुस्लिम वोट बैंक समाजवादी पार्टी से खफा हो गया| देश में सो-काल्ड धर्म निरपेक्षता की राजनीति करने वाली पार्टियों क नज़र मुस्लिम वोट बैंक की तरफ है। प्रदेश का मुस्लिम समुदाय सपा से नाराज़ है| सभी पार्टियों की नज़र अब इसी वोट बैंक की तरफ गड़ी हुई है। उधर बसपा सुप्रीमों मायावती को पता है अगर समय मुस्लिम वोट बैंक को साध लिया तो लोकसभा चुनाव में पार्टी क तस्वीर बदल जायेगी। वही मुजफ्फरनगर दंगो की वजह से भाजपा को बड़ा फायदा होता दिखाई दे रहा है। 

कांग्रेस, सपा, बसपा और भाजपा अभी पार्टिया लोकसभा चुनावों को लेकर अपन अपनी रणनीति बनाने में लगी हुई है| प्रदेश क जनता का झुकाव किस तरफ होगा ये देखने वाली बात होगी लेकन एक बात तो तय है आने वाले समय में राजनीतिक दलों के बीच होने वाली नूराकुश्ती देखने लायक होगी।

नमो ब्रांड है तो बिकेगा ही

नमो बिंदी, नमो साड़ी, नमो चिप्स से लेकर पता नहीं क्या-क्या नमो यानि नरेन्द्र मोदी के नाम पर बिक रहा है। मोदी इस समय 500 करोड़ के ब्रांड बन चुके है, नरेन्द्र मोदी के नाम को भुनाने के लिए गुजरात की कपड़ा बनाने वाली कंपनियों से लेकर कुटीर उद्योग में बिंदी और छोटे छोटे रोज़मर्रा के सामान बने वाली कंपनियों ने भी मोदी नाम के तेज़ी से बढ़ते ब्रांड का फायदा उठाने के लिये सोच लिया है। 

गुजरात से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक नमो ब्रांड की धूम है। आज हर नाम मोदी के नाम को भुना लेना चाहता है तभी तो दूरदराज के इलाके रांची में जहाँ नमो टी स्टाल खुल गया वहीँ, हाल में ही बीते नवरात्रों में युवाओं के बीच मोदी को पहुँचाने के लिये डांडिया के समय पहने जाने वाले विशेष परिधान पर भी भाजपा के PM इन वेटिंग नरेन्द्र मोदी की छाप दिखाई दी। 

मोदी नाम को भुनाने के लिये भाजपा ने भ बड़े पैमाने पर सोशल साइट्स का सहारा लिया जिसमें फेसबुक से लेकर ट्वीटर और गूगल ऐसी साइट्स है जहां मोदी की धूम है। मोदी के नाम को इस समय सभी भुनाने में लगे हुये है| वहीँ, सर्वे साइट्स पर भी मोदी की बढ़त देश के अन्य किसी भी राजनीतिज्ञ से कहीं ज्यादा है। 

गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार आज टेलीविजन रेटिंग में सबसे ज्यादा रेटिंग बटोरने वाले राजनेता बने हुये हैं| सभी निजी चैनल मोदी को दिखाकर उन्हें भुनाना चाहते है। नरेन्द्र मोदी आज अखबारों की सुर्खिया बने हुये है मोदी की कैम्पेनिंग और सोशल मीडिया पर उनकी बढ़त मोदी को भारतीय राजनीति में एक अलग स्थान दिलाती है। 

नमो-नमो कर रही देश की जनता के बीच मोदी का जादू है या केंद्र सरकार की नाकामियों के बीच जनता को सिर्फ मोदी से उम्मीद ही आज उन्हें एक अलग मुकाम दिला रही है ये तो चुनावों के बाद सामने आयेगा| लेकिन इतना तो तय है कि मोदी धीरे धीरे भारतीय जनमानस के साथ बाज़ार की उथल पुथल पर नज़र रखने की नज़र में चढ़े हुये है। 

मोदी का लोगो की नज़रों में आना एक अलग बात है लेकिन उनका बाज़ार में एक ब्रांड बन जाना दूसरी और अहम बात है। भारतीय राजनीति में संभवत मोदी ऐसे पहले राजनेता हैं जो ब्रांड के तौर पर स्थापित हुये है। इस मोदी नामक ब्रांड की कीमत बाज़ार ने करीब 500 करोड़ पहुँच गई है, भाजपा अब इसी ब्रांड मोदी को कैश कराने में लग गई है। 

5 सौ करोड़ के मोदी नामक इस ब्रांड की मुश्किलें भी कम नहीं है। कुछ राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनावों पर चुनाव आयोग की खास नज़र है अगर चुनाव आयोग ने मोदी ब्रांड और उनके नाम से बिक रहे उत्पादों को चुनाव प्रचार सामग्री मानकर चुनावी खर्चे में जोड़ दिया तो भाजपा बड़ी मुश्किल में फंस सकती है और इस नमो ब्रांड के चक्कर में भाजपा के चुनावी खर्चे का आंकलन भी चुनाव आयोग इस ब्रांड के साथ करेगा। 

मोदी आज देश की उम्मीद बने हुए है यही वजह है कि आज सभी राजनीतिक दल मोदी की आलोचना करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते है, मोदी की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है मोदी कही भी जनसभा के लिये जाते है, विरोधियों के बयान उनकी जनसभा से पहले ही आना शुरू हो जाते है। खैर आज देश में मोदी नमक ब्रांड खूब चल रहा है मौक़ा भी है और दस्तूर भी| जो दिखता है वही बिकता है तो बाज़ार मोदी को क्यों न भुना ले।

इंकार पर फिर से विचार करे सऊदी अरब

संयुक्त राष्ट्र में अरब समूह के देशों ने सऊदी अरब से अनुरोध किया है कि वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के निर्वाचित सदस्य के रूप में परिषद में सीट लेने से अपने । संयुक्त राष्ट्र में अरब समूह के देशों के हवाले से कहा, सऊदी अरब के नेताओं को सुरक्षा परिषद की अपनी सदस्यता बरकरार रखनी चाहिए, तथा हमारी नीतियों, खासकर सुरक्षा परिषद के मंच से जुड़े मुद्दों, के पक्ष में अपनी मजबूत भूमिका जारी रखनी चाहिए।

रियाद ने चक्रण प्रणाली के आधार पर अगले दो वर्ष के लिए गुरुवार को हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा चुनाव में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सदस्य चुने जाने के एक दिन बाद शुक्रवार को इसकी सदस्यता ग्रहण करने से इंकार कर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को चौंका दिया। इस बीच खाड़ी समन्वय परिषद (जीसीसी) ने यूएनएससी को अपने कर्तव्यों को बेहतर और व्यावहारिक तरीके से निर्वाह कर सकने के लिए सऊदी अरब द्वारा इसमें सुधार की मांग की सराहना की है।

कांशीराम मायावती को मुख्यमंत्री नहीं बनाना चाहते थे

राजनीति में कब कौन सा सुर कौन सा राजनीतिज्ञ पकड़ ले और कौन सा राग अलापने लगे ये कह नहीं सकते। देश की राजनीति और प्रदेशो में राजनीति करने वाले सभी दल अपना एक अलग वोट बैंक बनाना चाहते है । देश की राजनीति पर नज़र डाली जाये तो राष्ट्रीय स्तर से लेकर क्षेत्रीय स्तर पर अभी छोटे बड़े दलों का अपना अपना वोट बैंक है जो जातिगत और क्षेत्र के हिसाब से बने हुये है। यही वजह है अपना वोट बैंक बढाने के लिए राजनीतिज्ञ और जातिगत राजनीति करने वाले नेता समय समय पर ऐसे बयान देते है जो उनका वोट बैंक तो बढ़ाता ही है साथ ही उन्हें सुर्ख़ियों में ला देता है। 

वर्ष 84 में राजनीति की जमीन तलाश कर रहे पंजाब के रहने वाले बसपा के संस्थापक कांशीराम के भाई दलबारा सिंह ने एक बयान देकर बसपा कैडर और उसकी विरोधी पार्टियों को सकते में डाल दिया है, अब इस बयान को दलबारा सिंह का कोई राजनीतिक पैंतरा समझा जाये या लोकसभा चुनाव से पहले दरबारा सिंह के पीछे खड़ी किसी राजनीतिक पार्टी की चाल। दरबारा सिंह ने ये कह कर उत्तर प्रदेश के साथ केंद्र में राजनीति करने वाली पार्टियों और बहुजन समाज पार्टी में हलचल पैदा कर दी की कांशीराम वर्तमान बसपा अध्यक्ष मायावती को उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनाने के खिलाफ थे।

बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक और दलबारा सिंह के भाई कांशीराम ने मायावती को दूसरे दलों का सहारा लेकर सरकार न बनाने की सलाह दी थी लेकिन मायावती ने सत्ता को पास आता देखकर भाजपा के सहयोग से उत्तर प्रदेश में 3 जून 1995 को बसपा की सरकार बना ली थी जो अक्टूबर में गिर गई थी जिसका हश्र सबके सामने आया। दलबारा ने मायावती के ऊपर बहुजन समाज से धोखा करने का आरोप भी लगाया। 

खुद की राजनीतिक जमीन तलाश रहे दलबारा सिंह ने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ बैठक कर आगामी लोकसभा चुनाव में पार्टी प्रत्याशी उतारने का भी एलान किया। उन्होंने कहा पार्टी उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज को धोखा देने वाली मायावती को सबक सिखाने के लिए 50 सीटों पर चुनाव लड़ेगी साथ ही बहुजन समाज को कांशीराम के सपने और मायावती के धोखे से अवगत करायेगी। 

Sunday, 20 October 2013

Election है भाई

राजा और रजवाड़े भले ही खत्म हो गए हों, लेकिन मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का टिकट पाकर विधायक बनने की आस में बुंदेलखंड में नाम के राजा और रानी, प्रजा के साथ कतार में लगे हैं। बुंदेलखंड में रियासतें गिनती की रही हैं। आजादी के बाद रियासतें भले ही खत्म हो गई हों, मगर इस इलाके में क्षत्रिय परिवार में जन्मे बालक के नाम के साथ आज भी राजा या जू लगाने की परंपरा बरकरार है। यही कारण है कि क्षत्रिय परिवार का शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति हो जिसको राजा या जू कहकर न बुलाया जाता हो।

इस इलाके की विभिन्न रियासतों के वारिस अथवा क्षत्रिय परिवारों से नाता रखने वाले आगामी विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों की चौखट पर दस्तक देने में लगे हैं। कोई पाला बदल रहा है तो कोई अपनी निष्ठा का हवाला देकर चुनाव में टिकट मांग रहा है। इनमें से कई तो अभी विधायक हैं और कई अपने लिए नई जमीन तलाश रहे हैं। बुंदेलखंड में वैसे तो मध्य प्रदेश में छह जिले -छतरपुर, टीकमगढ़, सागर, दमोह, पन्ना और दतिया- आते हैं। इस इलाके के छतरपुर, टीकमगढ़ और पन्ना में नाम के साथ राजा, रानी या जू लिखने की परंपरा अन्य क्षेत्रों की तुलना में कहीं ज्यादा है। 

राज्य में नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस और भाजपा में टिकट वितरण की कवायद तेज हो चली है। अन्य लोगों के साथ नाम के राजा भी उम्मीदवार बनने के लिए जोड़-तोड़ में लगे हुए हैं। छतरपुर जिले की छतरपुर विधानसभा सीट से कांग्रेस का टिकट पाने वाले डीलमणी सिंह उर्फ बब्बू राजा, राजनगर क्षेत्र से वर्तमान विधायक विक्रम सिंह उर्फ नाती राजा व पूर्व विधायक शंकर प्रताप सिंह उर्फ मुन्ना राजा, महाराजपुर से भाजपा के विधायक मानवेंद्र सिंह उर्फ भंवर राजा, बिजावर से विधायक आशा रानी, भाजपा सांसद जितेंद्र सिंह बुंदेला उर्फ अन्नू राजा, टीकमगढ़ से कांग्रेस विधायक यादवेंद्र सिंह उर्फ जग्गू राजा, खरगापुर से भाजपा के पूर्व विधायक सुरेंद्र प्रताप सिंह उर्फ बेबी राजा टिकट पाने के लिए ताल ठोंक रहे हैं। इसी तरह पन्ना राजघराने की जीतेश्वरी देवी उर्फ युवरानी भाजपा से टिकट की दावेदार हैं।

एक तरफ जहां प्रजा के साथ राजा टिकटें मांग रहे हैं, वहीं एक राजा दूसरे राजा की टिकट कटवाने में भी पूरी तरह सक्रिय है। इन राजाओं की दोनों ही दलों में मजबूत पकड़ है, यही कारण है कि अधिकांश दावेदारों को मैदान में जोर आजमाइश करने का मौका मिल जाएगा। बुंदेलखंड के वरिष्ठ पत्रकार रवींद्र व्यास कहते हैं कि इस इलाके की राजनीति ब्राह्मण और क्षत्रिय के बीच घूमती है। खासकर छतरपुर, टीकमगढ़ और पन्ना जिलों में आरक्षित विधानसभा सीटों को छोड़कर शेष स्थानों से इन्हीं दो वर्गों के प्रतिनिधि जीतकर आते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि ये दोनों वर्ग धन और बाहुबल में अन्य से कहीं आगे हैं। 

राज्य में विधानसभा चुनाव को लेकर बुंदेलखंड क्षेत्र में टिकट के लिए कतार में खड़े कितने राजा और रानी टिकट पाने में सफल होते हैं, इस पर सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है।

सहकारिता मंत्री का फरमान चपरासी बनने के लिये तैयार रहो

राजनीति आपसे क्या न करवा दे, राजनीति सपने दिखाती भी है और उन्हें दूसरे दलों को तोड़ने का मौका भी देती है। राजनीति करने वाले जल्द दूसरी सरकारों द्वारा लिये गए फैसलों को बदलते नहीं है लेकिन कुछ ऐसे राजनीतिक दल भी है जो मौक़ा पड़ने पर अपने प्रतिद्वंदी या उनके आदमियों को निपटाने में तनिक भी देर नहीं करते। उत्तर प्रदेश में भी दो ऐसे दल है जो समय-समय पर एक दूसरे के सामने आते रहते है| जब जिसकी सरकार बनी वो दूसरे को नेस्तनाबूत करने में कोई कोताही नहीं बरतता। 

उत्तर प्रदेश में जानी दुश्मन बन चुके सपा-बसपा शीर्ष स्तर पर तो एक दूसरे के नेताओं को छूने से परहेज करते है लेकिन नीचे के स्तर पर अगर गड़बडिया मिल गई तो उसकी गाज उनके ऊपर गिरती है जिन्होंने किसी नेता की मदद लेकर लाभ लिया हो। प्रदेश की राजनीति में आजकल एक वरिष्ठ मंत्री का बयान एक महकमे के लोगो के लिए शाप बन गया। आजकल कई घरों के चूल्हे भकभकाने लगे है| वहीँ, सैकड़ो लोगो की आँखों से नींद गायब है। 

प्रदेश के सहकारिता मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने प्रदेश में स्थापित सहकारी बैंको के दर्जनों मैनेजरों की यह कह कर दिवाली खराब कर दी है कि बहुजन समाज पार्टी सरकार के समय सहकारी बैंको में मैनेजर के पदों पर नियुक्त लोगो की योग्यता अगर कम पाई गई तो उन्हें चपरासी बना दिया जायेगा। मंत्री के इस बयान से सहकारी बैंक के वो मैनेजर आजकल परेशान चल रहे है जिनकी नियुक्ती बसपा शासन काल में हुई थी। 

मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने ये बयान देकर हडकंप मचा दिया है, शिवपाल सिंह यादव ने कहा है कि मानक से कम योग्यता वाले मैनेजर चपरासी बनने के लिये तैयार रहे। आज हालात ये है कि नाम न छापने की शर्त पर बसपा शासन काल के समय नियुक्त हुए एक युवा मैनेजर कहते है कितनो ने अपनी जमीन जायदाद और घर के जेवरात बेचकर इस नौकरी को प्राप्त किया था, आज योग्यता का आधार किस तरह तय होगा ये किसी को मालूम नहीं है इसमें साफ़ तौर पर राजनीति ही दिख रही है।

SSP मुझे जान से मरवा देगा

"मातहत हो मातहत बनकर रहो" ये हम नहीं कह रहे है बल्कि आजकल उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग के अधिकारी अपने सब-आर्डीनेट से कह रहे है। समाजवादी पार्टी की सरकार में हालात इतने खराब हो चुके है कि कनिष्ठ अधिकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों पर उन्हें जान से मारने का आरोप लगा रहे है। पुलिस विभाग अनुशासन के लिये जाना जाता है। लेकिन आजकल उत्तर प्रदेश पुलिस के अधिकारी अपना हित साधने के लिये अपने कनिष्ठ अधिकारियों को प्रताड़ित करने से भी बाज़ नहीं आ रहे है। 

ऐसा ही एक मामला इन दिनों पुलिस महकमे में गूंज रहा है जहाँ एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी जो भारतीय पुलिस सेवा से चयनित होकर आया है उसने अपने कनिष्ठ के साथ ऐसा क्या किया कि आज उसने पुलिस महकमे के आला अधिकारी को पत्र लिखकर अपनी जान का ख़तरा बताया है। 

मामला प्रदेश के वाराणसी जिले का है जहाँ पुलिस अधीक्षक यातायात और जिलें के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के बीच अघोषित जंग चल रही है। यातायात पुलिस अधीक्षक जीएन खन्ना ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को लेकर एक शिकायती पत्र ADG को लिखा| इस पत्र में जीएन खन्ना ने अपनी जान का ख़तरा बताते हुये अपने अफसर को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। 

SP यातायात जीवन खन्ना ने ADG जीएल मीणा को लिखे पत्र में लिखा है की वाराणसी जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अजय मिश्रा पुलिस मैनुअल और नियमो को दरकिनार कर अपनी सत्ता चला रहे है। SP यातायात ने आरोप लगाया कि एसएसपी ने दबाव डालकर उनके गाडी चालक, गनर और फालोवर को जबरिया अवकाश पर भेज दिया है। वही बगैर उनके अनुमोदन के यातायात पुलिस कर्मियों का स्थानान्तरण कर दिया। 

ADG जीएल मीणा ने इस पत्र को रेंज के DIG को भेजकर इस पूरे प्रकरण की जांच करने को कहा है। DIG रेंज वाराणसी ने SP यातायात के आरोपों को निराधार बताते हुये SP यातायात को ही कटघरे में खड़ा करने का काम किया है। DIG के एसएसपी के पक्ष में खड़ा होने से भारतीय पुलिस सेवा और प्रांतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों के बीच की खाई उजागर हो गई। 

यातायात पुलिस अधीक्षक जीएन खन्ना ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अजय मिश्र पर जो आरोप लगाये है वो काफी संगीन है, मामले की शुरुवात नो एंट्री में बड़े वाहनों के प्रवेश पास जारी करने में फर्जीवाड़ा पकड़े जाने बाद दोनों अधिकारियों के बीच दूरियाँ बढ़ गई। इस आरोप और दोनों अधिकारियों में बढे तनाव की जांच भ्रष्टचार निवारण संगठन कर रहा है। SP जीएन खन्ना ये भी आरोप लगाते है कि अपने पद का दुरुपयोग करते हुये एसएसपी उनका लगातार उत्पीड़न कर रहे है। 

इस पूरे प्रकरण से एक बात सामने आ गई कि पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी अपने कनिष्ठ अधिकारियों को किस तरह से अपने अंगूठे के नीचे दबा कर रखते है, ये वाराणसी के प्रकरण से जनता और सरकार के सामने आ गया है| वैसे देखा ये गया है कि वरिष्ठ अधिकारी वो भी पुलिस महकमे के अपने मातहतों को अनुशासन का पाठ पढ़ाते तो है लेकिन खुद नियमों को कैसे तोड़ते-मरोड़ते है ये वाराणसी की घटना ने साबित किया।

एक तरफ मतदान होगा तो दूसरी तरफ होंगी सैकड़ो शादियां

छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण के होने वाले मतदान को लेकर प्रशासन के साथ-साथ आम नागरिक भी कशमकश की स्थिति में हैं। 19 नवंबर को सूबे की 73 विधानसभाओं के लिए मतदान होना है और 18 व 19 नवंबर को ही विवाह के श्रेष्ठ मुहूर्त भी हैं। ऐसे में भवनों, बसों आदि की बुकिंग को लेकर असमंजस की स्थिति है। मतदान के दिन ही प्रदेश में सैकड़ों शादियां होने वाली हैं, जिससे मतदान प्रभावित होने का अंदेशा है। इसको लेकर राजनीतिक दल भी चिंतित नजर आ रहे हैं।

प्रशासन को शासकीय कार्यालयों में प्रशिक्षण शुरू करना है और बसों को अधिगृहीत करना है, ऐसे में लोगों को विवाह भवन तथा बसों के लिए परेशान होना पड़ सकता है। विदित हो कि सूबे के जिन जिलों में चुनाव के लिए अधिसूचना 25 अक्टूबर को जारी की जाएगी, वहां नामांकन भरने की अंतिम तिथि एक नवंबर निर्धारित की गई है। दो नवंबर को नामांकन पत्रों की जांच एवं चार नवंबर तक नाम वापस लिया जाएगा तथा मतदान 19 नवंबर को कराया जाएगा। इधर, चुनाव की तारीखों तथा विवाह सीजन के एक साथ होने से सूबे के अधिकारियों को अपना पसीना बहाना पड़ सकता है। 

गौरतलब है कि दूसरे चरण के तहत प्रदेश की 73 विधानसभा क्षेत्रों में 19 तारीख को मतदान होना है, वहीं पंडितों का कहना है कि 18 तथा 19 नवंबर को इस सीजन की श्रेष्ठ विवाह मुहूर्त की तारीखें हैं। पंडित अजय शर्मा के मुताबिक, 18 तथा 19 नवंबर श्रेष्ठ तिथियों में से हैं तथा इस दिन कई घरों में विवाह की तारीखें पहले ही तय की जा चुकी हैं। प्रदेश के इन इलाकों में निर्वाचन कार्यो के लिए अधिकारियों के पास पहले से ही बसों की काफी कमी है, जिस वजह से अधिकारियों ने मतदान दलों को ट्रक से पहुंचाने की योजना बनाई है। चुनावी कार्यक्रम तथा विवाह तिथियों के साथ-साथ होने से अब लोगों को अपने घरों की विवाह तिथियों की चिंता सता रही है। जिन घरों में विवाह होने हैं वे बारात आदि के लिए बसों के न मिलने से चिंतित हैं। 

नवंबर में सूबे में सैकड़ों की संख्या में विवाह होने हैं, जिसके लिए महीनों पूर्व से ही हलवाई, बैंड, वाहन, टेंट, फोटोग्राफर, वीडियो शूटिंग आदि की बुकिंग कराई गई है। ऐन विवाह मुहूर्त के दिन मतदान तिथि को देखते हुए अधिकारियों को मतदान के प्रतिशत में कमी आने की आशंका भी सता रही है। इसके उलट जिन लोगों के घरों में विवाह हैं उनको भवन तथा बसों की चिंता सता रही है। निजी बस एसोसिएशन के अध्यक्ष ललित विश्वकर्मा ने बताया, जिस किसी व्यक्ति की बस की बुकिंग चुनाव कार्य की वजह से रद्द हो रही है उसे हम लिया गया एडवांस रकम पूरा वापस कर रहे हैं। बहुतेरे बस मालिकों ने चुनावी वर्ष होने की वजह से बुकिंग ही नहीं ली है।

वहीं, कांग्रेस के जिला पंचायत सदस्य सुनील माहेश्वरी का मानना है कि विवाह की वजह से मतदान पर असर पड़ने की संभावना है। उन्होंने मतदाताओं से अपील की है कि वे मतदान करने के बाद ही विवाह कार्य के लिए घरों से निकलें। बहरहाल, एक ही तिथि में विवाह और मतदान होने से प्रत्याशियों के साथ-साथ प्रशासन भी चिंतित नजर आ रहा है।

केंद्र सरकार के कारनामों से हिन्दुस्तान की लाईफ खो गई

भूख पर शहजादे कुछ नहीं बोलते, सोनिया गांधी कुछ नहीं बोलती, कांग्रेस का पाप छुपाने में सभी सहभागी है जो इस उत्तर प्रदेश में भी मौजूद है। उत्तर प्रदेश के कानपुर में अपनी पहली रैली को संबोधित करते हुए भाजपा के पीएम इन वेटिंग नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस के साथ अभी दलों पर हमला बोला| मोदी ने कानपुर को क्रांति का गवाह बताते हुए कहा कि कांग्रेस को सत्ता से हटाने के लिए कानपुर से आवाज उठनी चाहिये। स्वराज्य के लिये आवाज लगाइए। 

नरेन्द्र मोदी ने कहा कि कांग्रेस ने इन दस सालों में कुछ नहीं किया| अटल बिहारी वाजपेई के शासन के 6 साल को निकाल दिया जाये तो सिर्फ तबाही के सिवा आपको कुछ नहीं मिला। उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था पर प्रहार करते हुए उन्होंने कहा कि अखिलेश सरकार के राज में कानून व्यवस्था इतनी बिगड़ गई है कि एक साल में 5 हज़ार से ज्यादा लोगो की हत्या हो गई है। फिर भी उत्तर प्रदेश की सरकार वोट की राजनीति खेलती है। सरकार आतंकवादियों को जेल से छोड़ने की तैयारी कर रही है| क्या आप ऐसी सरकार का साथ देना चाहिए? आप इन्हें करारा जवाब दीजिये। 

मेरे गुजरात में यूपी का कोई जिला, कोई तहसील ऐसी नहीं होगी जहाँ का निवासी गुजरात में न रहता हो और सुख चैन की ज़िन्दगी जीता है। अपना सब कुछ छोड़कर गुजरात गया है उसे क्यों जाना पडा। जिस भूमि ने 8-8 प्रधानमंत्री दिए वहा के लोगो को रोज़ी रोटी के लिए गुजरात जाना पडता है। अपराध की स्थिति उत्तर प्रदेश में काफी दयनीय है| उत्तर प्रदेश के लोग चिंता में रहते है। संकल्प लीजिये कांग्रेस ही नहीं उसके चट्टो बत्तो को भी सबक सिखायेंगे। 

कानपुर नगर पर उन्होंने कहा कि यहाँ की सभी मीलें बंद है| ऐसा क्यों हुआ आप को सोचना है। सपा , बसपा और कांग्रेस की तिकड़ी ने इसे मिटटी में मिला दिया है। 2014 में लोकसभा का चुनाव है। दिल्ली सरकार को अपने कारनामो का हिसाब देना चाहिए| मैंने चुनाव से पहले हर एक खर्च का हिसाब दिया। कांग्रेसी जहा जाते है गुजरात का बखान और बुराई एक साथ करते है| मैंने अपना हिसाब दे दिया है। हिन्दुस्तान की जनता को गुमराह मत करिये। मै अगर मुजरिम हूँ तो प्रधानमंत्री भी मुजरिम है। कोयला की फ़ाइल नहीं दिल्ली में पूरी सरकार खो गई है। आपके कारनामों के कारण हिन्दुस्तान की लाइफ खो गई है।

बालिग महिलाओं को सहमति से संबंध बनाने का अधिकार

भारतीय पुरुष किसी महिला के साथ सहमति से सम्बन्ध तो बना लेता है , लेकिन यही सम्बन्ध उसकी खुशियों को खराब कर देती है और कुछ दिनों बाद ही, आपसी सहमति से सम्बन्ध बनाने वाली महिला जब उक्त व्यक्ति पर बलात्कार का आरोप लगाती है तो वही ख़ुशी उसके जीवन का कभी न मिटने वाला नासूर बन जाती है। लेकिन कोर्ट के एक आदेश से पुरुषों को थोड़ी राहत दे गया कोर्ट ने कहा अब 18 साल से ऊपर की महिला सहमति से सेक्स करें तो कोई अपराध नहीं, और इसके लिये अदालत से मंजूरी की जरुरत नहीं। 

कोर्ट के इस आदेश ने सहमति से सेक्स करने के बाद परिवार के दबाव आकर बलात्कार का आरोप लगाने वाली महिलाओं के इस कृत्य पर रोक लगेगी। रेणुका चौधरी ने कहा की सहमति से सेक्स और बलात्कार का आरोप लगाने वाली स्थिति में संशय है। रेणुका चौधरी ने कहा की कुछ महिलायें सहमती से सम्बन्ध बनती है उसके बाद उसे बलात्कार का रूप दे देती है ये दुखद: उन्होंने कहा की 18 से ऊपर वाली महिलायें किसी के बिना सेक्स कर सकती है और किसी व्यक्ति से सम्बन्ध बना सकती है उन्हें किसी अदालत से मंजूरी की जरुरत नहीं।

मोदी का उत्तर प्रदेश आगमन

भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी आज उत्तर प्रदेश में शंख फूकेंगे। मोदी की शंखनाद रैली को लेकर प्रदेश भाजपा जीतनी उत्साहित है उतनी ही राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की नज़र इस रैली पर टिकी हुई है। नरेन्द्र मोदी को ये पता है प्रधानमंत्री पद तक पहुँचने के उत्तर प्रदेश जीतना ही होगा। मोदी की रैली पर विपक्ष खासकर उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज समाजवादी पार्टी की ख़ास नज़र है। 

मोदी अगर उत्तर प्रदेश में भाजपा को बढ़त दिलाते है तो ये तय है कि समाजवादी पार्टी की बढ़त भी तय है। आज ही ये तय होगा की मोदी का असर उत्तर प्रदेश की राजनीति पर कैसा पड़ता है। नरेन्द्र मोदी आज उत्तर प्रदेश से क्या हुंकार भरेंगे इस पर भी सभी राजनीतिक दलों के साथ मतदाताओं की भी नज़र है| नरेन्द्र मोदी और उनकी टीम ये अच्छी तरह जानती है यूपी जीता तो देश जीता इसी एटार्न पर काम करते हुये मोदी की टीम आगे बढ़ रह है। 

नरेन्द्र मोदी और भाजपा को अच्छी तरह से पता है कि भाजपा की केंद्र में बनी सरकार में यूपी का बड़ा योगदान रहा है। अटल बिहारी वाजपेई की 13 दिन 13 महीने और 5 साल की सरकार को बनाने में उत्तर प्रदेश ने सर्वाधिक योगदान दिया था , भाजपा यहाँ से 50 से ऊपर सीटे जीतकर केंद्र में सत्ता पर जा बैठी थी। मोदी और उनकी टीम को इस बात का भान है अगर 272 के जादुई आंकड़े तक पहुंचना है तो यूपी को साधना पड़ेगा। 

केन्द्रीय राजनीति में एक कहावत है जिसने उत्तर प्रदेश जीता उसने केंद्र जीत लिया क्योंकि केंद्र की सत्ता की चाभी उत्तर प्रदेश से होकर जाती है। जिसका नतीजा पूर्व के चुनावों में दिखा भी, जब 1996 के चुनाव में भाजपा ने अप्रत्याशित सफलता हासिल करते हुए 54 सीटें जीतकर केंद्र से कांग्रेस से मुक्त कराया था। भाजपा ने तीन बार इसी प्रदेश की सीटों के दम पर केन्द्रीय सत्ता को अपने कब्जे में किया। 2004 में स्थिति बदल गई और 2009 ने तो भाजपा को उन्ही सीटों पर सीमित कर दिया जिन सीटों पर भाजपा के चेहरे माने जाने वाले नेता चुनाव लड़ रहे थे। 

उत्तर प्रदेश में कहावत मशहूर है दो कोस पर बोली बदले चार कोस पर पानी, ऐसी ही कहानी यहाँ की राजनीति की भी है। 80 लोकसभा सीटों का प्रतिनिधीत्व करने वाले उत्तर प्रदेश में ब्राहमण, ठाकुर बनिया, दलित, पिछड़े, और मुस्लिम समुदाय के लिए अलग-अलग पार्टियां राजनीति करती है सभी जाति और धर्मो को अपनी तरफ खीचती हैं । यहाँ की राजनीतिक पार्टियों के बड़े दिग्गजों में से मुलायम सिंह यादव , मायावती, अजीत सिंह जैसे नेता है जो अपनी शर्तों पर केंद्र को समर्थन देते है लेकिन इन तीनो को भाजपा से परहेज है। साथ ही ये तीनो नेता अपने को सबसे बड़ा सेकुल्यर मानते है।

मोदी को इसी मिथक को तोड़ना है, आज की रैली मतदाताओं के रुझान को भी तय कर देगी कि जो बयार मोदी के लिये ग्रामीण मतदाताओं के बीच चल रही है वो वोट में बदलेगी की नहीं। नरेन्द्र मोदी ने अपनी रैली की जगह का चुनाव कांग्रेस का गढ़ बन चुके उस कानपुर से की है जहाँ से केन्द्रीय मंत्री और तीन बार से सांसद श्री प्रकाश जायसवाल चुनाव लड़ते है। मोदी कांग्रेस के गढ़ में हुंकार भरेंगे जिसकी गूंज मुलायम सिंह यादव के गृह जनपद इटावा तक जायेगी। कानपुर के आस पास के सपा प्रभाव वाले जिलों में भी मोदी की गूंज पहुंचेगी साथ ही इस पहली रैली के माध्यम से मोदी पूरे उत्तर प्रदेश को कोई खास सन्देश भी देंगे। 

नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी केंद्र में सत्ता में आने का ख्वाब देख रहे है इनका ये ख्वाब उत्तर प्रदेश में भारी सफलता के बाद ही पूरा हो सकता है। पार्टी के बड़े नेता और चिंतक ये अच्छी तरह जानते है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के पक्ष में वोट डलवाना वैसा ही है जैसे किसी हिंसक पशु के मुंह से खाना छीन लेना। करीब 20 करोड़ की आबादी वाले इस प्रदेश की राजनीति जीतनी उलझी है उतनी शायद कही नही है । प्रदेश में सभी जातियों की अपनी अपनी पार्टियां है सबकी उन पार्टियों में हिस्सेदारी है जो साफ़ दिखती भी है। 

भाजपा की राह उत्तर प्रदेश में मुश्किल है भाजपा को उत्तर प्रदेश में सिर्फ एक फैक्टर फायदा है वो है केंद्र से आम जनता की नाराजगी। नरेन्द्र मोदी और उनके रणनीतिकार अच्छी तरह जानते है कि उत्तर प्रदेश जीता तो केंद्र जीता लेकिन जीत अभी दूर की कौड़ी नज़र आती है। नरेन्द्र मोदी विकास की बात कहते है, लेकिन जहां की जनता के आँखों पर जातिवाद की पट्टी बंधी हो वहां, वहां जनता को विकास की बात कितनी समझ में आती हैं यह कहना मुश्किल है। 

आज की मोदी की जनसभा में केंद्र पर कुठाराघात होगा तो भाजपा के कार्यकर्ताओं को मोदी चुनाव जीतने के गुण भी सिखायेंगे साथ उन्हें अनुशासन में रहने का पाठ भी पढ़ायेंगे । मोदी की आज की रैली से उत्तर प्रदेश में भाजपा की राजनीतिक दिशा और दशा तय होगी की भाजपा नरेन्द्र मोदी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उत्तर प्रदेश फतह के पाती है या नही ।

पिपली लाइव का सिक्वल बना डोडियाखेड़ा

लखनऊ से मात्र 70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित उन्नाव जनपद का डोडिया खेड़ा गाँव आज कल पूरे विश्व की निगाहों में है। वजह एक साधू शोभन सरकार के सपने ने देश की सरकार को एक ऐसा आदेश देने पर मजबूर कर दिया जिसने सपने और हकीक़त में कोई फर्क नहीं छोड़ा। आज देश विदेश की मीडिया में कौतुहल का विषय बने इस सोने की खोज में भारत सरकार की दो ऐसी एजेंसिया लगी है जिन्हें ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व की खोज करने में महारत हासिल है। 

सोना मिलेगा या नहीं मिलेगा इस पर देश विदेश की मीडिया पर बहस का दौर भी चल निकला है। वही खुदाई और सोने की खोज को लेकर संत समाज भी दो भागो में बंट गया है। आज डोडियाखेड़ा में हालात ये है कि सोना मिलने में अभी कुछ समय है लेकिन उसे मिलने और न मिलने वाले सोने को पाने के दावेदारों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। विश्वास और विज्ञान के बीच फसें लोग इस सोने के खजाने की चमक देखने के लिए ललायित है। 

राजा राव राम बख्स सिंह के खजाने की खोज में लगी भारत सरकार ने एक साधू के सपने के आधार पर उन्नाव के इस गाँव में ऐसा बखेड़ा खड़ा कर दिया है जो हकीक़त में बदल जाए तो भारत की आर्थिक स्थिति सुधरती है और न बदले तो पूरे विश्व में भारत को अंधविश्वासी देश के तौर पर स्थापित होना पड़ सकता है। इस पूरे प्रकरण में भारत सरकार के साथ उन दो एजेंसियों पर भी सवाल खड़े हो रहे है जिन्हें पुरातात्विक महत्व की वस्तुये खोजने के लिये जाना जाता है। ASI यानि आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया और GSI जियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया जो भारत में गम हो चुकी सभ्यताओं को खोजने के लिए जाने जाते है। 

ASI यानि आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया और GSI जियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया ने भारत में पहली बार किसी साधू के सपने के आधार पर जमीन में दबे खजाने की खोज करने का काम अपने हाथ में लिया है। उन्नाव के डोडिया खेड़ा गाँव में आज हालात ऐसे है जो भारत की छवि को पूरे विश्व में खराब करने वाले है। इस सोने के खजाने की खुदाई में अभी एक महीने का वक़्त लगने वाला है, लेकिन कौतुहल ऐसा जिसने 2010 में आई "पिपली लाइव" नामक फिल्म की याद दिला दी "पिपली लाइव" एक हास्यप्रधान और भारत में किसानो द्वारा की जा रही आत्महत्याओं को लेकर तंज करते हुये बनाई गई फिल्म थी। 

पिपली लाईव में नत्था के आत्महत्या किये जाने की खबर ने नेतानगरी से लेकर मीडिया में कौतुहल पैदा करने का काम किया था। किसान के आत्महत्या की खबर को मीडिया और राजनीति के बीच ऐसा उलझा दिया गया की जिस वजह से उस फिल्म का निर्माण हुआ वो मूल वजह ही गायब हो गई और रह गया सिर्फ टीआरपी का खेल और अपनी राजनीति को चटकाने का प्रसंग। कुछ ऐसा ही चल रहा है उन्नाव के डोडियाखेड़ा गाँव में जहाँ मीडिया का रेला है तो राजनीति करने का बेहतर अवसर वही सोने के मिलने पर दावेदारों की बड़ी लिस्ट। सवाल ये है सोना मिलेगा या नहीं और खुदाई में क्या निकलेगा। अब सवाल ये खडा हो गया है क्या किसी साधू के सपने के आधार पर भारत सरकार को खुदाई करने के आदेश देने चाहिये। 

केन्द्रीय मंत्री चरण दास महंत ने कहा डोडियाखेड़ा गाँव में मंदिर के नीचे और किले के पास करीब 1000 टन सोना मिलने का पत्र शोभन सरकार के शिष्य ओम महाराज ने मंत्रालय को लिखा था उसी पत्र के आधार पर जब भारत सरकार ने (GSI) जियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया को इस पत्र के तथ्यों और उस जमीन के जांच के आदेश दिये गये (GSI) जियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया की प्रारंभिक जांच में जमीन के अन्दर मेटल होने के प्रमाण मिले उसी के बाद सरकार ने खुदाई के आदेश दिये। ASI यानि आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया और GSI जियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया ने डोडियाखेड़ा में खुदाई का काम विशेषज्ञों के नेतृत्व में शुरू कर दिया है। 

इस पूरी खुदाई पर नज़र रख रही भारत सरकार के सामने प्रदेश सरकार ने नई चुनौती रख दी है और इस पूरे मामले का श्रेय लेने के लिये होड़ भी मच गई। उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार का कहना है अगर वहां सोने का खजाना मिला तो उसमें एक हिस्सा प्रदेश सरकार को मिलना चाहिये। सेकेण्ड पिपली लाईव के इस शो में रोजाना नए नए तथ्य और बातें सामने आ रही है कुछ लोगो का कहना है राजा राव राम बख्स सिंह नहीं बल्कि 25 गांवों के जमीदार थे, 25 गांवो की जमींदारी करने वाले के पास इतना अकूत सोना कहाँ से आ सकता है। वही कुछ लोग ये भी कहते है राजा राव राम बख्स सिंह के बिठुर राज घराने से अच्छे और विश्वास के सम्बन्ध थे इन्ही संबंधो की वजह से जब अंग्रेजो की सेना ने बिठुर पर हमला किया तब तात्या टोपे ने बिठुर का खजाना नदी के रास्ते डोडियाखेड़ा भेज दिया था जिसे राजा राव राम बख्स सिंह ने जमीन में गड़वा दिया, आगे चलकर अंग्रेजों ने राजा राव राम बख्स सिंह को अंग्रेजों ने फांसी पर चढ़ा दिया गया तभी से वो सोने का खजाना वहा दबा पड़ा, ये लोगो के मुंह से सुनी सुनाई बातें है। 

डोडियाखेड़ा गाँव और बाबा शोभन सरकार के सपने ने देश के सभी प्रान्तों और हिस्सों में दो ही चर्चा है सोना मिलेगा या नहीं और मिला तो दावेदार कौन होगा इस बात ने देश क्या विदेश में भी भारत में चल रहे इस सोने की खोज को चर्चा में ला दिया है। आज देश में साधू संत और वैज्ञानिक इस बात पर अचरच रहे है कि क्या सपने सच होते है और अगर होते है तो अभी तक किसी ने दक्षिण में स्थित मंदिरों में दबे अकूत खजाने का सही आंकलन कर सरकार को क्यों नहीं बता दिया, अगर डोडिया खेड़ा गाँव में दबे 1000 टन सोने से देश की अर्थ व्यवस्था में सुधार होगा तो दक्षिण में मिलने वाले सोने से भारत एक बार फिर सोने की चिड़िया के साथ विश्वगुरु भी बन सकता है साथ ही वो पांच पैसे, दस पैसे, बीस पैसे और चवन्नी-अठन्नी का जमाना वापस आ सकता है। 

बहरहाल, डोडिया खेड़ा गाँव में पिपली लाईव का सिक्वल चल रहा है फर्क बस इतना है न कोई यहाँ नत्था है और न ही आत्महत्या होने वाली है बस एक उम्मीद है उस सोने की आस की जिसे एक नामी साधक ने सपने में देखा और जिए पाने के लिए सरकार और उसकी मशीनरी खुदाई कर रही है।

Monday, 23 September 2013

महाभारत में शहीद होंगे बहुगुणा

उत्तराखंड में जून में आई आपदा ने इस पर्वतीय प्रदेश की सियासत को गर्म कर दिया था, आपदा इतनी भीषण थी की केंद्र सरकार और कांग्रेस नेतृत्व ने उत्तराखंड सरकार और वहां के मुख्यमंत्री को आपदा से निपटने के लिए पूरी छूट दे दी थी, पूरे देश ने इस आपदा से निपटने में वहां की सरकार का पूरा साथ दिया। लाखो लोग उत्तराखंड आपदा से प्रभावित हुये, चार धाम यात्रा भी पूरी तरह से रोक दी गई। उत्तराखंड में आई उस विनाशलीला में बाबा केदारनाथ का धाम और पूरी केदारघाटी तबाह हो गई। 

कांग्रेस नेतृत्व ने मुख्यमंत्री वजय बहुगुणा को आर्थिक, सैन्य बल और सिस्टम सपोर्ट देकर आपदा प्रभावित लोगो को राहत पहुंचाने के लिए हर सम्भव मदद की थी इस बीच विजय बहुगुणा की सुस्ती और उनके काम करने के तरीके को लेकर भी सवालिया निशान लगने शुरू हो गए। वही बहुगुणा सरकार में शामिल उन्ही के सहयोगी उनके लिए गड्ढा खोदने का काम करने लगे। आपदा के समय मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की निष्क्रियता को लेकर स्थानीय कांग्रेसियों ने कांग्रेस नेतृत्व और आलाकमान सोनिया गांधी के सामने उनकी बखिया उधेड़ कर रख दी। 

विजय बहुगुणा के विरोधियों का नेतृत्व खुद केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत ने किया वजह साफ़ थी जिस तरह विधानसभा चुनावों के बाद विजय बहुगुणा ने अपने ब्राह्मण होने का फायदा मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचने के लिए उठाया था वो हरीश रावत को नागवार गुजरा था, विधानसभा चुनावों के बाद अगर विजय बहुगुणा कांग्रेस आलाकमान से अपनी नजदीकियों का फायदा उठाकर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुये थे उसने अन्दर ही अन्दर हरीश रावत गुट को आंदोलित कर दिया था। 

हरीश रावत इस आपदा के बहाने विजय बहुगुणा से मुख्यमंत्री की कुर्सी छिनने की पूरी तैयारी कर चुके थे लेकिन सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने आपदा को प्राकृतिक आपदा मान कर उन्हें जीवनदान दे दिया था। विजय बहुगुणा भी अपनी कुर्सी बचाने के लिए आपदा के राहत कार्य के साथ साथ पार्ट के अन्दर उठ रहे विरोध के स्वर को थामने पर भी लगे थे, इसी बीच उन्ही के मंत्रिमंडल के हरक सिंह रावत ने उत्तराखंड की राजनीति को अस्थिर करने के लिए नई राजनीतिक चाल चली जिसमें उन्होंने कांग्रेसी विधायको का मन टटोलने के लिए अपने आवास पर एक डिनर पार्टी आयोजित की थी जिसमें ऐसी घटना घटी जिसने हरक सिंह रावत की मुख्यमंत्री की कुर्सी हलाने की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। 

हरक सिंह रावत की इस डिनर पार्टी के दौरान हुई फायरिंग में दो लोगो के जख्मी हो गए| कांग्रेस के खानपुर विधायक और वन विकास निगम के अध्यक्ष कुंवर प्रणव सिंह के चैंपियन पर गैरकानूनी फायरिग करने का आरोप हैं| कृषि मंत्री ने के यहाँ आयोजित इस भोज में प्रदेश के कई बड़े-बड़े मंत्री और विधायक शिरकत करनें पहुंचे थे। करीब 9 बजे खानपुर विधायक और वन विकास निगम के अध्यक्ष कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन भी समारोह में सम्मलित होनें पहुंचे प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक हरक सिंह रावत से मुलाकत करनें के बाद उन्होंने हवाई फायर किये| इसके बाद कुंवर सिंह चैंपियन नें डाइनिंग हॉल में जाकर भी हवाई फायरिंग का प्रदर्शन किया। इसी दौरान एक गोली छिटकर कांग्रेस नेता विवेकानंद खंडूरी के पाँव में जा लगी और दूसरी गोली हरिद्वार के नेता रवींद्र सैनी को लगी। 

हरक सिंह रावत की इस डिनर पार्टी में खुद मुख्यमंत्री भी शामिल होने वाले थे लेकन उसके पहले ही हुई इस फायरिंग ने बहुगुणा के कार्यक्रम को रद्द करा दिया साथ ही हरक सिंह की मुख्यमंत्री बनने के सपने को भी तोड़ दिया था। हरक सिंह रावत स पार्टी के बहाने अपनी ताकत दिखाना चाहते थे। दिल्ली दरबार से आ रही ख़बरों के मुताबिक लोकसभा चुनावों से पहले कांग्रेस नेतृत्व उतराखंड में परिवर्तन के संकेत दे चुका है, विजय बहुगुणा इस मुद्दे पर कुछ भी बोलने से कतरा रहे है वही उनके मंत्रिमंडल के सहयोगी और राजनीतिक विरोधी उनकी कुर्सी के पाये उखाड़ने पर लगे हुये है। 

विजय बहुगुणा के साथ ही कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्या से भी उनकी प्रदेश की अध्यक्षी वापस ली जा रह है कांग्रेस ने उनको हटाने के लिए एक व्यक्ति एक पद का फार्मूला दिया है। लोकसभा चुनाव से पहले उतराखंड में भारी बदलाव देखने को मिलेगा कुछ नेता जोड़तोड़ भी करते मिलेंगे तो कुछ के सपने उनके द्वारा किये जा रहे गलत कामों की वजह से टूटेंगे। कांग्रेस नेतृत्व किस पर भरोसा दिखाती है साथ ही किसका भाग्य बाकी नेताओं पर भर पड़ता है ये उतराखंड की राजनीति में मची उथल पुथल के शांत होने के बाद ही सामने आयेगा। लेकन ये तो तय है कि विजय बहुगुणा के सर से ताज उतरने वाला है।

विधायकों की गिरफ्तारी सपा-भाजपा की राजनीति तो नहीं

18 सितम्बर को उत्तर प्रदेश विधानसभा के विशेष सत्र के दौरान जहाँ मुजफ्फरनगर दंगा पूरी तरह से सदन के अन्दर छाया रहा, शुक्रवार को भाजपा विधायक सुरेश राणा की लखनऊ के गोमतीनगर इलाके से हुई गिरफ्तारी के बाद पूरी प्रदेश की सियासत गर्म हो गई, वहीँ समाजवादी पार्टी और भाजपा इस गिरफ्तारी को लेकर आमने सामने आ गए। विधानसभा सत्र के आखिरी दिन सदन के अन्दर दोनों दलों के विधायकों ने अपने कुर्ते की बांह चढ़ाकर संसदीय गरिमा को तार-तार किया तो सरकार ने सदन के अन्दर हुए अपमान का बदला ले लिया। 

सरकार ने मुजफ्फरनगर दंगो के आरोप में जारी किये गए वारंट के तामिल के लिए पुलिस अफसरों के चूले कसे तो अफसर भी विधानसभा सत्र के दौरान जिन आरोपी विधायकों को ढूंढ नहीं पा रहे थे वो उन्हें सड़क चलते मिल गए पुलिस ने भारतीय जनता पार्टी के विधायक सुरेश राणा को राजधानी लखनऊ से गिरफ्तार कर लिया और जज के सामने प्रस्तुत कर जेल भेजने की तैयारी कर ली उधर बाकी आरोपी विधायक राजधानी में सत्र समाप्त होते है सरकार और पुलिस की जानकारी में और उनकी आँखों के सामने अपने अपने विधानसभा क्षेत्रों में पहुँच गए।

सरकार और पुलिस का समन्वय यहाँ समझ नहीं आया जो मुजफ्फरनगर एक छोटी सी घटना के बाद दो सप्ताह तक साम्प्रदायिक दंगो की आग में झुलसता रहा। प्रदेश की अखिलेश सरकार भाजपा के विधायको हुकुम सिंह, संगीत सोम, भारतेंदु सिंह, सतीश राणा और बसपा विधायक नूर सलीम राणा को इस दंगे का जिम्मेदार मानकर मुकादमा दर्ज कराती रही| पुलिस इन्हें खोजने के लिए वारंट लेकर इधर उधर दौडती रही| वो सभी माननीय लगातार चार दिनों तक प्रदेश की राजधानी के अति महत्वपूर्ण और अति सुरक्षित इलाकों में घुमते रहे| तब पुलिस ने सपा सरकार के इशारे पर गिरफ्तार नहीं किया लेकिन जैसे ही वो अपने क्षेत्र जो इस समय प्रदेश का सांप्रदायिक दंगो को लेकर संवेदनशील हो चुका है वहां पहुंचे पुलिस ने उन्हें उनके घरो से गिरफ्तार कर लिया। 

सरकार और पुलिस का ये नाटक समझ से परे है जो विधायक राजधानी लखनऊ में आसानी से गिरफ्तार किये जा सकते थे उन्हें उनके ही प्रभाव वाले क्षेत्र में उनके समर्थको के सामने गिरफ्तार करने के पीछे सरकार की मंशा क्या है? ये राजनीति की थोड़ी समझ रखने वाला व्यक्ति समझ जाएगा। मुजफ्फरनगर दंगो के पीछे किसका हाथ है ये जांच के बाद पता चलेगा लें पूर्व में आ रही खबरों और प्रदेश सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री के तथाकथित फ़ोन करने की बात सामने आने के बाद इन दंगो की छुपी सच्चाई सामने आने लगी है। भाजपा विधायकों हुकुम सिंह, संगीत सोम और बसपा के नूर सलीम राणा की गिरफ्तारी कुछ और ही कहानी कह रही है। 

मुजफ्फरनगर में हुई इन गिरफ्तारियों के पीछे सपा-भाजपा की सोची समझी राजनीतिक चाल तो नहीं है? संगीत सोम ने अपनी गिरफ्तारी के समय कहा उनकी गिरफ्तारी पश्चिम उत्तर प्रदेश के प्रभारी मंत्री और कद्दावर सपा नेता आज़म खान के इशारे पर हुई है, संगीत सोम का ये बयान अपने में बहुत कुछ कह रहा है। वहीँ सरकार और पुलिस ने इन गिरफ्तारियों को मुजफ्फरनगर में करके एक बार फिर उन जख्मो को कुरेद दिया है जो अभी दंगो के बाद हरे है। विधायको को गिरफ्तार करवा कर प्रदेश की अखिलेश सरकार कौन सा सन्देश मुजफ्फरनगर वासियों को देना चाहती है इसे समझना अभी बाकी है। 

भाजपा विधायकों की गिरफ्तारी के समय उनके समर्थको के आक्रोश था और वहा हुई नारेबाजी के बाद एक बात साफ़ हो गई कि सरकार ने दंगो की आग को सेना और अर्धसैनिक बल लगाकर दबा भले दिया हो लेकिन अन्दर ही अंदर चिंगारी सुलग रही है। सरकार और भाजपा की मंशा साफ़ नहीं है इन गिरफ्तारियों को जो लखनऊ में हो जानी चाहिए थी उसे मुजफ्फरनगर में कर के सरकार ने दबी चिंगारी को हवा देने का ही काम किया वो इन दोनों पार्टियों की मिली जुली राजनीति की तरफ ही इशारा कर रही है। 

जांच एजेंसियों की जांच में कितनी सामने आयेगी ये तो रिपोर्ट आने के बाद ही तय होगा लेकिन पश्चिम उत्तर प्रदेश की राजनीति को इन दोनों दलों ने 27 अगस्त को ही तय कर दिया जो भविष्य में अपना रंग दिखाएगी साथ ही लोकसभा चुनाव के दौरान मतदाताओं के फर्क को भी तय कर देगी की दोनों वर्ग किस तरफ जायेंगे।

माफ़ी से पिघले मुख्यमंत्री अखिलेश

मुजफ्फरनगर दंगो से पहले देश की मीडिया में छाई रहने वाली और सुर्खियाँ बटोरने वाली भारतीय प्रशासनिक सेवा की अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल अब जल्द बहाल हो जायेंगी। मुख्यमंत्री सचिवालय से आ रही ख़बरों के मुताबिक, दुर्गा शक्ति नागपाल ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मुलाकात कर उनसे माफ़ी मांगी ली है। दुर्गा शक्ति नागपाल अपने निलंबन से पहले नोएडा में उपजिलाधिकारी सदर के पद पर तैनात थी। 

दुर्गा शक्ति नागपाल को 27 जुलाई को उत्तर प्रदेश सरकार ने एक निर्माणधीन धार्मिक स्थल की दीवार गिरवाने के आरोप में निलंबित कर दिया था। दुर्गा शक्ति पर साम्प्रदायिक तनाव फैलाने का भी आरोप था। दुर्गा शक्ति के निलंबन को लेकर ये भी ख़बरें आई कि खनन माफियाओं पर कार्रवाई को लेकर स्थानीय सपा नेताओं ने सरकार पर दबाव बनाया था। 

करीब एक महीने तक मीडिया की सुर्ख़ियों में रही दुर्गा शक्ति से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी नाराज थे, दुर्गा शक्ति को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया गया था जिसका जवाब उन्होंने सरकार को दे दिया था। दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन को लेकर अखिलेश यादव सरकार की काफी किरकिरी भी हुई थी। 

प्रदेश में ही नहीं पूरे देश में दुर्गा शक्ति के निलंबन को लेकर विरोध हुआ। अखिलेश सरकार पर उगलियां उठाई जा रहीं थी। आरोप ये लगा कि उन्होंने ग्रेटर नोएडा के कादलपुर गांव में बन रही एक मस्जिद के निर्माण को अवैध करार देकर उसकी दीवार को गिरा दिया। जिससे इलाके में धार्मिक सदभाव बिगड़ने का खतरा पैदा हो गया है।

दंगा हो रहा था मुख्यमंत्री सो रहे थे : जयराम रमेश

केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने दंगो पर सीधे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर हमला बोला है। शनिवार को लखनऊ आये जयराम रमेश ने कहा मुजफ्फरनगर दंगे पूरी तरह से सपा- भाजपा द्वारा प्रायोजित थे, दोनों पार्टियों की मिलीभगत से एक छोटी सी घटना ने साम्प्रदायिक दंगो का रूप ले लिया। जयराम रमेश ने साफ़ कहा कि प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को जिस तरह से अपने पद का इस्तेमाल करना चाहिए था उस समय वो मुख्यमंत्री आवास के अपने आलिशान शयनकक्ष में सो रहे थे। 

जयराम रमेश ने मुजफ्फरनगर दंगो पर बोलते हुये कहा कि ये दंगे भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी की मिलीभगत के नतीजे के तौर पर सामने आये। उन्होंने ये भी कहा कि जिस तरह से 27 अगस्त के बाद धीरे धीरे एक छोटी सी चिंगारी ने बड़ा रूप ले लिया हैं उसमे सरकार के अगुवा की निष्क्रियता साफ़ झलकती है, वही भाजपा आगामी लोकसभा चुनावों को लेकर ऐसे दंगो में अपने हाथ सेंक कर सियासी फायदा उठाना चाहती है। 

जयराम रमेश के प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर किये गए इस खुलेआम हमले ने प्रदेश सरकार की मुश्किल बढ़ा दी है। जयराम रमेश से पहले भी खुद प्रदेश के राज्यपाल बनवारी लाल जोशी ने भी अखिलेश सरकार पर तीखी टिप्पणी की थी, इस टिप्पणी में राज्यपाल ने केंद्र को भेजी अपनी रिपोर्ट में साफ़ लिखा था कि प्रदेश की अखिलेश सरकार ने समय रहते कार्रवाई नहीं की। 

जयराम रमेश की प्रदेश सरकार पर की गई इस तल्ख़ टिप्पणी का जवाब समाजवादी पार्टी किस रूप में देती है ये भविष्य में की जाने वाली राजनीति के बाद ही सामने आयेगा वैसे मुजफ्फरनगर दंगो को लेकर मोर्चा और रिपोर्ट सरकार को राज्यपाल बीएल जोशी ने भेजी थी, उसी रिपोर्ट को एक तरह से और तीखे अंदाज में जयराम रमेश ने आगे बढ़ा दिया है। 

इस बीच पुलिस ने मुजफ्फरनगर दंगो के लिए दोषी ठहराये जा रहे भाजपा के दो विधायकों सुरेश राणा और संगीत सिंह सोम को गिरफ्तार किया है| वहीं, बसपा के विधायक नूर सलीम को भी पुलिस ने गिरफ्त में लिया है। मुजफ्फरनगर दंगो के बाद कठघरे में खड़ी प्रदेश सरकार ने इन तीनो विधायकों की गिरफ्तारी कर अपने दामन पर लगे दागो को धोने की कोशिश की है। 

केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश ने मनरेगा घोटालों पर भी उत्तर प्रदेश की सपा सरकार की कार्यशैली पर सवालिया निशान खड़े किये है। रमेश ने साफ़ कहा कि मनरेगा घोटाले पर प्रदेश की अखिलेश सरकार गंभीर नहीं है, उन्होंने साफ़ कहा की इस घोटाले की जांच सीबीआई से कराये जाने की आवश्यकता है। 

मुजफ्फरनगर दंगे और मनरेगा के बहाने ही केंद्र की सत्ता की अगुवाई कर रही कांग्रेस प्रदेश सरकार पर निशाना साध कर अपने उस वोट बैंक को बचाने की कवायद में लग गई है जो प्रदेश में सियासत कर रही सभी पार्टियां कांग्रेस के पाले से खिसका रही है। कांग्रेस अपनी 2009 की स्थिति को बचाने में लगी हुई है, देखना है उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस फिलहाल इन दो मुद्दों को उठाकर अखिलेश सरकार और अन्य पार्टियों को कितना दबा सकती है।

सियासत और मोदी

भारतीय जनता पार्टी ने आगामी आम चुनावों को लेकर पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को घोषित कर कांग्रेस से मामले में बढ़त ले ली। नरेन्द्र मोदी की प्रधानमंत्री पद पर उम्मीदवारी घोषित होते ही ये तय हो गया कि भाजपा और सहयोगी पार्टियां आम चुनाव में बहुमत के लिए जरुरी 272 का जादुई आंकड़ा छूती है तो देश के अगले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही होंगे।

नरेन्द्र मोदी ने भी अपनी उम्मीदवारी की घोषणा के बाद भाजपा की केन्द्रीय चुनाव संचालन समिति के पद से इस्तीफा दे दिया। भाजपा की केन्द्रीय प्रचार टीम अब प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर नरेन्द्र मोदी के देश के अलग अलग हिस्सों में आयोजित होने वाली चुनावी जनसभाओ के कार्यक्रम को तैयार करने में जुट गई है। भाजपा ने नरेन्द्र मोदी के कार्यक्रम को तय करने में जातिगत वोट बैंक, लोकसभा सीटों के हिसाब से प्रदेशो में होने वाले जनसभाओ की संख्या भी तय करना शुरू कर दिया है। 

भाजपा 2014 आम चुनावों में 1996 को दोहराना चाहती है। वजह भी साफ़ है 1996 में राममंदिर आन्दोलन और तात्कालिक प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की असफल कांग्रेस सरकार के बाद पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में उतरी भाजपा ने 1991 से एक कदम आगे निकलते हुये 51 सीटों से एक सीट ज्यादा जीतकर 96 में प्रदेश में भाजपा का परचम 52 सीटों पर जीत दर्ज कर लहरा दिया था। यही वो साल था जब भाजपा ने पहली बार 13 दिन की सरकार बनाई और लोकसभा में बहुमत साबित न होने की वजह से अटल बिहारी वाजपेई की सरकार एक वोट से गिर गई थी।

जिस उत्तर प्रदेश ने भारतीय जनता पार्टी को केंद्र की सत्ता के करीब पहुंचाया आज वही उत्तर प्रदेश एक बार फिर भाजपा की प्रयोगशाला बनने जा रहा है, और इस प्रयोगशाला पर प्रयोग करने की कमान भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के कंधो पर डाली गई है भाजपा की केन्द्रीय चुनाव समिति ने नरेन्द्र मोदी के उत्तर प्रदेश की आम जनता को लुभाने के लिए उनके कार्यक्रमों की एक लम्बी लिस्ट तैयार की है जो 15 अक्टूबर से जनसभाओ में तब्दील होने लगेगी| देखने वाली बात ये होगी गुजरात के नरेन्द्र मोदी उत्तर प्रदेश की आम जनता की आँखों में कैसे कैसे लुभावने सपने डालते है। 

मोदी शब्दों के बाज़ीगर कहे जाते है उनकी भाषण शैली जहां पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई की याद दिलाती है वहीँ, वो भाजपा के जनप्रिय नेता अटल जी से एक कदम आगे आक्रामक शैली का भी प्रयोग करते है। नरेन्द्र मोदी को जमीनी राजनीति की हकीक़त पता है। जातियों में बनती उत्तर प्रदेश की राजनीति की नब्ज पकड़ना मोदी और भाजपा के लिए आसान नहीं है इस बात से वाकिफ भाजपा का थिंक टैंक और खुद मोदी भी इस प्रदेश की महत्वता समझते हुये फूंक फूंक कर कदम रख रहे है। 

नरेन्द्र मोदी की पहली जनसभा कानपुर में होने वाली है जहां से केन्द्रीय कोयला मंत्री और तीन बार से सांसद श्री प्रकाश जायसवाल संसंदीय क्षेत्र का नेतृत्व करते है| मोदी कांग्रेस पर पहली चोट कानपुर से ही करेंगे वही दूसरी जनसभा झाँसी में होगी जहां के सांसद आदित्य जैन है जो केंद्र सरकार में मंत्री है जबकि तीसरी जनसभा जनसंघ की प्रयोगशाला के तौर पर मशहूर बहराइच में होगी इस सीट से भी सोनिया गांधी के करीबी और राजीव गाँधी की सुरक्षा में तैनात रहे कमांडो कमल किशोर सांसद है। 

नरेंद्र मोदी और भाजपा उत्तर प्रदेश में अपनी पहली तीन जनसभाओ का एलान कर चुके है इसके अलावा भी मोदी की आगामी जनसभाओ का एलान जल्द होगा| मोदी और उनकी टीम उन सीटों को ही पहले निशाने पर ले चुकी है जहां से कांग्रेस ने 2009 के चुनावों में जीत हासिल की थी, मोदी और उनके सबसे करीबी अमित शाह की मंशा इन लोकसभा सीटो का चयन कर ये साफ़ कर चुकी है की मोदी की जनसभाओ में भीड़ जुटाकर केंद्र में बैठी यूपीए सरकार को ये सन्देश दे दिया जाये की कांग्रेस से जनता उब चुकी है। 

मोदी और भाजपा अच्छी तरह से जानते है अगर उत्तर प्रदेश जीत लिया तो केंद्र जीत लिया, इस बात को ध्यान में रखते हुए भाजपा की केन्द्रीय समिति ने अपनी कमर कस ली है। भाजपा नेतृत्व को अच्छी तरह पता है कि अगर भाजपा ने 1991, 1996 दोहरा दिया तो प्रदेश में भाजपा की स्वर्णिम उड़ान एक बार फिर शुरू हो जायेगी। जनसंघ की प्रयोगशाला के तौर पर जानी जाने वाली यूपी को लेकर भाजपा सतर्क हो गई है। भाजपा ने जातिगत आधार को भी ध्यान में रखकर नरेन्द्र मोदी के कार्यक्रम को तय किया है। नरेन्द्र मोदी खुद पिछड़ी जाति से आते है। 

80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में चुनावी घमासान की आहट सुनाई पड़ने लगी है। मुलायम सिंह यादव खुद अपने कार्यकर्ताओं से 60 सीटे जीतकर देने की मांग कर चुके है। वहीँ, कांग्रेस भी अपनी उन 21 सीटों को बचाने की जुगत में लगी हुई है जो उसने अप्रत्याशित रूप से 2009 में जीती थी। भाजपा भी 2014 के आम चुनावों में व्यक्तिवादी सोच से आगे निकलकर पार्टी के सन्देश और मोदी के व्यक्तित्व को प्रदेश की जनता तक पहुंचाने में लगी हुई है। 

भाजपा ने 2004 और 2009 के चुनाव में 10-10 सीट जीती थी, जो स्थानीय भाजपा नेताओं के खुद के प्रभाव वाली सीटे थी। मोदी इन्ही 10 सीटो से आगे बढ़कर लोकसभा चुनाव में 50 सीट को जीत में तब्दील करना चाहते है। भाजपा ने प्रदेश में मोदी के प्रथम आगमन की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। मोदी को भाजपा ने जून महीने में ही केन्द्रीय चुनाव संचालन समिति का अध्यक्ष मनोनित किया था, तभी से कयास लगाये जा रहे थे की मोदी उत्तर प्रदेश का रूख कब करते है, पार्टी के अंदरुनी सूत्रों की माने तो मोदी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित होने के बाद ही पार्टी चाहती थी कि मोदी उत्तर प्रदेश आये, अब भाजपा वही करने जा रही है। 

84 कोसी परिक्रमा, राममंदिर का राग और अब मुजफ्फरनगर दंगो ने प्रदेश की जनता में एक माहौल और डर पैदा करने का काम किया है। मुजफ्फरनगर दंगो के बाद प्रदेश की सियासत गर्म है प्रदेश सरकार और उनके कद्दावर मंत्री पर आलोचनाओं की झड़ी लग गई है। भाजपा, बसपा, कांग्रेस जैसी पार्टिया इन दंगो को भुनाने में लगी है वही समाजवादी पार्टी भी इन दंगो को कैश कराने के लिए तत्पर दिख रही है। मोदी मुजफ्फरनगर दंगो पर बोलेंगे कि नहीं ये 15 अक्तूबर को पता चलेगा लेकिन ये तय है की अब मोदी का कार्यक्रम आ जाने के बाद प्रदेश की राजनीति का पारा चढ़ने वाला है।