मध्य प्रदेश के लोग अपनी मांगों को पूरा करने के लिए आंदोलन, प्रदर्शन करते रहे हैं, अब यहां वक्त के साथ मांगें पूरी कराने के लिए किए जाने वाले सत्याग्रहों का रूप बदल चला है। पहले जल सत्याग्रह हुआ, फिर जन सत्याग्रह व चिता सत्याग्रह हुआ और अब जीवन अधिकार सत्याग्रह शुरू हो गया है।
नर्मदा घाटी पर बन रहे पांच बांधों के प्रभावितों ने राजधानी भोपाल में डेरा डाला है। ओंकारेश्वर, इंदिरा, महेश्वर, मान व बेदा बांध के प्रभावित पहली बार अपनी मांगों को पूरा कराने के लिए एकजुट होकर राजधानी की सड़क पर उतरे हैं। नर्मदा बचाओ आंदोलन की अगुवाई में हजारों प्रभावित लोग शाहजहानी पार्क में डेरा डाले हुए हैं। वे पांच दिन तक यहां जीवन अधिकार सत्याग्रह करने जुटे हैं। वहीं पांच सदस्य प्रतीकात्मक तौर पर पांच दिन के उपवास पर हैं। वे नारा दे रहे हैं कि पुनर्वास व जमीन दो नहीं तो बांध खाली करो। साथ ही, सरकार को चुनाव में सबक सिखाने का भी वे खुलकर संकेत दे रहे हैं। प्रभावितों की मांग है कि पुनर्वास नीति का पालन किए जाने के साथ आठ सूत्री मांगें मानी जाएं।
नर्मदा बचाओ आंदोलन के आलोक अग्रवाल ने कहा कि ओंकारेश्वर व इंदिरा सागर बांध के प्रभावितों ने जल में रहकर सत्याग्रह किया था, उसे जल सत्याग्रह नाम दिया गया था, मगर आज पांच बांध के प्रभावित भोपाल में जमा हुए हैं और उन्हें अपना जीवन बचाना है, लिहाजा इसे जीवन अधिकार सत्याग्रह का नाम दिया गया है। अग्रवाल का कहना है कि नर्मदा घाटी के पांचों बांध वाले क्षेत्रों में 11 विधानसभा सीटें हरदा, हरसूद, खंडवा, मान्धाता, बागली, कन्नौद खातेगांव, कसरावद, महेश्वर, बडवाह, भीकनगांव, गंधवानी सीधे रूप से प्रभावित हो रही है। हर सीट पर हजारों प्रभावित मौजूद हैं, इसके अलावा इंदिरा सागर बांध से प्रभावित लोग अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में भी हैं। इस प्रकार कुल 15 से 20 सीटों पर नर्मदा घाटी के विस्थापित सीधा प्रभाव डाल सकते हैं। सरकार ने मांगें नहीं मानी तो विधानसभा चुनाव में उसे खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
जीवन अधिकार सत्याग्रह से पहले नर्मदा नदी पर बन रहे ओंकारेश्वर व इंदिरा सागर बांध के प्रभावितों ने जल सत्याग्रह कर प्रदेश ही नहीं, देश का ध्यान अपनी ओर खींचा था। एक पखवाड़े तक पानी में रहने वालों के शरीर में गलन पैदा हो गई थी, उसके बाद ही सरकार जागी थी और तीन मंत्रियों की समिति बनाकर प्रभावितों से बातचीत कर मांगें पूरी करने का भरोसा दिलाया था।
इसके अलावा कटनी जिले में बन रहे वेलस्पन बिजली संयंत्र के प्रभावितों ने अपने गांव में चिताएं बनाकर चिता सत्याग्रह किया था। गांव के लोग अपने खेतों में लकड़ी की चिताएं बना ली थीं और फिर उस पर बच्चों और महिलाओं के साथ मिट्टी तेल की शीशी हाथ में लेकर अनशन पर बैठे थे। इसके इतर समाजसेवी पी. राजगोपाल ने जनजातीय वर्ग के लोगों को जमीन का हक दिलाने के लिए जन सत्याग्रह किया था। इसके तहत उन्होंने ग्वालियर से दिल्ली तक की पदयात्रा की, मगर केंद्र सरकार आंदोलनकारियों के आगरा तक पहुंचने पर ही मांगों को मानने के लिए तैयार हो गई।
राज्य में प्रभावित लोग अपनी मांगों को पूरा कराने के लिए आंदोलन व प्रदर्शन के नए नए तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। पिछले सत्याग्रह में वे जहां लोगों का ध्यान खींचने में सफल रहे, वहीं मांगें मनवाने में भी सफलता हासिल की थी, अब देखना है कि 'जीवन अधिकार सत्याग्रह' कितना सफल होता है।
नर्मदा घाटी पर बन रहे पांच बांधों के प्रभावितों ने राजधानी भोपाल में डेरा डाला है। ओंकारेश्वर, इंदिरा, महेश्वर, मान व बेदा बांध के प्रभावित पहली बार अपनी मांगों को पूरा कराने के लिए एकजुट होकर राजधानी की सड़क पर उतरे हैं। नर्मदा बचाओ आंदोलन की अगुवाई में हजारों प्रभावित लोग शाहजहानी पार्क में डेरा डाले हुए हैं। वे पांच दिन तक यहां जीवन अधिकार सत्याग्रह करने जुटे हैं। वहीं पांच सदस्य प्रतीकात्मक तौर पर पांच दिन के उपवास पर हैं। वे नारा दे रहे हैं कि पुनर्वास व जमीन दो नहीं तो बांध खाली करो। साथ ही, सरकार को चुनाव में सबक सिखाने का भी वे खुलकर संकेत दे रहे हैं। प्रभावितों की मांग है कि पुनर्वास नीति का पालन किए जाने के साथ आठ सूत्री मांगें मानी जाएं।
नर्मदा बचाओ आंदोलन के आलोक अग्रवाल ने कहा कि ओंकारेश्वर व इंदिरा सागर बांध के प्रभावितों ने जल में रहकर सत्याग्रह किया था, उसे जल सत्याग्रह नाम दिया गया था, मगर आज पांच बांध के प्रभावित भोपाल में जमा हुए हैं और उन्हें अपना जीवन बचाना है, लिहाजा इसे जीवन अधिकार सत्याग्रह का नाम दिया गया है। अग्रवाल का कहना है कि नर्मदा घाटी के पांचों बांध वाले क्षेत्रों में 11 विधानसभा सीटें हरदा, हरसूद, खंडवा, मान्धाता, बागली, कन्नौद खातेगांव, कसरावद, महेश्वर, बडवाह, भीकनगांव, गंधवानी सीधे रूप से प्रभावित हो रही है। हर सीट पर हजारों प्रभावित मौजूद हैं, इसके अलावा इंदिरा सागर बांध से प्रभावित लोग अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में भी हैं। इस प्रकार कुल 15 से 20 सीटों पर नर्मदा घाटी के विस्थापित सीधा प्रभाव डाल सकते हैं। सरकार ने मांगें नहीं मानी तो विधानसभा चुनाव में उसे खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
जीवन अधिकार सत्याग्रह से पहले नर्मदा नदी पर बन रहे ओंकारेश्वर व इंदिरा सागर बांध के प्रभावितों ने जल सत्याग्रह कर प्रदेश ही नहीं, देश का ध्यान अपनी ओर खींचा था। एक पखवाड़े तक पानी में रहने वालों के शरीर में गलन पैदा हो गई थी, उसके बाद ही सरकार जागी थी और तीन मंत्रियों की समिति बनाकर प्रभावितों से बातचीत कर मांगें पूरी करने का भरोसा दिलाया था।
इसके अलावा कटनी जिले में बन रहे वेलस्पन बिजली संयंत्र के प्रभावितों ने अपने गांव में चिताएं बनाकर चिता सत्याग्रह किया था। गांव के लोग अपने खेतों में लकड़ी की चिताएं बना ली थीं और फिर उस पर बच्चों और महिलाओं के साथ मिट्टी तेल की शीशी हाथ में लेकर अनशन पर बैठे थे। इसके इतर समाजसेवी पी. राजगोपाल ने जनजातीय वर्ग के लोगों को जमीन का हक दिलाने के लिए जन सत्याग्रह किया था। इसके तहत उन्होंने ग्वालियर से दिल्ली तक की पदयात्रा की, मगर केंद्र सरकार आंदोलनकारियों के आगरा तक पहुंचने पर ही मांगों को मानने के लिए तैयार हो गई।
राज्य में प्रभावित लोग अपनी मांगों को पूरा कराने के लिए आंदोलन व प्रदर्शन के नए नए तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। पिछले सत्याग्रह में वे जहां लोगों का ध्यान खींचने में सफल रहे, वहीं मांगें मनवाने में भी सफलता हासिल की थी, अब देखना है कि 'जीवन अधिकार सत्याग्रह' कितना सफल होता है।

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