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Thursday, 27 June 2013

कैसे नसीब होगी दो जून की रोटी

केदारनाथ के रास्ते में तीर्थयात्रियों के लिए कुली, श्रमिक का काम करने वाले और तीर्थयात्रा के दौरान छोटी दुकानें लगा कर जीवनयापन करने वाले उत्तराखंड के सैंकड़ों ग्रामीण लापता हैं। आज हालात ये है कि कई कई गाँव ऐसे है जहा पुरुषो को कोई नामो निशान नहीं बचा है| अपने घरों को चलाने और अपने बीबी बच्चों का भरण पोषण करने के लिए स्थानीय ग्रामीण केदारनाथ और चार धाम यात्रा के दौरान छोटे छोटे काम करके पुरे साल कि कमाई इन चार महीनो में कर लिया करते थे| 

लोक विज्ञान संस्थान, देहरादून के निदेशक और राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के सदस्य (विशेषज्ञ) रवि चोपड़ा का कहना है, राष्ट्रीय समाचार माध्यमों ने चार धाम तीर्थयात्रा के चार तीर्थ स्थलों केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री में बारिश और बाढ़ की त्रासदी की खबर लगातार प्रकाशित-प्रसारित कर रहे हैं। लेकिन तीर्थस्थलों से आगे इस त्रासदी ने स्थानीय लोगों के जीवन में ज्यादा जटिल परिस्थिति पैदा की है। सबसे अहम उनसे जीवनयापन का जरिया छिन जाना है।

चोपड़ा के मुताबिक, मंदाकिनी घाटी के गांवों के सैंकड़ों लोग 14 किलोमीटर तीर्थयात्रा मार्ग पर बच्चों, महिलाओं या बुजुर्गो को अपनी पीठ पर ढोने, चिप्स या बोतल बंद पानी और बरसाती बेचने का काम करते रहे हैं और कई ढाबा चलाते रहे हैं। चोपड़ा ने कहा, इनमें से कई लोग लापता हैं। अब यात्रा सत्र समाप्त हो गया है और हम नहीं जानते कि यह फिर कब शुरू होगा। ग्रामीणों पर अत्यंत गहरा असर पड़ा है।उनके सहयोगी ने सूचना दी है कि 22 किलोमीटर दूर गुप्तकाशी के एक गांव के 78 लोग लापता हैं। ये लोग केदारनाथ में काम करते थे।

तीर्थयात्रा के अलावा ग्रामीण अपने जीवनयापन के लिए पर्यटकों के आने पर भी आश्रित होते हैं। चोपड़ा ने कहा, यही उनके जीवनयापन का मुख्य स्रोत है। त्रासदी में हजारों भवन और घर, पुल और सड़कें ध्वस्त हो गई हैं, जिससे पर्यटन पर अत्यंत बुरा प्रभाव पड़ेगा।

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