'केदारनाथ धाम' जहाँ हजारों श्रधालुओ की चहल-पहल रहती थी आज बाबा वहां अकेले खड़े है, निर्विकार निराकार| 'बाबा' भी शायद नाराज है नहीं तो वो उस गंगा को इतना कहर बरपाने देते जो उनकी जटाओ में अठखेलिया करती है। बाबा सही में नाराज है नहीं तो वो केदारनाथ जहाँ देश के कोने-कोने से भक्त हफ्तों की यात्रा करके पहुँचने के लिए बेताब रहते हैं वो बाबा का मंदिर आज मलबे के ढेर में तब्दील न हो जाता। बाबा नाराज है उन हुक्मरानों से जिन्होंने पहाड़ को सिर्फ दोहन की वस्तु समझा।
प्रकृति ने भी इंसान को बता दिया कि उसने उन्हें बनाया है इंसान ने उसे नहीं। आज प्रकृति अपने नुकसान का बदला ले रही है। नहीं तो पलक झपकते ही गंगा और उसकी सहायक नदियां इतना विकराल रूप नहीं ले लेती की हज़ारों लोगो की जान और खरबों का नुकसान चंद घंटो में हो जाता।
"Land Of God" यानि देवभूमि उत्तराखंड जहां पर आई आपदा में भगवान भी भारी भंवर में फंस गए है, वजह साफ है जिस तरह की आफत आसमान से हिमालय की पहाड़ियों पर उतरी, उसने उत्तराखंड में खौफ की वो तस्वीर पेश की जिसने उत्तरखंड को ही नहीं पूरे देश में डर पैदा कर दिया।
उत्तराखंड के नौ जिलों में प्रकृति ने जिस तरह से आफत बरसाई उसने पर्यटन में रूचि रखने वाले को उत्तराखंड जाने के नाम पर खौफ पैदा कर दिया है। उत्तराखंड से आ रही ख़बरों के मुताबिक, अभी तक जितना नुक्सान हुआ है उसे ठीक करने में करीब तीन साल का समय और खरबों रुपयें लगेंगे।
मई से नवम्बर महीने के बीच चलने वाली 'छोटा चार धाम यात्रा' में देश के सभी प्रान्तों से भक्त उत्तराखंड पहुँचते है। इन भक्तों की संख्या लाखो में होती है। करीब 6 महीने चलने वाली चारधाम यात्रा से सरकार को भारी राजस्व प्राप्त होता है।
उत्तराखंड के जिन नौ जिलों में प्रकृति ने अपना कहर बरपाया वो नौ जिले हमेशा से प्राकृतिक आपदा का शिकार होते रहे है। 20 अक्टूबर 1991 को राज्य के उत्तरकाशी जिले में आये भूकंप ने करीब हज़ार लोगो के जीवन को ख़त्म के दिया। उत्तरकाशी में आये भूकंप का केंद्र हिमालय की वो पहाड़िया बनी जहां कभी ज़िन्दगी अपनी पूरी रवानी पर रहती थी।
उत्तरकाशी में आये भूकंप ने देश को भी हिला दिया था, उस समय भी चारधाम की यात्रा चल रही है। देश के सभी हिस्सों से श्रद्धालु वहा पहुंचे थे, इस भूकंप में हज़ारो परिवार प्रभावित हुए थे| वहीँ, खरबों रुपयों की संपत्ति का नुकसान हुआ था।
आज फिर वैसे ही हालात है। पहाड़ और प्रकृति ने अपना विकराल रूप दिखाया है, हज़ारों लापता है, तो हज़ारो को खोजने में हलकान प्रशासन को कुछ सूझ नहीं रहा है तो वहीँ, मुख्यमंत्री और सरकार को लोगो के गुस्से का सामना करना पड़ रहा है।
उत्तराखंड को देवों की भूमि कहा जाता है, यमनोत्री, गंगोत्री, बदरीनाथ,केदारनाथ, हेमकुंड साहिब, रूद्रनाथ, पंच प्रयाग, देवप्रयाग, नन्ददेव ऐसे तीर्थ स्थल है जिनमे देश के हिन्दू, सिख और अलग अलग सम्प्रदाय के लोगो की आस्था है। हर साल लाखों यात्री अपने अराध्य के दर्शन के लिए उत्तराखंड की पावन धरती पर कदम रखते है।
9 नवम्बर 1999 को जब इस राज्य की स्थापना हुई थी तब राज्य को पर्यटन राज्य के तौर पर प्रचारित किया गया लेकिन अपनी विषम परिस्थितियों की वजह से उत्तराखंड का वो विकास नहीं हो सका जो इसे श्रेष्ठ राज्य के तौर पर स्थापित कर सके। उत्तराखंड में आज ज़िन्दगी ठहर गई है, प्रशासन और सरकार राहत और बचाव कार्य को लेकर फेल हो चुके है।
देश रो रहा है, सरकारे सिमित संसाधनों से लोगो को बचाने का प्रयास कर रही है। जिस समय बाढ़ और बारिश ने अपना तांडव किया उस समय चार धाम यात्रा की सड़क पर करीब 70 हज़ार सैलानी अपने अपने अराध्य के दर्शन के लिए निकले हुए थे। बारिश अपने पूरे शबाब पर थी 14 -15 जून की रात में आई भीषण बारिश और बाढ़ ने मात्र कुछ घंटो के अन्दर राज्य के 9 जिलों की तस्वीर बदल दी।
एक हफ्ते बीतने के बाद भी चार धाम की यात्रा पर निकले हज़ारों लोग लापता है। सेना ITBP के जवान और BRO के कर्मचारी दिन रात एक कर तीर्थ यात्रियों को बचाने के प्रयास में लगे हुए है। सरकार मौके से भाग रही है, अधिकारी कर्मचारी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ रहे। देश के कोने कोने से लोग अपनों का हाल जानने के लिए बेहाल है।
देश के हर कोने के किसी न किसी घर से सिसकियों की आवाज आ रही है| किसी के माता-पिता किसी का भाई तो किसी का बेटा कोई ना कोई लापता है, जानकारी के अभाव में दिल चाक-चाक हो रहा है साथ ही एक अंजाना डर भी कही प्रकृति ने उन्हें अपनी गोद में तो नहीं छुपा लिया।
बहरहाल आज उतराखंड की हर खबर उन लोगो के लिए एक उम्मीद है जिन्होंने अपनों को फिलहाल के लिए खो दिया है। केंद्र सरकार राहत और बचाव कार्य में लगी हुई है वही सिमित संसाधनों में सेना और अर्धसैनिक बालों के जवान कुछ लोगो के चेहरे पर मुस्कान बिखेर रहे है वहीँ, कुछ को मायूसी भी हाथ लग रही है।
खैर सरकार और खुद आम आदमी को अपने क्षणिक फायदे के लिए प्रकृति से खिलवाड़ नहीं करना चाहिए नहीं तो जो प्रकृति ने बाबा की मौन सहमती से अपना रौद्र रूप दिखाया और अपने तांडव पर मनुष्य को नचाया कही ऐसा ना हो कि बाबा के दर्शन के लिए तीन नहीं तीस साल का लंबा इंतज़ार करना पड़े|

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