धर्म निरपेक्षता की परिभाषा देश में बदल चुकी है। भारत को विश्व में एक मात्र धर्म निरपेक्ष राष्ट्र माना जाता है। यहाँ की राजनीति, लोगो के सोचने का तरीका और सत्ता सुख के लिए अपने हिसाब से पार्टियों के साथ खड़े होना और मतलब निकल जाने के बाद साथ छोड़ना देश में राजनीति करने वाली पार्टियों का शगल रहा है।
ताज़ा मिसाल है जदयू और भाजपा के गठबंधन के टूटने का, एक सिद्धांत और नीति लेकर करीब आई दोनों पार्टियों में राष्ट्रीय एजेंडे को लेकर मतभेद हुआ या एक व्यक्ति की बढ़त ने दूसरी पार्टी के नेताओं को इतना बेचैन कर दिया की उन्हें अपनी राजनीति ही खतरे में पड़ती नज़र आई ।
भाजपा और जदयू के टूटने में वैचारिक मतभेद से ज्यादा राजनीतिक महत्वकांक्षा दिखाई दी। नरेन्द्र मोदी के नाम पर शुरू हुए इस विवाद ने सत्रह साल पुराने गठबंधन को तोड़ दिया। आने वाले चुनावों में ये देखना दिलचस्प होगा की इस गठबंधन के टूटने से किसको लाभ होता है और कौन अपनी राजनीति को बचाने के लिए अपनी महत्वकांक्षा को गिरवी रखता है।
भाजपा 2004 से लगातार दो चुनाव हार चुकी है। 2004 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में लड़ा गया आम चुनाव भाजपा को धरती दिखा गया था। उस चुनाव में चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेई के चहेते स्वर्गीय प्रमोद महाजन थे जिन्होंने इंडिया शाइनिंग का नारा देकर पूरे देश में दूध दही की नदिया बहा दी थी।
इंडिया शाइनिंग कर रहा था सभी दिग्गज नेता हवा में उड़ कर मतदाताओ को अपनी उपलब्धिया बता रहे थे। जिस जदयू और भाजपा के कार्यकर्ता आज आपस में राजधानी पटना की सडको पर एक दूसरे को मारने पर आमदा है उन दोनों दलों की औकात और वोट को लालू यादव की राजद ने 22 सीटे जीतकर आसमान दिखा दिया था। आज जदयू के दोनों दिग्गज शरद यादव और नीतीश कुमार भविष्य की राजनीति और धर्म निरपेक्षता की दुहाई देकर जिस तरह से राजग से अलग हुए है उनकी बिसात 2004 के चुनावों में क्या थी ये चुनावी परिणाम खुद बयान कर रहे है।
2004 आते आते दोनों पार्टियों की सही स्थिति का आंकलन गलत साबित हुआ और उन्हें चुनावों के बाद आये रिजल्ट ने सकते में डाल दिया। हतोत्साहित राजग इस हार को भूल कर आगे बढ़ा और उसने विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू की। आज जिस मोदी को लेकर जदयू के नेता अपनी नाक सिकोड़ रहे है वही मोदी उस समय स्टार प्रचारक के तौर पर पूरे देश में चुनावी सभायें कर रहे थे।
2004 के आम चुनावों में जदयू को 6 सीट और भाजपा को 5 सीट मिली थी, वही लालू यादव की राजद को 22 और रामविलास पासवान की लोकजन शक्ति पार्टी को 4 जबकि कांग्रेस ने 3 सीट जीतकर बिहार में खुद को खत्म होने से बचा लिया था। 1996 में जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का गठन हुआ था उसके बाद हुए जनरल इलेक्शन में भाजपा और जदयू ने अविभाजित बिहार में 41 सीट जीतकर इतिहास रच दिया था।
जदयू की बिहार में मिली सफलता अकेले की नहीं है, 2009 में जिस तरह दोनों पार्टियों ने संयुक्त लड़कर बिहार से राजद और लोकजन शक्ति पार्टी का सफाया किया वो अकेले नीतीश कुमार और उनकी पार्टी के बस की बात नहीं थी। अगड़ो और पिछडो के साथ मुस्लिम वोट बैंक को अपने पाले में लाकर राजग गठबंधन बिहार की 40 लोकसभा सीटो में से 32 सीट अपने यानि राजग के खाते में डाली थी।
आज जदयू और भाजपा एक दुसरे के ऊपर गठबंधन तोड़ने का आरोप लगा रही है। भाजपा ने नीतीश सरकार को सत्ता छोड़कर दुबारा जनादेश लेने की मांग की है। बिहार भाजपा अध्यक्ष मंगल पांडे का कहना है जनता ने राजग को वोट दिया था न सिर्फ नीतीश कुमार की जदयू को, उन्होंने गठबंधन धर्म का पालन न कर जनता के साथ दगा किया है इसलिये उन्हें इस्तीफा देकर चुनावों में उतरना चाहिए।
बिहार में लगातार दो बार से सत्ता पर कब्ज़ा ज़माने वाली राजग की दोनों मुख्य पार्टिया भाजपा और जदयू आज अलग अलग हो चुकी है। नीतीश कुमार और शरद यादव का ये कहना है की भाजपा अपने बुजुर्ग नेताओं को दरकिनार कर रही है जबकि शरद, नीतीश को राजनीति का ककहरा सिखाने वाले जार्ज फर्नाडिस को उनके चेलों ने कहा पहुंचा दिया ये भारतीय राजनीति में रूचि रखने वालों से छुपा नहीं है।
नीतीश कुमार और शरद यादव ने संयुक्त पत्रकार वार्ता में कहा आज भाजपा में अटल- आडवाणी जैसा कोई नेता नहीं जो सबको साथ लेकर चले। राजग का गठबंधन जब बना था तब उसकी कमान अटल आडवाणी जैसे नेताओं के हाथ में थी। नीतीश कुमार और शरद यादव के बयानों में कितना सच और कितना झूठ छुपा है ये उन्हें 2004 के बाद ही पता चल जाना चाहिए था।
2004 के लोकसभा चुनावों में राजग बुरी तरह हारी वही अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा को पूरा करने के लिए नीतीश कुमार और शरद यादव ने 2005 के विधानसभा चुनावों का इंतज़ार किया चुनाव हुए भाजपा - जदयू गठबंधन सत्ता में आया उस समय नीतीश और शरद को नरेन्द्र मोदी और भाजपा का कम्युनल चेहरा नजर नहीं आया था जबकि गुजरात दंगो को करीब 4 साल बीत गए थे।
आज नीतीश कुमार और शरद यादव सुचिता, कामन मिनिमम प्रोग्राम और चरित्र की बात कर रहे है, जबकि जदयू की सुचिता और चरित्र साफ़ दिखाई दे रहा है। भाजपा ने इस्तीफा देकर नया जनादेश प्राप्त करने की मांग की है नीतीश कुमार और जदयू में राजनीतिक चरित्र होता तो शायद वो पहले इस्तीफा देते उसके बाद गठबंधन तोड़ते।
कर्पूरी ठाकुर, राम मनोहर लोहिया, राजनारायण के चेलों को शायद सत्ता के आगे कुछ भी नहीं दिखता। यही वजह है कि भाजपा ने सरकार नीतीश कुमार और जदयू के खिलाफ एक दिन का बिहार बंद का आह्वान कर विश्वासघात दिवस मनाया, भाजपा जदयू की पुरानी साथी थी जदयू में थोड़ी भी सुचिता रहती तो शायद पार्टी और उनके कार्यकर्ता भाजपा के बंद और विश्वासघात दिवस के विरोध में सड़को पर नहीं आते और ना ही हिंसक झडपें होती।
बहरहाल जिस नरेन्द्र मोदी के विरोध में नीतीश कुमार और शरद यादव ने अपनी पार्टी जदयू को राजग से अलग किया उसी नरेन्द्र मोदी का नाम आज बिहार भाजपा ने अपने नारों में शामिल कर बिहार के सभी जिलों और सड़को पर गुंजायमान कर दिया। जिस नरेन्द्र मोदी के व्यक्तित्व से नीतीश कुमार को डर लग रहा था आज उसी नरेन्द्र मोदी ने अपने व्यक्तित्व के दर्शन बिहार गए बिना दिखा दिया|
भाजपा और जनता दल यूनाइटेड की राहे जुदा हो चुकी है, भाजपा और जदयू को बिहार में अपनी अपनी स्थिति का सही आंकलन आने वाले चुनावों और 2015 के विधानसभा चुनावों में लग जाएगा। लेकिन इतना तो तय है कि नीतीश और शरद यादव अवसरवादी राजनीति के पैरोकार रहे है। जो इन दोनों के पुराने साथी और रहनुमा लालू यादव के इस बयान से पता चलता है कि नीतीश कुमार सत्ता चिपकू नेता है और अवसरवादिता उनमें कूट-कूट कर भरी है।
ताज़ा मिसाल है जदयू और भाजपा के गठबंधन के टूटने का, एक सिद्धांत और नीति लेकर करीब आई दोनों पार्टियों में राष्ट्रीय एजेंडे को लेकर मतभेद हुआ या एक व्यक्ति की बढ़त ने दूसरी पार्टी के नेताओं को इतना बेचैन कर दिया की उन्हें अपनी राजनीति ही खतरे में पड़ती नज़र आई ।
भाजपा और जदयू के टूटने में वैचारिक मतभेद से ज्यादा राजनीतिक महत्वकांक्षा दिखाई दी। नरेन्द्र मोदी के नाम पर शुरू हुए इस विवाद ने सत्रह साल पुराने गठबंधन को तोड़ दिया। आने वाले चुनावों में ये देखना दिलचस्प होगा की इस गठबंधन के टूटने से किसको लाभ होता है और कौन अपनी राजनीति को बचाने के लिए अपनी महत्वकांक्षा को गिरवी रखता है।
भाजपा 2004 से लगातार दो चुनाव हार चुकी है। 2004 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में लड़ा गया आम चुनाव भाजपा को धरती दिखा गया था। उस चुनाव में चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेई के चहेते स्वर्गीय प्रमोद महाजन थे जिन्होंने इंडिया शाइनिंग का नारा देकर पूरे देश में दूध दही की नदिया बहा दी थी।
इंडिया शाइनिंग कर रहा था सभी दिग्गज नेता हवा में उड़ कर मतदाताओ को अपनी उपलब्धिया बता रहे थे। जिस जदयू और भाजपा के कार्यकर्ता आज आपस में राजधानी पटना की सडको पर एक दूसरे को मारने पर आमदा है उन दोनों दलों की औकात और वोट को लालू यादव की राजद ने 22 सीटे जीतकर आसमान दिखा दिया था। आज जदयू के दोनों दिग्गज शरद यादव और नीतीश कुमार भविष्य की राजनीति और धर्म निरपेक्षता की दुहाई देकर जिस तरह से राजग से अलग हुए है उनकी बिसात 2004 के चुनावों में क्या थी ये चुनावी परिणाम खुद बयान कर रहे है।
2004 आते आते दोनों पार्टियों की सही स्थिति का आंकलन गलत साबित हुआ और उन्हें चुनावों के बाद आये रिजल्ट ने सकते में डाल दिया। हतोत्साहित राजग इस हार को भूल कर आगे बढ़ा और उसने विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू की। आज जिस मोदी को लेकर जदयू के नेता अपनी नाक सिकोड़ रहे है वही मोदी उस समय स्टार प्रचारक के तौर पर पूरे देश में चुनावी सभायें कर रहे थे।
2004 के आम चुनावों में जदयू को 6 सीट और भाजपा को 5 सीट मिली थी, वही लालू यादव की राजद को 22 और रामविलास पासवान की लोकजन शक्ति पार्टी को 4 जबकि कांग्रेस ने 3 सीट जीतकर बिहार में खुद को खत्म होने से बचा लिया था। 1996 में जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का गठन हुआ था उसके बाद हुए जनरल इलेक्शन में भाजपा और जदयू ने अविभाजित बिहार में 41 सीट जीतकर इतिहास रच दिया था।
जदयू की बिहार में मिली सफलता अकेले की नहीं है, 2009 में जिस तरह दोनों पार्टियों ने संयुक्त लड़कर बिहार से राजद और लोकजन शक्ति पार्टी का सफाया किया वो अकेले नीतीश कुमार और उनकी पार्टी के बस की बात नहीं थी। अगड़ो और पिछडो के साथ मुस्लिम वोट बैंक को अपने पाले में लाकर राजग गठबंधन बिहार की 40 लोकसभा सीटो में से 32 सीट अपने यानि राजग के खाते में डाली थी।
आज जदयू और भाजपा एक दुसरे के ऊपर गठबंधन तोड़ने का आरोप लगा रही है। भाजपा ने नीतीश सरकार को सत्ता छोड़कर दुबारा जनादेश लेने की मांग की है। बिहार भाजपा अध्यक्ष मंगल पांडे का कहना है जनता ने राजग को वोट दिया था न सिर्फ नीतीश कुमार की जदयू को, उन्होंने गठबंधन धर्म का पालन न कर जनता के साथ दगा किया है इसलिये उन्हें इस्तीफा देकर चुनावों में उतरना चाहिए।
बिहार में लगातार दो बार से सत्ता पर कब्ज़ा ज़माने वाली राजग की दोनों मुख्य पार्टिया भाजपा और जदयू आज अलग अलग हो चुकी है। नीतीश कुमार और शरद यादव का ये कहना है की भाजपा अपने बुजुर्ग नेताओं को दरकिनार कर रही है जबकि शरद, नीतीश को राजनीति का ककहरा सिखाने वाले जार्ज फर्नाडिस को उनके चेलों ने कहा पहुंचा दिया ये भारतीय राजनीति में रूचि रखने वालों से छुपा नहीं है।
नीतीश कुमार और शरद यादव ने संयुक्त पत्रकार वार्ता में कहा आज भाजपा में अटल- आडवाणी जैसा कोई नेता नहीं जो सबको साथ लेकर चले। राजग का गठबंधन जब बना था तब उसकी कमान अटल आडवाणी जैसे नेताओं के हाथ में थी। नीतीश कुमार और शरद यादव के बयानों में कितना सच और कितना झूठ छुपा है ये उन्हें 2004 के बाद ही पता चल जाना चाहिए था।
2004 के लोकसभा चुनावों में राजग बुरी तरह हारी वही अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा को पूरा करने के लिए नीतीश कुमार और शरद यादव ने 2005 के विधानसभा चुनावों का इंतज़ार किया चुनाव हुए भाजपा - जदयू गठबंधन सत्ता में आया उस समय नीतीश और शरद को नरेन्द्र मोदी और भाजपा का कम्युनल चेहरा नजर नहीं आया था जबकि गुजरात दंगो को करीब 4 साल बीत गए थे।
आज नीतीश कुमार और शरद यादव सुचिता, कामन मिनिमम प्रोग्राम और चरित्र की बात कर रहे है, जबकि जदयू की सुचिता और चरित्र साफ़ दिखाई दे रहा है। भाजपा ने इस्तीफा देकर नया जनादेश प्राप्त करने की मांग की है नीतीश कुमार और जदयू में राजनीतिक चरित्र होता तो शायद वो पहले इस्तीफा देते उसके बाद गठबंधन तोड़ते।
कर्पूरी ठाकुर, राम मनोहर लोहिया, राजनारायण के चेलों को शायद सत्ता के आगे कुछ भी नहीं दिखता। यही वजह है कि भाजपा ने सरकार नीतीश कुमार और जदयू के खिलाफ एक दिन का बिहार बंद का आह्वान कर विश्वासघात दिवस मनाया, भाजपा जदयू की पुरानी साथी थी जदयू में थोड़ी भी सुचिता रहती तो शायद पार्टी और उनके कार्यकर्ता भाजपा के बंद और विश्वासघात दिवस के विरोध में सड़को पर नहीं आते और ना ही हिंसक झडपें होती।
बहरहाल जिस नरेन्द्र मोदी के विरोध में नीतीश कुमार और शरद यादव ने अपनी पार्टी जदयू को राजग से अलग किया उसी नरेन्द्र मोदी का नाम आज बिहार भाजपा ने अपने नारों में शामिल कर बिहार के सभी जिलों और सड़को पर गुंजायमान कर दिया। जिस नरेन्द्र मोदी के व्यक्तित्व से नीतीश कुमार को डर लग रहा था आज उसी नरेन्द्र मोदी ने अपने व्यक्तित्व के दर्शन बिहार गए बिना दिखा दिया|
भाजपा और जनता दल यूनाइटेड की राहे जुदा हो चुकी है, भाजपा और जदयू को बिहार में अपनी अपनी स्थिति का सही आंकलन आने वाले चुनावों और 2015 के विधानसभा चुनावों में लग जाएगा। लेकिन इतना तो तय है कि नीतीश और शरद यादव अवसरवादी राजनीति के पैरोकार रहे है। जो इन दोनों के पुराने साथी और रहनुमा लालू यादव के इस बयान से पता चलता है कि नीतीश कुमार सत्ता चिपकू नेता है और अवसरवादिता उनमें कूट-कूट कर भरी है।

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