लोकसभा चुनाव की बिसात धीरे धीरे बिछ रही है। मीडिया हाउस के ओपेनियन पोल भी जोर शोर से भारतीय जनमानस को दिखाये जा रहे है। नमो जहा प्रधानमंत्री को लगातार खुले मंच से ललकार रहे है परिणामो को लेकर चिंतित भी दिख रहे है, चुनाव परिणामों को अपने पक्ष में करने के लिए नमो के नाम से मशहूर हो चुके नरेन्द्र मोदी वो सभी हथकंडे अपना रहे है जो भाजपा की शब्दावली में नहीं है।
हाल में ही जारी ओपेनियन पोल में भाजपा को हालांकि और पार्टियों से बढ़त हासिल हुई है लेकिन बिहार में जदयू के अलग होने से ख़ासा नुक्सान भी उठाना पड़ रहा है। नरेन्द्र मोदी और भाजपा नेतृत्व इस बात को अच्छी तरह से जानता है कि बिहार के नुकसान और जदयू के अलग होने की भरपाई उसे कही न कही से करनी पड़ेगी।
नरेन्द्र मोदी और उनकी टीम बिहार में पार्टी की संभावनाओं को जीवित रखने के लिए ऐसे नेताओं की तलाश में है जिनका वहा की राजनीति पर असर के साथ नाम भी हो, भार की राजनीति में नब्बे के दशक में राष्ट्रीय जनता दल की सरकार में लालू यादव और राबड़ी देवी के बाद किसी व्यक्ति या राजनेता की तूती बोलती थी तो वो थे लालू यादव के साले साधू यादव जिनके आदेश पर ही बिहार की सरकारी मशीनरी इधर से उधर होती थी।
लालू यादव के साले साधू की अपने जीजा से ऐसी खटकी कि उन्होंने सरकार जाते ही उनका साथ छोड़ कांग्रेस का दामन थाम लिया लेकिन जिस सुरक्षित राजनीति की तलाश में साधू थे वो ठिकाना कांग्रेस में नहीं मिला और राजनीति के हाशिये पर चले गए, बीते एक दशक से गुमनामी के अंतहीन सागर में डूबने वाले साधू यादव अचानक चर्चा में आ गए, साधू यादव को मिलने के लिए भारतीय राजनीति में चर्चा का विषय बन चुके गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बुला भेजा।
साधू यादव और नरेन्द्र मोदी की मुलाकात गांधीनगर में हुई| इस मुलाकात के कई मायने निकाले जा रहे है| साधू अकेले नरेन्द्र मोदी से मिलने नहीं गए| वो अपने साथ बिहार कांग्रेस के एक और कद्दावर नेता दसई चौधरी को भी साथ ले गए। नरेन्द्र मोदी और इन दोनों नेताओं की मुलाक़ात के अब कई मायने निकाले जा रहे है। नरेन्द्र मोदी बिहार में उनकी वजह से हुई क्षति की भरपाई करना चाहते है| साथ ही भाजपा के पाले से जो पिछड़ा वोट निकलता जा रहा है, उसे वापस पार्टी के साथ जोड़ने का रास्ता तलाश रहे है।
नरेन्द्र मोदी को साधू यादव के रूप में बिहार की राजनीति और वहा के वोटर का मूड भापने वाला एक नेता मिल सकता है तो वही बिहार की राजनीति में गुमनामी में जा चुके साधू यादव और दसई चौधरी को अपनी खोई जमीन पाने का मौक़ा। नरेन्द्र मोदी और साधू यादव की इस मुलाकात के कई मायने भी हो सकते है, मोदी साधू के बहाने लालू को भी चोट पहुंचा सकते है, साथ नीतीश कुमार को उनकी दगाबाजी के लिए सबक भी सिखा सकते है।
बहरहाल नरेन्द्र मोदी और साधू यादव की मुलाकात बिहार की राजनीति में नये गठजोड़ की तरफ इशारा कर रही है, या ये भी हो सकता है नरेन्द्र मोदी का करिश्मा साधू और दसई को भाजपा में शामिल करा दे, अगर ऐसा हुआ तो साधू की वजह से लालू और नीतीश की मुश्किलें थोड़ी बढ़ सकती है| वही भाजपा को एक और स्थानीय क्षत्रप मिल सकता है।
हाल में ही जारी ओपेनियन पोल में भाजपा को हालांकि और पार्टियों से बढ़त हासिल हुई है लेकिन बिहार में जदयू के अलग होने से ख़ासा नुक्सान भी उठाना पड़ रहा है। नरेन्द्र मोदी और भाजपा नेतृत्व इस बात को अच्छी तरह से जानता है कि बिहार के नुकसान और जदयू के अलग होने की भरपाई उसे कही न कही से करनी पड़ेगी।
नरेन्द्र मोदी और उनकी टीम बिहार में पार्टी की संभावनाओं को जीवित रखने के लिए ऐसे नेताओं की तलाश में है जिनका वहा की राजनीति पर असर के साथ नाम भी हो, भार की राजनीति में नब्बे के दशक में राष्ट्रीय जनता दल की सरकार में लालू यादव और राबड़ी देवी के बाद किसी व्यक्ति या राजनेता की तूती बोलती थी तो वो थे लालू यादव के साले साधू यादव जिनके आदेश पर ही बिहार की सरकारी मशीनरी इधर से उधर होती थी।
लालू यादव के साले साधू की अपने जीजा से ऐसी खटकी कि उन्होंने सरकार जाते ही उनका साथ छोड़ कांग्रेस का दामन थाम लिया लेकिन जिस सुरक्षित राजनीति की तलाश में साधू थे वो ठिकाना कांग्रेस में नहीं मिला और राजनीति के हाशिये पर चले गए, बीते एक दशक से गुमनामी के अंतहीन सागर में डूबने वाले साधू यादव अचानक चर्चा में आ गए, साधू यादव को मिलने के लिए भारतीय राजनीति में चर्चा का विषय बन चुके गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बुला भेजा।
साधू यादव और नरेन्द्र मोदी की मुलाकात गांधीनगर में हुई| इस मुलाकात के कई मायने निकाले जा रहे है| साधू अकेले नरेन्द्र मोदी से मिलने नहीं गए| वो अपने साथ बिहार कांग्रेस के एक और कद्दावर नेता दसई चौधरी को भी साथ ले गए। नरेन्द्र मोदी और इन दोनों नेताओं की मुलाक़ात के अब कई मायने निकाले जा रहे है। नरेन्द्र मोदी बिहार में उनकी वजह से हुई क्षति की भरपाई करना चाहते है| साथ ही भाजपा के पाले से जो पिछड़ा वोट निकलता जा रहा है, उसे वापस पार्टी के साथ जोड़ने का रास्ता तलाश रहे है।
नरेन्द्र मोदी को साधू यादव के रूप में बिहार की राजनीति और वहा के वोटर का मूड भापने वाला एक नेता मिल सकता है तो वही बिहार की राजनीति में गुमनामी में जा चुके साधू यादव और दसई चौधरी को अपनी खोई जमीन पाने का मौक़ा। नरेन्द्र मोदी और साधू यादव की इस मुलाकात के कई मायने भी हो सकते है, मोदी साधू के बहाने लालू को भी चोट पहुंचा सकते है, साथ नीतीश कुमार को उनकी दगाबाजी के लिए सबक भी सिखा सकते है।
बहरहाल नरेन्द्र मोदी और साधू यादव की मुलाकात बिहार की राजनीति में नये गठजोड़ की तरफ इशारा कर रही है, या ये भी हो सकता है नरेन्द्र मोदी का करिश्मा साधू और दसई को भाजपा में शामिल करा दे, अगर ऐसा हुआ तो साधू की वजह से लालू और नीतीश की मुश्किलें थोड़ी बढ़ सकती है| वही भाजपा को एक और स्थानीय क्षत्रप मिल सकता है।
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