पिछले 100 वर्षो के अपने जीवनकाल में सिनेमा ने, खासकर हिंदी सिनेमा ने फिल्मों के सार तत्व को बेहतर तरीके से परिभाषित किया है। फिल्मकार मनमोहन देसाई की 1977 में आई फिल्म 'अमर अकबर एंथनी' ऐसी ही बेहतरीन फिल्मों का एक उदाहरण है।
अपनी जबरदस्त व्यवसायिक सफलता से इतर यह फिल्म भारतीय राष्ट्रवाद के मूल में निहित बहुलतावाद और आश्चर्यजनक समन्वयन का संदेश देने में कामयाब रही थी। देसाई ने बड़ी ही खूबसूरती से फिल्म में मुखर और स्पष्ट तरीके से तीन अलग-अलग धर्म समुदायों में जन्मे और पले-बढ़े युवकों के बीच गहरी मित्रता और सौहार्द्र को दिखाया है।
आज जब टीवी पर अतिशयोक्ति पूर्ण विचारों वाले लोग 'हिंदू राष्ट्रवाद' का मतलब अपने-अपने तरीके से बखानने में लगे हैं, 'अमर अकबर एंथनी' जैसी फिल्म को फिर से देखा जाना काफी उपयोगी सिद्ध हो सकता है। अनुभवी पत्रकार और लेखक सिद्धार्थ भाटिया की आने वाली पुस्तक 'अमर अकबर एंथनी-मसाला, मैडनेस एंड मनमोहन देसाई' फिल्म के धर्मनिरेक्ष स्वर और रंग के बारे में बात करती है।
भाटिया ने एक साक्षात्कार में कहा, मनमोहन देसाई अपने संदेश को जबरदस्ती लोगों तक नहीं पहुंचा रहे थे, बल्कि उनकी फिल्म 'अमर अकबर एंथनी' खुद ही एक संदेश थी। हिंदी सिनेमा ने भारत की धर्मनिपेक्षता की नीति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और 'अमर अकबर एंथनी' इसका एक उदाहरण है।
भाटिया से यह पूछे जाने पर कि उनके अनुसार फिल्म के तीन मजबूत पक्ष कौन-कौन से हैं, उन्होंने कहा, "फिल्म कहीं पर भी उबाऊ नहीं है, इसकी गति कहीं भी धीमी नहीं पड़ती। आज 40 साल बाद भी फिल्म उतनी ही ताजा और नई है। क्या आज कोई फिल्म ऐसी है, जो आज से 40 साल बाद भी आपको नई लगे। फिल्म 'अमर अकबर एंथनी' आप आज भी देखें तो फिल्म आपको हंसाने में सक्षम है।
अपनी जबरदस्त व्यवसायिक सफलता से इतर यह फिल्म भारतीय राष्ट्रवाद के मूल में निहित बहुलतावाद और आश्चर्यजनक समन्वयन का संदेश देने में कामयाब रही थी। देसाई ने बड़ी ही खूबसूरती से फिल्म में मुखर और स्पष्ट तरीके से तीन अलग-अलग धर्म समुदायों में जन्मे और पले-बढ़े युवकों के बीच गहरी मित्रता और सौहार्द्र को दिखाया है।
आज जब टीवी पर अतिशयोक्ति पूर्ण विचारों वाले लोग 'हिंदू राष्ट्रवाद' का मतलब अपने-अपने तरीके से बखानने में लगे हैं, 'अमर अकबर एंथनी' जैसी फिल्म को फिर से देखा जाना काफी उपयोगी सिद्ध हो सकता है। अनुभवी पत्रकार और लेखक सिद्धार्थ भाटिया की आने वाली पुस्तक 'अमर अकबर एंथनी-मसाला, मैडनेस एंड मनमोहन देसाई' फिल्म के धर्मनिरेक्ष स्वर और रंग के बारे में बात करती है।
भाटिया ने एक साक्षात्कार में कहा, मनमोहन देसाई अपने संदेश को जबरदस्ती लोगों तक नहीं पहुंचा रहे थे, बल्कि उनकी फिल्म 'अमर अकबर एंथनी' खुद ही एक संदेश थी। हिंदी सिनेमा ने भारत की धर्मनिपेक्षता की नीति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और 'अमर अकबर एंथनी' इसका एक उदाहरण है।
भाटिया से यह पूछे जाने पर कि उनके अनुसार फिल्म के तीन मजबूत पक्ष कौन-कौन से हैं, उन्होंने कहा, "फिल्म कहीं पर भी उबाऊ नहीं है, इसकी गति कहीं भी धीमी नहीं पड़ती। आज 40 साल बाद भी फिल्म उतनी ही ताजा और नई है। क्या आज कोई फिल्म ऐसी है, जो आज से 40 साल बाद भी आपको नई लगे। फिल्म 'अमर अकबर एंथनी' आप आज भी देखें तो फिल्म आपको हंसाने में सक्षम है।
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