उत्तर प्रदेश के 30 सरकारी विभागों के 85 योजनाओं में अब प्रदेश के मुस्लिमों के लिए अखिलेश सरकार ने 20 प्रतिशत कोटा की घोषणा करके बड़ी राजनीतिक गति हासिल कर ली है। लोकसभा चुनावों से पहले अखिलेश सरकार के इस मास्टर स्ट्रोक ने प्रदेश में राजनीति करने वाली पार्टियों को मीलों पीछे छोड़ दिया है, अखिलेश सरकार के इस फैसले से मुस्लिम राजनीति करने वाले दल भी अपनी रणनीति पर पुनर्विचार को बाध्य हो गए है।
अखिलेश सरकार के इस फैसले से जहाँ एक तरफ मुस्लिम तुष्टिकरण को साबित कर दिया है वही, अन्य जातियों में गुस्सा भी भर दिया है। सरकार ने अपने इस फैसले में कहा है कि ये योजना उन्ही इलाकों में लागू होगी जहां की आबादी में मुस्लिम परिवारों की संख्या 25 प्रतिशत होगी।
सरकार का ये फैसला इस ओर भी इशारा करता है कि सरकार अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत करने के लिए समाज में विभेद पैदा कर रही है। सरकार को अब शायद समाज में हिन्दू वर्ग के वो गरीब नहीं दिखाई दे रहे है जिन्हें अल्पसंख्यक समाज की तरह ही विकास और योजनाओं में भागीदारी की जरुरत है। अखिलेश सरकार के इस फैसले ने समाज के एक बड़े वर्ग में गुस्सा भरने का काम किया है।
अखिलेश सरकार और समाजवादी पार्टी पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगते रहे है, इन आरोपों को कैबिनेट के इस फैसले ने सही साबित कर दिया है। अखिलेश सरकार ने अपने इस फैसले से उस तबके के लोगो को निराशा कर दिया जिन्हें प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से अपना जीवन स्तर और अपने क्षेत्र में विकास की उम्मीदे लगा रखी थी।
प्रदेश में 2001 की जनगणना के अनुसार, करीब 20 प्रतिशत अल्पसंख्यक है, जिनमे मुस्लिम धर्म को मानने वाले करीब 19 प्रतिशत हैं, सरकार ने अल्पसंख्यक शब्द का इस्तेमाल कर अपने उस बड़े वोट बैंक को खुश कर दिया जिसके सहारे वो आने वाले चुनाव और भविष्य की राजनीति करना चाहती है।
अखिलेश सरकार के इस फैसले ने प्रदेश के 80 प्रतिशत आबादी को उनके भाग्य के सहारे छोड़ दिया जबकि राजधर्म की परिभाषा ये कहती है, राज में सभी वर्ग के लोगो का विकास सामान तौर पर होना चाहिये, राज करने वाली पार्टी और उसके अगुवा की नज़रों में कोई अलग नहीं होता।
2011 की जनगणना के अनुसार, उत्तर प्रदेश की जनसंख्या पर नज़र डाली जाए तो यहाँ की आबादी करीब 20 करोड़ है, इस आबादी में अल्पसंख्यक 4 करोड़ है उसमें मुस्लिम धर्म को मानने वाले करीब 3. 60 करोड़ है सरकार ने इसी वोट बैंक को साधने के लिए इस फैसले को किया। प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस फैसले को सच्चर कमिटी की रिपोर्ट के आधार पर सही ठहराते हुये अब केंद्र को दबाव में लाने की वकालत भी शुरू कर दी है।
सरकार के इस फैसले को उन्होंने अपना चुनावी वादा पूरा करने वाला बताया है। अखिलेश यादव ने कहा कि उन्होंने चुनाव के घोषणा पत्र में ये वादा किया था की अल्पसंख्यकों को आर्थिक और सामाजिक रूप से आगे बढ़ाने के वादे पर अमल करते हुए राज्य सरकार ने सच्चर और रंगनाथ मिश्रा कमेटियों की रिपोर्ट को आगे बढ़ाने की दिशा में कदम बढ़ाया है।
सरकार ने इस फैसले को लेने में प्रदेश के जातीय समीकरण का भरपूर लाभ उठाया हैं। प्रदेश के जातिगत ढाँचे पर नज़र डाली जाए तो उत्तर प्रदेश का जातिगति ढांचा अन्य प्रदेशो से विपरीत परिस्थतियों वाला है यही वजह है कि भारत में जाति की राजनीति की नीवं डालने वाला उत्तर प्रदेश आज अलग अलग जातियों और समुदायों में बंट गया हैं।
समाजवादी पार्टी ने प्रदेश के जातिगत ढाँचे का इस्तेमाल करने के लिए अपने तरकश से वो तीर निकाला है जिसके आगे सभी पार्टियां निरुत्तर हो गई है। प्रदेश की जनसंख्या के हिसाब से अगर सभी जातियों का अलग अलग बंटवारा किया जाए तो सरकार के इस फैसले के पीछे की सोच खुद ब खुद साफ़ हो जाती है।
प्रदेश की कुल जनसंख्या 20 करोड़ के आस पास है जिसमें अल्पसंख्यक करीब 20 प्रतिशत यानि 4 करोड़ , पिछड़ी जातियाँ 24 प्रतिशत यानि करीब 5 करोड़ , वही सामान्य जातियां जिसमें ब्राहमण , ठाकुर , बनिया और कायस्थ कुल 28 प्रतिशत यानि लगभग 6 करोड़ वहीँ 28 प्रतिशत दलित और अन्य जातियाँ शामिल है।
समाजवादी पार्टी को अपने पिछड़े वोट बैंक पर पूरा भरोसा है की वो कही नहीं जायेंगे यह वजह है की अखिलेश सरकार ने एक बड़े वोट बैंक को साधने के लिए प्रदेश की अन्य जातियों को हाशिये पर डाल दिया। सरकार के इस फैसले ने आम जन को सोचने पर मजबूर कर दिया है क सरकार की मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति क वजह से आज प्रदेश के विकास में भी जाति और धर्म को ध्यान में रखा जायेगा।
सरकार का ये फैसला उन योजनाओं के लिए है जहाँ पर विकास कार्य होने है। इसमें अल्पसंख्यक इलाकों में कोटे के हिसाब से हैंडपंप लगाना, आंगनबाड़ी केन्द्रों की स्थापना, संपर्क मार्ग और अन्य ग्रामीण अवस्थापानाओ के निर्माण के अलावा ऐसी योजनाये जिसमें व्यक्ति विशेष को आर्थिक विकास या लाभ का मौका मिले। सामाजिक पेंशन योजनाये, ग्रामीण एवं शहरी गरीबों के लिए आवास, कन्या विद्या धन, निशुल्क बोरिंग, जैसी योजनाये भी दायरे में है।
सरकार के इस फैसले और उपरोक्त योजनाओं का लाभ क्या केवल अल्पसंख्यक समाज के लोगों को मिलना चाहिए, बहुसंख्यक समाज में ऐसे इलाके और उन इलाकों में रहने वाले गरीब लोग नहीं है जिनके लिए भी इन योजनाओं का उतना ही महत्व हो जितना अल्पसंख्यको के लिए। आज लोगो का सवाल ये है कि अखिलेश यादव की सोच अन्य राजनीतिक पार्टियों की सोच की तरह क्यों हो गई कि वो समाज में फुट डालकर राज करना चाहते है।
सन 2002 में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री के एक बयान ने भारतीय राजनीति को नई बहस दे दी थी, पूर्व प्रधानमंत्री ने दंगो के ऊपर एक मुख्यमंत्री को नसीहत देते हुए कहा था "आपने राजधर्म नहीं निभाया" यही बयान आज अखिलेश यादव के ऊपर भी लागू हो रहा है साथ ही जनता ये सवाल भी कर रही है क्या खोटे के हक़दार सिर्फ अल्पसंख्यक है, बहुसंख्यकों में गरीब नहीं?
अखिलेश सरकार के इस फैसले से जहाँ एक तरफ मुस्लिम तुष्टिकरण को साबित कर दिया है वही, अन्य जातियों में गुस्सा भी भर दिया है। सरकार ने अपने इस फैसले में कहा है कि ये योजना उन्ही इलाकों में लागू होगी जहां की आबादी में मुस्लिम परिवारों की संख्या 25 प्रतिशत होगी।
सरकार का ये फैसला इस ओर भी इशारा करता है कि सरकार अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत करने के लिए समाज में विभेद पैदा कर रही है। सरकार को अब शायद समाज में हिन्दू वर्ग के वो गरीब नहीं दिखाई दे रहे है जिन्हें अल्पसंख्यक समाज की तरह ही विकास और योजनाओं में भागीदारी की जरुरत है। अखिलेश सरकार के इस फैसले ने समाज के एक बड़े वर्ग में गुस्सा भरने का काम किया है।
अखिलेश सरकार और समाजवादी पार्टी पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगते रहे है, इन आरोपों को कैबिनेट के इस फैसले ने सही साबित कर दिया है। अखिलेश सरकार ने अपने इस फैसले से उस तबके के लोगो को निराशा कर दिया जिन्हें प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से अपना जीवन स्तर और अपने क्षेत्र में विकास की उम्मीदे लगा रखी थी।
प्रदेश में 2001 की जनगणना के अनुसार, करीब 20 प्रतिशत अल्पसंख्यक है, जिनमे मुस्लिम धर्म को मानने वाले करीब 19 प्रतिशत हैं, सरकार ने अल्पसंख्यक शब्द का इस्तेमाल कर अपने उस बड़े वोट बैंक को खुश कर दिया जिसके सहारे वो आने वाले चुनाव और भविष्य की राजनीति करना चाहती है।
अखिलेश सरकार के इस फैसले ने प्रदेश के 80 प्रतिशत आबादी को उनके भाग्य के सहारे छोड़ दिया जबकि राजधर्म की परिभाषा ये कहती है, राज में सभी वर्ग के लोगो का विकास सामान तौर पर होना चाहिये, राज करने वाली पार्टी और उसके अगुवा की नज़रों में कोई अलग नहीं होता।
2011 की जनगणना के अनुसार, उत्तर प्रदेश की जनसंख्या पर नज़र डाली जाए तो यहाँ की आबादी करीब 20 करोड़ है, इस आबादी में अल्पसंख्यक 4 करोड़ है उसमें मुस्लिम धर्म को मानने वाले करीब 3. 60 करोड़ है सरकार ने इसी वोट बैंक को साधने के लिए इस फैसले को किया। प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस फैसले को सच्चर कमिटी की रिपोर्ट के आधार पर सही ठहराते हुये अब केंद्र को दबाव में लाने की वकालत भी शुरू कर दी है।
सरकार के इस फैसले को उन्होंने अपना चुनावी वादा पूरा करने वाला बताया है। अखिलेश यादव ने कहा कि उन्होंने चुनाव के घोषणा पत्र में ये वादा किया था की अल्पसंख्यकों को आर्थिक और सामाजिक रूप से आगे बढ़ाने के वादे पर अमल करते हुए राज्य सरकार ने सच्चर और रंगनाथ मिश्रा कमेटियों की रिपोर्ट को आगे बढ़ाने की दिशा में कदम बढ़ाया है।
सरकार ने इस फैसले को लेने में प्रदेश के जातीय समीकरण का भरपूर लाभ उठाया हैं। प्रदेश के जातिगत ढाँचे पर नज़र डाली जाए तो उत्तर प्रदेश का जातिगति ढांचा अन्य प्रदेशो से विपरीत परिस्थतियों वाला है यही वजह है कि भारत में जाति की राजनीति की नीवं डालने वाला उत्तर प्रदेश आज अलग अलग जातियों और समुदायों में बंट गया हैं।
समाजवादी पार्टी ने प्रदेश के जातिगत ढाँचे का इस्तेमाल करने के लिए अपने तरकश से वो तीर निकाला है जिसके आगे सभी पार्टियां निरुत्तर हो गई है। प्रदेश की जनसंख्या के हिसाब से अगर सभी जातियों का अलग अलग बंटवारा किया जाए तो सरकार के इस फैसले के पीछे की सोच खुद ब खुद साफ़ हो जाती है।
प्रदेश की कुल जनसंख्या 20 करोड़ के आस पास है जिसमें अल्पसंख्यक करीब 20 प्रतिशत यानि 4 करोड़ , पिछड़ी जातियाँ 24 प्रतिशत यानि करीब 5 करोड़ , वही सामान्य जातियां जिसमें ब्राहमण , ठाकुर , बनिया और कायस्थ कुल 28 प्रतिशत यानि लगभग 6 करोड़ वहीँ 28 प्रतिशत दलित और अन्य जातियाँ शामिल है।
समाजवादी पार्टी को अपने पिछड़े वोट बैंक पर पूरा भरोसा है की वो कही नहीं जायेंगे यह वजह है की अखिलेश सरकार ने एक बड़े वोट बैंक को साधने के लिए प्रदेश की अन्य जातियों को हाशिये पर डाल दिया। सरकार के इस फैसले ने आम जन को सोचने पर मजबूर कर दिया है क सरकार की मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति क वजह से आज प्रदेश के विकास में भी जाति और धर्म को ध्यान में रखा जायेगा।
सरकार का ये फैसला उन योजनाओं के लिए है जहाँ पर विकास कार्य होने है। इसमें अल्पसंख्यक इलाकों में कोटे के हिसाब से हैंडपंप लगाना, आंगनबाड़ी केन्द्रों की स्थापना, संपर्क मार्ग और अन्य ग्रामीण अवस्थापानाओ के निर्माण के अलावा ऐसी योजनाये जिसमें व्यक्ति विशेष को आर्थिक विकास या लाभ का मौका मिले। सामाजिक पेंशन योजनाये, ग्रामीण एवं शहरी गरीबों के लिए आवास, कन्या विद्या धन, निशुल्क बोरिंग, जैसी योजनाये भी दायरे में है।
सरकार के इस फैसले और उपरोक्त योजनाओं का लाभ क्या केवल अल्पसंख्यक समाज के लोगों को मिलना चाहिए, बहुसंख्यक समाज में ऐसे इलाके और उन इलाकों में रहने वाले गरीब लोग नहीं है जिनके लिए भी इन योजनाओं का उतना ही महत्व हो जितना अल्पसंख्यको के लिए। आज लोगो का सवाल ये है कि अखिलेश यादव की सोच अन्य राजनीतिक पार्टियों की सोच की तरह क्यों हो गई कि वो समाज में फुट डालकर राज करना चाहते है।
सन 2002 में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री के एक बयान ने भारतीय राजनीति को नई बहस दे दी थी, पूर्व प्रधानमंत्री ने दंगो के ऊपर एक मुख्यमंत्री को नसीहत देते हुए कहा था "आपने राजधर्म नहीं निभाया" यही बयान आज अखिलेश यादव के ऊपर भी लागू हो रहा है साथ ही जनता ये सवाल भी कर रही है क्या खोटे के हक़दार सिर्फ अल्पसंख्यक है, बहुसंख्यकों में गरीब नहीं?
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