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Sunday, 21 July 2013

महिलाओं को शादी में रूचि नहीं

दुनिया में आर्थिक रूप से सर्वाधिक शक्तिशाली देशों में से एक अमेरिका में तेजी से सामाजिक बदलाव भी हुआ है। सदियां बदलने के साथ वहां के समाज में महिलाओं के बीच विवाह के प्रति अरुचि का आलम यह है कि बहुत कम संख्या में महिलाएं शादी कर रही हैं और इस बंधन में वे तभी बंधती हैं जब वे जोड़े पहन कर चर्च से निकलने का फैसला ले लेती हैं। 

बोवलिंग ग्रीन विश्वविद्यालय के नेशनल सेंटर फॉर फैमली एंड मैरिज रिसर्च (एनसीएफएमआर) की नवीन पारिवारिक रूपरेखा के मुताबिक, औरतें अब शादी को लंबे समय तक टाल रही हैं। विवाह एक सदी से ज्यादा का बदलाव' के मुताबिक अमेरिका में विवाह दर 31.1 है और यह सदी में सबसे निचले स्तर पर है। 

1920 में जहां विवाह दर 92.3 थी वहीं अब यह प्रति 1000 शादीशुदा औरतों में मोटे अनुमान के अनुसार 31 शादियों के बराबर है। 1970 की तुलना में विवाह दर करीब 60 प्रतिशत कम हुई है। एनसीएफएमआर के सह-निदेशक डॉ. सुसान ब्राउन ने कहा, शादी अब अनिवार्य नहीं रही। उन्होंने कहा, यह महज प्रदर्शन का विकल्प हो कर रह गया है। कई जोड़े सहवास चुन रहे हैं और कई लोग एकल जीवन बिताना पसंद कर रहे हैं।"

इससे ज्यादा बदली सदी में पहली शादी के वक्त औरतों की औसत उम्र भी बढ़ी है। अब महिलाओं की शादी की औसत उम्र 27 वर्ष हो चुकी है। केंद्र के सह निदेशक डॉ. वेंडी मैनिंग के मुताबिक, पहली शादी के समय महिलाओं और पुरुषों की उम्र ऐतिहासिक रूप से उच्च स्तर पर है और सधी हुई रफ्तार से औसत उम्र में वृद्धि हो रही है।

इसके अलावा तलाक लेने या अलग होने के अनुपात में नाटकीय वृद्धि हो रही है। 1920 में एक प्रतिशत महिलाएं तलाक लेती थी, लेकिन आज 15 प्रतिशत ले रही हैं। ब्राउन ने बताया, अमेरिका में तलाक का दर उच्च स्तर पर है और तलाकशुदा लोग पहले के मुकाबले दोबारा शादी करना कम पसंद कर रहे हैं। सभी नस्ली और जातीय समूहों में विवाह दर गिर चुकी है। सबसे ज्यादा कमी अफ्रीकी-अमेरिकियों में देखी जा रही है। 

शोधकर्ताओं ने नेशनल वाइटल स्टैटिस्टिक के 100 ईयर्स ऑफ मैरिज एंड डाइवोर्स स्टैटिस्टिक यूनाइटेड स्टेट्स 1867-1967 और सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड दि यूएस सेन्सस ब्यूरो के आंकड़ों का अध्ययन में इस्तेमाल किया। यह अध्ययन अमेरिका के स्वास्थ्य एवं मानवीय सेवाएं, योजना एवं मूल्यांकन विभाग के उपमंत्री कार्यालय द्वारा समर्थित और वित्त पोषित था।

सब्बा पहलवान की आवाज सुनो

 रमजान के महीने में मुस्लिम समाज के लोगों को घड़ी नहीं, एक आवाज बताती है कि सहरी का वक्त हो गया। मध्य प्रदेश के दमोह जिले में यह सिलसिला चार दशक से ज्यादा समय से चला आ रहा है। 

शहर की गलियों में हाथ में डंडा लिए और 'जाग जाओ' की पुकार लगाता हुआ सब्बा पहलवान रात के सन्नाटे को तोड़ते हुए मुस्लिम समाज के लोगों को बताता है कि सहरी का वक्त हो चुका है और अब बिस्तर छोड़ दो। 

सब्बा पहलवान की आवाज सुनते ही रोजा रखने वाले जागकर अपने नित्य काम में जुट जाते हैं। जो लोग पुकार से नहीं जागते हैं, तो वह उनके दरवाजों की कुंडी तक खटखटाने से पीछे नहीं रहते।

उम्र के लगभग छह दशक को पार कर गए सब्बा पहलवान बीते 40 वर्षो से रमजान के महीने में शहर की गलियों में घूम-घूमकर लोगों को जगाने का काम करते चले आ रहे हैं। वे कहते हैं कि रमजान के महीने में सहरी के लिए लोगों को जगाते वक्त उन्हें ऐसा लगता है मानो वे ख्वाजा गरीब नबास की नगरी अजमेर शरीफ में घूम रहे हों। इतना नहीं, वे अल्लाह के लिए इसे अपना करम मानते हैं। 

बुजुर्ग अफजल बताते हैं कि वे सब्बा पहलवान को पिछले चार दशक से रमजान के महीने में शहर की गलियों में घूम-घूमकर लोगों को यह बताते हैं कि अब सहरी का वक्त हो गया है। उनकी पुकार लोगों के लिए घड़ी बन गई है। 

सब्बा पहलवान कहते हैं कि वे जब 16 वर्ष के थे, तभी से रमजान के महीने में लोगों को सहरी का समय बताते चले आ रहे हैं। रात के अंधेरे में उन्हें किसी से डर नहीं लगता, क्योंकि अल्लाह का आशीर्वाद उनके साथ होता है। वे बेखौफ होकर शहर की गलियों में अपने अभियान पर निकलते हैं। वे कहते हैं, "यह काम भी तो अल्लाह का ही है, यह इबादत भी है।" 

बुजुर्ग सब्बा पहलवान औरों के लिए नजीर बन गए हैं कि सिर्फ अपने लिए नहीं, समाज के लिए जिया जाता है। सब्बा मानते हैं कि समाज के लिए किया जाने वाला काम अल्लाह का ही काम है।

Friday, 19 July 2013

अपने ही मुख्यमंत्री का पुतला फूँक रहे है कार्यकर्ता

अखिलेश यादव ने अपने कैबिनेट का विस्तार कर दिया| इस विस्तार से अखिलेश यादव के कुछ साथी नाराज़ हो चले है| नाराजगी इतनी की अपने जिलें पहुँचते ही जिन कार्यकर्ताओं के दम पर सपा सत्ता में पहुंची थी उन्ही समर्थको को उकसा कर मुख्यमंत्री का पुतला फुकवा दिया|

राजभवन से भेजी गई चिट्ठी ने कुछ माननीयों के उम्मीदों के पर लगा दिए थे| आज विधायक से लेकर पार्टी के नेता और जमीनी स्तर के कार्यकर्ता सरकार से अपनी मेहनत का फल अंग रहे है| मुलायम सिंह यादव ने सत्ता से बाहर रहते सरकार के खिलाफ एक नारा दिया था, "हल्ला बोल|" नारे को मुलायम सिंह यादव और उनकी पार्टी के वरिष्ठ नेता शायद सत्ता में आते ही भूल चुके है लेकिन यहाँ आश्चर्य करने वाली बात ये है कि सपा मुखिया ये कैसे भूल गए कि उनके कार्यकर्ता कुछ नहीं भूलते है|

उसी "हल्ला बोल" नारे को आज वही समाजवादी कार्यकर्ता अपनी ही सरकार के ऊपर इस्तेमाल कर रहे हैं| देवरिया के कार्यकर्ता अपने नेता और मुलायम सिंह सरकार में मंत्री रहे शाकिर अली के लगातार तीसरी बार मंत्रिमंडल में शामिल न किये जाने को लेकर नाराज हो गए| कार्यकर्ताओं ने देवरिया में सुभाष चौक पर पार्टी नेतृत्व को कोसते हुए मुर्दाबाद के नारे भी लगाये

कार्यकर्ता इतने ज्यादा आक्रोश में थे कि उन्हीने सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के खिलाफ भी मुर्दाबाद के नारे लगाते हुए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का पुतला भी फूँका| पुलिस मूकदर्शक बनी खड़ी रही| उधर सपा जिलाध्यक्ष रामइकबाल यादव का कहना है कि भीड़ में चार पांच सपाई थे बाकी दुसरे दलों के लोग अब सवाल ये उठता है कि अगर वो दूसरे दलों के लोग थे तो मुख्यमंत्री का पुतला फूंकने पर पुलिस ने कार्रवाई क्यों नहीं की 

उधर देवरिया के पथरदेवा सीट से विधायक जिन्होंने भाजपा के तात्कालिक प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही को चुनाव में मात दी थी, वो इस बार भी मंत्रिमंडल में शामिल न होने की वजह से पार्टी नेतृत्व से खफा है| उनका साफ़ कहना है कि मुझे मंत्री पद न दिए जाने का मलाल है|

बहरहाल इस तीसरे मंत्रिमंडल विस्तार ने पार्टी के सभी इलाकों को प्रतिनिधित्व न मिलने की वजह से आक्रोश है| जो कार्यकर्ताओं के गुस्से के तौर पर फूट रहा है जिसका एक नजारा देवरिया के सपा कार्यकर्ताओं ने दिखा दिया| वैसे भी देवरिया से सपा ने 7 विधानसभाओ में से 5 पर पार्टी का परचम लहराया|

सरकार गठन के समय भाटपार रानी से विधायक चुन के आये स्वर्गीय कामेश्वर उपाध्याय को मंत्रिमंडल में जगह मिली, उनकी मृत्यु के बाद देवरिया कोटे से अगला नंबर शाकिर अली का ही था लेकिन इस मंत्रिमंडल विस्तार में जगह न मिलने की वजह से मुख्यमंत्री का पुतला अब सपा कार्यकर्ता ही फूँक रहे है|

Thursday, 18 July 2013

भाजपा-आरएसएस का अच्छा प्रोडक्ट : दिग्विजय सिंह

कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की हैदराबाद में होने वाली रैली के लिए मोदी का भाषण सुनने के लिए लगाये गए 5 रुपये के टिकट को बेस्ट मार्केटिंग स्टेटजी करार दिया है। 

दिग्विजय सिंह ने अपने ट्वीटर एकाउंट पर ट्वीट करके लिखा है, भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) मार्केटिंग करने में माहिर है। दोनों ने मिलकर अपने प्रोडक्ट (उत्पाद) नरेन्द्र मोदी की मार्केटिंग करने के लिए उनका दाम 5 रुपये मुक़र्रर किया है। 

दिग्विजय सिंह ने व्यंगात्मक लहजे में लिखा की वो भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) मार्केटिंग स्टेटजी को सलाम करते है। कांग्रेस महासचिव के ट्वीट को पढने के लिए उनके ट्वीटर एकाउंट ‏@digvijaya_28 पर लाग इन किया जा सकता है।

दिग्विजय संघ ने जो ट्वीट किया है उसमें लिखा है "BJP and RSS are Genius in Marketing. They are selling Modi as a Product for ₹ 5 per person ! Amazing ! Hats off to their Marketing Genius !"

दिग्विजय सिंह ने मोदी को एक प्रोडक्ट बता कर एक तरह से भाजपा का मज़ाक भी उड़ा दिया साथ ही उनका दाम 5 रूपये लगाये जाने पर आश्चर्य प्रकट करते हुये सलामी भी दे दी| अब देखना है भाजपा आरएसएस और खुद नरेन्द्र मोदी दिग्विजय सिंह के इस ट्वीट का क्या जवाब देते है।

मंत्रीपद मिलने की "पाती" समझे माननीय

'नहीं ये आपका स्थान नहीं है ये शपथ ग्रहण करने वाले मंत्रियों के लिए आरक्षित है'। माननीय बोले हमें भी राजभवन से भेजी गई चिटठी मिली है। राजभवन में लकझक कलफ किये गए कुर्ते पैजामे में पहुंचे माननीयों को आज इस बात की उम्मीद थी कि नेता जी के इशारे पर लाल बत्ती मिलनी तो तय है। 

राजभवन में आज अजीब नज़ारा देखने को मिला जब अखिलेश सरकार के विस्तार के लिए भेजी गई चाय की चिटठी को कुछ माननीय मंत्री पद मिलने का आग्रह पत्र समझ बैठे। सबसे बुरी दशा उनकी हुई जो अपने क्षेत्रों में जनता के बीच गये हुए थे जब उन्हें राजभवन की पाती (चाय के लिये आमंत्रण पत्र) मिला तो उनके निर्वाचन क्षेत्र में हवा फ़ैल गई कि विधायक जी को मंत्री पद मिलने वाला है। अपने क्षेत्रों में गए कुछ माननीय रातो रात राजधानी की राह पकड़ लिये और सुबह राजभवन का रूख कर गये इस उम्मीद में की आज लाल बत्ती में सवार होकर अपनों के बीच वापस जायेंगे। 

लेकिन उनकी उम्मीदों पर पानी ऐसे फिरा जैसे नेता जी और टप्पू भईया ने उन्हें वादा किया था लाल बत्ती से नवाजने का, राजभवन में आज नजारा अलग था, जितने माननीय वहां पहुंचे थे किसी को नहीं ये नहीं पता था कि मंत्री पद किसे मिलेगा इस असमंजस की स्थिति में फंसे सभी माननीय आज इस उम्मीद में थे कि उनका नंबर भी लग सकता है। 

राजभवन से भेजी गई उस चिट्ठी ने माननीयों को थोड़े समय के लिए ही सही मंत्री बनने का सपना तो दे ही दिया। राजभवन में जब शपथ दिलाने के लिए माननीयो का नाम पुकारा जा रहा था तब अपना नाम नहीं आने पर कुछ को निराशा भी हाथ लगी और कुछ इस उम्मीद में थे कि शायद अगला नाम उनका हो। लेकिन नारद की तरह चपल नारद राय , कैलाश की तरह अटल कैलाश यादव और राम की तरह मर्यादित राममूर्ति वर्मा को लालबत्ती मिली वही नेता जी को खुश करने का ईनाम उस गायत्री प्रजापति को मिला जिन्होंने अमेठी में कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। 

बहरहाल हम तो उन माननीयों के पक्ष में ही खड़े रहेंगे जिन्होंने आज मंत्रिपद ना मिलने पर दिल पे पत्थर रख लिया|वैसे भी कोशिश करने वालों की मदद भगवान के साथ खुद नेता जी भी करते है, लगे रहिये कभी तो लालबत्ती हाथ लगेगी।

महिलायें आखिर क्यों नहीं लेती मनरेगा का लाभ

उत्तर प्रदेश के कन्नौज की सांसद भले ही एक कद्दावर महिला हैं, लेकिन इस क्षेत्र में महिलाओं की सामाजिक भागीदारी में पिछड़ेपन का नमूना मनरेगा जैसी योजना में महिलाओं की हिस्सेदारी देखने से मिल जाता है। 

अखिलेश सरकार में कन्नौज पर मेहरबानी किसी से छिपी नहीं है। मुख्यमंत्री अखिलेश स्वयं कन्नौज के सांसद रह चुके हैं और वर्तमान में उनकी पत्नी डिंपल यादव कन्नौज की सांसद हैं। क्षेत्र में मनरेगा में महिलाओं की भागीदारी नाममात्र की है।

ऐसा नहीं है कि इस बात की भनक आलाधिकारियों को नहीं है। शासन स्तर पर होने वाली हर समीक्षा बैठक में महिलाओं की भागीदारी का प्रतिशत नहीं बढ़ने पर मातहतों को फटकार लगाई जाती है। इसके बाद भी मनरेगा में महिलाओं की भागीदारी नहीं बढ़ रही है। 

कन्नौज में महात्मा गांधी रोजगार गांरटी योजना (मनरेगा) की शुरुआत अप्रैल 2008 में हुई थी। तबसे आज तक प्रशासनिक तंत्र बराबर महिलाओं को अधिक संख्या में इससे जोड़ने का प्रयास कर रहा है। लेकिन, अभी तक महिलाओं की सहभागिता बढ़ाने का कोई कारगर उपाय नहीं खोजा जा सका है। 

जिले की आबादी 16,58,005 है। इसमें महिलाओं की आबादी 7,75,459 है। प्रशासन अभी तक महज तीन फीसदी महिलाओं को मनरेगा से जोड़ने में कामयाब हो सका है। यह हाल तब है जब रोजगार के मामले में मनरेगा को सबसे बेहतर माना जाता है और इसमें महिलाओं को तमाम तरह की सहुलियतें भी दी जाती हैं।

मनरेगा से जनपदों में प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए के विकास कार्य होते हैं। नियम के मुताबिक काम मांगने वाले हर महिला-पुरुष को कार्य दिया जाना है और मांगने के 15 दिन के अंदर काम उपलब्ध नहीं कराए जाने की स्थिति में श्रमिक को उस अवधि का भत्ता दिए जाने की व्यवस्था है। 

भत्ते के मामले में भी कन्नौज बेहद खास है क्योंकि अभी तक जिले में किसी को भी भत्ता नहीं दिया गया है। कागजों की जादूगरी में माहिर रोजगार सेवक, ग्राम प्रधान व तकनीकी सहायकों की हर रिपोर्ट ओके रहती है।

इंटेलिजेंस वाईडेंस बाई ड्रिंकिंग वाटर

पानी पीने से आप कुछ परीक्षाओं में बेहतर कर सकते हैं। हाल ही में आए एक अध्ययन में यह बात सामने आई है। एक संज्ञानात्मक परीक्षा में परीक्षार्थियों की प्रतिक्रिया की तीव्रता का परीक्षण किया गया, जिसमें बिना पानी पीकर परीक्षा देने वालों की अपेक्षा परीक्षा से पहले तीन कप पानी पीकर परीक्षा देने वाले प्रतिभागियों ने बेहतर प्रदर्शन किया। 

एक वेबसाइट के मुताबिक विज्ञान पत्रिका 'फ्रांटियर्स इन ह्यूमन न्यूरोसाइंस' के 16 जुलाई को प्रकाशित शोध के हवाले से कहा है, इन परिणामों से पता चलता है कि जब मानव अपनी प्यास को बुझा लेता है तो वह अपना ध्यान खींचने वाली चीजों से मुक्त हो जाता है। वेबसाइट ने इंग्लैंड के पूर्वी लंदन मनोविज्ञान महाविद्यालय के शोधकर्ता कैरोलीन एडमंड्स के हवाले से कहा, कुछ परीक्षाओं में प्यास बेहतर परिणाम दे सकती है। क्योंकि प्यास जगाने वाले हार्मोस के रिसाव का संबंध मानव की सजगता एवं चेतना से भी है।

इससे पहले वयस्कों पर हुए अध्ययनों के मुताबिक पानी की कमी के कारण मस्तिष्क के प्रदर्शन में कमी आ जाती है, तथा बच्चों पर किए गए अध्ययनों के अनुसार जल के पर्याप्त सेवन से याददाश्त में वृद्धि हो सकती है। हाल ही में ईस्ट लंदन स्कूल द्वारा किए गए अध्ययन में 34 वयस्कों को सुबह 9.00 बजे से ही भोजन और पानी का कम से कम सेवन करने के लिए कहा गया तथा उन्हें दूसरे दिन प्रयोगशाला बुलाया गया। प्रतिभागियों को दो बार प्रयोगशाला बुलाया गया।

पहली बार जहां प्रतिभागियों को परीक्षण से पहले खाने के लिए अनाज वाला चॉकलेट और पीने के लिए पानी दिया गया, वहीं दूसरी बार प्रतिभागियों को सिर्फ अनाज वाला चॉकलेट ही दिया गया। परीक्षण के दौरान प्रतिभागियों को एक कंप्यूटर पर कोई भी चीज दिखाई पड़ने पर जल्द से जल्द एक बटन दबाना था। परीक्षण के बाद पानी पीने वाले प्रतिभागियों ने पानी न पीने वाले प्रतिभागियों की अपेक्षा कहीं अधिक तेजी दिखाई।

Wednesday, 17 July 2013

वाईडेंस बाई ड्रिंकिंग वाटर

पानी पीने से आप कुछ परीक्षाओं में बेहतर कर सकते हैं। हाल ही में आए एक अध्ययन में यह बात सामने आई है। एक संज्ञानात्मक परीक्षा में परीक्षार्थियों की प्रतिक्रिया की तीव्रता का परीक्षण किया गया, जिसमें बिना पानी पीकर परीक्षा देने वालों की अपेक्षा परीक्षा से पहले तीन कप पानी पीकर परीक्षा देने वाले प्रतिभागियों ने बेहतर प्रदर्शन किया। 

एक वेबसाइट के मुताबिक विज्ञान पत्रिका 'फ्रांटियर्स इन ह्यूमन न्यूरोसाइंस' के 16 जुलाई को प्रकाशित शोध के हवाले से कहा है, इन परिणामों से पता चलता है कि जब मानव अपनी प्यास को बुझा लेता है तो वह अपना ध्यान खींचने वाली चीजों से मुक्त हो जाता है। वेबसाइट ने इंग्लैंड के पूर्वी लंदन मनोविज्ञान महाविद्यालय के शोधकर्ता कैरोलीन एडमंड्स के हवाले से कहा, कुछ परीक्षाओं में प्यास बेहतर परिणाम दे सकती है। क्योंकि प्यास जगाने वाले हार्मोस के रिसाव का संबंध मानव की सजगता एवं चेतना से भी है।

इससे पहले वयस्कों पर हुए अध्ययनों के मुताबिक पानी की कमी के कारण मस्तिष्क के प्रदर्शन में कमी आ जाती है, तथा बच्चों पर किए गए अध्ययनों के अनुसार जल के पर्याप्त सेवन से याददाश्त में वृद्धि हो सकती है। हाल ही में ईस्ट लंदन स्कूल द्वारा किए गए अध्ययन में 34 वयस्कों को सुबह 9.00 बजे से ही भोजन और पानी का कम से कम सेवन करने के लिए कहा गया तथा उन्हें दूसरे दिन प्रयोगशाला बुलाया गया। प्रतिभागियों को दो बार प्रयोगशाला बुलाया गया।

पहली बार जहां प्रतिभागियों को परीक्षण से पहले खाने के लिए अनाज वाला चॉकलेट और पीने के लिए पानी दिया गया, वहीं दूसरी बार प्रतिभागियों को सिर्फ अनाज वाला चॉकलेट ही दिया गया। परीक्षण के दौरान प्रतिभागियों को एक कंप्यूटर पर कोई भी चीज दिखाई पड़ने पर जल्द से जल्द एक बटन दबाना था। परीक्षण के बाद पानी पीने वाले प्रतिभागियों ने पानी न पीने वाले प्रतिभागियों की अपेक्षा कहीं अधिक तेजी दिखाई।

इ भोजनवा काल हो गईल

बिहार के सारण जिले के मशरक के रहने वाले हरेन्द्र मिश्र के दो पुत्रों प्रहलाद और राहुल की मौत मध्याह्न भोजन के कारण हो गई है। हरेन्द्र का जहां बुढ़ापे का सहारा छीन गया है वहीं उनकी पत्नी का रो-रोकर बुरा हाल है। वह कभी सरकार को कोस रही हैं तो कभी अपलक हर आने वाले को निहार रही हैं। इस भीड़ में उनकी अश्रुपूर्ण आंखें ऐसे लागों को तलाश रही हैं जो उनके बेटों को फिर वापस ले आएं। 

वह रोते हुए स्थानीय भाषा में कहती हैं, "इ भोजनवा काल हो गईल। हमनी के का पता रहे कि इ बच्चवन आज स्कूल जईहं तो फिर एकनी के मरले मुंह देखे के मिली।"

वैसे यह हाल केवल हरेन्द्र मिश्र के घर की ही नहीं है। मशरक प्रखंड के नवनिर्मित प्राथमिक विद्यालय धरमसती, डंडामन में एक सरकारी विद्यालय में मंगलवार को मध्याह्न भोजन खाने से अब तक 19 बच्चों की मौत हो गई है जबकि अभी भी 40 से ज्यादा बच्चों का इलाज चल रहा है। पूरे डंडामन गांव में मातम का माहौल है। सभी लोग केवल एक-दूसरे को निहार रहे हैं। कुछ लोग जहां सरकार को दोषी मान रहे हैं तो कुछ लोग खाने में मिलावट की बात कर रहे हैं। 

रामानंद राय की पुत्री काजल की मौत के बाद उनके सामने दुखों का पहाड़ टूट गया है। काजल की दादी कहती हैं उसके साथ पूरे परिवार का सपना जुड़ा था। वैसे अब तक मध्याह्न भोजन में किसी तरह की मिलावट या मौत की अन्य वजहों का पता नहीं चल पाया है। सारण के जिलाधिकारी अभिजीत सिन्हा कहते हैं कि चिकित्सकों के मुताबिक खाने में ऑर्गेनिक फास्फोरस की संभावना है। परंतु अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। 

शिक्षा विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि राज्य में लगातार मध्याह्न भोजन में गड़बड़ी की शिकायत मिलती रही है। सरकार ने पिछले दिनों ही राज्य के 38 वरीय उप समाहर्ता को प्रत्येक जिले में मध्याह्न भोजन योजना का प्रभारी पदाधिकारी बनाया था। आरोप है कि इन पदाधिारियों ने व्यंजन सूची की जांच के अलावा कुछ खास नहीं किया। 

राज्य में ताजा आंकड़ों के मुताबिक 22,102 सरकारी विद्यालयों में रसोईघर नहीं हैं। राज्य में 7,235 रसोई सह भंडारगृह निर्माणाधीन हैं। ऐसे में जिन विद्यालयों में रसोईघर नहीं हैं उन बच्चों का खाना खुले में बनाया जाता है। राज्य में करीब 72,000 प्राथमिक, मध्य, अनुदानित प्रारंभिक विद्यालयों के साथ-साथ मदरसों और शिक्षण केन्द्रों में यह योजना लागू है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य विद्यालयों का नामांकन, स्कूल छोड़ने की प्रवृत्ति कम करना तथा बच्चों को कुपोषण से मुक्ति दिलाना है। 

शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली समाजिक संस्था 'आर्ट एंड आर्टिस्ट सोसाइटी' की सचिव संध्या सिंह कहती हैं कि मध्याह्न भोजन योजना के तहत पौष्टिक भोजन उपलब्ध हो सके इसके लिए विभाग द्वारा अलग-अलग दिन की व्यंजन सूची निर्धारित है तथा इस सूची को विद्यालय के बाहर लगाने का निर्देश दिया गया है। परंतु अधिसंख्य विद्यालयों में व्यंजन सूची के अनुसार खाना नहीं दिया जाता है। बच्चों के अभिभावकों को व्यंजन सूची की जानकारी न हो इसके लिए इसे विद्यालय के बाहर नहीं लगाया जाता।

Tuesday, 16 July 2013

कौन से विभाग के अभियंता कमाते है मिट्टी से अरबो रुपये

मानसून के आने से पहले हर साल नदियों पर तटबंध दुरुस्त करने और बांधों के रख-रखाव के लिए अरबों रुपये जारी किए जाते हैं, लेकिन फिर भी तटबंधों के टूट जाने के कारण न सिर्फ हजारों हेक्टेयर फसल जलमग्न हो जाती है, बल्कि लोग अपने घर छोड़ने के लिए भी विवश होते हैं। कुशीनगर में नारायणी नदी के किनारे बने तटबंधों के रखरखाव पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, इसके बावजूद हर साल ये तटबंध टूट ही जाते हैं। आखिर क्यों?

नारायणी नदी (बड़ी गंडक) हिमालय के धौलागिरि पर्वत से निकलकर तिब्बत, नेपाल और भारत के हजारों वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को प्रभावित करती है। नेपाल के वाल्मीकिनगर (त्रिवेणी) बैराज के पास भारत में प्रवेश करती है और बिहार के कुछ क्षेत्रों से उत्तर प्रदेश के महराजगंज, कुशीनगर होते हुए पुन: बिहार में प्रवेश कर जाती हैं।

15 जून से 15 अक्टूबर तक बरसात के समय नदी में बाढ़ का खतरा बना रहता है। नदी के तटबंधों की लंबाई नेपाल में 24 किलोमीटर, उत्तर प्रदेश में 106 किलोमीटर और बिहार में 40 किलोमीटर, अर्थात कुल 170 किलोमीटर है। इन तटबंधों की मरम्मत के लिए सरकार हर साल करोड़ों रुपये खर्च करती है। वर्ष 1968-69 में छितौनी बांध, 1971-72 में नौतार बांध, 1972-73 में रेलवे इक्विपमेंट बांध, 1982 में कटाई भरपुरवा बांध, 1980-81 में सीपी तटबंध बांध, 1980-81 में अमवाखास बांध, 1980-81 में अमवा रिंगबांध का निर्माण कराया गया था। 

इसके बाद 1985 के आस-पास पिपरासी रिटायर बांध, अहिरौली-पिपराघाट कट एक और दो, जमींदारी बांध, 1975 में एपी एक्सटेंशन बांध, 1975 में नरवाजोत बांध, 1990-91 में एपी एप्रोच रोड आदि सैकड़ों किलोमीटर लंबे बांध उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से बनवाए गए। जहां तक खर्च का सवाल है, वर्ष 1968-69 में छितौनी बांध पर 04 करोड़ 68 लाख 82 हजार रुपये, 1971-72 में बने नौतार बांध पर 13 करोड़ रुपये, 1972-73 में बने रेलवे इक्विपमेंट बांध पर 464 लाख रुपये खर्च हुए। इस तरह अन्य बांधों के निर्माण में भी करोड़ों रुपये खर्च हुए।

कुछ वर्ष पहले तक केवल रखरखाव में ही छितौनी बांध पर 84 करोड़ रुपये, नौतार बांध पर 22 करोड़ रुपये और रेलवे बांध पर 66.5 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इसी तरह अन्य बांधों के रखरखाव पर अब तक 50 अरब से ज्यादा रुपये खर्च हो चुके हैं। जाहिर है, यदि सही नीति और नीयत से कार्य हुआ होता तो इतने खर्च में सीमेंट के बांध बना दिए गए होते, जिससे हर साल बाढ़ के खतरे से लोगों को निजात मिल जाती, मगर मिट्टी कार्य करवाकर महज खानापूर्ति की जाती है। 

कुशीनगर के सहायक अभियंता उत्कर्ष भारद्वाज का कहना है कि नदी अक्सर अपना रुख बदलती रहती है। इसकी धारा बदलने से कटान होता रहता है। ऐसे में सुरक्षा के लिए बांध बनाना पड़ता है। इस काम में धन खर्च होना लाजिमी है।

डांस बार में मुन्नी होगी जवान और शीला बदनाम

2005 में जब तात्कालिक उपमुख्यमंत्री आर आर पाटिल ने महाराष्ट्र के सभी डांस बार को बंद करने के आदेश दिए थे तो उनके कलम से निकला वो आदेश कई घरों के चूल्हे बुझाने के साथ उन अबोध लड़कियों को नई ज़िन्दगी देने वाला साबित हुआ। 2005 में जब आर आर पाटिल ने डांस बार बंद करने के आदेश दिये थे तब मुंबई से जाने वाली रेलगाड़ियों के सभी डिब्बों में इन बार बालाओं की संख्या सबसे ज्यादा हुआ करती थी। 

बार बालाओ की रेलगाड़ियों ने इनको उन जगहों पर पहुंचा दिया जहां जाने का सपना इन्होने कभी देखा नहीं होगा। मुम्बई के डांस बार की चमक दमक वाली दुनिया से मेलों में डांस ग्रुप के साथ परफार्म करना इनकी नियत बन गई। पेट की आग बुझाने के लिए इन बार बालाओं ने अपने जिस्म की नुमाइश करने में भी कोताही नहीं बरती। 

2005 में डांस बार बंद होने के बाद इनके सामने रोज़ी रोटी का संकट पैदा हुआ, सरकारी फरमान ने इन हज़ारों बार बालाओं में से कुछ को जिस्म फरोशी के धंधे में भी धकेल दिया था। मुम्बई से निकाले जाने के बाद इन्होने पूर्वी भारत और उत्तरी भारत में रोज़ी रोटी कमाने के लिए रूख किया। वही कुछ कोलकाता और चेन्नई जैसे महानगरों में शिफ्ट हो गई। 

अगस्त 2005 में बाम्बे पुलिस (संशोधन) एक्ट 2005 के तहत सरकार ने मुम्बई शहर के करीब 700 डांस बार और महाराष्ट्र के अलग अलग शहरों के 650 बार को बंद करने के आदेश दे दिए थे। इन डांस बारों में करीब 75 हज़ार बार बालायें अपने हुस्न और नाच को दिखाकर पुरुष ग्राहकों से पैसे पाती थी| वहीँ, करीब 1.5 लाख लोग इस धंधे में रोज़ी रोटी कमा रहे थे। 

महाराष्ट्र सरकार का कहना था, मुम्बई में चलने वाले बार अपराध को बढ़ावा दे रहें है साथ ही अपराधियों को शरण भी देते है। मुम्बई पुलिस का ये भी कहना था की इन डांस बार की वजह से मानव तस्करी भी बढ़ गई थी। बहरहाल अपने लटके झटकों से पूरे भारत से मुंबई आने वाले और डांस बार में जाकर डांस देखने का शौक रखने वालों को झुमाने वाली इन बार बालाओ के ऊपर प्रसिद्द फिल्म चांदनी बार भी बन चुकी है जिसने डांस बार बालाओ के स्याह पक्ष को उजागर किया था। 

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को आगे बढ़ा कर करीब 2.5 लाख लोगो को रोज़ रोटी कमाने का जरिया दे दिया है। साथ ही उन शौक़ीन लोगो के शौक को पूरा करने का एक और मौक़ा दे दिया| मुम्बई की रौनक कही जाने वाली बार बालाये अब मुम्बई की ट्रेन पकड़ने के साथ अपने पुराने दिनों में लौटने को भी बेताब होंगी । 

वजह भी साफ़ है मेलों, आर्केस्ट्रा और डांस ग्रुप में काम करते हुए इन्हें अपने को समाज में विचरने वाले गिद्धों से बचाने में खासी मशक्कत करनी पड़ती थी| कम से कम डांस बार में इन्हें खुद को बचाने में जद्दोजहद का सामना नहीं करना पड़ेगा, वजह भी साफ़ है डांस बार दबंग ही चलाते है।

क्यों हो जाती थी धड़कने तेज़

नई पीढ़ी शायद इस बात पर भी यकीन न करे कि डाकिया जब तार लेकर किसी के दरवाजे पर आता था तो लोगों के दिलों की धड़कन तेज हो जाती थी। टेलीग्राम या तार अक्सर मृत्यु या किसी की तबीयत खराब होने की जानकारी देने के लिए ही की जाती थी। इसी वजह से जब किसी घर में डाकिया तार लेकर आता था तो लोगों के दिलों की धड़कन तेज हो जाती थी और कई बार तो बगैर तार पढ़े ही लोग रोना शुरू कर देते थे। आज से 163 वर्ष पुरानी तार सेवा समाप्त हो गई, पर आज भी युवा पीढ़ी इस बात से अनजान है कि तार क्या था और इसे भेजा कैसे जाता था। 

तार क्या था और इसे भेजा कैसे जाता था, इस संबंध में पड़ताल करने पर डाकघर के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि जिस तरह शहरों का टेलीफोन कोड है, उसी तरह टेलीग्राम करने के लिए जिलों व शहरों का भी टेलीग्राम कोड हुआ करता था। टेलीग्राम कोड छह अक्षरों का होता था। टेलीग्राम करने के लिए प्रेषक अपना नाम, संदेश और प्राप्तकर्ता का पता आवेदन पत्र पर लिखकर देता था, जिसे टेलीग्राम मशीन पर अंकित किया जाता था और शहरों के कोड के हिसाब से प्राप्तकर्ता के पते तक भेजा जाता था। 

उन्होंने बताया कि टेलीग्राम करने के लिए पहले मोर्स कोड का इस्तेमाल होता था। विभाग के सभी सेंटर एक तार से जुड़े थे। मोर्स कोड के तहत अंग्रेजी के अक्षर व गिनती के अंकों का डॉट (.) व डैस (-) में सांकेतिक कोड बनाया गया था। सभी टेलीग्राम केंद्रों पर एक मशीन लगी होती थी। 

जिस गांव या शहर में टेलीग्राम करना होता था, उसके जिले या शहर के केंद्र पर सांकेतिक कोड से संदेश लिखवाया जाता था। मशीन के माध्यम से संबंधित जिले या शहर के केंद्र पर एक घंटी बजती थी जिससे तार मिलने की जानकारी प्राप्त होती थी और सूचना तार के माध्यम से केंद्र पर पहुंचती थी। घंटी की सांकेतिक कोड को सुनकर कर्मचारी प्रेषक द्वारा भेजे गए संदेश को लिख लेता था। गड़बड़ी की आशंका के चलते टेलीग्राम संदेश बहुत छोटा होता था। संदेश नोट करने के बाद डाकिया उसे संबंधित व्यक्ति तक पहुंचा जाता था। 

डाकघर के अधिकारियों के अनुसार, तार सेवा सेना और पुलिस के साथ ही खुफिया विभाग के लिए बेहद उपयोगी थी। तत्काल संदेश पहुंचाने और गोपनीयता बरकरार रहने की वजह से सेना और पुलिस के साथ ही खुफिया संदेश भेजने के इच्छुक लोग इसका प्रयोग किया करते थे। आज भी कई लोगों के पास तार के माध्यम से प्राप्त संदेश सुरक्षित हैं। डाकघर के अधिकारियों ने बताया कि टेलीग्राम बंद होने की सूचना मिलने के बाद भी कुछ ही लोगों ने तार करने में रुचि ली। दिल्ली में हालांकि आखिरी दिन करीब 20,000 लोगों ने अपने प्रियजनों को तार भेजकर अपना शौक पूरा किया।

जमाना बदला, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की तरक्की की बदौलत संचार सुविधाएं बढ़ गई हैं और लोगों को अब मोबाइल और इंटरनेट से ही संदेश भेजना अच्छा लगता है, पर जिन्होंने तार या पत्र भेजा है, उनके लिए निश्चित रूप से तार सेवा का महत्व आज भी बरकरार है। कई बूढ़े-बुजुर्गो की यादें तार से जुड़ी होंगी। जरा उनसे भी पूछ ही लीजिए।

मौत को पसंद है 12 जुलाई

बालीवुड को एक बार फिर शोक दे गई 12 जुलाई को यमराज के दूतों ने हरदिल अज़ीज़ कलाकारों को ले जाने का दिन मुक़र्रर किया है। बीते साल की तरह इस साल भी 12 जुलाई देश को दर्द दे गई। 

12 जुलाई 2012 को रुस्तमे हिन्द और सभी के दिलों पर राज करने वाले 83 वर्षीय दारा सिंह जी की मौत हो गई थी, दारा सिंह जी की मौत पर बालीवुड के साथ पूरा देश शोक मग्न हो गया था। दारा सिंह जी की मौत पर प्राण साहब भी खासे दुखी हुये थे। 

12 जुलाई को जब बालीवुड दारा सिंह जी की मौत की पहली पुन्य तिथि मना रहा था, तभी रात 8.30 पर एक खबर ने देश को शोक में डाल दिया वो खबर आई लीलावती हास्पिटल से जहा प्राण साहब का इलाज़ चल रहा था। प्राण साहब दुनिया छोड़ गए थे। 93 साल की उम्र में प्राण साहब ने आखरी सांस ली। 

दारा सिंह जी और प्राण साहब से पहले देश ने एक और अभिनेता को 12 जुलाई को ही खोया था, वो थे जुबली कुमार के नाम से मशहूर राजेंद्र कुमार जी जिन्होंने 69 साल की उम्र में सन 1999 में दुनिया छोड़ दी थी। 

इन तीनो फ़िल्मी हस्तियों ने एक साथ एक ही समय पर पुरे देश में उनके चाहने वाले करोडो लोगो के दिलों पर राज किया। राजेंद्र कुमार साहब जहा अपने समय की लड़कियों के दिलों की धड़कन थे वही दारा सिंह जी ने मर्दानगी पसंद लोगो के बीच अपनी पैठ बनाई तो वही प्राण साहब ने अपनी खलनायकी से फ़िल्मी दुनिया के बुरे आदमी की नई परिभाषा गढ़ दी। 

प्राण साहब की खलनायकी का आलम ये था की आम भारतीयों ने अपने बच्चों का नाम तक प्राण रखना पसंद नहीं किया। वही राजेंद्र कुमार और दारा सिंह ने अपने अभिनय की छाप लोगो के दिलों पर ऐसी छोड़ी की आज भी उनकी फ़िल्में उसी चाव से देखी जाती है जिस चाव से उस समय देखा जाता था। पर्दाफाश भी अपनी श्रधांजलि इन हरदिल अज़ीज़ कलाकारों को देता है।

चाहिये वीवीआईपी नंबर तो खर्च करिये ज्यादा पैसे

उत्तर प्रदेश सरकार ने मोटर वाहनों के महत्वपूर्ण नम्बरों को नये सिरे से 4 श्रेणियों में विभाजित करते हुए अलग-अलग पंजीयन शुल्क लिए जाने के लिए अधिसूचना जारी कर दी है। 

अधिसूचना के मुताबिक़ निर्धारित शुल्क के अतिरिक्त अति आकर्षक पंजीयन नम्बर हेतु 15,000 रुपये, अति महत्वपूर्ण पंजीयन नम्बरों हेतु 7,500 रुपये, आकर्षक पंजीयन नम्बर हेतु 6,000 रुपये तथा महत्वपूर्ण पंजीयन नम्बर हेतु 3,000 रुपये पंजीयन शुल्क निर्धारित किया गया है।

इस संबंध में परिवहन आयुक्त रजनीश गुप्ता ने बताया कि इन महत्वपूर्ण नम्बरों के लिए कोई भी व्यक्ति पहले आने पर पहले के सिद्धान्त पर अग्रिम निर्धारित शुल्क जमा करके अपने पंजीयन नम्बर को आरक्षित करा सकता है। उन्होंने सभी संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिये हैं कि सभी अधिसूचित महत्वपूर्ण नम्बरों को कार्यालय में अलग बोर्ड पर प्रदर्शित करें तथा आरक्षित संख्याओं को भी प्रतिदिन बोर्ड पर इस प्रकार प्रदर्शित करें जिससे आवेदक को आसानी से उपलब्ध पंजीयन नम्बरों की जानकारी हो सके।

Friday, 12 July 2013

मोदी का बयान 'एकदम सही काम', सियासत में बवाल

मोदी का बयान उन्होंने 2002 में जो किया, वह बिल्कुल सही था। जब उन्होंने कुछ गलत नहीं किया, तो वह खुद को कसूरवार क्यों मानें। साथ ही उन्होंने कहा कि मैंने एक हिंदू परिवार में जन्म लिया है, इसलिए मैं हिंदू राष्ट्रवादी हूं। गुजरात में 2002 के दंगों पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की पिल्ले वाली टिप्पणी की सभी राजनीतिक दलों ने पुरजोर निंदा करते हुए उनसे माफी मांगने के लिए कहा है। 

एक साक्षात्कार में गोधरा कांड के बाद हुए दंगों के संबंध में पूछे गए एक सवाल के जवाब में मोदी ने कहा कि उन्होंने 'एकदम सही काम' किया था और यहां तक कि यदि कोई पिल्ला भी किसी कार के पहिए के नीचे आ जाए तो उन्हें दुख होता है।

कांग्रेस महासचिव अजय माकन ने एक बयान में कहा है, हम ऐसी तुलना की भर्त्सना करते हैं। वे राष्ट्र से इसके लिए माफी मांगें। कांग्रेस के मुताबिक, किसी भी सभ्य देश में ऐसी तुलना के लिए कोई स्थान नहीं है और यह टिप्पणी भारत के सदाचार के विरुद्ध है। कांग्रेस ने गुजरात के मुख्यमंत्री को याद दिलाया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें राजधर्म का पालन करने के लिए कहा था।

माकन ने कहा, चुनाव के पूर्व इस तरह की टिप्पणी क्यों की जा रही है, हम इसे समझने में विफल हैं। मोदी को आड़े हाथों लेते हुए कांग्रेस महासचिव एवं गुजरात के प्रभारी गुरुदास कामत ने कहा, भाजपा के कद्दावर नेता लालकृष्ण आडवाणी द्वारा मोदी को दिया गया प्रमाणपत्र अब पूरे देश में वैध हो गया।

समाजवादी पार्टी के कमाल फारूकी ने कहा, यह अत्यंत दुखद, अपमानजनक और विचलित करने वाला बयान है। वे कह रहे हैं कि मुसलमान पिल्ले से भी गए बीते हैं। उन्हें तुरंत राष्ट्र की जनता से माफी मांगनी चाहिए। जनता दल (युनाइटेड) के नेता शिवानंद तिवारी ने कहा, मैं नहीं समझता कि मोदी मानसिक रूप से स्थिर व्यक्ति हैं। उन्हें मानसिक चिकित्सा की जरूरत है। मोदी की टिप्पणी से ही जाहिर होता है कि उनका सम्मिलित राजनीति में विश्वास नहीं है।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने हालांकि मोदी का बचाव किया है और कहा है कि टिप्पणी की गलत व्याख्या की गई है। भाजपा की प्रवक्ता निर्मला सीतारमन ने कहा, यह कहना निंदनीय है कि मोदी ने एक समुदाय की तुलना कुत्ते से की है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है और मैं केवल यही कहना चाहूंगी कि इससे पहले भी कई टिप्पणी की गई और उसकी व्याख्या की गई। लोग पहले साक्षात्कार को पढ़े और देखें कि किस परिप्रेक्ष्य में यह कहा गया है।

राघव जी ने भाजपा सरकार को बचाया

नौकर के साथ अप्राकृतिक दुष्कर्म के मामले में मंत्री पद गंवाने वाले भाजपा के पूर्व मंत्री राघव जी के वजह से मध्य की शिवराज सरकार कांग्रेस के अविश्वास प्रस्ताव से बच गई। दरअसल जिस कांग्रेसी विधायक ने भाजपा का साथ दिया वो कांग्रेसी विधायक अपने ही वरिष्ठ नेता के एक ट्वीट से भड़क गया। बीते दो महीनो से कांग्रेस जिस अविश्वास प्रस्ताव को विधानसभा में लाने की तैयारी कर रही थी वो अविश्वास प्रस्ताव कांग्रेस के ही एक नेता के भड़कने से गिर गया। 

कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक और दिग्विजय सिंह सरकार में मंत्री पद सुशोभित करने वाले राकेश चौधरी उन्हीं दिग्विजय सिंह के एक ट्वीट से इतना भड़क गए जितना वो राघव जी प्रकरण में नहीं भड़के होंगे। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने अपने ट्विटर एकाउंट पर भाजपा के पूर्व मंत्री राघव जी को निशाना बनाते हुये ट्वीट किया "बच्चा बच्चा राम का राघव जी के काम का" इसी ट्वीट ने शिवराज सरकार का काम सदन में आसान कर दिया। 

दरअसल कांग्रेस बीते दो माह से शिवराज सिंह सरकार के खीलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी में थी, गुरुवार को सदन का आखरी दिन था, विधानसभा अध्यक्ष ने जैसे ही नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह को अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा करने के लिए आमंत्रित किया कांग्रेस के सदन में उपनेता राकेश चौधरी ने दिग्विजय संघ के ट्वीट की चर्चा करते हुये उस पर सदन में चर्चा करने की मांग रख दी। 

राकेश चौधरी ने कहा की राम देश के 80 फीसदी हिन्दुओं के आस्था के प्रतीक है, कोई उनके बारें में ऐसा कैसे लिख सकता है। राकेश चौधरी के ऐसा कहते ही सदन में हंगामे की स्थिति उत्पन्न हो गई भाजपा ने मौके का फायदा उठाते हुये सदन को स्थगित करने की मांग रख दी। उधर कांग्रेस अपने ही उपनेता के विरोध से सकते में आ गई कांग्रेस अभी कुछ समझ पाती तब तक विधानसभा के सभापति ने सदन को स्थगित करने का ऐलान कर दिया। 

कांग्रेस के विधायकों ने सरकार के ऊपर धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुये कहा की आज जो कुछ भी हुआ वो विधायिका के हिसाब से सही नहीं था। कांग्रेस जहाँ अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा करने के लिए तैयारी कर रही थी वहीँ भाजपा ने उन्ही के विधायक को आगे कर अपनी सरकार बचा ली। 

कांग्रेस ने पार्टी से गद्दारी करने वाले विधायक को पार्टी से 6 साल के लिए निष्काषित कर दिया वही भाजपा ने कांग्रेस से निकाले गए विधायक को गले लगा कर पार्टी में शामिल कर लिया। राघव जी प्रकरण पर जहाँ पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह भाजपा को राम और राघव जी का नाम लेकर घेरने की तैयारी में थे वही दाँव उल्टा पड़ गया, अविश्वास प्रस्ताव तो गिरा ही पार्टी में भी फुट पड़ गई।

बलात्कार पीड़िता की काटी जा रही जबान, जलाया जा रहा है जिंदा

प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बने अभी सवा साल भी नहीं हुये प्रदेश अपराधियों की गिरफ्त में आ गया, जहाँ प्रदेश के सभी जिलों में अपराध की घटनाये बढ़ी रही हैं, वही मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के गृह जनपद में भी अपराधी बेख़ौफ़ घूम रहे और और वारदातों को अंजाम दे रहे है जैसे प्रदेश में कानून राज नहीं खुद उनका राज चल रहा है। 

प्रदेश मुखिया के गढ़ जनपद इटावा में बीती रात गैंगरेप की शिकार लड़की को बेख़ौफ़ बदमाशों ने जिंदा जलाने क कोशिश की| बुरी तरह जल चुकी लड़की की शुक्रवार की सुबह मुलायम सिंह यादव के पैतृक गाँव सैफई स्थित अस्पताल में मौत हो गई। लड़की के साथ 6 लोगो ने बलात्कार किया था। 

बलात्कार करने के बाद आरोपियों ने बलात्कार की शिकार लड़की के परिजनों को मुंह खोलने पर जान से मारने की धमकी भ दी थी। आज सुबह जब अस्पताल में पीड़ित लड़की की मौत हुई तो मुख्यमंत्री के गृह जनपद में कानून व्यवस्था प्रदेश क जनता के सामने आ गई। 

इससे पहले 23 जुलाई को प्रतापगढ़ में एक बलात्कार पीड़ित लड़की की गवाही से पहले उसकी जुबान काटने का मामला सामने आया था, पीडिता का बयान 24 जुलाई को न्यायालय में होना था, आरोपियों ने पीडिता की जबान सर्फ इस लिये काट ली ताकि वो न्यायालय में गवाही न दे सके इस मामले में आरोपी जल में बंद है। 

प्रतापगढ़ मामले में पुलिस ने मामले को दबाने की कोशिश भी की खुद वहां के एसपी एल रवि कुमार ने कहा था कि पीडिता की जबान नहीं काटी गई थी बल्कि उसके चेहरे पर चाकुओ से वार हुआ था। अखिलेश राज के ये दो मामले प्रदेश की कानून व्यवस्था और पुलिस क कार्यशैली को उजागर करने के लिए काफी है। 

उत्तर प्रदेश में लगातार बढ़ रहे अपराध को लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं में भी खासा रोष है। समाजक कार्यकर्ता रंजना कुमारी का कहना है, प्रदेश में बढ़ रहे अपराध को राजनीतिक शरण मिली हुई है, अपराधी बेख़ौफ़ है उन्हें पता है कि अपराध करने के बाद भी उनका कुछ नहीं होगा। राजनेताओं ने पुलिस के हाथ बाँध दिये है। 

वही महिला आयोग क राष्ट्रीय अध्यक्ष ममता शर्मा ने कहा की देश का अपराध राज्य बनता जा रहा है| उत्तर प्रदेश NCRB ने हाल में ही एक रिपोर्ट जारी की है जिसमें अपराध के बढ़ते ग्राफ में उत्तर प्रदेश पहले नंबर पर वही मध्य प्रदेश को दूसरा स्थान हासिल हुआ है दोनों राज्यों के अपराधियों में आगे निकलने की होड़ लगी हुई है । 

बहरहाल इटावा में गैंग रेप के बाद लड़की को जिंदा जला देने क घटना ने प्रदेश क अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा सरकार को कटघरे में खडा कर दिया है साथ ही 2003-07 के बीच चली मुलायम सरकार की याद दिला दी है। आज प्रदेश के हालात ये है कि अपराधी बेख़ौफ़ अपराध किये जा रहे है, पुलिस राजनीतिक दबाव कहे या कार्यशैली कोई ठोस कदम नहीं उठा पा रही है।

Thursday, 11 July 2013

सुप्रीम कोर्ट का फैसला एतिहासिक

 जिस केंद्र सरकार ने आज से 24 साल पहले 15 अप्रैल 1989 को नेताओं को अपराध के साथ राजनीति करने की छूट प्रदान की थी उसपर सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने ग्रहण लगा दिया। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आसन्न लोकसभा चुनावों से करीब एक साल पहले आया। इस फैसले ने सजायाफ्ता या किसी मामले में आने वाले फैसले का इंतज़ार कर रहे नेताओं की मुश्किलों को बढ़ा दिया। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने एक नए तरीके के भ्रष्टाचार की नींव पड़ने की संभावना बढ़ गई है । जो कोर्ट के फैसले को ध्यान में रखकर पुलिस, कानून, और न्याय व्यवस्था से होता हुआ फैलेगा। 

सुप्रीम कोर्ट के 10 जुलाई को आये इस एतिहासिक फैसले ने भारत की राजनीति को नई दिशा दे दी। देश की राजनीति में प्रवेश की पहली शर्त ही दो चार मुकदमें होना आज उन्ही नेताओं की गले की हड्डी बन गया| जिन्होंने राजनीति करने के लिए इसे हथियार की तरह इस्तेमाल किया। राजनीति का अपराधीकरण रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व कानून की वह धारा ही निरस्त कर दी जिसका इस्तेमाल कर सजायाफ्ता नेता विधानसभाओं और देश की गौरवशाली संसद का सदस्य बनकर माननीय का दर्जा पा जाते थे। 

सुप्रीम कोर्ट के इस फासले ने कुछ सरकारी तंत्र के लिए पैसे कमाने का रास्ता भी खोल दिया अब मुकदमें को कमजोर करने के लिए और सज़ा की अवधि को कम करने के लिए जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगो को उनके कार्यों और फैसलों के लिए मुंहमांगी कीमत भी मिलेगी। कहते है भारत जैसे देश में कानून बनाने से पहले उसका तोड़ ढूंढ़ लिया जाता है। जहा उच्चतम न्यायालय का ये फैसला कुछ नेताओं को उनके जिंदगी भर की राजनीति का ईनाम देने वाला साबित होगा वही कुछ दागी नेता आदेश के तोड़ के लिए अपने उस काले धन का मुंह भी खोल देंगे जिन्होंने राजनीति में रहते हुये उस पैसे को अनाप शनाप तरीके से कमाया होगा। 

उच्चतम न्यायालय ने इस फैसले में ये प्रावधान किया है कि किस भी नेता पर आरोप तय होते और सज़ा का एलान होते ही उसकी सदस्यता खुद ब खुद समाप्त हो जायेगी इसने राष्ट्रीय से लेकर क्षेत्रीय राजनीति करने वाले दलों के हौसलों को कम कर दिया है। आज सभी पार्टियों के दागी नेताओं पर नज़र डालें तो स्थिति अपने आप साफ़ हो जाती है कि इस हरम में सभी नंगे है। सभी पार्टियों ने एक ही नीति दागी नेताओं के लिये अपना रखी है, तू मेरी पीठ खुजा मै तेरी खुजाता हूँ । पार्टियों में दागियों पर नज़र डाली जाए तो सभी एक दूसरे के साथ ही खड़े नज़र आते है। बस इतना फर्क है की किसी किसी में ज्यादा तो किसी में कम इस मामले को राजनीतिक दल एक दूसरे पर उंगली उठा सकते है। 

आंकड़ो पर नज़र डालें तो तस्वीर खुद ब खुद सामने आ जाती है, कि भारतीय राजनीति में कोई भी दल दागी नेताओं के मोह से बच नहीं सका है। अगर उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम किसी भी दिशा की तरफ नज़र डालें तो सभी पार्टियाँ सज़ायाफ्ता या ट्रायल में चल रहे नेताओं से गलबहियाँ कर रही है। देश में इस समय 162 मौजूदा सांसदों के ऊपर आपराधिक मामले चल रहे है। इन मामलों में 76 सांसद ऐसे है जिनपर ऐसे आरोप है जो न्यायालय में साबित हो जाये तो इन्हें पांच साल से ज्यादा की सज़ा हो सकती है। वही देश के सभी 28 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों में 1258 विधायक ऐसे है जिनपर आपराधिक मामले दर्ज है। इनमे से 605 विधायकों पर गंभीर आपराधिक मामलें है। 

देश की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों में ज्यादा दागी है तो उसमें झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के 82% , समाजवादी पार्टी के 48% , जदयू के 47% , बहुजन समाज पार्टी के 34% , भाजपा के 31% , वही कांग्रेस के 21% सांसद और विधायक दागियों की श्रेणी में है। वही देश की राजनीति को दिशा देने वाले लोकसभा के दोनों सदनों लोकसभा में 30% वही उच्च सदन यानि राज्यसभा में 17% दागी है। देश की प्रमुख पार्टियों में जो देश के लिए फैसले लेने का दम भारत है उनमे जिन बड़े नेताओं पर इस कानून की धारा हटने से आफत आ सकती है उनमे भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी बाबरी मस्जिद मामले में आरोपी है। वही उत्तर प्रदेश में भाजपा की नैया पार लगाने का दम भर रहे नरेन्द्र मोदी के करीबी अमित शाह फर्जी मुठभेड़ मामले में आरोपी है। 

चारा घोटाले की आफत लालू यादव के ऊपर झूल रही है वही कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के लिए एक समय आफत बन गए ए राजा 2-G स्पेक्ट्रम घोटाले में आरोपी है। इनके अलावा जयललिता, कनिमोझी और दयानिधि मारन ऐसे नेता है जो अपनी अपनी पार्टियों के कर्ताधर्ता माने जाते है। अगर राज्यवार दागी नेताओं के अपराधों पर नज़र डाली जाये तो सबसे आगे बिहार में 58 % ऐसे नेता है जिनपर कोई ना कोई अपराधिक मामला चल रहा है। इसके बाद यूपी का नंबर आता है जहा 47 % , दिल्ली में 44 %, वही गुजरात में 31% दागी नेता मौजूद है। न्यायालय ने धारा 8 की उपधारा 1 से 3 में अपराधों की सूची है । इसमें दोषी ठहराये गये नेताओं को 6 साल की सज़ा का प्रावधान है। 

सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गये इस फैसले को कोर्ट की नज़रों में लाने का काम देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ। राजनीति का अपराधीकरण को सामने लाने और इस पर शिकंजा कसने के लिए लखनऊ की एक संस्था ने उच्चतम न्यायालय के संज्ञान में इस मामले को रखा था। उत्तर प्रदेश विधानसभा में मौजूद माननीयों में से करीब 47 % माननीय ऐसे हैं जिनपर आपराधिक मामले दर्ज है। प्रदेश की विधानसभा में 403 विधायकों में से 189 विधायक ऐसे है जिनपर आपराधिक मामले चल रहे है उनमे से 98 विधायको के ऊपर गंभीर मामले दर्ज है। 

पार्टी वार अगर नज़र डाली जाये तो प्रदेश की सत्ता पर काबिज समाजवादी पार्टी के 224 विधायकों में से 111 के ऊपर आपराधिक मामलें है, बसपा के 80 विधायको में से 29 के ऊपर आपराधिक मामले है। भाजपा के 47 विधायकों में से 25 विधायकों के ऊपर आपराधिक मामले है। कांग्रेस के 28 में से 13 विधायको के ऊपर आपराधिक मामले है। वही रालोद के 9 विधायकों में से 2 विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज है। 

बहरहाल सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने देश की राजनीति में सफाई के अभियान की शुरुवात कर दी है। कोर्ट के फैसले ने राजनीतिक पार्टियों को परेशानी में भी डाल दिया है लेकिन स फैसले की वजह से कुछ जिम्मेदार लोगो की बांछे भी खिल गई है वजह भी साफ़ है जहा चुनावी राजनीति होगी वहा पैसा, अपराध और कानून को तोड़ने वाली बाते होंगी ही। अब कानून तोड़ने वालों को बचाने के लिए कुछ नियम तो तोड़ने मरोड़ने होंगे जिसके लिए पैसा पानी की तरह बहेगा| उच्चतम न्यायालय को इस ओर भी ध्यान देकर कोई एतिहासिक निर्णय सुनाना चाहिये ताकि निचले स्तर पर इस फैसले से होने वाले भ्रष्टाचार को रोका जा सके।

मोदी की बधाई कांग्रेस तैश में आई

भाजपा के चुनावी चेहरे और आने वाले दिनों में भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित किये जाने वाले नरेन्द्र मोदी को अब मुस्लिम के तीज त्यौहार भी भाने लगे है| नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को मुसलमानों को रमजान की बधाई दी, मोदी की मुस्लिम धर्म को मानने वालों को दी गई बधाई खुद को मुस्लिमों की रहनुमा मानने वाली पार्टी कांग्रेस को रास नहीं आई, मोदी की बधाई के बाद देश की राजनीति का पारा गर्म हो गया। 

मोदी बधाई को आड़े हाथ लेते हुए कांग्रेस ने कहा कि वह वोट के लि‍ए कुछ भी कर सकते हैं। 2002 के गुजरात दंगों का दंश देने वाले नरेंद्र मोदी हाल ही में भाजपा की चुनाव प्रचार समि‍ति के अध्‍यक्ष बनाए गए हैं।रमजान पर दि‍ए गए उनके संदेश को 2014 के लोगसभा चुनावों से जोड़कर देखा जा रहा है। मोदी ने ट्वि‍टर पर दि‍ए एक ट्वीट में कहा कि वह कामना करते हैं कि रमजान का पवि‍त्र महीना खुशी, शांति और संपन्‍नता लेकर आए। 

मोदी के ट्वीट पर प्रति‍क्रि‍या देते हुए गुजरात कांग्रेस अध्‍यक्ष अर्जुन मोधवाडि‍या ने बगैर कि‍सी पार्टी या व्‍यक्‍ति का नाम लेते हुए कहा कि वह वोट पाने के लि‍ए कुछ भी कर सकते हैं। कभी वह राम मंदि‍र मुद्दा उठाते हैं तो कभी उसे रसातल में भेज देते हैं। कभी वह कहते हैं कि जि‍न्‍ना सेकुलर थे तो कभी वह सच्‍चर कमेटी की रि‍पोर्ट जलाते हैं और रमजान की बधाई देते हैं।

भगवान जगन्नाथ सबके आराध्य हैं

पुरी में भी जगन्नाथ यात्रा निकाली जा रही है। महाबोधि मंदिर में धमाके के बाद खुफिया एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि जगन्नाथ यात्रा को भी निशाना बनाया जा सकता है। ये देखते हुए ओडिशा पुलिस ने जगन्नाथ पुरी रथयात्रा की सुरक्षा सख्त कर दी है। 

रथ यात्रा में 10 लाख से ज्यादा श्रद्धालु शामिल हो रहे हैं| पुरी में भगवाना जगन्नाथ राजसी ठाठ-बाट के साथ अपने रथ में विराजमान हैं। बीच में भगवान का रथ है और उसके चारों तरफ हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ है।

वही गुजरात के अहमदाबाद में वहा के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूजा की और रथ खींचकर यात्रा की शुरुआत की। इस रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के रथ चल रहे हैं। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के अवसर पर जनता को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं दी हैं। 

डॉ. सिंह ने रथयात्रा के लिए दिए गए शुभकामना संदेश में कहा है कि छत्तीसगढ़ के पड़ोसी राज्य ओड़िशा में श्री क्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध पुरी के समुद्र तट पर विराजमान महाप्रभु श्री जगन्नाथ न केवल इन दोनों राज्यों की जनता के, बल्कि संपूर्ण भारत और पूरी दुनिया में सबके आराध्य हैं।