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Monday, 8 July 2013

10 हजार करोड़ रुपये की चपत कैसे लग रही उप्र को

उत्तर प्रदेश में 10000 करोड़ रुपये से कहीं अधिक धनराशि नौकरशाही, राजनेताओं की जेब में चली जाती है। जिससे जहां बड़ी धनराशि का लाभ आम जनता को नहीं मिल पाता वहीं सम्बन्धित योजनाओं का क्रियान्वयन गलत हाथों में चला जाता है जिससे विकास का पहिया कीचड़ में तो धंसता चला जाता है।

संस्थागत भ्रष्टाचार के चलते, प्रासंगिक योजनायें नहीं बन पाती तथा 'कान्ट्रैक्टर ड्रिवेन प्रोजेक्ट' के लिए स्मूथ-लाइनिंग की जाती है। यह बात जिजीविषा के संस्थापक अध्यक्ष चन्द्र भूषण पाण्डेय ने 'सरकारी तंत्र में संस्थागत भ्रष्टाचार, चुनौतियां व समाधान' विषय पर आयोजित संगोष्ठी में कही। 

उन्होंने कहा कि 10000 करोड़ रुपये तो केवल नियोजित बजट का भाग है जिसकी बात की जा रही है इसके अलावा नान-प्लान बजट में रिश्वत तथा, लेखपाल, पंचायत अधिकारी, पुलिस तथा पेशकार सहित तमाम नौकरशाहों को रूटीन के कार्यो के लिए दी जाने वाली रिश्वत सम्मिलित नहीं है। 

उन्होंने कहा कि 10000 करोड़ को यदि नौकरशाहों, राजनेताओं की जेब से निकालकर विकास कार्य में लगाया जाए तो इससे 2000 मेगावाट की बड़ी ऊर्जा परियोजना खड़ी हो सकती है अथवा 33 लाख परिवारों को घर दिया जा सकता है अथवा 40 लाख हैण्डपम्प लगाई जा सकती है अथवा 16 लाख व्यक्तियों को 5000 रुपये प्रतिमाह सहायता देकर उनकी तस्वीर बदली जा सकती है।

मैग्सेसे पुरस्कार विजेता संदीप पाण्डेय ने कहा कि बहुत बर्दाश्त किया गया, अब संस्थागत भ्रष्टाचार को उखाड़ फेंकना है। इसके लिए इस जन-अभियान में सम्मिलित हों तथा, विभागवार मोर्चा, दबाव समूह बनाकर प्रदेश मुख्यालय, मण्डल मुख्यालय तथा जनपद एवं विकास खण्ड स्तर पर अभियान चलाने की आवश्यकता है। 

सर्वजन हिताय संरक्षण समिति के ओपी पाण्डेय ने कहा कि नीतिगत बदलाव की आवश्यकता है। राजनीति में जब तक साफ-सुथरे लोग नहीं आयेंगे तब तक, तस्वीर बदलना कठिन है। इं. अ़ख्तर अली फारूकी ने भ्रष्टाचार के वर्तमान स्वरूप के लिए प्रशासनिक व्यवस्था की विफलता बताते हुए कहा कि आईएएस अधिकारियों के आचार-व्यवहार को बदलने की आवश्यकता है। 

जस्टिस एस.सी. वर्मा ने, समाज के नैतिक मूल्यों में बदलाव से उत्पन्न इस संकट पर कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपना-अपना दायित्व ईमानदारी से निर्वहन करना चाहिए तथा भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेंस का संकल्प लेना चाहिए।

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