बिहार के सारण जिले के मशरक के रहने वाले हरेन्द्र मिश्र के दो पुत्रों प्रहलाद और राहुल की मौत मध्याह्न भोजन के कारण हो गई है। हरेन्द्र का जहां बुढ़ापे का सहारा छीन गया है वहीं उनकी पत्नी का रो-रोकर बुरा हाल है। वह कभी सरकार को कोस रही हैं तो कभी अपलक हर आने वाले को निहार रही हैं। इस भीड़ में उनकी अश्रुपूर्ण आंखें ऐसे लागों को तलाश रही हैं जो उनके बेटों को फिर वापस ले आएं।
वह रोते हुए स्थानीय भाषा में कहती हैं, "इ भोजनवा काल हो गईल। हमनी के का पता रहे कि इ बच्चवन आज स्कूल जईहं तो फिर एकनी के मरले मुंह देखे के मिली।"
वैसे यह हाल केवल हरेन्द्र मिश्र के घर की ही नहीं है। मशरक प्रखंड के नवनिर्मित प्राथमिक विद्यालय धरमसती, डंडामन में एक सरकारी विद्यालय में मंगलवार को मध्याह्न भोजन खाने से अब तक 19 बच्चों की मौत हो गई है जबकि अभी भी 40 से ज्यादा बच्चों का इलाज चल रहा है। पूरे डंडामन गांव में मातम का माहौल है। सभी लोग केवल एक-दूसरे को निहार रहे हैं। कुछ लोग जहां सरकार को दोषी मान रहे हैं तो कुछ लोग खाने में मिलावट की बात कर रहे हैं।
रामानंद राय की पुत्री काजल की मौत के बाद उनके सामने दुखों का पहाड़ टूट गया है। काजल की दादी कहती हैं उसके साथ पूरे परिवार का सपना जुड़ा था। वैसे अब तक मध्याह्न भोजन में किसी तरह की मिलावट या मौत की अन्य वजहों का पता नहीं चल पाया है। सारण के जिलाधिकारी अभिजीत सिन्हा कहते हैं कि चिकित्सकों के मुताबिक खाने में ऑर्गेनिक फास्फोरस की संभावना है। परंतु अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।
शिक्षा विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि राज्य में लगातार मध्याह्न भोजन में गड़बड़ी की शिकायत मिलती रही है। सरकार ने पिछले दिनों ही राज्य के 38 वरीय उप समाहर्ता को प्रत्येक जिले में मध्याह्न भोजन योजना का प्रभारी पदाधिकारी बनाया था। आरोप है कि इन पदाधिारियों ने व्यंजन सूची की जांच के अलावा कुछ खास नहीं किया।
राज्य में ताजा आंकड़ों के मुताबिक 22,102 सरकारी विद्यालयों में रसोईघर नहीं हैं। राज्य में 7,235 रसोई सह भंडारगृह निर्माणाधीन हैं। ऐसे में जिन विद्यालयों में रसोईघर नहीं हैं उन बच्चों का खाना खुले में बनाया जाता है। राज्य में करीब 72,000 प्राथमिक, मध्य, अनुदानित प्रारंभिक विद्यालयों के साथ-साथ मदरसों और शिक्षण केन्द्रों में यह योजना लागू है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य विद्यालयों का नामांकन, स्कूल छोड़ने की प्रवृत्ति कम करना तथा बच्चों को कुपोषण से मुक्ति दिलाना है।
शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली समाजिक संस्था 'आर्ट एंड आर्टिस्ट सोसाइटी' की सचिव संध्या सिंह कहती हैं कि मध्याह्न भोजन योजना के तहत पौष्टिक भोजन उपलब्ध हो सके इसके लिए विभाग द्वारा अलग-अलग दिन की व्यंजन सूची निर्धारित है तथा इस सूची को विद्यालय के बाहर लगाने का निर्देश दिया गया है। परंतु अधिसंख्य विद्यालयों में व्यंजन सूची के अनुसार खाना नहीं दिया जाता है। बच्चों के अभिभावकों को व्यंजन सूची की जानकारी न हो इसके लिए इसे विद्यालय के बाहर नहीं लगाया जाता।
वह रोते हुए स्थानीय भाषा में कहती हैं, "इ भोजनवा काल हो गईल। हमनी के का पता रहे कि इ बच्चवन आज स्कूल जईहं तो फिर एकनी के मरले मुंह देखे के मिली।"
वैसे यह हाल केवल हरेन्द्र मिश्र के घर की ही नहीं है। मशरक प्रखंड के नवनिर्मित प्राथमिक विद्यालय धरमसती, डंडामन में एक सरकारी विद्यालय में मंगलवार को मध्याह्न भोजन खाने से अब तक 19 बच्चों की मौत हो गई है जबकि अभी भी 40 से ज्यादा बच्चों का इलाज चल रहा है। पूरे डंडामन गांव में मातम का माहौल है। सभी लोग केवल एक-दूसरे को निहार रहे हैं। कुछ लोग जहां सरकार को दोषी मान रहे हैं तो कुछ लोग खाने में मिलावट की बात कर रहे हैं।
रामानंद राय की पुत्री काजल की मौत के बाद उनके सामने दुखों का पहाड़ टूट गया है। काजल की दादी कहती हैं उसके साथ पूरे परिवार का सपना जुड़ा था। वैसे अब तक मध्याह्न भोजन में किसी तरह की मिलावट या मौत की अन्य वजहों का पता नहीं चल पाया है। सारण के जिलाधिकारी अभिजीत सिन्हा कहते हैं कि चिकित्सकों के मुताबिक खाने में ऑर्गेनिक फास्फोरस की संभावना है। परंतु अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।
शिक्षा विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि राज्य में लगातार मध्याह्न भोजन में गड़बड़ी की शिकायत मिलती रही है। सरकार ने पिछले दिनों ही राज्य के 38 वरीय उप समाहर्ता को प्रत्येक जिले में मध्याह्न भोजन योजना का प्रभारी पदाधिकारी बनाया था। आरोप है कि इन पदाधिारियों ने व्यंजन सूची की जांच के अलावा कुछ खास नहीं किया।
राज्य में ताजा आंकड़ों के मुताबिक 22,102 सरकारी विद्यालयों में रसोईघर नहीं हैं। राज्य में 7,235 रसोई सह भंडारगृह निर्माणाधीन हैं। ऐसे में जिन विद्यालयों में रसोईघर नहीं हैं उन बच्चों का खाना खुले में बनाया जाता है। राज्य में करीब 72,000 प्राथमिक, मध्य, अनुदानित प्रारंभिक विद्यालयों के साथ-साथ मदरसों और शिक्षण केन्द्रों में यह योजना लागू है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य विद्यालयों का नामांकन, स्कूल छोड़ने की प्रवृत्ति कम करना तथा बच्चों को कुपोषण से मुक्ति दिलाना है।
शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली समाजिक संस्था 'आर्ट एंड आर्टिस्ट सोसाइटी' की सचिव संध्या सिंह कहती हैं कि मध्याह्न भोजन योजना के तहत पौष्टिक भोजन उपलब्ध हो सके इसके लिए विभाग द्वारा अलग-अलग दिन की व्यंजन सूची निर्धारित है तथा इस सूची को विद्यालय के बाहर लगाने का निर्देश दिया गया है। परंतु अधिसंख्य विद्यालयों में व्यंजन सूची के अनुसार खाना नहीं दिया जाता है। बच्चों के अभिभावकों को व्यंजन सूची की जानकारी न हो इसके लिए इसे विद्यालय के बाहर नहीं लगाया जाता।

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