भारतीय जनता पार्टी करीब डेढ़ दशक बाद राम मंदिर मुद्दे की तरफ वापस लौटती दिखाई दे रही है। इसे संयोग कहे या मोदी की बड़ी राजनीतिक चाल जहा आज मोदी गुजरात में बैठकर बिहार के कार्यकर्ताओं को संबोधित करेंगे वही उनके सबसे विश्वसनीय सिपहसलार अमित मोदी अयोध्या में रामलला के दरवाजे पहुँच गए।
गुजरात के जिस सोमनाथ मंदिर से 1989 में भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण अडवाणी ने अपनी रथयात्रा की शुरुवात की थी और बिहार की धरती पर लालू प्रसाद यादव के आदेश पर गिरफ्तार किये गए थे, आज उसी सोमनाथ की धरती से भाजपा के चुनाव प्रचार की परचम थामें गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी बिहार में टेलीकांफ्रेंसिंग के द्वारा चुनावी बिगुल फूकेंगे। जदयू के साथ गठबंधन टूटने के बाद पहली बार नरेन्द्र मोदी ने आज से अपनी चुनावी रणनीतियों को परवान चढ़ाना शुरू कर देंगे।
राजनीति में समय का सही इस्तेमाल मोदी जैसे राजनेता करना जानते है। नरेन्द्र मोदी ने आज देश के दो राज्यों को अपनी चुनावी वैतरणी पार कराने के लिए चुना जहा से लोकसभा की करीब 20 % सीटों को चुनकर जनता संसद में भेजती है। नरेन्द्र मोदी ने बिहार के कार्यकर्ताओं को संबोधित करने से पहले ही अमित शाह को अयोध्या के लिए रवाना कर रामलला से आशीर्वाद लेने भेज दिया।
भगवान राम की जन्मभूमि पर कदम रखते ही अमित शाह ने उनका पीछा कर रही मीडिया को जो पहला बयान दिया उस बयान ने साफ़ कर दिया की मोदी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी राम जन्मभूमि और मंदिर निर्माण की तरफ फिर से वापस लौट चुकी है। अमित शाह ने कहा कि वो रामलला से आशीर्वाद लेने आये है ताकि केंद्र की सत्ता पर काबिज कांग्रेसनीत यूपीए गठबंधन से देश की जनता को निजात मिले और रामलला का भव्य मंदिर निर्माण हो ताकि भगवान राम को उनकी सही जगह पर स्थापित किया जा सके।
भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकार ये जानते है बीते डेढ़ दशकों में रामजन्म भूमि मुद्दा छोड़ने की वजह से केंद्र की सत्ता जो हाथ से गई वो राम ही वापस दिलाएंगे। NDA के गठन के समय जिस रामलला और मंदिर निर्माण के अपने वादे को भाजपा ने ठंडे बस्ते में डाल दिया था, आज वही भाजपा एक बार फिर गुजरात से लगायत बिहार होते हुये एक बार फिर अयोध्या पहुँच गई।
1989 में रामजन्म भूमि और रथयात्रा के सारथी रहे लालकृष्ण आडवाणी आज रथ की लगाम नरेन्द्र मोदी को सौंप चुके है या ये कहे समय ने आडवाणी को पीछे कर दिया। नरेन्द्र मोदी वैसे तो पार्टी में सबको साथ लेकर चलने का दम भर रहे है लेकिन आज उन्होंने उस राज्य से अपनी चुनावी तैयारियों की शुरुवात करने के लिये चुना जहा से रथयात्रा रोके जाने के बाद रामलहर ने पूरे देश को अपने में समेट लिया था। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने एक साथ दोनों प्रदेशो को साधने की कोशिश की है।
भाजपा के इन दोनों नेताओं की कदमताल ने एक बार फिर देश में हिंदुत्व, रामलल्ला , रथयात्रा और रामजन्म भूमि मंदिर निर्माण जैसे मुद्दों को देश की राजनीति में बहस का मुद्दा बना दिया। भाजपा और उसके अगुवा नरेन्द्र मोदी को इस बात की सही जानकारी है कि देश में कौन सा राग छेड़ने पर जनता के दिल पर राज किया जा सकता है।
नरेन्द्र मोदी के साथ एक और बात अच्छी तरह से जुडी है नरेन्द्र मोदी को गुजरात के विकास का अगुवा माना जा रहा है। गुजरात माडल को नरेन्द्र मोदी देश में भी लागू करना चाहते है। मोदी के विकास और हिंदुत्व के साथ राम मंदिर मुद्दा अगर काम कर जाये तो मोदी के लिये भाजपा को केंद्र की सत्ता पर काबिज कराना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं रहेगा।
भाजपा के उत्थान और पतन पर उनके लोकसभा चुनावों के आधार पर किये गए प्रदर्शन पर नज़र डाले तो स्थिति अपने आप साफ़ हो जाती है। रामलहर पर जब तक भारतीय जनता पार्टी सवार रही तब तक देश की जनता ने उन्हें सर आँखों पर बैठाया लेकिन जैसे ही भाजपा के हाथ पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता आई भाजपा राम को भूली और जनता भाजपा को। जनता ने भाजपा द्वारा देश की हिन्दू जनता को दिए गए धोखे का सबक सिखाते हुये सत्ता से बाहर किया तो आज दस साल बाद भी केंद्र की सत्ता अभी भी उससे दूर लग रही है।
नरेन्द्र मोदी और उनकी टीम के हाथ में भाजपा के चुनाव प्रचार समिति की कमान आते ही NDA में सबसे बड़ी टूट हुई, भाजपा जदयू को खो चुकी है। भाजपा अच्छी तरह जानती है देश के वोटर का दिल आसानी से नहीं जीता जा सकता यही वजह है कि भाजपा ने एक बार फिर हिंदुत्व के रामरथ पर सवार होनी की पूरी तैयारी कर ली है।
आडवाणी की 89 में बिहार में गिरफ्तारी के बाद मंडल की आग में झुलस रहे देश में आम चुनावों में अनुसूचित जाति , अनुसूचित जनजाति , और पिछडो ने वीपी सिंह की अगुवाई में जनता ने जनता दल के "चक्र" चुनाव चिन्ह पर इतने वोट डाले की जनता दल की सरकार को स्वीकार करने के अलावा देश की राजनीतिक पार्टियों के पास कोई विकल्प नहीं बचा था। उन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने सबसे बेहतर प्रदर्शन करते हुये 85 सीट जीती थी ।
भाजपा के लिए आडवाणी की रथयात्रा और राममंदिर मुद्दे ने संजीवनी का काम किया 1991 में भाजपा कांग्रेस के बाद लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और 120 सीटे जीतकर मुख्य विपक्षी पार्टी का दर्जा प्राप्त किया। राम मंदिर मुद्दे ने भाजपा को जैसे सत्ता तक पहुँचने की राह दिखा दी थी 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में कारसेवकों ने विवादित ढांचा गिरा दिया इसी के बाद भाजपा हिंदुत्व के रथ पर सवार हिन्दू जातियों की पहली पसंद बनती गई।
1996 में भाजपा ने पहली बार मात्र 13 दिन के लिए अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में सरकार बनाई, भाजपा के पास उस समय 161 सीटे थी। अटल बिहारी वाजपेई की सरकार गिरी और तीसरे मोर्चे की सरकार का गठन हुआ लेकिन 99 में देश एक बार फिर चुनावों की तरफ चल पडा। इस बीच अटल बिहारी वाजपेई की सरकार का गठन दुबारा हुआ और वो सरकार 13 महीनो चली।
99 में भाजपा ने अटल बिहारी वाजपेई की अगुवाई में चुनाव लड़ा इस चुनाव में भाजपा दबे जुबान से मंदिर की बात कहती रही जनता ने अन्य दलों की भाजपा के साथ की गई दगाबाजी का सिला दिया| भाजपा ने 1999 चुनावों में अपने सहयोगियों के साथ मिलकर बहुमत से मात्र 2 कदम दूर रहते हुये 270 सीटे जीत कांग्रेस को सत्ता से मीलों दूर कर दिया।
सत्ता मिलते ही भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टिया सत्ता के मद में चूर हो गई। राममंदिर और हिंदुत्व उनके एजेंडे से बाहर हो गया पार्टी देश और भारत विकास में लग गई। अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व वाली सरकार में अच्छे काम भी हुये लेकिन जनता भाजपा द्वारा किये वादे नहीं भूली थी। जिसका सिला भी भाजपा को मिला और इंडिया शाईनिग करते हुए भाजपा के नेताओं के चेहरे की शाईनिंग 2004 का लोकसभा चुनाव हारते ही चली गई। गठबंधन 270 से 181 पर पहुँच गया।
सोनिया गाँधी का करिश्माई नेतृत्व कहे या भाजपा की राम मंदिर के नाम पर जनता से की गई दगाबाजी कांग्रेसनीत गठबंधन यूपीए ने मनमोहन सिंह के नेतृत्व में सरकार बनाई। भाजपा नीत गठबंधन में टूट हुई जिसका असर भी दिखा| 2009 के लोकसभा चुनाव में राजद और नीचे चला गया 181 सीटो से 159 सीट पर पहुँचने वाली राजद एक बार फिर राममंदिर और हिंदुत्व का राग अलाप चुका है।
भाजपा में तेज़ी से घट रही घटनाओं और गतिविधियों ने ये संकेत दे दिये की संघ ने भी नरेन्द्र मोदी को अपनी तरफ से पूरी ताकत दे दी है। लालकृष्ण आडवाणी का संघ प्रमुख से नागपुर में जाकर मिलना, राजनाथ सिंह का संघ की ड्योढ़ी पर मत्था टेकना वही नरेन्द्र मोदी के ख़ास अमित शाह का अयोध्या जाना ये सभी संकेत भाजपा को उनके पुराने मुद्दे पर वापस लौटने की गवाही दे रहे है।
बहरहाल भाजपा और पार्टी के अगुवा अच्छी तरह जानते है कि इस बार के लोकसभा चुनाव में चूके तो आगे हालात कैसे होंगे ये कोई नहीं जानता इस वजह से इस बार दिल्ली फतह के लिए राममंदिर को आगे लाना पड़े कोई बुराई नहीं भाजपा इस बार हर हाल में केंद्र की सत्ता चाहती है, लेकिन उसकी मुश्किल भी बड़ी है भाजपा की सबसे बड़ी सहयोगी जदयू ने भाजपा और राजद का दामन छोड़ दिया है। भाजपा को अच्छी तरह पता है राममंदिर और हिंदुत्व वही एक मुद्दा है जिससे वोट बांटकर, वोट पाया जा सकता है।
भाजपा ने एक बार फिर राम का सहारा लिया है, राम उसे सहारा देते है या और बुरी हालत करते है ये तो चुनावों के परिणाम के बाद ही सामने आयेगा लेकिन इतना तय है, मोदी के विकास और हिंदुत्व का मुद्दा अगर काम कर गया तो देश में नई हलचल तो जरुर दिखाई देगी।
गुजरात के जिस सोमनाथ मंदिर से 1989 में भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण अडवाणी ने अपनी रथयात्रा की शुरुवात की थी और बिहार की धरती पर लालू प्रसाद यादव के आदेश पर गिरफ्तार किये गए थे, आज उसी सोमनाथ की धरती से भाजपा के चुनाव प्रचार की परचम थामें गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी बिहार में टेलीकांफ्रेंसिंग के द्वारा चुनावी बिगुल फूकेंगे। जदयू के साथ गठबंधन टूटने के बाद पहली बार नरेन्द्र मोदी ने आज से अपनी चुनावी रणनीतियों को परवान चढ़ाना शुरू कर देंगे।
राजनीति में समय का सही इस्तेमाल मोदी जैसे राजनेता करना जानते है। नरेन्द्र मोदी ने आज देश के दो राज्यों को अपनी चुनावी वैतरणी पार कराने के लिए चुना जहा से लोकसभा की करीब 20 % सीटों को चुनकर जनता संसद में भेजती है। नरेन्द्र मोदी ने बिहार के कार्यकर्ताओं को संबोधित करने से पहले ही अमित शाह को अयोध्या के लिए रवाना कर रामलला से आशीर्वाद लेने भेज दिया।
भगवान राम की जन्मभूमि पर कदम रखते ही अमित शाह ने उनका पीछा कर रही मीडिया को जो पहला बयान दिया उस बयान ने साफ़ कर दिया की मोदी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी राम जन्मभूमि और मंदिर निर्माण की तरफ फिर से वापस लौट चुकी है। अमित शाह ने कहा कि वो रामलला से आशीर्वाद लेने आये है ताकि केंद्र की सत्ता पर काबिज कांग्रेसनीत यूपीए गठबंधन से देश की जनता को निजात मिले और रामलला का भव्य मंदिर निर्माण हो ताकि भगवान राम को उनकी सही जगह पर स्थापित किया जा सके।
भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकार ये जानते है बीते डेढ़ दशकों में रामजन्म भूमि मुद्दा छोड़ने की वजह से केंद्र की सत्ता जो हाथ से गई वो राम ही वापस दिलाएंगे। NDA के गठन के समय जिस रामलला और मंदिर निर्माण के अपने वादे को भाजपा ने ठंडे बस्ते में डाल दिया था, आज वही भाजपा एक बार फिर गुजरात से लगायत बिहार होते हुये एक बार फिर अयोध्या पहुँच गई।
1989 में रामजन्म भूमि और रथयात्रा के सारथी रहे लालकृष्ण आडवाणी आज रथ की लगाम नरेन्द्र मोदी को सौंप चुके है या ये कहे समय ने आडवाणी को पीछे कर दिया। नरेन्द्र मोदी वैसे तो पार्टी में सबको साथ लेकर चलने का दम भर रहे है लेकिन आज उन्होंने उस राज्य से अपनी चुनावी तैयारियों की शुरुवात करने के लिये चुना जहा से रथयात्रा रोके जाने के बाद रामलहर ने पूरे देश को अपने में समेट लिया था। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने एक साथ दोनों प्रदेशो को साधने की कोशिश की है।
भाजपा के इन दोनों नेताओं की कदमताल ने एक बार फिर देश में हिंदुत्व, रामलल्ला , रथयात्रा और रामजन्म भूमि मंदिर निर्माण जैसे मुद्दों को देश की राजनीति में बहस का मुद्दा बना दिया। भाजपा और उसके अगुवा नरेन्द्र मोदी को इस बात की सही जानकारी है कि देश में कौन सा राग छेड़ने पर जनता के दिल पर राज किया जा सकता है।
नरेन्द्र मोदी के साथ एक और बात अच्छी तरह से जुडी है नरेन्द्र मोदी को गुजरात के विकास का अगुवा माना जा रहा है। गुजरात माडल को नरेन्द्र मोदी देश में भी लागू करना चाहते है। मोदी के विकास और हिंदुत्व के साथ राम मंदिर मुद्दा अगर काम कर जाये तो मोदी के लिये भाजपा को केंद्र की सत्ता पर काबिज कराना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं रहेगा।
भाजपा के उत्थान और पतन पर उनके लोकसभा चुनावों के आधार पर किये गए प्रदर्शन पर नज़र डाले तो स्थिति अपने आप साफ़ हो जाती है। रामलहर पर जब तक भारतीय जनता पार्टी सवार रही तब तक देश की जनता ने उन्हें सर आँखों पर बैठाया लेकिन जैसे ही भाजपा के हाथ पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता आई भाजपा राम को भूली और जनता भाजपा को। जनता ने भाजपा द्वारा देश की हिन्दू जनता को दिए गए धोखे का सबक सिखाते हुये सत्ता से बाहर किया तो आज दस साल बाद भी केंद्र की सत्ता अभी भी उससे दूर लग रही है।
नरेन्द्र मोदी और उनकी टीम के हाथ में भाजपा के चुनाव प्रचार समिति की कमान आते ही NDA में सबसे बड़ी टूट हुई, भाजपा जदयू को खो चुकी है। भाजपा अच्छी तरह जानती है देश के वोटर का दिल आसानी से नहीं जीता जा सकता यही वजह है कि भाजपा ने एक बार फिर हिंदुत्व के रामरथ पर सवार होनी की पूरी तैयारी कर ली है।
आडवाणी की 89 में बिहार में गिरफ्तारी के बाद मंडल की आग में झुलस रहे देश में आम चुनावों में अनुसूचित जाति , अनुसूचित जनजाति , और पिछडो ने वीपी सिंह की अगुवाई में जनता ने जनता दल के "चक्र" चुनाव चिन्ह पर इतने वोट डाले की जनता दल की सरकार को स्वीकार करने के अलावा देश की राजनीतिक पार्टियों के पास कोई विकल्प नहीं बचा था। उन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने सबसे बेहतर प्रदर्शन करते हुये 85 सीट जीती थी ।
भाजपा के लिए आडवाणी की रथयात्रा और राममंदिर मुद्दे ने संजीवनी का काम किया 1991 में भाजपा कांग्रेस के बाद लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और 120 सीटे जीतकर मुख्य विपक्षी पार्टी का दर्जा प्राप्त किया। राम मंदिर मुद्दे ने भाजपा को जैसे सत्ता तक पहुँचने की राह दिखा दी थी 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में कारसेवकों ने विवादित ढांचा गिरा दिया इसी के बाद भाजपा हिंदुत्व के रथ पर सवार हिन्दू जातियों की पहली पसंद बनती गई।
1996 में भाजपा ने पहली बार मात्र 13 दिन के लिए अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में सरकार बनाई, भाजपा के पास उस समय 161 सीटे थी। अटल बिहारी वाजपेई की सरकार गिरी और तीसरे मोर्चे की सरकार का गठन हुआ लेकिन 99 में देश एक बार फिर चुनावों की तरफ चल पडा। इस बीच अटल बिहारी वाजपेई की सरकार का गठन दुबारा हुआ और वो सरकार 13 महीनो चली।
99 में भाजपा ने अटल बिहारी वाजपेई की अगुवाई में चुनाव लड़ा इस चुनाव में भाजपा दबे जुबान से मंदिर की बात कहती रही जनता ने अन्य दलों की भाजपा के साथ की गई दगाबाजी का सिला दिया| भाजपा ने 1999 चुनावों में अपने सहयोगियों के साथ मिलकर बहुमत से मात्र 2 कदम दूर रहते हुये 270 सीटे जीत कांग्रेस को सत्ता से मीलों दूर कर दिया।
सत्ता मिलते ही भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टिया सत्ता के मद में चूर हो गई। राममंदिर और हिंदुत्व उनके एजेंडे से बाहर हो गया पार्टी देश और भारत विकास में लग गई। अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व वाली सरकार में अच्छे काम भी हुये लेकिन जनता भाजपा द्वारा किये वादे नहीं भूली थी। जिसका सिला भी भाजपा को मिला और इंडिया शाईनिग करते हुए भाजपा के नेताओं के चेहरे की शाईनिंग 2004 का लोकसभा चुनाव हारते ही चली गई। गठबंधन 270 से 181 पर पहुँच गया।
सोनिया गाँधी का करिश्माई नेतृत्व कहे या भाजपा की राम मंदिर के नाम पर जनता से की गई दगाबाजी कांग्रेसनीत गठबंधन यूपीए ने मनमोहन सिंह के नेतृत्व में सरकार बनाई। भाजपा नीत गठबंधन में टूट हुई जिसका असर भी दिखा| 2009 के लोकसभा चुनाव में राजद और नीचे चला गया 181 सीटो से 159 सीट पर पहुँचने वाली राजद एक बार फिर राममंदिर और हिंदुत्व का राग अलाप चुका है।
भाजपा में तेज़ी से घट रही घटनाओं और गतिविधियों ने ये संकेत दे दिये की संघ ने भी नरेन्द्र मोदी को अपनी तरफ से पूरी ताकत दे दी है। लालकृष्ण आडवाणी का संघ प्रमुख से नागपुर में जाकर मिलना, राजनाथ सिंह का संघ की ड्योढ़ी पर मत्था टेकना वही नरेन्द्र मोदी के ख़ास अमित शाह का अयोध्या जाना ये सभी संकेत भाजपा को उनके पुराने मुद्दे पर वापस लौटने की गवाही दे रहे है।
बहरहाल भाजपा और पार्टी के अगुवा अच्छी तरह जानते है कि इस बार के लोकसभा चुनाव में चूके तो आगे हालात कैसे होंगे ये कोई नहीं जानता इस वजह से इस बार दिल्ली फतह के लिए राममंदिर को आगे लाना पड़े कोई बुराई नहीं भाजपा इस बार हर हाल में केंद्र की सत्ता चाहती है, लेकिन उसकी मुश्किल भी बड़ी है भाजपा की सबसे बड़ी सहयोगी जदयू ने भाजपा और राजद का दामन छोड़ दिया है। भाजपा को अच्छी तरह पता है राममंदिर और हिंदुत्व वही एक मुद्दा है जिससे वोट बांटकर, वोट पाया जा सकता है।
भाजपा ने एक बार फिर राम का सहारा लिया है, राम उसे सहारा देते है या और बुरी हालत करते है ये तो चुनावों के परिणाम के बाद ही सामने आयेगा लेकिन इतना तय है, मोदी के विकास और हिंदुत्व का मुद्दा अगर काम कर गया तो देश में नई हलचल तो जरुर दिखाई देगी।

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