सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने सभी पार्टियों और राजनेताओं के पेशानी पर बल ला दिया, कोर्ट के फैसले के मुताबिक किसी भी नेता को अगर दो साल क सज़ा हो जाये तो उसकी संसद और विधानसभा से सदस्यता खुद ब खुद ख़त्म हो जायेगी। ये आज की राजनीति और नेताओं के चरित्र का सच है, बीते जमाने के नेतागीरी और नेताओं के चरित्र को दर्शाती एक और कहानी है जो आज इस दुनिया में नहीं है हम बात कर रहे है उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य के गौरवशाली विधानसभा के उस पूर्व सदस्य की जो बेहतर इलाज़ के बिना दुनिया छोड़ गया आज परिवार की आर्थिक स्थिति और पैसे की तंगी होने की वजह से उसकी लाश को कफ़न भी नहीं नसीब हुआ।
आज देश की राजनीतिक पार्टिया संसद और विधानसभाओ में अपने सदस्यों की संख्या बढाने के लिए जिस तरह अपराधी बाहुबलियों और पैसे वालों को गले लगाकर अपने बगल में बैठाती है वैसा शायद पहले नहीं होता था, सुचिता और चरित्र की राजनीति करने वाले नेताओं को समाजसेवा ही भाती थी, तभी तो ऐसे नेता अपने कल के बारे में सोचने से पहले समाज के बारे में सोचा करते थे।
ऐसे ही एक नेता थे पूर्व विधायक भगौती प्रसाद जिनकी मौत ने राजनीति के स्याह चेहरे को उजागर कर दिया। जिस देश में राजनेताओं के ठाठ और विलासिता के कई उदाहरण आम हैं, वहां गरीबी और तंगहाली में एक विधायक की मौत हो जाए, तो सभी को घोर आश्चर्य होगा| लेकिन यह सच है, गरीबी के दौर से गुजर रहे दो बार के विधायक भगौती प्रसाद का गम्भीर बीमारियों की वजह से अस्पताल में बुधवार को अंत हो गया, वे करीब 78 वर्ष के थे।
दलित बिरादरी के भगौती प्रसाद ने अपना पूरा जीवन ईमानदारी से जनता की सेवा में लगा दिया| वर्ष 1967 और 1969 में इकौना सुरक्षित सीट से भारतीय जनसंघ के टिकट पर विधायक चुने गये प्रसाद को बेहद मुफलिसी भरी जिंदगी गुजारनी पड़ी। प्रसाद ने वर्ष 2003 में अपने परिवार का खर्च चलाने के लिए गांव में एक नुक्कड़ पर चाय तथा चने की दुकान खोलनी पड़ी। मौजूदा वक्त में राजनेताओं के ठाठ-बाठ के उलट चाय की दुकान चलाकर बेहद गरीबी में जिंदगी गुजारने वाले प्रसाद के परिवार में पत्नी फूलमती, तीन पुत्र, एक पुत्री हैं।
परिजन के मुताबिक गरीबी और तंगहाली के दौर से गुजरे पूर्व विधायक भगौती प्रसाद का जीवन के अंतिम समय में ठीक से इलाज तक नहीं हो सका। छह दिन पहले उन्हें बहराइच के एक निजी नर्सिग होम में भर्ती कराया गया था, लेकिन पैसे की कमी की वजह से रविवार को उन्हें जिला अस्पताल लाना पड़ा जहा उनकी मौत हो गई। आर्थिक तंगी का आलम यह था कि पूर्व विधायक के शव को उनके पैतृक गांव भेजने का खर्च भी अस्पताल प्रशासन को देना पड़ा। यहां तक कि परिजन के पास उनके अंतिम संस्कार के लिये भी पैसे नहीं थे।
पारिवारिक सूत्रों के मुताबिक, प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री बीजेपी नेता दद्दन मिश्र और पूर्व विधान परिषद सदस्य सुभाष त्रिपाठी ने पार्टी की तरफ प्रसाद का उनके पैतृक गांव मढ़ारा में अंतिम संस्कार कराया। पूर्व विधायक के पास सम्पत्ति के नाम पर करीब तीन एकड़ खेती की जमीन थी| पहले वे अपने गांव में एक झोपड़ी में रहते थे| कुछ साल पहले ग्राम पंचायत ने उनके बेटे को गरीबों को मिलने वाला इंदिरा आवास आवंटित कर दिया था, जिसमें वे अपने परिवार के साथ रहते थे।
आज देश की राजनीतिक पार्टिया संसद और विधानसभाओ में अपने सदस्यों की संख्या बढाने के लिए जिस तरह अपराधी बाहुबलियों और पैसे वालों को गले लगाकर अपने बगल में बैठाती है वैसा शायद पहले नहीं होता था, सुचिता और चरित्र की राजनीति करने वाले नेताओं को समाजसेवा ही भाती थी, तभी तो ऐसे नेता अपने कल के बारे में सोचने से पहले समाज के बारे में सोचा करते थे।
ऐसे ही एक नेता थे पूर्व विधायक भगौती प्रसाद जिनकी मौत ने राजनीति के स्याह चेहरे को उजागर कर दिया। जिस देश में राजनेताओं के ठाठ और विलासिता के कई उदाहरण आम हैं, वहां गरीबी और तंगहाली में एक विधायक की मौत हो जाए, तो सभी को घोर आश्चर्य होगा| लेकिन यह सच है, गरीबी के दौर से गुजर रहे दो बार के विधायक भगौती प्रसाद का गम्भीर बीमारियों की वजह से अस्पताल में बुधवार को अंत हो गया, वे करीब 78 वर्ष के थे।
दलित बिरादरी के भगौती प्रसाद ने अपना पूरा जीवन ईमानदारी से जनता की सेवा में लगा दिया| वर्ष 1967 और 1969 में इकौना सुरक्षित सीट से भारतीय जनसंघ के टिकट पर विधायक चुने गये प्रसाद को बेहद मुफलिसी भरी जिंदगी गुजारनी पड़ी। प्रसाद ने वर्ष 2003 में अपने परिवार का खर्च चलाने के लिए गांव में एक नुक्कड़ पर चाय तथा चने की दुकान खोलनी पड़ी। मौजूदा वक्त में राजनेताओं के ठाठ-बाठ के उलट चाय की दुकान चलाकर बेहद गरीबी में जिंदगी गुजारने वाले प्रसाद के परिवार में पत्नी फूलमती, तीन पुत्र, एक पुत्री हैं।
परिजन के मुताबिक गरीबी और तंगहाली के दौर से गुजरे पूर्व विधायक भगौती प्रसाद का जीवन के अंतिम समय में ठीक से इलाज तक नहीं हो सका। छह दिन पहले उन्हें बहराइच के एक निजी नर्सिग होम में भर्ती कराया गया था, लेकिन पैसे की कमी की वजह से रविवार को उन्हें जिला अस्पताल लाना पड़ा जहा उनकी मौत हो गई। आर्थिक तंगी का आलम यह था कि पूर्व विधायक के शव को उनके पैतृक गांव भेजने का खर्च भी अस्पताल प्रशासन को देना पड़ा। यहां तक कि परिजन के पास उनके अंतिम संस्कार के लिये भी पैसे नहीं थे।
पारिवारिक सूत्रों के मुताबिक, प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री बीजेपी नेता दद्दन मिश्र और पूर्व विधान परिषद सदस्य सुभाष त्रिपाठी ने पार्टी की तरफ प्रसाद का उनके पैतृक गांव मढ़ारा में अंतिम संस्कार कराया। पूर्व विधायक के पास सम्पत्ति के नाम पर करीब तीन एकड़ खेती की जमीन थी| पहले वे अपने गांव में एक झोपड़ी में रहते थे| कुछ साल पहले ग्राम पंचायत ने उनके बेटे को गरीबों को मिलने वाला इंदिरा आवास आवंटित कर दिया था, जिसमें वे अपने परिवार के साथ रहते थे।

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