रमजान के महीने में मुस्लिम समाज के लोगों को घड़ी नहीं, एक आवाज बताती है कि सहरी का वक्त हो गया। मध्य प्रदेश के दमोह जिले में यह सिलसिला चार दशक से ज्यादा समय से चला आ रहा है।
शहर की गलियों में हाथ में डंडा लिए और 'जाग जाओ' की पुकार लगाता हुआ सब्बा पहलवान रात के सन्नाटे को तोड़ते हुए मुस्लिम समाज के लोगों को बताता है कि सहरी का वक्त हो चुका है और अब बिस्तर छोड़ दो।
सब्बा पहलवान की आवाज सुनते ही रोजा रखने वाले जागकर अपने नित्य काम में जुट जाते हैं। जो लोग पुकार से नहीं जागते हैं, तो वह उनके दरवाजों की कुंडी तक खटखटाने से पीछे नहीं रहते।
उम्र के लगभग छह दशक को पार कर गए सब्बा पहलवान बीते 40 वर्षो से रमजान के महीने में शहर की गलियों में घूम-घूमकर लोगों को जगाने का काम करते चले आ रहे हैं। वे कहते हैं कि रमजान के महीने में सहरी के लिए लोगों को जगाते वक्त उन्हें ऐसा लगता है मानो वे ख्वाजा गरीब नबास की नगरी अजमेर शरीफ में घूम रहे हों। इतना नहीं, वे अल्लाह के लिए इसे अपना करम मानते हैं।
बुजुर्ग अफजल बताते हैं कि वे सब्बा पहलवान को पिछले चार दशक से रमजान के महीने में शहर की गलियों में घूम-घूमकर लोगों को यह बताते हैं कि अब सहरी का वक्त हो गया है। उनकी पुकार लोगों के लिए घड़ी बन गई है।
सब्बा पहलवान कहते हैं कि वे जब 16 वर्ष के थे, तभी से रमजान के महीने में लोगों को सहरी का समय बताते चले आ रहे हैं। रात के अंधेरे में उन्हें किसी से डर नहीं लगता, क्योंकि अल्लाह का आशीर्वाद उनके साथ होता है। वे बेखौफ होकर शहर की गलियों में अपने अभियान पर निकलते हैं। वे कहते हैं, "यह काम भी तो अल्लाह का ही है, यह इबादत भी है।"
बुजुर्ग सब्बा पहलवान औरों के लिए नजीर बन गए हैं कि सिर्फ अपने लिए नहीं, समाज के लिए जिया जाता है। सब्बा मानते हैं कि समाज के लिए किया जाने वाला काम अल्लाह का ही काम है।
शहर की गलियों में हाथ में डंडा लिए और 'जाग जाओ' की पुकार लगाता हुआ सब्बा पहलवान रात के सन्नाटे को तोड़ते हुए मुस्लिम समाज के लोगों को बताता है कि सहरी का वक्त हो चुका है और अब बिस्तर छोड़ दो।
सब्बा पहलवान की आवाज सुनते ही रोजा रखने वाले जागकर अपने नित्य काम में जुट जाते हैं। जो लोग पुकार से नहीं जागते हैं, तो वह उनके दरवाजों की कुंडी तक खटखटाने से पीछे नहीं रहते।
उम्र के लगभग छह दशक को पार कर गए सब्बा पहलवान बीते 40 वर्षो से रमजान के महीने में शहर की गलियों में घूम-घूमकर लोगों को जगाने का काम करते चले आ रहे हैं। वे कहते हैं कि रमजान के महीने में सहरी के लिए लोगों को जगाते वक्त उन्हें ऐसा लगता है मानो वे ख्वाजा गरीब नबास की नगरी अजमेर शरीफ में घूम रहे हों। इतना नहीं, वे अल्लाह के लिए इसे अपना करम मानते हैं।
बुजुर्ग अफजल बताते हैं कि वे सब्बा पहलवान को पिछले चार दशक से रमजान के महीने में शहर की गलियों में घूम-घूमकर लोगों को यह बताते हैं कि अब सहरी का वक्त हो गया है। उनकी पुकार लोगों के लिए घड़ी बन गई है।
सब्बा पहलवान कहते हैं कि वे जब 16 वर्ष के थे, तभी से रमजान के महीने में लोगों को सहरी का समय बताते चले आ रहे हैं। रात के अंधेरे में उन्हें किसी से डर नहीं लगता, क्योंकि अल्लाह का आशीर्वाद उनके साथ होता है। वे बेखौफ होकर शहर की गलियों में अपने अभियान पर निकलते हैं। वे कहते हैं, "यह काम भी तो अल्लाह का ही है, यह इबादत भी है।"
बुजुर्ग सब्बा पहलवान औरों के लिए नजीर बन गए हैं कि सिर्फ अपने लिए नहीं, समाज के लिए जिया जाता है। सब्बा मानते हैं कि समाज के लिए किया जाने वाला काम अल्लाह का ही काम है।
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