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Sunday, 7 July 2013

लावारिस लाशों का मसीहा

बीते 35 वर्षो से लावारिस लाशों को उनकी सद्गति तक पहुंचाने वाले कमरुद्दीन आज भी सरकार से मदद की आस लगाये बैठा| एक पुलिस अधिकारी की मदद से मोटरसाइकिल से ठेलागाडी बनाने वाले कमरुद्दीन ने अभी तक 25 हज़ार लाशों को उनकी सद्गति दिलाई है| कमरुद्दीन प्रदेश के लखीमपुर में डीसी रोड किनारे है कांशीराम आवासीय कालोनी। 

कमरूद्दीन ने बताया कि जिला अस्पताल से लावारिस शवों को ढोने का काम पहले समर बहादुर सिंह करता था। इस काम में वह समर की मदद करता था। 10 वर्षो तक काम करने के बाद समर की मौत हो गई। उसके बाद मोहम्मद नवी, छल्लन और अपने दमाद भल्लर के साथ मिलकर कमरूद्दीन यह काम करता रहा।

कमरूद्दीन ने बताया कि लखीमपुर सदर कोतवाली में कोतवाल पी.के. मिश्रा की नियुक्ति हुई। एक दिन उन्होंने जब उसे ठेलिया पर लावारिस शव ढोते हुए देखा तो उन्हें तरस आ गया और उन्होंने उसे दान में एक पुरानी मोटरसाइकिल दे दी। इसके बाद कमरूद्दीन ने मोटरसाइकिल में ही ठेलिया को जोड़ने की व्यवस्था कर ली, तब से काम थोड़ा आसान हो गया है।

कमरूद्दीन चाहता है कि अगर उसे प्रदेश सरकार द्वारा एक गाड़ी और घर के खर्च भर के लिए कुछ पैसे मिलने लगे तो उसकी मुश्किलें और आसान हो जाएंगी। 

कमरूद्दीन कहता है, अब तक लगभग पच्चीस हजार लावारिस लाशें ढो चुका हूं और चिट्ठियां लिखकर अपनी समस्याएं यहां के अफसरों से लेकर मुख्यमंत्री तक को बता चुका हूं। लेकिन आज तक किसी ने मेरी बात नहीं सुनी। बस, अपना फर्ज समझकर यह काम करता हूं।

बात करते-करते कमरूद्दीन मशहूर फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन की फिल्म 'कुली' का एक गीत गुनगुनाने लगता है 'सारी दुनिया का बोझ हम उठाते हैं..' वह शवों का बोझ उठाते-उठाते इसी काम को नेकी मानता है। यह बात दीगर है कि बोझ उठाने वाले इस नेक इंसान के बारे में सोचने की फुर्सत किसी को नहीं है।

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