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Thursday, 4 July 2013

अनाज के हर किलो से निकालेंगे वोट

मनमोहन सरकार और यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गाँधी ने अपनी चुनावी रणनीतियों को अमलीजामा पहनाना शुरू कर दिया है। केंद्र सरकार के पिटारे से निकले खाद्य सुरक्षा अध्यादेश (फ़ूड सिक्युरिटी आर्डिनेंस) को लागू कर दिया है। दो बार कैबिनेट बैठक से बाहर हुये इस बिल को केंद्र सरकार के सिपहसालारों ने अध्यादेश में बदल दिया। 

तीसरी बार तीसरी दुनिया के देश भारत के उन करोड़ों गरीबों के मुंह तक निवाला पहुंचाने के लिए केंद्र की मनमोहन सरकार ने अपनी अगुवा के दिशा निर्देश पर इस अध्यादेश को कैबिनेट से मंजूरी दिलाकर महामहिम के पास, पास करने के लिए भिजवा दिया। मनमोहन सरकार का ये फैसला इस चुनावी साल का वो छक्का है जिसके लिए अब विपक्ष और मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा को नया रास्ता तलाशना पड़ेगा। 

सरकार ने इस बिल को संसद से पास कराने के लिए वो सब कुछ किया जो उसे नहीं करना चाहिये था, विपक्ष भी इस खाद्य सुरक्षा बिल को लेकर सतर्क था| वजह भी साफ़ थी, ये बिल कही संसद से एक्ट के तौर पर पास हो जाता तो विपक्ष कांग्रेस से कई कदम पीछे हो जाती। कांग्रेस भी हार मानने वाली नहीं थी, क्योंकि उसे पता था की इस चुनावी वर्ष में अगर खाद्य सुरक्षा बिल को पास करा लिया जाता है तो देश की करीब 67 % जनता अपने वोटो का रूख केंद्र की सत्ता में बैठी कांग्रेस की तरफ मोड़ देगी। 

कांग्रेस ने एक ऐसा ही एक्ट 25 अगस्त 2005 को पास करवाया था, उस एक्ट की वजह से ग्रामीण इलाकों में बेरोजगार जनता को कम से कम 100 दिन के रोज़गार की गारंटी मिल गई थी। नरेगा यानि राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार एक्ट ने भारत के गांवो में निवास करने वालों की तस्वीर बदल दी थी साथ ही कांग्रेस की सूरत को भी बदल दिया, कांग्रेस गांव-गांव में पहचानी जाने लगी। कांग्रेस ने एक दाँव ठीक 2009 के चुनावों के पहले चला जब उसने इस एक्ट का नाम बदल कर राष्ट्रपिता के नाम से जाने जाने वाले महात्मा गांधी के नाम को इस एक्ट में जोड़ दिया । 

कांग्रेस ने महात्मा गांधी के जन्मदिन, 2 अक्टूबर 2009 को इस योजना का नाम महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी एक्ट यानी मनेरगा कर दिया था| जिसका फायदा कांग्रेस को 2009 के चुनावों में मिला। कांग्रेस ने इस एक्ट के बदौलत उन चुनावों में अकेले कांग्रेस ने 206 सीटे जीती थी वही संयुक्त गतिशील गठबंधन यानि यूनाइटेड प्रोग्रेसीव एलायंस (UPA) ने बहुमत से 10 सीटे कम 262 सीटों पर कब्जा जमा कर सत्ता में वापसी की थी। 

2009 के लोकसभा चुनावों में घोटाला, भ्रष्टाचार, मंहगाई और सरकार के कामकाज पर भी उंगलिया उठी थी लेकिन मनरेगा ने न सिर्फ यूपीए की सत्ता में वापसी कराई बल्कि विपक्ष को भी धराशाई कर दिया। इन चुनावों में यूपीए गठबंधन को 37.22% वोट मिले थे साथ ही इस एक्ट के बदौलत उनके वोट प्रतिशत में 3.96% की स्विंग हुई थी। कांग्रेस ने मनरेगा लागू कर लगातार दूसरी बार सत्ता पर कब्जा जमाया अब खाद्य सुरक्षा अध्यादेश (फ़ूड सिक्युरिटी आर्डिनेंस) लाकर केंद्र में बैठी यूपीए तीसरी बार केंद्र की सत्ता पर कब्जा जमाने की तैयारी में है। 

खाद्य सुरक्षा अध्यादेश (फ़ूड सिक्युरिटी आर्डिनेंस) जो पहले बिल के तौर पर आना था उसकों लाने में जहाँ कांग्रेस को विपक्ष के वार झेलने पड़े वही अपने ही सत्ता के साथियों का भी विरोध झेलना पडा। कांग्रेस की पुरानी सहयोगी शरद पवार के अगुवाई वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) ने इस बिल का भारी विरोध किया। कैबिनेट से शरद पवार के विरोध की वजह से दो बार ठंडे बसते में डाले गए इस एक्ट को कांग्रेस ने चुनावों से पहले देश में लागू करने के लिए अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया और इस एक्ट को अध्यादेश में बदल कर कैबिनेट से पास करा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पास भेज दिया। 

कांग्रेस को इस अध्यादेश को 6 महीने के अन्दर संसद के दोनों सदनों से पास कराना है। कांग्रेस भी इस बात को अच्छी तरह से जानती है कि ये बिल विपक्ष के सहयोग बिना पास नहीं हो सकता है यही वजह है कांग्रेस और उसकी अगुवा ने इस समय का चुनाव किया 6 महीने बाद तक देश में लोकसभा चुनावों का माहौल बन जायेगा। चुनाव प्रचार अपने चरम पर होगा तब कांग्रेस के चुनावी रणनीतिकार इस अध्यादेश को लेकर जनता के बीच जा सकते है। कांग्रेस जनता के बीच ये कह सकती है कि वो गरीबों के साथ है लेकिन विपक्ष गरीब का पेट भरते नहीं देखना चाहता। 

भाजपा को दुविधा में फंसाने वाली कांग्रेस ने इस अध्यादेश के माध्यम से अपने चुनावी हित साधने की पूरी तैयारी कर ली है। वही भाजपा इस एक्ट को लेकर मुखर है भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के बयानों पर गौर करें तो भाजपा इस अध्यादेश को लेकर बैकफुट पर नज़र आ रही है। भाजपा की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज का कहना है, भाजपा इस बिल के विरोध में नहीं है लेकिन सरकार को इस बिल को संसद में लोकतान्त्रिक तरीके से बहस के बाद पास कराना चाहिए। सरकार इस बिल को संसद में लाना नहीं चाहती थी इसी वजह से उसने इसे आर्डिनेंस के तौर पर महामहिम के सामने भेज दिया। 

खाद्य सुरक्षा अध्यादेश (फ़ूड सिक्युरिटी आर्डिनेंस) के लागू हो जाने के बाद केंद्र सरकार की इस योजना से देश के 1 अरब 20 करोड़ की जनता में से 67 % जनता यानी 80 करोड़ जनता को लाभ पहुंचेगा। सरकार ने इस बिल में 2 रुपये किलों गेंहू , 3 रुपयें किलो चावल वही गर्भवती महिलाओं के लिए अलग से 6 हज़ार रुपयें का प्राविधान किया है। इस बिल से ग्रामीण इलाकों के 75% जनता और शहरी इलाकों के 50 % जनता को लाभ मिलेगा। सोनिया गांधी और उनकी टीम ने इस अध्यादेश को लागू करवा कर भरपूर चुनावी माइलेज लेने का इंतज़ाम कर लिया है। 

कांग्रेस सत्ता के करीब रहने वाली पार्टी है, कांग्रेस और उसके रणनीतिकारों को ये पता है कि जनता की उँगलियों को हाथ के पंजे वाले निशान तक कैसे पहुंचाना है। इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक कांग्रेस ने चुनावों से पहले कुछ ना कुछ ऐसा किया जिसकी वजह से जनता कांग्रेस की तरफ झुक गई। सोनिया के नेतृत्व में लगातार दो बार सत्ता का स्वाद चख चुकी कांग्रेस अब तीसरी पारी खेलने के लिए इस अध्यादेश के माध्यम से मैदान में है। वही संयुक्त विपक्ष आपसी खीचतान से ही बाहर नहीं आ पा रहा है। 

यूपीए-2 का कार्यकाल भी विवादों, घोटालों, मंहगाई तक से भरा रहा यहाँ तक की इस कार्यकाल में साफ़ छवि वाले भारतीय राजनीति के मिस्टर क्लीन मनमोहन सिंह के ऊपर भी कोयले के दाग लग चुके है। सोनिया की अगुवाई में अगर कांग्रेस खाद्य सुरक्षा अध्यादेश (फ़ूड सिक्युरिटी आर्डिनेंस) के साथ चुनावों में उतरती है और जिस चुनावी सफलता की अपेक्षा यूपीए को है वो मिलती है तो सत्ता में आने के बाद कांग्रेस के साथ सभी ये कह सकते है 'दाग' अच्छे थे लेकिन ये अध्यादेश उन दागो से भी अच्छा साबित हुआ।

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