कांग्रेस के दुश्मन नंबर एक जनता पार्टी के सुब्रमण्यम स्वामी जल्द ही नरेन्द्र मोदी के हाथों में हाथ डाले राजनीतिक गलियों में विचरते देखे जा सकते है। सुब्रमण्यम स्वामी अपनी पार्टी का विलय भारतीय जनता पार्टी में करने को तैयार हो गए है। जनता पार्टी के विलय और सुब्रमण्यम स्वामी की मोदी से नजदीकियों को मोदी की बड़ी सियासी सफलता के तौर पर देखा जा रहा है।
एनडीए के कुनबे को कम होता देख जहां कांग्रेस नीत पार्टियां खुश हो रही थी वही अब सुब्रमण्यम स्वामी के भाजपा के साथ आ जाने से भाजपा विरोधी पार्टियों की भृकुटिया तन गई है। सुब्रमण्यम स्वामी पालिटिक्स के अच्छे मैनेजर माने जाते है। सुब्रमण्यम स्वामी के बारे में ये भी कहा जाता है की उनकी पकड़ और पहचान हिन्दुस्तान के सभी दलों और उनके नेताओ से है।
भाजपा का लाभ ही इसी में है की वो सुब्रमण्यम स्वामी का इस्तेमाल अपने टूटते कुनबे को बचाने और बढाने में करे। नरेन्द्र मोदी ने सुब्रमण्यम स्वामी को अपने पाले में लाकर कांग्रेस की मुश्किल बढाने का भी इंतजाम कर लिया है। वजह साफ़ है सुब्रमण्यम स्वामी ने यूपीए सरकार के 9 सालों के दौरान कांग्रेस सरकार में हुए घोटालों को जिस तरह उजागर किया उसने कांग्रेस और प्रधानमंत्री की मुश्किलों को बढ़ा कर रखा दिया था।
सुब्रमण्यम स्वामी ने 2G स्पेक्ट्रम मामले में पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा की जिस तरह से घेरेबंदी की थी उसने कांग्रेस के साथ करूणानिधि की पार्टी द्रमुक को भी मुश्किलों में डाल दिया। सुब्रह्मण्यम स्वामी ही वो राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने इस मामले में याचिका दायर की थी। उन्ही की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 122 कंपनियों के लाइसेंस रद्द करने के आदेश दिए थे। सुब्रमण्यम स्वामी ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और वित्त मंत्री पी चिदंबरम के खिलाफ भी मोर्चा खोला जिसकी वजह से चिदंबरम भी कुछ दिनों तक मुश्किलों में फंसे रहे।
मोदी और स्वामी की पहचान 70 के दशक से है दोनों ही पुराने जनसंघी रहे है। लेकिन बाद के दिनों में दोनों की राह अलग हो गई। 1977 में इमरजेंसी के विरोध में संयुक्त विपक्ष ने जनता पार्टी का गठन किया स्वामी, जयप्रकाश नारायण, चौधरी चरण सिंह, राजनारायण के साथ जनता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से थे। 77 में जनता पार्टी ने कांग्रेस को बेदखल कर सत्ता पाई थी लेकिन जनता पार्टी की सरकार ज्यादा दिनों तक चली नहीं और सभी नेताओं के अहं ने पार्टी को तोड़ दिया सबकी राहें अलग अलग हो गई।
सुब्रमण्यम स्वामी ने पार्टी नहीं छोड़ी और पार्टी के चेहरे बनकर पार्टी चलाते रहे। 1990 में स्वामी को पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया तब से सुब्रमण्यम स्वामी अकेले ही पार्टी को चला रहे थे। जनता पार्टी के एकमात्र सांसद के तौर पर सुब्रमण्यम स्वामी ने कई बार संसद की शोभा बढ़ाई। सुब्रमण्यम स्वामी ने आखिरी बार 1999 में लोकसभा का चुनाव जीता उसके बाद वो लोकसभा नहीं पहुँच सके।
सुब्रमण्यम स्वामी 1996 से लगातार भाजपा के साथ रहे लेकिन वो अटल बिहारी वाजपेई द्वारा खुद की उपेक्षा को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे। सुब्रमण्यम स्वामी को अपनी उपेक्षा का बदला लेने का मौका 1999 में मिला जब वोट आफ मोशन के दौरान अटल बिहारी वाजपेई को अपना बहुमत साबित करना था। सुब्रमण्यम स्वामी ने एक चाय पार्टी का आयोजन किया जिसमें सोनिया गाँधी भी मौजूद थी उन्होंने ही जयललिता से सोनिया गाँधी की मुलाकात कराई उसी के बाद जयललिता ने अटल सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था।
अटल बिहारी वाजपेई की सरकार 17 अप्रैल 1999 को बहुमत साबित करते हुये एक वोट न जुटा पाने की वजह से गिर गई। सुब्रमण्यम स्वामी ने अपने राजनीतिक प्रबंधन से अटल सरकार को चलता कर दिया था, उसके बाद सुब्रमण्यम स्वामी भी चुनाव जीतकर लोकसभा नहीं पहुँच सके। संघ की वजह से सुब्रमण्यम स्वामी को राज्यसभा में भेजा जाता रहा। आज सुब्रमण्यम स्वामी एक बार फिर मुख्य धारा में वापसी को बैचैन है जिसके लिए उन्होंने अपने पुराने साथी और वर्तमान राजनीति में तेज़ी से अपना कद बढ़ा रहे नरेन्द्र मोदी का दामन थामने की पूरी तैयारी कर चुके है।
स्वामी के साथ को मोदी की बड़ी सियासी सफलता के तौर पर देखा जा रहा है वजह भी साफ़ है स्वामी जिस तरह से कांग्रेस की जड़ खोद रहे है आने वाले दिनों में कांग्रेस के नए घोटाले का दीदार भी वो जनता को करा सकते है। नरेन्द्र मोदी किस तरह अपनी सियासी सफलता के लिए सुब्रमण्यम स्वामी का इस्तेमाल करते है ये भारतीय राजनीति में देखना काफी दिलचस्प होगा। वैसे नरेन्द्र और और स्वामी की जुगलबंदी आगे क्या रूख दिखाएगी ये समय के साथ पता चलेगा।
एनडीए के कुनबे को कम होता देख जहां कांग्रेस नीत पार्टियां खुश हो रही थी वही अब सुब्रमण्यम स्वामी के भाजपा के साथ आ जाने से भाजपा विरोधी पार्टियों की भृकुटिया तन गई है। सुब्रमण्यम स्वामी पालिटिक्स के अच्छे मैनेजर माने जाते है। सुब्रमण्यम स्वामी के बारे में ये भी कहा जाता है की उनकी पकड़ और पहचान हिन्दुस्तान के सभी दलों और उनके नेताओ से है।
भाजपा का लाभ ही इसी में है की वो सुब्रमण्यम स्वामी का इस्तेमाल अपने टूटते कुनबे को बचाने और बढाने में करे। नरेन्द्र मोदी ने सुब्रमण्यम स्वामी को अपने पाले में लाकर कांग्रेस की मुश्किल बढाने का भी इंतजाम कर लिया है। वजह साफ़ है सुब्रमण्यम स्वामी ने यूपीए सरकार के 9 सालों के दौरान कांग्रेस सरकार में हुए घोटालों को जिस तरह उजागर किया उसने कांग्रेस और प्रधानमंत्री की मुश्किलों को बढ़ा कर रखा दिया था।
सुब्रमण्यम स्वामी ने 2G स्पेक्ट्रम मामले में पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा की जिस तरह से घेरेबंदी की थी उसने कांग्रेस के साथ करूणानिधि की पार्टी द्रमुक को भी मुश्किलों में डाल दिया। सुब्रह्मण्यम स्वामी ही वो राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने इस मामले में याचिका दायर की थी। उन्ही की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 122 कंपनियों के लाइसेंस रद्द करने के आदेश दिए थे। सुब्रमण्यम स्वामी ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और वित्त मंत्री पी चिदंबरम के खिलाफ भी मोर्चा खोला जिसकी वजह से चिदंबरम भी कुछ दिनों तक मुश्किलों में फंसे रहे।
मोदी और स्वामी की पहचान 70 के दशक से है दोनों ही पुराने जनसंघी रहे है। लेकिन बाद के दिनों में दोनों की राह अलग हो गई। 1977 में इमरजेंसी के विरोध में संयुक्त विपक्ष ने जनता पार्टी का गठन किया स्वामी, जयप्रकाश नारायण, चौधरी चरण सिंह, राजनारायण के साथ जनता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से थे। 77 में जनता पार्टी ने कांग्रेस को बेदखल कर सत्ता पाई थी लेकिन जनता पार्टी की सरकार ज्यादा दिनों तक चली नहीं और सभी नेताओं के अहं ने पार्टी को तोड़ दिया सबकी राहें अलग अलग हो गई।
सुब्रमण्यम स्वामी ने पार्टी नहीं छोड़ी और पार्टी के चेहरे बनकर पार्टी चलाते रहे। 1990 में स्वामी को पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया तब से सुब्रमण्यम स्वामी अकेले ही पार्टी को चला रहे थे। जनता पार्टी के एकमात्र सांसद के तौर पर सुब्रमण्यम स्वामी ने कई बार संसद की शोभा बढ़ाई। सुब्रमण्यम स्वामी ने आखिरी बार 1999 में लोकसभा का चुनाव जीता उसके बाद वो लोकसभा नहीं पहुँच सके।
सुब्रमण्यम स्वामी 1996 से लगातार भाजपा के साथ रहे लेकिन वो अटल बिहारी वाजपेई द्वारा खुद की उपेक्षा को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे। सुब्रमण्यम स्वामी को अपनी उपेक्षा का बदला लेने का मौका 1999 में मिला जब वोट आफ मोशन के दौरान अटल बिहारी वाजपेई को अपना बहुमत साबित करना था। सुब्रमण्यम स्वामी ने एक चाय पार्टी का आयोजन किया जिसमें सोनिया गाँधी भी मौजूद थी उन्होंने ही जयललिता से सोनिया गाँधी की मुलाकात कराई उसी के बाद जयललिता ने अटल सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था।
अटल बिहारी वाजपेई की सरकार 17 अप्रैल 1999 को बहुमत साबित करते हुये एक वोट न जुटा पाने की वजह से गिर गई। सुब्रमण्यम स्वामी ने अपने राजनीतिक प्रबंधन से अटल सरकार को चलता कर दिया था, उसके बाद सुब्रमण्यम स्वामी भी चुनाव जीतकर लोकसभा नहीं पहुँच सके। संघ की वजह से सुब्रमण्यम स्वामी को राज्यसभा में भेजा जाता रहा। आज सुब्रमण्यम स्वामी एक बार फिर मुख्य धारा में वापसी को बैचैन है जिसके लिए उन्होंने अपने पुराने साथी और वर्तमान राजनीति में तेज़ी से अपना कद बढ़ा रहे नरेन्द्र मोदी का दामन थामने की पूरी तैयारी कर चुके है।
स्वामी के साथ को मोदी की बड़ी सियासी सफलता के तौर पर देखा जा रहा है वजह भी साफ़ है स्वामी जिस तरह से कांग्रेस की जड़ खोद रहे है आने वाले दिनों में कांग्रेस के नए घोटाले का दीदार भी वो जनता को करा सकते है। नरेन्द्र मोदी किस तरह अपनी सियासी सफलता के लिए सुब्रमण्यम स्वामी का इस्तेमाल करते है ये भारतीय राजनीति में देखना काफी दिलचस्प होगा। वैसे नरेन्द्र और और स्वामी की जुगलबंदी आगे क्या रूख दिखाएगी ये समय के साथ पता चलेगा।

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