जिस केंद्र सरकार ने आज से 24 साल पहले 15 अप्रैल 1989 को नेताओं को अपराध के साथ राजनीति करने की छूट प्रदान की थी उसपर सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने ग्रहण लगा दिया। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आसन्न लोकसभा चुनावों से करीब एक साल पहले आया। इस फैसले ने सजायाफ्ता या किसी मामले में आने वाले फैसले का इंतज़ार कर रहे नेताओं की मुश्किलों को बढ़ा दिया। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने एक नए तरीके के भ्रष्टाचार की नींव पड़ने की संभावना बढ़ गई है । जो कोर्ट के फैसले को ध्यान में रखकर पुलिस, कानून, और न्याय व्यवस्था से होता हुआ फैलेगा।
सुप्रीम कोर्ट के 10 जुलाई को आये इस एतिहासिक फैसले ने भारत की राजनीति को नई दिशा दे दी। देश की राजनीति में प्रवेश की पहली शर्त ही दो चार मुकदमें होना आज उन्ही नेताओं की गले की हड्डी बन गया| जिन्होंने राजनीति करने के लिए इसे हथियार की तरह इस्तेमाल किया। राजनीति का अपराधीकरण रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व कानून की वह धारा ही निरस्त कर दी जिसका इस्तेमाल कर सजायाफ्ता नेता विधानसभाओं और देश की गौरवशाली संसद का सदस्य बनकर माननीय का दर्जा पा जाते थे।
सुप्रीम कोर्ट के इस फासले ने कुछ सरकारी तंत्र के लिए पैसे कमाने का रास्ता भी खोल दिया अब मुकदमें को कमजोर करने के लिए और सज़ा की अवधि को कम करने के लिए जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगो को उनके कार्यों और फैसलों के लिए मुंहमांगी कीमत भी मिलेगी। कहते है भारत जैसे देश में कानून बनाने से पहले उसका तोड़ ढूंढ़ लिया जाता है। जहा उच्चतम न्यायालय का ये फैसला कुछ नेताओं को उनके जिंदगी भर की राजनीति का ईनाम देने वाला साबित होगा वही कुछ दागी नेता आदेश के तोड़ के लिए अपने उस काले धन का मुंह भी खोल देंगे जिन्होंने राजनीति में रहते हुये उस पैसे को अनाप शनाप तरीके से कमाया होगा।
उच्चतम न्यायालय ने इस फैसले में ये प्रावधान किया है कि किस भी नेता पर आरोप तय होते और सज़ा का एलान होते ही उसकी सदस्यता खुद ब खुद समाप्त हो जायेगी इसने राष्ट्रीय से लेकर क्षेत्रीय राजनीति करने वाले दलों के हौसलों को कम कर दिया है। आज सभी पार्टियों के दागी नेताओं पर नज़र डालें तो स्थिति अपने आप साफ़ हो जाती है कि इस हरम में सभी नंगे है। सभी पार्टियों ने एक ही नीति दागी नेताओं के लिये अपना रखी है, तू मेरी पीठ खुजा मै तेरी खुजाता हूँ । पार्टियों में दागियों पर नज़र डाली जाए तो सभी एक दूसरे के साथ ही खड़े नज़र आते है। बस इतना फर्क है की किसी किसी में ज्यादा तो किसी में कम इस मामले को राजनीतिक दल एक दूसरे पर उंगली उठा सकते है।
आंकड़ो पर नज़र डालें तो तस्वीर खुद ब खुद सामने आ जाती है, कि भारतीय राजनीति में कोई भी दल दागी नेताओं के मोह से बच नहीं सका है। अगर उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम किसी भी दिशा की तरफ नज़र डालें तो सभी पार्टियाँ सज़ायाफ्ता या ट्रायल में चल रहे नेताओं से गलबहियाँ कर रही है। देश में इस समय 162 मौजूदा सांसदों के ऊपर आपराधिक मामले चल रहे है। इन मामलों में 76 सांसद ऐसे है जिनपर ऐसे आरोप है जो न्यायालय में साबित हो जाये तो इन्हें पांच साल से ज्यादा की सज़ा हो सकती है। वही देश के सभी 28 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों में 1258 विधायक ऐसे है जिनपर आपराधिक मामले दर्ज है। इनमे से 605 विधायकों पर गंभीर आपराधिक मामलें है।
देश की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों में ज्यादा दागी है तो उसमें झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के 82% , समाजवादी पार्टी के 48% , जदयू के 47% , बहुजन समाज पार्टी के 34% , भाजपा के 31% , वही कांग्रेस के 21% सांसद और विधायक दागियों की श्रेणी में है। वही देश की राजनीति को दिशा देने वाले लोकसभा के दोनों सदनों लोकसभा में 30% वही उच्च सदन यानि राज्यसभा में 17% दागी है। देश की प्रमुख पार्टियों में जो देश के लिए फैसले लेने का दम भारत है उनमे जिन बड़े नेताओं पर इस कानून की धारा हटने से आफत आ सकती है उनमे भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी बाबरी मस्जिद मामले में आरोपी है। वही उत्तर प्रदेश में भाजपा की नैया पार लगाने का दम भर रहे नरेन्द्र मोदी के करीबी अमित शाह फर्जी मुठभेड़ मामले में आरोपी है।
चारा घोटाले की आफत लालू यादव के ऊपर झूल रही है वही कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के लिए एक समय आफत बन गए ए राजा 2-G स्पेक्ट्रम घोटाले में आरोपी है। इनके अलावा जयललिता, कनिमोझी और दयानिधि मारन ऐसे नेता है जो अपनी अपनी पार्टियों के कर्ताधर्ता माने जाते है। अगर राज्यवार दागी नेताओं के अपराधों पर नज़र डाली जाये तो सबसे आगे बिहार में 58 % ऐसे नेता है जिनपर कोई ना कोई अपराधिक मामला चल रहा है। इसके बाद यूपी का नंबर आता है जहा 47 % , दिल्ली में 44 %, वही गुजरात में 31% दागी नेता मौजूद है। न्यायालय ने धारा 8 की उपधारा 1 से 3 में अपराधों की सूची है । इसमें दोषी ठहराये गये नेताओं को 6 साल की सज़ा का प्रावधान है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गये इस फैसले को कोर्ट की नज़रों में लाने का काम देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ। राजनीति का अपराधीकरण को सामने लाने और इस पर शिकंजा कसने के लिए लखनऊ की एक संस्था ने उच्चतम न्यायालय के संज्ञान में इस मामले को रखा था। उत्तर प्रदेश विधानसभा में मौजूद माननीयों में से करीब 47 % माननीय ऐसे हैं जिनपर आपराधिक मामले दर्ज है। प्रदेश की विधानसभा में 403 विधायकों में से 189 विधायक ऐसे है जिनपर आपराधिक मामले चल रहे है उनमे से 98 विधायको के ऊपर गंभीर मामले दर्ज है।
पार्टी वार अगर नज़र डाली जाये तो प्रदेश की सत्ता पर काबिज समाजवादी पार्टी के 224 विधायकों में से 111 के ऊपर आपराधिक मामलें है, बसपा के 80 विधायको में से 29 के ऊपर आपराधिक मामले है। भाजपा के 47 विधायकों में से 25 विधायकों के ऊपर आपराधिक मामले है। कांग्रेस के 28 में से 13 विधायको के ऊपर आपराधिक मामले है। वही रालोद के 9 विधायकों में से 2 विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज है।
बहरहाल सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने देश की राजनीति में सफाई के अभियान की शुरुवात कर दी है। कोर्ट के फैसले ने राजनीतिक पार्टियों को परेशानी में भी डाल दिया है लेकिन स फैसले की वजह से कुछ जिम्मेदार लोगो की बांछे भी खिल गई है वजह भी साफ़ है जहा चुनावी राजनीति होगी वहा पैसा, अपराध और कानून को तोड़ने वाली बाते होंगी ही। अब कानून तोड़ने वालों को बचाने के लिए कुछ नियम तो तोड़ने मरोड़ने होंगे जिसके लिए पैसा पानी की तरह बहेगा| उच्चतम न्यायालय को इस ओर भी ध्यान देकर कोई एतिहासिक निर्णय सुनाना चाहिये ताकि निचले स्तर पर इस फैसले से होने वाले भ्रष्टाचार को रोका जा सके।
सुप्रीम कोर्ट के 10 जुलाई को आये इस एतिहासिक फैसले ने भारत की राजनीति को नई दिशा दे दी। देश की राजनीति में प्रवेश की पहली शर्त ही दो चार मुकदमें होना आज उन्ही नेताओं की गले की हड्डी बन गया| जिन्होंने राजनीति करने के लिए इसे हथियार की तरह इस्तेमाल किया। राजनीति का अपराधीकरण रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व कानून की वह धारा ही निरस्त कर दी जिसका इस्तेमाल कर सजायाफ्ता नेता विधानसभाओं और देश की गौरवशाली संसद का सदस्य बनकर माननीय का दर्जा पा जाते थे।
सुप्रीम कोर्ट के इस फासले ने कुछ सरकारी तंत्र के लिए पैसे कमाने का रास्ता भी खोल दिया अब मुकदमें को कमजोर करने के लिए और सज़ा की अवधि को कम करने के लिए जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगो को उनके कार्यों और फैसलों के लिए मुंहमांगी कीमत भी मिलेगी। कहते है भारत जैसे देश में कानून बनाने से पहले उसका तोड़ ढूंढ़ लिया जाता है। जहा उच्चतम न्यायालय का ये फैसला कुछ नेताओं को उनके जिंदगी भर की राजनीति का ईनाम देने वाला साबित होगा वही कुछ दागी नेता आदेश के तोड़ के लिए अपने उस काले धन का मुंह भी खोल देंगे जिन्होंने राजनीति में रहते हुये उस पैसे को अनाप शनाप तरीके से कमाया होगा।
उच्चतम न्यायालय ने इस फैसले में ये प्रावधान किया है कि किस भी नेता पर आरोप तय होते और सज़ा का एलान होते ही उसकी सदस्यता खुद ब खुद समाप्त हो जायेगी इसने राष्ट्रीय से लेकर क्षेत्रीय राजनीति करने वाले दलों के हौसलों को कम कर दिया है। आज सभी पार्टियों के दागी नेताओं पर नज़र डालें तो स्थिति अपने आप साफ़ हो जाती है कि इस हरम में सभी नंगे है। सभी पार्टियों ने एक ही नीति दागी नेताओं के लिये अपना रखी है, तू मेरी पीठ खुजा मै तेरी खुजाता हूँ । पार्टियों में दागियों पर नज़र डाली जाए तो सभी एक दूसरे के साथ ही खड़े नज़र आते है। बस इतना फर्क है की किसी किसी में ज्यादा तो किसी में कम इस मामले को राजनीतिक दल एक दूसरे पर उंगली उठा सकते है।
आंकड़ो पर नज़र डालें तो तस्वीर खुद ब खुद सामने आ जाती है, कि भारतीय राजनीति में कोई भी दल दागी नेताओं के मोह से बच नहीं सका है। अगर उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम किसी भी दिशा की तरफ नज़र डालें तो सभी पार्टियाँ सज़ायाफ्ता या ट्रायल में चल रहे नेताओं से गलबहियाँ कर रही है। देश में इस समय 162 मौजूदा सांसदों के ऊपर आपराधिक मामले चल रहे है। इन मामलों में 76 सांसद ऐसे है जिनपर ऐसे आरोप है जो न्यायालय में साबित हो जाये तो इन्हें पांच साल से ज्यादा की सज़ा हो सकती है। वही देश के सभी 28 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों में 1258 विधायक ऐसे है जिनपर आपराधिक मामले दर्ज है। इनमे से 605 विधायकों पर गंभीर आपराधिक मामलें है।
देश की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों में ज्यादा दागी है तो उसमें झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के 82% , समाजवादी पार्टी के 48% , जदयू के 47% , बहुजन समाज पार्टी के 34% , भाजपा के 31% , वही कांग्रेस के 21% सांसद और विधायक दागियों की श्रेणी में है। वही देश की राजनीति को दिशा देने वाले लोकसभा के दोनों सदनों लोकसभा में 30% वही उच्च सदन यानि राज्यसभा में 17% दागी है। देश की प्रमुख पार्टियों में जो देश के लिए फैसले लेने का दम भारत है उनमे जिन बड़े नेताओं पर इस कानून की धारा हटने से आफत आ सकती है उनमे भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी बाबरी मस्जिद मामले में आरोपी है। वही उत्तर प्रदेश में भाजपा की नैया पार लगाने का दम भर रहे नरेन्द्र मोदी के करीबी अमित शाह फर्जी मुठभेड़ मामले में आरोपी है।
चारा घोटाले की आफत लालू यादव के ऊपर झूल रही है वही कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के लिए एक समय आफत बन गए ए राजा 2-G स्पेक्ट्रम घोटाले में आरोपी है। इनके अलावा जयललिता, कनिमोझी और दयानिधि मारन ऐसे नेता है जो अपनी अपनी पार्टियों के कर्ताधर्ता माने जाते है। अगर राज्यवार दागी नेताओं के अपराधों पर नज़र डाली जाये तो सबसे आगे बिहार में 58 % ऐसे नेता है जिनपर कोई ना कोई अपराधिक मामला चल रहा है। इसके बाद यूपी का नंबर आता है जहा 47 % , दिल्ली में 44 %, वही गुजरात में 31% दागी नेता मौजूद है। न्यायालय ने धारा 8 की उपधारा 1 से 3 में अपराधों की सूची है । इसमें दोषी ठहराये गये नेताओं को 6 साल की सज़ा का प्रावधान है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गये इस फैसले को कोर्ट की नज़रों में लाने का काम देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ। राजनीति का अपराधीकरण को सामने लाने और इस पर शिकंजा कसने के लिए लखनऊ की एक संस्था ने उच्चतम न्यायालय के संज्ञान में इस मामले को रखा था। उत्तर प्रदेश विधानसभा में मौजूद माननीयों में से करीब 47 % माननीय ऐसे हैं जिनपर आपराधिक मामले दर्ज है। प्रदेश की विधानसभा में 403 विधायकों में से 189 विधायक ऐसे है जिनपर आपराधिक मामले चल रहे है उनमे से 98 विधायको के ऊपर गंभीर मामले दर्ज है।
पार्टी वार अगर नज़र डाली जाये तो प्रदेश की सत्ता पर काबिज समाजवादी पार्टी के 224 विधायकों में से 111 के ऊपर आपराधिक मामलें है, बसपा के 80 विधायको में से 29 के ऊपर आपराधिक मामले है। भाजपा के 47 विधायकों में से 25 विधायकों के ऊपर आपराधिक मामले है। कांग्रेस के 28 में से 13 विधायको के ऊपर आपराधिक मामले है। वही रालोद के 9 विधायकों में से 2 विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज है।
बहरहाल सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने देश की राजनीति में सफाई के अभियान की शुरुवात कर दी है। कोर्ट के फैसले ने राजनीतिक पार्टियों को परेशानी में भी डाल दिया है लेकिन स फैसले की वजह से कुछ जिम्मेदार लोगो की बांछे भी खिल गई है वजह भी साफ़ है जहा चुनावी राजनीति होगी वहा पैसा, अपराध और कानून को तोड़ने वाली बाते होंगी ही। अब कानून तोड़ने वालों को बचाने के लिए कुछ नियम तो तोड़ने मरोड़ने होंगे जिसके लिए पैसा पानी की तरह बहेगा| उच्चतम न्यायालय को इस ओर भी ध्यान देकर कोई एतिहासिक निर्णय सुनाना चाहिये ताकि निचले स्तर पर इस फैसले से होने वाले भ्रष्टाचार को रोका जा सके।

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